मशरुर जाने वाली बस ने पीर बिन्दली से 5-6 मिनट में ही हमें मशरुर पहुँचा दिया। मन्दिर से आधा किमी पहले बने बस सटैंड़ पर बस ने हमें उतार दिया था। इसके बाद बस वहाँ से मुड़कर वापिस चली गयी। हमने मन्दिर की ओर चलना शुरु कर दिया। कुछ दूर चलते ही सड़क ऊपर जाती हुई मुड़ जाती है। हमने समझा कि सड़क एक चक्कर लगाकर इस पहाड़ पर आयेगी। इसलिये हम सड़क छोड़कर सीधे पहाड़ पर चढ़ गये। पहाड़ पर चढ़्ते ही हमें एक गाँव जैसा माहौल दिखायी दिया। वहाँ कुछ लोग खेतों में कार्य कर रहे थे। हम दोनों उनके खेतों से होते हुए उनके गाँव में पहुँच गये। गाँव में जाकर एक आदमी से पता किया कि मन्दिर कहाँ है? उन्होंने कहा कि इन घरो के पीछे जो स्कूल है उसके पार करते ही मन्दिर है। मन्दिर के पास रहने वाले किसान जाट बिरादरी से सम्बन्ध रखते है। यहाँ आसपास बहुत ज्यादा आबादी तो नजर नहीं आ रही थी फ़िर इतनी कम आबादी के लिये स्कूल बनाना समझ नहीं आ रहा था। जैसे ही स्कूल पार किया तो शैल मन्दिर के अवशेष दिखायी देन लगे।
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शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013
Masroor- Rock cut Temples मशरुर- शैल मूर्तिकला के 15 मन्दिरों का समूह
हिमाचल की कांगड़ा व करसोग घाटी की बस यात्रा 02 SANDEEP PANWAR
गुरुवार, 25 अप्रैल 2013
Bus journey Chamba to (Kangra) Masroor चम्बा से कांगड़ा के मशरुर तक की बस यात्रा
हिमाचल की कांगड़ा व करसोग घाटी की बस यात्रा 02 SANDEEP PANWAR
चम्बा में गाड़ी वालों ने सही समय पर बता दिया था कि वे दिल्ली वापिस जा रहे है। जिससे हमें अपना यात्रा कार्यक्रम बदलने का समय मिल गया। मैंने और विपिन ने कांगड़ा की छोटी रेल व करसोग घाटी सहित कुछ अन्य स्थल देखने की योजना बना ड़ाली। मनु भी हमारे साथ चलने को कह रहा था लेकिन मनु के पास भारी बैग था जिस कारण हमने मनु को भी दिल्ली भेज दिया। विधान व उसके दोस्त सिर्फ़ मणिमहेश तक के लिये ही आये थे। हमारे यात्रा कार्यक्रम बदलने का सबसे ज्यादा प्रभाव बाइक वालों पर हुआ। लेकिन कहते है जो हुआ अच्छा ही हुआ। मराठे दो बाइक से यहाँ तक चले आये थे। जबकि उनके पास एक बाइक बजाज की मात्र 100 cc की प्लेटिना थी। मैंने पहली बार बाइक देखते ही बोल दिया था कि यह बाइक दो सवारी पर पूरी यात्रा नहीं करवा सकती है। हमारी यात्रा बदलने पर संतोष तिड़के ने कहा अब हम कहाँ जाये? मैंने अपनी तरफ़ से कोई सलाह देने से पहले उनके मन की लेने की सोची थी। मराठे बोले कि उन्हे बद्रीनाथ जाना है। अरे वाह, बद्रीनाथ जाने का जोश मणिमहेश यात्रा के बाद भी बना हुआ था। मैंने संतोष को अम्बाला तक इसी मार्ग से वापिस जाने की सलाह दी। अम्बाला के बाद मराठे सहारनपुर देहरादून होकर बद्रीनाथ के लिये हमारे चलने के कुछ देर बाद ही प्रस्थान कर गये थे।
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