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सोमवार, 8 जुलाई 2019

Bharatpur Lohagarh iron Fort, Unbeatable durg भरतपुर का लोहागढ किला, अजेय दुर्ग

  • मथुरा भरतपुर यात्रा 3         Sandeep Panwar 
मथुरा भ्रमण के बाद भरतपुर का अजेय दुर्ग लोहागढ़ किला देखने चल दिये। 
भरतपुर का नाम महाराजा सूरजमल के अद्भुत साहस और वीरता के कारण मान सम्मान से लिया जाता है।  यदि भरतपुर के महाराजा सूरजमल नहीं हुए होते तो मुझे नहीं लगता कि इतना मान सम्मान देश की 6 करोड से ज्यादा की जाट बिरादरी को वर्तमान समय में मिल पाता। जाट बिरादरी प्राचीन समय से ही मेहनती व लडाकू रही है। 

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

Humayun's tomb हुमायूँ का मकबरा, मुगलों का कब्रिस्तान



कुतुबमीनार उर्फ विष्णु स्तंभ की सैर करने के बाद हमारा काफिला “मुगलों का कब्रिस्तान” उर्फ हुमायूँ का मकबरे पहुँच चुका है। इस जगह की सैर कराने से पहले आपको इस स्थल की राम कहानी बता देता हूँ। शुरुआत करता हूँ, यहाँ पहुँचा कैसे जाये? यहाँ पहुँचना बहुत ही आसान है। दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के बिल्कुल पास में ही है। निजामुद्दीन से यहाँ पहुँचने के लिये पैदल दूरी ही है जो आसानी से टहलते हुए पार की जा सकती है। यहाँ से दिल्ली का चिडियाघर (Zoological park of Delhi) भी ज्यादा दूर नहीं रह जाता है। दोनों के बीच में सिर्फ एक किमी का ही फासला रह जाता है। यहाँ का नजदीकी मैट्रो स्टेशन जवाहर लाल नेहरु मैट्रो स्टेशन है। हम कुतुबमीनार से जिस बस में सवार हुए थे वह बस मोरीगेट जा रही थी जो इसके सामने से होकर जाती है। सडक पार करते ही पूर्व दिशा की ओर एक लाल रंग का बोर्ड दिखाई देता है। जिस पर हुमायूँ का मकबरा लिखा हुआ था। यह मुगल परिवार का एक शाही कब्रिस्तान (मुर्दाघर अलग चीज है) है। बोले तो (मुगलों का शाही कब्रिस्तान)। इस ईमारत में मुगलों के परिवार के सैकडों सदस्यों की कब्र बनी हुई है। इसलिये मैंने इसके लिये शाही कब्रिस्तान शब्द का उपयोग किया है।
Humayun’s Tomb हुमायूँ का मकबरा (मुगलों का कब्रिस्तान graveyard of Mugal)

बुधवार, 5 जुलाई 2017

Qutub Minar कुतुबमीनार या विष्णु स्तम्भ


कुतुबमीनार उर्फ विष्णु स्तंभ, जी हाँ दोस्तों, आज आपको भारत के दिल कहे जाने वाली दिल्ली के एतिहासिक स्मारक कुतुबमीनार की सैर कराते है। कुछ वर्षों पहले तक दिल्ली को दिलवालों का शहर कहा जाता था लेकिन वर्तमान में यह भिखमंगों का शहर सा लगता है। ऐसा नहीं है कि सभी भिखमंगे है, अधिकतर मेहनतकश लोग है जो मेहनत की रोटी खाना पसन्द करते है। भिखमंगे वाली बात राजनीति की ओर मुड जायेगी। जो मैं नहीं चाहूँगा। वैसे तो मैं इससे पहले भी कई बार कुतुबमीनार देख चुका हूँ। पहले की तीन यात्राओं में से, दो में तो मैंने फोटो लिये ही नहीं थे। दो बार की यात्रा में यहाँ के फोटो लिये थे। जो पुराने फोटो अभी मेरे पास है। वो इक्के-दुक्के ही है। वो भी कागज वाले। आजकल तो डिजीटल कैमरे आ गये है। कुछ वर्ष पहले ऐसा न था। पहले हम रील वाले कैमरा उपयोग करते थे जिसमें 36 फोटो हुआ करते थे। उसमें से आधे फोटो किसी न किसी कारण खराब हो जाया करते थे। यह लेख वैसे भी लम्बा होने जा रहा है। 2,800 शब्दों व 30 से ज्यादा फोटो तो इसी लेख में हो गये है। ऊपर से मैं यह फोटो वाला किस्सा शुरु में ही घुसा बैठा। चलो फोटो वाले किस्से को यही दफन करते हुए, आगे कुत्ता बीमार! अरे कुतुब मीनार की ओर बढते है। इस यात्रा में मेरा पूरा परिवार साथ गया था। पूरा परिवार बोले तो मियाँ बीबी बच्चों समेत। इस यात्रा में बम्बई नगरी में रहने वाला अपना इकलौता दोस्त विशाल राठौर भी साथ आने वाला था।
World heritage monument site... Qutub Minar, Mehrauli कुतुब मीनार, महरौली

सोमवार, 4 अगस्त 2014

Rani Lakshmi bai's Jhansi Fort रानी लक्ष्मीबाई वाला झांसी का किला

KHAJURAHO-ORCHA-JHANSI-12                               SANDEEP PANWAR, Jatdevta
इस यात्रा के सभी लेख के लिंक यहाँ है।01-दिल्ली से खजुराहो तक की यात्रा का वर्णन
02-खजुराहो के पश्चिमी समूह के विवादास्पद (sexy) मन्दिर समूह के दर्शन
03-खजुराहो के चतुर्भुज व दूल्हा देव मन्दिर की सैर।
04-खजुराहो के जैन समूह मन्दिर परिसर में पार्श्वनाथ, आदिनाथ मन्दिर के दर्शन।
05-खजुराहो के वामन व ज्वारी मन्दिर
06-खजुराहो से ओरछा तक सवारी रेलगाडी की मजेदार यात्रा।
07-ओरछा-किले में लाईट व साऊंड शो के यादगार पल 
08-ओरछा के प्राचीन दरवाजे व बेतवा का कंचना घाट 
09-ओरछा का चतुर्भुज मन्दिर व राजा राम मन्दिर
10- ओरछा का जहाँगीर महल मुगल व बुन्देल दोस्ती की निशानी
11- ओरछा राय प्रवीण महल व झांसी किले की ओर प्रस्थान
12- झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का झांसी का किला।
13- झांसी से दिल्ली आते समय प्लेटफ़ार्म पर जोरदार विवाद

आज के लेख में दिनांक 28-04-2014 को की गयी यात्रा के बारे में बताया जा रहा है। यदि आपको इस यात्रा के बारे में शुरु से पढना है तो ऊपर दिये गये लिंक पर क्लिक करे। इस यात्रा में अभी तक आपने पढा कि मैं खजुराहो, ओरछा भ्रमण करने के बाद झांसी पहुँच गया। झांसी व उसके आसपास कई स्थल देखने लायक है उनमें झांसी का किला सर्वोपरी है। देश को अंग्रेजो से मुक्त कराने की पहली लडाई में बुन्देलखन्ड के वीरों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से जमकर मुकाबला किया था। सन 1857 के गदर में बुन्देलखन्ड के वीरों ने अंग्रेजों की हालत खराब की थी।

सोमवार, 28 जुलाई 2014

Orccha -Raya Parveen Mahal and Jhansi ओरछा राय प्रवीण महल व झांसी प्रस्थान

KHAJURAHO-ORCHA-JHANSI-11

इस यात्रा के सभी लेख के लिंक यहाँ है।01-दिल्ली से खजुराहो तक की यात्रा का वर्णन
02-खजुराहो के पश्चिमी समूह के विवादास्पद (sexy) मन्दिर समूह के दर्शन
03-खजुराहो के चतुर्भुज व दूल्हा देव मन्दिर की सैर।
04-खजुराहो के जैन समूह मन्दिर परिसर में पार्श्वनाथ, आदिनाथ मन्दिर के दर्शन।
05-खजुराहो के वामन व ज्वारी मन्दिर
06-खजुराहो से ओरछा तक सवारी रेलगाडी की मजेदार यात्रा।
07-ओरछा-किले में लाईट व साऊंड शो के यादगार पल 
08-ओरछा के प्राचीन दरवाजे व बेतवा का कंचना घाट 
09-ओरछा का चतुर्भुज मन्दिर व राजा राम मन्दिर
10- ओरछा का जहाँगीर महल मुगल व बुन्देल दोस्ती की निशानी
11- ओरछा राय प्रवीण महल व झांसी किले की ओर प्रस्थान
12- झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का झांसी का किला।
13- झांसी से दिल्ली आते समय प्लेटफ़ार्म पर जोरदार विवाद

आज के लेख में दिनांक 28-04-2014 को की गयी यात्रा के बारे में बताया जा रहा है। यदि आपको इस यात्रा के बारे में शुरु से पढना है तो ऊपर दिये गये लिंक पर क्लिक करे। इस यात्रा में अभी तक आपने पढा कि खजुराहो के बाद ओरछा यात्रा में जहाँगीर महल देखने के बाद आगे चल दिये। बाहर आते ही रेल वाला अमेरिकी पेट्रिक मिला। हमारा फ़ोटो लेने के बाद वह जहाँगीर महल के अन्दर चला गया। हम राय प्रवीन देखने चल दिये। राय प्रवीण महल की कहानी भी काफ़ी मजेदार है। बुन्देल राज्य की सबसे होनहार गायिका, नृतिका व गीतकार का दर्जा इसी प्रवीण राय को प्राप्त था। राय प्रवीण की यही प्रसिद्दी इसकी मुसीबतों का कारण भी बन गयी। इनकी चर्चा मुगल बादशाह के कानों में भी पहुँची तो मुगल बादशाह ने ओरछा के राजा से कहा कि राय प्रवीण हमारे दरबार की शोभा बढायेगी। आखिरकार मुगल बादशाह ने राय प्रवीण को आगरा बुलवा लिया। यह गायिका राय प्रवीण भी पहुँची हुई चीज थी।

गुरुवार, 10 जुलाई 2014

Orcha Fort- Light and sound show ओरछा किले में उजाला व आवाज शो

KHAJURAHO-ORCHA-JHANSI-07

आज के लेख में दिनांक 27-04-2014 की यात्रा के बारे में बताया जा रहा है। यदि आपको इस यात्रा के बारे में शुरु से पढना है तो नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करे। ओरछा रेलवे स्टेशन से ओरछा नगरी की दूरी मात्र 6 किमी है। स्थानीय ऑटो में बैठकर आगे वाली सीट पर चालक के साथ यात्रा करने में मजा आया। ओरछा में सडक की स्थिति बहुत शानदार है। सडक तो खजुराहो में भी शानदार ही मिली थी। आटो में यात्रा करते समय एक पल भी ऐसा नहीं लगा कि सडक में कोई गडडा आया हो। ओरछा पहुँचने में मुश्किल से 10 मिनट का समय ही लगा होगा। ऑटो वाले ने राम मन्दिर के सामने वाले चौराहे पर जाकर उतार दिया। अंधेरा होने में ज्यादा समय नहीं बचा था। इसलिये सोचा कि पहले रुकने का ठिकाना ही तलाश कर लिया जाये। ओरछा नगरी भले ही आस्था व पर्यटन मिश्रित नगरी के तौर पर जानी पहचानी जाती हो लेकिन यहाँ के कुदरती नजारे हिमालय के नजारों से टक्कर लेते हुए दिखायी देते प्रतीत होते है।
इस यात्रा के सभी लेख के लिंक यहाँ है।01-दिल्ली से खजुराहो तक की यात्रा का वर्णन
02-खजुराहो के पश्चिमी समूह के विवादास्पद (sexy) मन्दिर समूह के दर्शन
03-खजुराहो के चतुर्भुज व दूल्हा देव मन्दिर की सैर।
04-खजुराहो के जैन समूह मन्दिर परिसर में पार्श्वनाथ, आदिनाथ मन्दिर के दर्शन।
05-खजुराहो के वामन व ज्वारी मन्दिर
06-खजुराहो से ओरछा तक सवारी रेलगाडी की मजेदार यात्रा।
07-ओरछा-किले में लाईट व साऊंड शो के यादगार पल 
08-ओरछा के प्राचीन दरवाजे व बेतवा का कंचना घाट 
09-ओरछा का चतुर्भुज मन्दिर व राजा राम मन्दिर
10- ओरछा का जहाँगीर महल मुगल व बुन्देल दोस्ती की निशानी
11- ओरछा राय प्रवीण महल व झांसी किले की ओर प्रस्थान
12- झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का झांसी का किला।
13- झांसी से दिल्ली आते समय प्लेटफ़ार्म पर जोरदार विवाद


बुधवार, 12 मार्च 2014

Bhangarh-India's most haunted place भानगढ-भारत का सबसे बदनाम भूतहा किला

भानगढ-सरिस्का-पान्डुपोल-यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे दिये गये है।
01- दिल्ली से अजबगढ होते हुए भानगढ तक की यात्रा।
02- भानगढ में भूतों के किले की रहस्मयी दुनिया का सचित्र विवरण
03- राजस्थान का लघु खजुराहो-सरिस्का का नीलकंठ महादेव मन्दिर
04- सरिस्का वन्य जीव अभ्यारण में जंगली जानवरों के मध्य की गयी यात्रा।
05- सरिस्का नेशनल पार्क में हनुमान व भीम की मिलन स्थली पाण्डु पोल
06- राजा भृतहरि समाधी मन्दिर व गुफ़ा राजा की पूरी कहानी विवरण सहित
07- नटनी का बारा, उलाहेडी गाँव के खण्डहर व पहाडी की चढाई
08- नीमराणा की 12 मंजिल गहरी ऐतिहासिक बावली दर्शन के साथ यात्रा समाप्त

BHANGARH-SARISKA-PANDUPOL-NEEMRANA-02                           SANDEEP PANWAR

हमारी गाड़ी घाटा व थाना गाजी नामक जगह की ओर से आयी थी। उसके बाद हम अजबगढ के खण्ड़हरों से होते हुए भानगढ तक पहुँचे। आज आपको भानगढ के भूतों वाले किले में घूमाया व इसके बारे में विस्तार से बताया जा रहा है। जयपुर से सरिस्का/ अलवर जाने वाले मुख्य मार्ग से भानगढ किले की दूरी लगभग 3 किमी हटकर है। इस मोड़ से कोई एक किमी पहले सरिस्का की ओर सारा माता मन्दिर आता है। यहाँ रात ठहरने के ठिकाना मिल जाता है। यह मन्दिर भानगढ से वापिस आते समय सीधे हाथ पड़ता है।


मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

Sangla valley & Kamru fort सांगला घाटी और कमरु का किला

किन्नौर व लाहौल-स्पीति की बाइक यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे दिये है।
11- सतलुज व स्पीति के संगम (काजिंग) से नाको गाँव की झील तल
12- नाको गाँव की झील देखकर खतरनाक मलिंग नाला पार कर खरदांगपो तक
13- खरदांगपो से सुमडो (कौरिक बार्ड़र) के पास ममी वाले गियु गाँव तक (चीन की सीमा सिर्फ़ दो किमी) 
14- गियु में लामा की 500 वर्ष पुरानी ममी देखकर टाबो की मोनेस्ट्री तक
15- ताबो मोनेस्ट्री जो 1000 वर्ष पहले बनायी गयी थी।
16- ताबो से धनकर मोनेस्ट्री पहुँचने में कुदरत के एक से एक नजारे
17- धनकर गोम्पा (मठ) से काजा
18- की गोम्पा (मठ) व सड़क से जुड़ा दुनिया का सबसे ऊँचा किब्बर गाँव (अब नहीं रहा)
20- कुन्जुम दर्रे के पास (12 km) स्थित चन्द्रताल की बाइक व ट्रेकिंग यात्रा
21- चन्द्रताल मोड बातल से ग्रामफ़ू होकर रोहतांग दर्रे तक
22- रोहतांग दर्रे पर वेद व्यास कुन्ड़ जहां से व्यास नदी का आरम्भ होता है।
23- मनाली का वशिष्ट मन्दिर व गर्म पानी का स्रोत

KINNAUR, LAHUL SPITI, BIKE TRIP-08                             SANDEEP PANWAR

मेरे लिये 3 घन्टे बाद सड़क पर कैमरे की कैप मिलना दुर्लभ बात थी। कैप मिटटी से सनी हुई थी इसलिये कैप को विनशीटर की जेब में ड़ाल लिया। सांगला पहुँचते ही किला देखना तय था लेकिन सांगला आते ही बारिश फ़िर शुरु हो लगी। बारिश को देखते हुए पहले रुकने का ठिकाना तलाश करना था। मनु ने बताया कि यहाँ से किले की चढाई अलग होती है। हम सोच रहे थे पहले अपना सामान बारिश से सुरक्षित कर ले। उसके बाद किला देखने जायेंगे। बारिश को देखते हुए हमारे पास दो ही विकल्प थे। पहला यह कि कोई सस्ता व अच्छा कमरा देखा जाये, दूसरा विकल्प था कि अपना टैन्ट ऐसी जगह लगाये जाये जहाँ बारिश से रात भर बचा रहा जाये। कमरे या टैन्ट में किसमें रुका जाये? इस बात पर मनु व राकेश में विवाद होने लगा?


शनिवार, 23 नवंबर 2013

Nagarkot/ Kangra Fort नगरकोट कांगड़ा दुर्ग किला

करेरी-कांगड़ा-धर्मशाला यात्रा के लिंक नीचे दिये है।

01- आओ करेरी झील धर्मशाला देखने चले।
02- धर्मशाला से करेरी गाँव की ट्रेकिंग भयंकर बारिश के बीच।
03- करेरी गाँव के शानदार नजारे, और भूत बंगला
04- धर्मशाला की ड़ल लेक।
05- धर्मशाला के चाय बागान के बीच यादगार घुमक्कड़ी।
06- कुनाल पत्थरी माता मन्दिर, शक्ति पीठ माता के 52 पीठ में से एक।
07- नगरकोट कांगड़ा का मजबूत दुर्ग / किला
08- मैक्लोड़गंज के भागसूनाग स्विमिंग पुल के ठन्ड़े पानी में स्नान  Back to Delhi

KARERI-KANGRA-DHARAMSHALA-07


कुनाल पत्थरी माता मन्दिर से वापसी में बस में सवार होकर कांगड़ा का किला देखने के लिये चल दिये। धर्मशाला से कांगड़ा तक लगातार ढ़लान है जिस कारण वाहनों को लगातार ब्रेक मारने पड़ते है। यहाँ कांगड़ा जाते समय सड़क किनारे उल्टे हाथ (दिल्ली से जाओगे तो सीधे हाथ) आयेगा। जिस बस में बैठे थे उस बस के ब्रेक कुछ ज्यादा चू-चू, चिरड़-चिरड़ कर रहे थे कि बस वाले को हार्न बजाने की जरुरत ही नहीं थी। हमारी बस कांगड़ा में उस तिराहे पर पहुँची जहाँ पठानकोट से मन्डी वाला मार्ग धर्मशाला वाले मार्ग में मिलता है। हमारी बस यहाँ काफ़ी देर खडी रही कि तभी मनु भाई की नजर सामने वाली दुकान पर गयी, उस दुकान में गर्मागर्म समौसे तले जा रहे थे। मनु बस से नीचे उतर कर सबके लिये एक-एक समौसा ले आया। हमने बस में ही गर्म-गर्मा समौसे को चट कर ड़ाला।



बुधवार, 18 सितंबर 2013

Red fort दिल्ली का लाल किला /लाल कोट

TOURIST PLACE IN NEW DELHI-01                                                   SANDEEP PANWAR 
दिल्ली का लाल किला तो मैंने बहुत बार देखा हुआ है सपरिवार देखने का कार्यक्रम पहले भी एक बाद बन चुका था लेकिन उस दिन दशहरा होने के कारण लाल किले में जाने वालों की इतनी ज्यादा भीड़ थी कि टिकट की लाईन ही 200 मीटर लम्बी मिली। उस दिन लाल किला छोड़ दिया गया। अभी अगस्त में चिरमिरी छत्तीसगढ़ के रहने वाले अपने प्रशंसक कम दोस्त अमित शुक्ला जी दिल्ली भ्रमण पर आये हुए थे। उनसे अमरकंटक में पहले ही वायदा कर दिया गया था आप जब भी दिल्ली अपनी बड़ी बहिन के यहाँ आओगे तो एक दिन हम दोनों सपरिवार दिल्ली के किसी स्थल पर घूमने चलेंगे। इसी तय शुदा क्रम में जब अमित जी दिल्ली आये तो मैं अपने परिवार को बस में लेकर अमित की बड़ी बहिन के यहाँ पहुँच गया। 



मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

Daulatatabad Fort-Aurangabad city-Nashik-Delhi Journey दौलताबाद किले से औरंगाबाद नाशिक होते हुए दिल्ली तक यात्रा वर्णन।

भीमाशंकर-नाशिक-औरंगाबाद यात्रा-16                                                                    SANDEEP PANWAR

वापसी की कहानी भी कम मजेदार नहीं थी हम दोनों ने किला देखने के बाद वहाँ से नीचे उतरना शुरु किया। उतरने से पहले हमने वहाँ चारों कोनों में घूम-घूम कर अपनी तसल्ली कर ली थी कि इससे बढ़िया नजारा और कुछ है या नहीं। यहाँ टॉप से नीचे देखने पर किले की चारदीवारी बहुत पतली लाइन जैसी दिखायी दे रही थी। ऊपर से देखने पर किले की चारदीवारी की संख्या साफ़ दिखायी दे रही थी। नीचे खड़े होकर जो बाते हमारी समझ से बाहर थी वह सब कुछ ऊपर से समझ आ रहा था। हमने धीरे-धीरे वहाँ से नीचे उतरना आरम्भ किया। यहाँ शीर्ष से नीचे उतरने के लिये हमें एक लम्बे घुमावदार मार्ग से होकर ऊपर आना पड़ा था वापसी में भी उसी मार्ग का उपयोग करना पड़ा। इस मार्ग को देखकर मुझे राजस्थान के जोधपुर शहर में गढ़ की याद हो आयी वहाँ भी इसी प्रकार की जोरदार चढ़ाई बनायी गयी है। जोधपुर का मेहरानगढ़ दुर्ग इसके सामने बच्चा लगता है।

शीर्ष पर स्थित झरोखे से शहर

कुछ देर बाद हम अंधेरी सुरंग के मुहाने पर पहुँच चुके थे। यहाँ आकर हमने एक मन्दिर देखा। जिसके बारे में बताया गया कि यह यहाँ के मराठा राजाओं का बनाया हुआ है। गणॆश भगवान की मूर्ति यहाँ होने के कारण इसे गणेश मन्दिर कहा जाता है। गणेश जी को राम-राम कर हम वहाँ से आगे अंधेरी गुफ़ा में घुसने के लिये चल दिये। गुफ़ा में ऊपर आते समय काफ़ी सावधानी बरतते हुए आये थे लेकिन नीचे जाते समय उससे भी ज्यादा सावधान रहना पड़ा। ऊपर चढ़ते समय गिरने से सिर्फ़ घुटने फ़ुटने का अंदेशा रहता है, लेकिन नीचे उतरते समय सब कुछ, मतलब सब कुछ, फ़ुटने का ड़र बना रहता है। धीरे-धीरे हम अंधेरी पार कर नीचे उस पुल तक आ गये, जिसे यहाँ आने का एकमात्र मार्ग माना जाता है। अबकी बार हमने पुल के पास खड़े होकर वहाँ के हालात का जायजा अच्छी तरह से लिया था। लोहे वाले पुल के नीचे एक अन्य पत्थर की सीढियाँ वाला पुल दिखायी दे रहा था जिससे यह समझ आने लगा कि लोहे वाला पुल आजादी के बाद पर्य़टकों की सहायता के लिय बनाया गया होगा। पहले सीढियों वाले पुल पर नीचे उतरकर ऊपर चढ़ते समय हमलावर पर हमला करने में आसानी रहती थी।

परकोटे/महाकोट का नजारा

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

Hill area in (Devagiri/ Daulatatabad Fort near Aurangabad city औरंगाबाद के निकट दौलताबाद/ देवागिरी किले/दुर्ग का पहाड़ी भाग।

भीमाशंकर-नाशिक-औरंगाबाद यात्रा-15                                                                    SANDEEP PANWAR

किले के मैदानी भाग में जहाँ चलने फ़िरने में समस्या नहीं आ रही थी उसके उल्ट यहाँ किले के पहाड़ी भाग की ओर चलते ही साँस फ़ूलने लगी। विशाल कहने लगा संदीप भाई सामने देखने पर लग रहा है कि किले का शीर्ष अभी एक किमी दूरी पर है। मैंने कहा हाँ भाई लगता तो ऐसे ही है बाकि चल के पता लगेगा। हम ऊपर पहाड़ी की ओर चढ़ने लगे। अभी आधा किमी दूरी ही पार नहीं की होगी कि एक बार फ़िर एक दरवाजे से टेढ़े-मेड़े होकर आगे बढ़्ना पड़ा। पहले दरवाजे के पास टेढ़े-मेड़े रास्ते इसलिये बनाये जाते थे ताकि बाहर से आने वाला हमलावर यहाँ आकर कमजोर पड़ जाये। क्योंकि हमलावर कितनी भी बड़ी संख्या में हो, ऐसे दरवाजे से तो उसको पंक्ति बद्ध होकर ही आगे बढ़ना होगा। यही पंक्ति ही कमजोर कड़ी होती थी। जिस पर थोड़े से सैनिक भी बहुत बड़ी सेना पर भारी पड जाते थे। यहाँ कुछ बन्दर/लंगूर बैठे हुए थे। लेकिन हम जैसे वनमानुष को देखकर उन्होंने जाते समय तो कुछ नहीं कहा, आते की बात आते समय बतायी जायेगी।

किले के चारों और ऐसी ही खाई है।

Plain area in (Devagiri/ Daulatatabad Fort near Aurangabad city औरंगाबाद के निकट दौलताबाद/ देवागिरी किले/दुर्ग का मैदानी भाग।

भीमाशंकर-नाशिक-औरंगाबाद यात्रा-14                                                                    SANDEEP PANWAR

दौलताबाद किले के भीतर जाने वाले मुख्य गलियारे के सामने जीप से उतर गये। यहाँ सड़क पार किले में जाने का मार्ग दिखायी दे रहा था। किले में जाने वाले मार्ग के दोनों ओर सूचना पट पर किले के बारे में कुछ जानकारी लिखी हुई थी। हमने वो जानकारी पढ़ने के बाद आगे चलना शुरु किया। मैंने इस लम्बे व ऊँचे किले को दो लेख में विभाजित किया है। पहल लेख में किले के मैदान वाले भाग के बारे में विवरण दिया गया है। दूसरे भाग में किले के पहाड़ी वाले भाग के बारे में बताया गया है। जैसा आपको फ़ोटो में दिखायी दे रहा है कि किले के बाहर ही पार्किंग बनायी गयी है। अपने वाहन से आने वालों के लिये किले से ज्यादा पैदल नहीं चलना पड़ता है। चलिये अब किले के अन्दर प्रवेश करते है। किले के बाहर से जो शानदार नजारा दिखाई दे रहा था, अन्दर जाकर असली व भव्य नजारा देखते है। अभी तक तो फ़ोटो में यह किला देखा था आज जाकर असलियत में यह किला देखना है। इस किले को ही पहले देवागिरी किला कहा जाता था।


चले अन्दर

शानदार पार्क

शनिवार, 2 मार्च 2013

Delhi- Qutub Minar, Red Fort, Rajghat, Iron Bridge दिल्ली में कुतुब मीनार, राजघाट, लाल किला, लोहे का पुल

Delhi-
दोस्तों यह तो आपको पता ही है कि मैं दिल्ली के एक कोने में ही रहता हूँ। मेरे ब्लॉग पर आपने अभी तक दिल्ली की एक आध ही पोस्ट देखी है। एक कहावत तो आपने सुनी ही होगी कि घर की मुर्गी दाल बराबर होती है। दिल्ली वालों के यही दिल्ली दाल बराबर होती है। जिन ऐतिहासिक आलीशान ईमारते देखने के लिये लोग पर्यटक घुमक्कड़ हजारों लाखों किमी दूर से दौड़े चले आते है। उन्ही खूबसूरत ईमारतों को देखने के लिये अधिकांश दिल्ली वालों के पास समय ही नहीं है। दोस्तों मुझे आलसी दिल्ली वालों में मत समझ लेना। मैं आपको बताता हूँ कि दिल्ली की कौन सी ईमारत मैंने कितने बार देखी है? सबसे पहले बात करते है पहले फ़ोटो वाली कुतुब मीनार को ले लीजिए। आज तक मैंने कुतुब मीनार को छ या सात बार देखा है। 


गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

बीकानेर-राजमहल जो अब होटल बना दिया गया है।


राज परिवार का वर्तमान निवास का कुछ भाग आपने पहली वाली पोस्ट में देख ही लिया था। आज इस पोस्ट में इसी महल का दूसरा हिस्सा भी दिखाया जा रहा है। जब जूनागढ़ वाला किला राजाओं को पुराना लगने लगा था तो उन्होंने अपने आराम करने के लिये एक नये महल का निर्माण कराया था। यह राजनिवास जूनागढ़ से थोड़ा सा हटकर है। इस महल के जिस हिस्से में राजपरिवार निवास कर रहा है वहाँ तक बाहरी लोगों का आवागमन वर्जित है। हमें तो गाईड़ ने यह भी बताया था कि वर्तमान में बीकानेर राजपरिवार में सिर्फ़ दो राजकुमारी है और इन दोनों में कोई सी भी यहाँ नहीं रहती है। इसलिये उन्होंने अपने महलों को होटल वालों को लीज पर दे दिया है। इस का फ़ायदा यह है कि राजपरिवार को इससे कुछ नगद नारायण भी मिलता रहता है साथ ही महल की साफ़-सफ़ाई व रख-रखाव भी इसी बहाने होता रहता है।


मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

बीकानेर-राज परिवार के शाही निवास का संग्रहालय


जिस गाईड के साथ हम यहाँ आये थे उन्होंने हमें बताया था कि राज परिवार जूनागढ़ के किले को छोड़ कर किसी दूसरी जगह रहने के लिये आ गया था। आज आपको राज परिवार के उसी निवास स्थल के दर्शन कराये जा रहे है। राज परिवार का नये वाला घर भी किसी बड़े महल से कम नहीं था। इस निवास का आधा हिस्सा राज परिवार ने होटल वालों को किराये पर दिया हुआ है। इसी के कुछ कमरों में राजाओं की ढ़ेर सारी यादगार निशानियाँ सम्भाल कर रखी हुई है। तो दोस्तों आप देखिये इस महल को, मैं चलता हूँ आगे की ओर।


गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

बीकानेर-जूनागढ़ किले के संग्रहालय में अनमोल चित्रकारी व शस्त्रों का जखीरा Bikaner-The great painting and old weapon in Junagarh fort


आज आपको बीकानेर के जूनागढ़ किले के अन्दरुनी हिस्से में बनाई गयी अनमोल व लाजवाब पेंटिंग दिखाई जा रही है। आप इन्हें जरा  कुछ ज्यादा ही ध्यान से देखना, क्योंकि इन्हें बने हुए काफ़ी समय बीत चुका है, आज भी देखते समय यह ऐसी लगती है जैसे यह कल की बनी हुई चित्रकारी है। आपको भूमिका में ज्यादा लम्बा ना उलझाते हुए नीचे आपको ढ़ेर सारे चित्र दिखा रहा हूँ। आप चित्र देखिए।


मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

Bikaner- Junagarh Fort बीकानेर- जूनागढ़ किला


दशनोक स्थित चूहों वाला मन्दिर देखने के उपरांत हम अपनी उसी कार में सवार होकर वापिस बीकानेर की ओर रवाना हो गये, जिस कार से चूहे वाला मन्दिर देखने गये थे। यह तो पिछले लेख में ही बता दिया गया था कि दशनोक का अपना रेलवे स्टेशन भी है। अत: जो भाई/बन्धु रेल से यहाँ जाने का इच्छुक होगा रेल से चला जायेगा। पिछले लेख में रेल की पटरी का एक फ़ोटॊ लगाया था वह फ़ोटो कार को बीच फ़ाटक में रोक कर लिया गया था। हमारे साथ प्रेम सिंह कार में सवार थे। प्रेम सिंह जी बीकानेर में होटल उद्योग से जुड़े हुए है। प्रेम सिंह जी ने बीकानेर पहुँचने से पहले ही अपने जानकार गाईड़ को फ़ोन कर पहले ही जूनागढ़ किले पर आने के लिये कह दिया था।
यह मत समझना कि मैं आपको कार बता कर बाइक से वहाँ घूम रहा था।

गुरुवार, 22 नवंबर 2012

Jaisalmer Fort जैसलमेर दुर्ग (किला)


रात को बारह बजे के करीब हमारी ट्रेन प्लेटफ़ार्म पर उपस्थित हो चुकी थी। हम अपने डिब्बे में सवार होकर जैसलमेर की ओर प्रस्थान कर गये। चूंकि शाम के समय ही हमने टिकट बुक किया था जिस कारण हमारी सीट पक्की नहीं हो पायी थी, हाँ इतना जरुर था कि हमारी दोनों सीटे RAC में उसी समय हो गयी थी, जब हमने बुक करायी थी। दिल्ली से यहाँ आते समय तो हम साधारण डिब्बे में बैठकर आये थे। अत: RAC टिकट मिलना भी हमारे लिये कम खुशी की बात नहीं थी। हम अपनी सीट पर जाकर बैठ गये थे। आज की रात हम आराम से सीट पर बैठकर जाने की सोच ही रहे थे, कुछ ऐसी ही बाते कर रहे थे। कि तभी टीटी महाराज भी दिखाई दे गये।


बुधवार, 21 नवंबर 2012

Jodhpur-Hotel The Gate Way जोधपुर होटल द गेट वे


हम जोधपुर महाराज का वर्तमान निवास स्थान उम्मेद भवन देखने जा रहे थे। हालांकि हम उम्मेद भवन में प्रवेश करने का तय समय शाम पाँच बजे, समाप्त होने के बाद पहुँचे थे। जैसे ही हमने जोधपुर के निर्वतमान महाराजा परिवार का वर्तमान निवास देखने के लिये, उनके भवन में अन्दर प्रवेश करना चाहा, तो वहाँ के सुरक्षा कर्मचारियों ने हमें अन्दर जाने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि आप अब अन्दर नहीं जा सकते हो। हमने कोशिश की, कि शायद कुछ देर के लिये ही सही वे हमें अन्दर जाने दे, लेकिन हमारा उम्मेद भवन जाना बेकार साबित हुआ। आखिरकार हम मुख्य दरवाजे से ही दो चार फ़ोटो खींच-खांच कर वापिस लौटने लगे। वैसे तो यह भवन काफ़ी बडा बना हुआ है। इसके बारे में बताया जाता है कि एक बार यहाँ अकाल जैसी स्थिति आ गयी थी जिस कारण यहाँ के तत्कालीन महाराजा ने आम जनता की मदद के लिये अपना खजाना खोलने का निश्चय कर लिया था। चूंकि राजा बडा चतुर था वह ऐसे ही जनता पर अपना धन बर्बाद भी नहीं करना चाहता था। अत: राजा ने जनता को धन देने के लिये एक तरीका निकाल लिया था। वह तरीका आपको बताऊँ उससे पहले यह बात बता देता हूँ कि उस तरीके का परिणाम ही यह उम्मेद भवन था।
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