पहाड़ की चढ़ाइ समाप्त करने के बाद जैसे ही मैदान आया था वहाँ कुछ देर बैठने के बाद हम नागफ़नी पहाड़ी देखने के लिये चल दिये। यह पहाड़ी मुख्य मार्ग से थोड़ा हटकर है इसलिये यहाँ आने के लिये सीधे हाथ की ओर लगभग आधा किमी चलना पड़ता है। जब हम नागफ़नी के लिये जा रहे थे तो हमें पढ़े लिखे लोगों की करतूत का ढ़ेर दिखायी दिया था। पढ़े लिखे लोग क्या करते है, बोतल बन्द पानी पिया और खाली बोतल होते ही फ़ैंक दी बोतल, बिस्कुट टॉफ़ी खाया, और फ़ैंक दिया उसका रेपर। ये पढ़े लिखे लोग अपना कीमती सामान तो कही नहीं फ़ैंकते है। फ़िर इन पर्यावरण को नुक्सान पहुँचाने वाली वस्तुओं को किसी कूड़ेदान में ड़ालने में इन्हें शर्म क्यों आती है। पढ़े लिखे लोगों की हालत पैदल मार्गों के अलावा, रेल, बस आदि सार्वजनिक स्थलों पर भी आसानी से दिखायी दे जाती है। जिस पगड़न्ड़ी से हम नागफ़नी के लिये जा रहे थे वहाँ पर पीले रंग के बहुत सारे फ़ूल खिले हुए थे। फ़ूलों के कारण वहाँ बहार आयी हुई थी।
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सामने जो पहाड़ दिख रहा है वही नागफ़नी है। |