TIRYUGINARAIN लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
TIRYUGINARAIN लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 17 फ़रवरी 2013

Tiryuginarain to Gaurikund trekking त्रियुगीनारायण से गौरीकुन्ड ट्रेकिंग

गंगौत्री से केदारनाथ पदयात्रा-7
सोनप्रयाग में पुल के पास ही कावँर यात्रियों के लिये एक लंगर/भण्डारा चल रहा था हमने यहाँ भी दो-दो पूरी का प्रसाद ग्रहण किया व कुछ देर आराम करने के बाद आगे की यात्रा पर चल दिये। यहाँ सोनप्रयाग के पुल के पास कुछ देर तक खडे होकर नदी की अनवरत बहती धारा का कभी ना भूलने वाला यादगार पल बिताया गया था। यहाँ से आगे सडक पर हल्की-हल्की चढाई भी शुरु हो गयी थी लेकिन हम तो एक सप्ताह से ऐसी-ऐसी खतरनाक पैदल उतराई व चढाई से होकर आये थे कि अब कैसी भी चढाई से हमारा कुछ नहीं बिगडता था।
 भगवान गणेश का सिर शिव शंकर जी ने धड से अलग कर  दिया था।


शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

पवाँली से त्रियुगीनाराय़ण तक, Panwali to Tiryuginarin, trekking

गंगौत्री से केदारनाथ पदयात्रा-6


पवाँली कांठा बुग्याल में रात को रुकने में कोई खास परेशानी नहीं है बस आपको शहरों वाली सुख सुविधा नहीं मिलेगी एकदम गाँव का माहौल है रहन-सहन से लेकर खान-पान तक सब कुछ, यहाँ तक कि इतनी ऊँचाई पर तो मोबाइल भी कभी-कभार ही काम करता है वह भी किसी एक खास कोने में जाने के बाद ही। यहाँ से किसी भी दिशा में जाने पर पहला गाँव कम से कम 17-18 किमी से ज्यादा दूरी पर है इसका मतलब साफ़ है कि बीच का सारा इलाका एकदम सुनसान मानव तो कभी-कभार ही नजर आते है, हम वैसे तो दो ही थे। मैं और मेरे मामा का छोरा। लेकिन इतने लम्बे सफ़र में साथ चलते-चलते सभी अपने से लगने लगे थे। सभी अच्छे दोस्त बन गये थे। ज्यादातर दिल्ली के आसपास के रहने वाले थे। रात को चूल्हे के समने बैठ कर गर्मागर्म रोटी खायी थी। कुछ ने शुद्ध देशी घी से बने हुए आलू के परांठे बनवाये थे। यहाँ पर पवाँली में खाने में देशी घी का प्रयोग किया जाता है। उसके दाम कुछ ज्यादा लेते है जो आम भोजन से 10-15 रुपये ज्यादा है। रात में दस बजे तक खा पी कर सोने की तैयारी होने लगी। यहाँ पर रात में कभी-कभार भालू आने का खतरा होता है। अत: सबको यह चेतावनी दे दी गयी कि रात में हो सके तो झोपडीनुमा घर से अकेले बाहर ना निकले। निकलना जरुरी हो तो पहले बाहर का माहौल देख ले व टार्च जला कर दूर तक एक नजर जरुर घुमा ले ताकि किसी किस्म का खतरा ना रहे। अब बात सोने की आयी तो एक झोपडीनुमा घर में आराम से 10-12 लोग सो सकते है। जानवरों के लिये अलग झोपडे होते है। सोने के लिये कोई पलंग या चारपाई नहीं होती है, सबको जमीन पर बिछे लकडी के फ़टटों पर या दीवार पर बने टांड नुमा दुछत्ती पर सोना होता है ओढने व बिछाने के लिये कम्बल की कोई कमी नहीं होती है। हमने भी दो-दो कम्बल लिये व आराम से लकडी के फ़टटों पर बिछा कर सो गये।
ये भोले के भक्तों की कावंड झूलती हुई।


Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...