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बुधवार, 27 अगस्त 2014

Kampty Fall-Mussoorie to Delhi कैम्पटी फ़ॉल मसूरी से दिल्ली तक

BIKE YATRA WITH WIFE-03

पेंचर वाली बाइक मोड पर ही थोडा गडबड करती थी अन्यथा बाइक आसानी से 40 की गति से दौडी जा रही थी। सीधी सडक पर बाइक चलाने में कोई समस्या नहीं आयी। जहाँ सडक खराब आती थी वही बाइक ज्यादा धीमे निकालनी पडती थी। ट्यूब कटने की चिन्ता नहीं थी। उसके बारे में तो सोच ही लिया था कि नई डलवानी ही पडेगी। 
इस यात्रा के तीनों लेख के लिंक नीचे दिये गये है।
01- दिल्ली से हरिदवार व ऋषिकेश यात्रा।
02- उत्तरकाशी से यमुनौत्री मन्दिर तक
03- कैम्पटी फ़ॉल, मसूरी देहरादून दिल्ली तक

शनिवार, 3 नवंबर 2012

सुरकण्डा देवी मन्दिर, धनौल्टी, मसूरी, देहरादून, शाकुम्बरी देवी मन्दिर


आप बता सकते थे कि कार के अगले पहिये में क्या हुआ था? लेकिन कोई नहीं बता पाया इससे साबित हुआ कि लोग अंदाजा भी नहीं लगाना चाहते है। मैं आज आपको बता रहा हूँ कि कार के अगले पहिये में चालक वाली साइड में नहीं बल्कि दूसरी तरफ़ वाले पहिये में आवाज आ रही थी। जैसे ही मैंने कार रोक कर नीचे उतर कर पहिया देखने गया तो सबसे पहले मेरी नजर टायर पर नहीं गयी थी मैंने पहले तो टायर के पीछे लटकने वाली रबर को देखा कि कही यह तो टायर में रगड नहीं खा रही है। लेकिन वह टायर से काफ़ी दूरी पर थी। जैसे ही मेरी नजर टायर पर गयी तो एक बार को सिर चकरा गया क्योंकि टायर में पेंचर होने के कारण हवा बिल्कुल नहीं बची थी। कार में एक टायर स्पेयर में रहता है आगे जाने से पहले टायर बदलना जरुरी था। टायर निकालने के लिये डिक्की खोलनी पडी, वहाँ से सारा सामान जैसे पताशे का टोकरा कपडे का थैला, नारियल का थैला गाडी से बाहर निकालने पडे थे। यह सारा सामान निकालने के बाद जाकर टायर बाहर निकाला जा सका।


सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

समूह में पहली बार कैम्पटी फ़ॉल भ्रमण(कोहरे का कहर) kampty fall group tour


लोग कहते है कि घुमक्कडी में पैसे खर्च करना फ़िजूल खर्ची है लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता। दूसरी बात पैसे खर्च करके भी कोई साधु महात्मा जितनी घुमक्कडी और भी करता होगा। मुझे नहीं लगता। जबकि मैं हमेशा कहता आया हूँ कि घुमक्कडी किस्मत से मिलती है समय व पैसों से नहीं, लेकिन कई लोग ऐसे भी मिल जायेंगे जिन्हे मेरी इस बात पर भी आपत्ति होगी। ऐसे लोगों को उनके हाल पर छोड देनी में ही अपनी भलाई है। जिससे मैं अपनी मनमौजी घुमक्कडी पर लगा रहता हूँ। तो चलिये दोस्तों आज आपको अपनी ऐसी पहली घुमक्कडी के बारे में बताता हूँ जिसमें मेरे साथ कई और युवक व युवती भी गये थे। युवती के फ़ोटो मैं नेट पर लगाना नहीं चाहता हूँ अत: कोई इस बारे में कुछ ना कहे। बात सन 2003 के दिसम्बर माह के आखिरी सप्ताह की बात है। मेरी मौसी व मामा का परिवार देहरादून में ही रहता है जिस कारण वहाँ साल में दो तीन बार आना-जाना हो ही जाता है। इसी तरह उपरोक्त तिथि को मेरी मौसी की लडकियाँ जिनकी ससुराल हमारे घर से 4-5 किमी दूर ही है। मौसी की लडकियों ने फ़ोन कर मुझे बताया कि वह व उनका देवर कुछ अन्य दोस्तों के साथ मसूरी घूमने जा रहे है। अगर तुम्हे चलना है तो शाम तक बता देना, क्योंकि रात को यहाँ से चल देना है। 
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