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मंगलवार, 6 अगस्त 2013

Bike Trip- Rohanda to Delhi रोहान्ड़ा से दिल्ली तक का यात्रा वर्णन

SACH PASS, PANGI VALLEY-14                                                                      SANDEEP PANWAR
अब रोहान्ड़ा का स्कूल सामने दिखायी दे रहा था। इससे पहले कि हम इस स्कूल तक पहुँच पाते, स्कूल के कुछ बच्चे स्कूल के पास ही खेलने में लगे पड़े थे। कुछ बच्चे कन्चे का खेल खेल रहे थे तो कुछ बच्चे पहाड़ की झाडियों में शहतूत जैसा छोटा सा दिखने वाला फ़ल चुनकर खाने में लगे पड़े थे। हम भी उन बच्चों के साथ उस झाड़ी में उस फ़ल को तोड़कर खाने में लग गये। कुछ फ़ल खाने के बाद हमने नीचे उतरना शुरु किया। स्कूल के आगे से होते हुए अपने गेस्ट हाऊस जा पहुँचे। महेश धूप में बैठा अखबार पढ़ रहा था। हमने जाते ही बोला चलो बैग उठाओ, बाइक पर सवार हो जाओ। महेश बोला आपने 10 बजे चलने की बोला था अभी तो 09:15 मिनट ही हुए है। अच्छा किया ना आना-जाना कुल मिलाकर 4 घन्टे का समय ही तो लगाया है।


गुरुवार, 2 मई 2013

Tatapani-Shimla-Delhi तत्ता पानी-शिमला-दिल्ली यात्रा

हिमाचल की कांगड़ा व करसोग घाटी की यात्रा 12                                                       SANDEEP PANWAR


बस तत्तापानी पहुँच चुकी थी। सीट पर पड़े-पड़े शरीर आलस से पूरी तरह भर गया था। सीट से उठने का मन ही नहीं कर रहा था। हमने टिकट भी यही तक का लिया था उससे कुछ नहीं फ़र्क पड़ता। कंड़क्टर बस चलते ही आगे का टिकट दुबारा दे देता। यकायक फ़ैसला किया कि नहीं, फ़िर पता नहीं कब मौका लगे या ना लगे। चलो उतरो बस से नीचे। बस से नीचे उतर गये। बस से नीचे उतरते ही विपिन ने कहा संदीप भाई दो-तीन किमी पीछे शिव गुफ़ा करके, एक लम्बी सी गुफ़ा बताई गयी है। उसे देखने चले। ना, तुरन्त मुँह से निकला। ना सुनकर विपिन बोला ठीक है तत्तापानी चलो। मैं और विपिन तत्तापानी के लिये चल दिये। अभी दिन छिपने में काफ़ी समय था इसलिये फ़ैसला हुआ कि सूरज छिपने से पहले यहाँ से निकल जायेंगे। हम दोनों सतलुज नदी किनारे बने हुए तत्तापानी के गर्म कुन्ड़ देखने के लिये सतलुज के बहाव के पास पहुँचने का मार्ग देखने लगे।


Chindi, Karsog चिन्दी, करसोग

हिमाचल की कांगड़ा व करसोग घाटी की यात्रा 11                                                       SANDEEP PANWAR

चिन्दी आने से पहले कई लेख चिन्दी के बारे में देखे हुए थे। मेरे पास एक बड़ा सा बक्सा है जिसमें भारत की तो शायद ही कोई जगह होगी जिसकी जानकारी मेरे पास नहीं होगी। दुनिया के ज्यादातर देशों की घुमक्कड़ी वाली जानकारी भी मेरे खजाने में मौजूद है। बताऊँगा कभी उसके बारे में एक दो लेख में, यदि मौका लगा तो। आज पहले चिन्दी से निपट लेते है। बस से उतरते ही सामने एक मन्दिर दिखाई दिया। सबसे पहले इसी मन्दिर पर अपना हमला हो गया। यहाँ भी वही निर्माण कार्य वाली बात प्रगति पर थी। इस मन्दिर में देखने लायक जो कुछ था उसका फ़ोटो हमने ले लिया था। यह मन्दिर चिन्दी माता मन्दिर के नाम से जाना जाता है। इस मन्दिर को देखते समय मन में विचार आ रहे थे कि हिन्दू धर्म में ही क्यों दे दना-दन भगवान पैदा कर दिये जा रहे है। इस मन्दिर की बनावट व नक्काशी अन्य सभी मन्दिरों की तरह लाजवाब बनायी गयी थी। अभी तो लकड़ी पर पालिश आदि भी नहीं हुई थी लकड़ी पर पालिश के बाद दिखने वाली चमक अलग ही दिखायी देती है। पहाड़ों में अब बर्फ़ भले ही हर जगह ना गिरती हो, लेकिन बारिश तो हर जगह हो सकती है, इसलिए घर हो या मन्दिर सभी की छत ढ़लावदार बनाई जाती है।

यह चिन्दी वाला मन्दिर है।

बुधवार, 1 मई 2013

Mahunag, Karsog मूल माहूनाग बखारी कोठी, करसोग

हिमाचल की कांगड़ा व करसोग घाटी की यात्रा 10                                                       SANDEEP PANWAR

करसोग बस अड़ड़े से मूल माहूनाग जाने वाली सीधी बस सेवा उपलब्ध है। हमने इसी सेवा का उपयोग करते हुए, अपनी इस हिमाचल यात्रा के अंतिम दिन की यात्रा आगे जारी रखी। करसोग से चिन्दी होकर माहूनाग के लिये मार्ग बनाया गया है। मन्ड़ी-सुन्दरनगर से चिन्दी होकर हम कल रात ही करसोग आये थे। करसोग घाटी में हमारे काम के सिर्फ़ दो ही प्राचीन मन्दिर थे। करसोग के आसपास पहाड़ों के शीर्ष पर कुछ अन्य प्रसिद्ध मन्दिर भी है जैसे कमरुनाग व शिकारी देवी, इन दोनों तक पहुँचने के लिये ट्रेकिंग करनी पड़ती है। अगर बाइक साथ हो तो शिकारी देवी तक पहुँच सकते है। आज अभी जिस मन्दिर तक हम बस से जा रहे है वहाँ पहुँचने के लिये कोई समस्या नहीं है। हमारे साथ बैठे एक स्थानीय बन्दे ने हमें बताया कि यह चिन्दी होकर जाती है। बस जैसे-जैसे चिन्दी/चिन्ड़ी के नजदीक पहुँचती जा रही थी हमारे दिलों की धड़कन भी बढ़ती जा रही थी। आखिरकार जब हमारी वस चिन्दी पहुँची तो वहाँ से आसपास के नजारे देख तबियत खुश हो गयी।


Mamleshwar Mahadev Temple ममलेश्वर महादेव मन्दिर, करसोग

हिमाचल की कांगड़ा व करसोग घाटी की यात्रा 09                                                       SANDEEP PANWAR

कामाक्षा देवी मन्दिर देखने के बाद हमें ममेल गाँव में ममलेश्वर महादेव मन्दिर जाना था। कामाख्या/कामाक्षा मन्दिर के पुजारी ने हमारी बाते सुनकर बताया कि थोड़ी देर में ही बस आने वाली है। यहाँ तक तो हम दोनों पैदल ही आये थे अब आगे की यात्रा बस से करने के कारण हमारे समय व ऊर्जा की बचत होने जा रही थी। हम मन्दिर के आँगन में ही बैठे हुए थे कि बस का होरन सुनाई दिया। बस आते ही हम उसमें सवार होकर ममेल गाँव की ओर चल दिये। बस पीछे किसी गाँव से आ रही थी। यह बस सीधे शिमला जा रही थी। जिस सड़क को हम दूर से देखते हुए आये थे अब उसे बस में बैठकर देखना अच्छा लग रहा था। इस मार्ग की चौड़ाई बहुत ही कम थी। सामने से आ रही एक बस के कारण हमारी बस को आगे बढ़ने से पहले बैक ले जाना पड़ा, जिससे सामने वाली बस के निकलने लायक जगह बन सके। कामाख्या मन्दिर तक शिमला से सीधी बस सेवा उपलब्ध है। यदि किसी को सीधे मन्दिर जाना हो तो सीधी वाली बस से अपनी यात्रा कर सकते है। जैसे ही कंड़क्टर ने टिकट के लिये पैसे माँगे तो हमने पैसे देते हुए कहा हमें ममलेश्वर मन्दिर जाना है।


मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

Sunder Nagar-Rohanda-Chindi-Karsog-Kamaksha Devi Temple सुन्दरनगर से रोहान्ड़ा, करसोग घाटी के कामाक्षा देवी मन्दिर तक की यात्रा।

हिमाचल की कांगड़ा व करसोग घाटी की यात्रा 08                                                       SANDEEP PANWAR
सुन्दर नगर बस अडड़े पर जब हमें करसोग की बस मिलने की उम्मीद समाप्त होती दिखी तो हमने वहाँ बैठकर आगे की बात सोचनी शुरु की ही थी कि हिमाचल रोड़वेज की मनाली से रिकांगपियो तक जाने वाली बस आकर खड़ी हो गयी। हमें इस बात का अंदाजा नहीं था कि यह बस करसोग से होकर जायेगी। हमने अनमने मन से बस कंड़क्टर से पूछा कि यह करसोग के आसपास से होकर जायेगी कि नहीं। जब कंड़क्टर ने कहा कि यह करसोग के बस अड़ड़े पर उतारने के बाद वापिस मुख्य सड़क पर आयेगी, उसके बाद सैंज-रामपुर वाले रुट के लिये चली जायेगी। हमने यह भी पता किया था कि यह बस रिकांगपियो सुबह 5 बजे के आसपास पहुँचा देती है। हमने बस में घुसकर देखा तो सबसे आखिरी की सीट पर तीन सवारी लायक स्थान बचा हुआ था। हमने समय ना गवाते हुए, अपने बैग उन सीट पर रख सीट आरक्षित कर ली। चूंकि बस में गर्मी लग रही थी इसलिये हम बस के बाहर खड़े होकर बस चलने की प्रतीक्षा करने लगे। कुछ आधे घन्टे बाद बस वहाँ से चल पड़ी। सुन्दर नगर से हमारी बस मन्ड़ी की ओर चलने लगी। लेकिन एक-दो किमी बाद ही हमारी बस दाँए हाथ की ओर मुड़ गयी।

करसोग बस अडड़े पर लगा सूचना पट

सोमवार, 29 अप्रैल 2013

Bid Monastery to Sunder Nagar via Mandi बीड़ मोनेस्ट्री से मन्ड़ी होकर सुन्दर नगर तक की यात्रा।

हिमाचल की कांगड़ा व करसोग घाटी की यात्रा 07                                                       SANDEEP PANWAR
चाय के बागान अभी समाप्त भी नहीं हुए थे कि खेतों मॆं तिब्बती लोगों द्धारा लगाये जाने वाली रंग बिरंगी झंड़ियाँ दिखायी देने लगी। इन झंड़ियों को तिब्बती लोग बड़ी पवित्र मानते है।  इन पर तिब्बती धर्म ग्रन्थ लिखे होते है। पहले फ़ोटो में खेत में लगी बहुत सारी झड़ियाँ दिखायी दे रही है। जहाँ यह झडियाँ लगी हुई थी वहाँ पर चाय के खेत नहीं थे। इन खेतो में कुछ स्थानीय महिलाएँ कार्य कर रही थी। हम कुछ देर तक उन्हे खेतों मॆं कार्य करते देखते रहे। इसके बाद हम आगे की ओर चल दिये। आगे चलने पर हमें एक और मोनेस्ट्री जैसी दिखायी देने लगी लगी। यहाँ इसके बाहर सड़क पर बहुत सारे रंग बिरंगे पत्थर रखे हुए थे। जिसपर तिब्बती भाषा में कुछ ना कुछ तो अवश्य लिखा हुआ था। पहले हम दोनों इसके अन्दर जाने की सोच रहे थे फ़िर मैंने अपना इरादा बदल दिया, विपिन से कहा कि अगर तुम्हे जाना है तो जाओ नहीं तो चलो आगे मन्ड़ी की ओर चलते है। विपिन बोला नहीं संदीप भाई दोनों देख कर आयेंगे। मैंने कहा देख भाई बात सिर्फ़ फ़ोटो लेने की ही है मैंने इसे बाहर से देख लिया तो मेरे लिये यह ही बहुत बड़ी बात है। जा भाई जा तुम फ़ोटो ले आओ मैं फ़ोटो देखकर ही खुश हो जाऊँगा।

खेर्तों में लगी तिब्बती झडियाँ।े

Paragliding point Bir-Billing monastery पैराग्लाईडिंग सरताज बीड़ की तिब्बती मोनेस्ट्री।

हिमाचल की कांगड़ा व करसोग घाटी की यात्रा 06                                                       SANDEEP PANWAR
बैजनाथ मन्दिर देखने के बाद विपिन को मन्दिर में ही छोड़ मैं सीधा बस अड़ड़े बस में जा पहुँचा। मेरे जाते ही बस चल पड़ी। बस अड़ड़े से निकलते ही बस मन्दिर के आगे पहुँच गयी तो विपिन भी मन्दिर के बाहर ही बस पकड़ने के लिये खड़ा हुआ मिल गया। विपिन के बस में आने के बाद हमारी बस बीड़ के लिये चल पड़ी। हमारी बस मन्ड़ी वाले हाईवे पर आगे बढ़ती हुई अज्जू/आहजू नामक गाँव के मोड़ से उल्टे हाथ ऊपर की ओर मुड़ गयी। यहाँ इस मोड़ पर सीधे हाथ छोटी रेलवे लाईन का स्टेशन भी दिखाई दे रहा था। अगर किसी दोस्त को पठानकोट से इस रेल में बैठकर बीड़ या बिलिंग के लिये आना है तो इस आहजू/अज्जू नामक गाँव पर आकर उतर जाये। यहाँ से उत्तर दिशा में पहाड़ की तीखी चढ़ाई पर बनी सीधी सड़क पर जाने के लिये वाहन मिल जाते है। इस गाँव से जो तेज चढ़ाई बस में बैठकर दिखायी दे रही थी, ऐसी तेज चढ़ाई तो फ़्लाईओवर पर चढ़ते समय भी दिखाई नहीं देती है। बस चालक ने इस चढ़ाई पर बस चढ़ाते समय दूसरे गियर से आगे बढ़ने की हिम्मत की तो बस लोड़ मानकर रुकने लगी जिससे दुबारा से बस को दूसरे गियर में लाना पड़ा। यदि ऐसी सीधी खड़ी चढ़ाई पर परमात्मा ना करे किसी गाड़ी का उतरते समय ब्रेक फ़ेल हो जाये तो उसका क्या होगा? होगा क्या, जितना बड़ा वाहन होगा उतनी बड़ी दुर्घटना घटने की प्रबल सम्भावना बढ़ जायेगी। बस अपनी पूरी ताकत लगाकर 20-25 की गति से ऊपर चढ़ती जा रही थी। इस चढ़ाई को देख हमें साँस लेने की फ़ुर्सत निकालनी पड़ रही थी, नहीं तो हम किसी काम के नहीं रहते। 


रविवार, 28 अप्रैल 2013

Baba Baijnath Temple बाबा बैजनाथ मन्दिर

हिमाचल की कांगड़ा व करसोग घाटी की यात्रा 05                                                       SANDEEP PANWAR
पालमपुर के चाय बागान देखने के बाद जिस बस में बैठकर हम बैजनाथ की ओर आ रहे थे, उस बस वाले से हमने बैजनाथ तक का टिकट लेकर कहा कि बीड़-बिलिंग जाने के कहाँ से बस मिल सकती है? बस वाले ने कहा आपको बीड़ कब जाना है? हमने कहा कि हम तो बैजनाथ के मन्दिर में घूमने के बाद सीधे बीड़-बिलिंग के लिये ही जायेंगे। मन्दिर में कितनी देर का काम है? पहले यह देख लो। हाँ मन्दिर में पूजा-पाठ करने के चक्कर में हम नहीं थे। हमें सिर्फ़ मन्दिर देखना है और फ़ोटो लेकर वापिस चले आना है। बस वाले ने कहा यह बस भी बीड़ तक जा रही है, यदि आप 15-20 मिनट में मन्दिर देखकर आ सकते हो तो इसी बस में आगे चले जाना क्योंकि बस बैजनाथ बस अड़ड़े पर 20 मिनट रुक कर आगे जायेगी। अगली बस आपको घन्टे भर बाद मिलेंगी। हमने कंड़क्टर की सलाह पर गहन विचार के बाद निर्णय लिया कि ठीक है बस अडड़े पर बस आते ही तुरन्त मन्दिर के लिये चले जायेंगे। अपने बैग बस में अपनी सीट पर ही छोड़ देंगे, ताकि कोई सीट पर कब्जा करके ना बैठ जाये। जैसे ही बस ने बैजनाथ शहर में प्रवेश किया तो बस अड़ड़े से कुछ पहले एक बोर्ड दिखायी दिया उस पर बैजनाथ मन्दिर जाने के बारे में लिखा हुआ था। इसके जरा सा आगे चलते ही बस उल्टे हाथ मुड़कर 20 मीटर ही चली होगी कि सीधे हाथ पर बने हुए बस अड़ड़े में घुसने लगी। जैसे ही विपिन बस से उतरने लगा तो तभी कंड़क्टर बोला सामने सीधे हाथ वाले प्रवेश मार्ग से मन्दिर चले जाओ। जल्दी पहुँच जाओगे।
बाबा बैजनाथ मन्दिर, भारत में कुल तीन बाबा बैजनाथ मन्दिर है।

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

Palampur Tea garden पालमपुर के चाय के बागान में घुमक्कड़ी

हिमाचल की कांगड़ा व करसोग घाटी की यात्रा 04                                                       SANDEEP PANWAR

पालमपुर स्टेशन पर ट्रेन से उतरकर कुछ दूर जाने पर पालमपुर जाने वाली सड़क मिल गयी। इस स्टेशन से पालमपुर शहर कई किमी दूरी पर था। हमें सबसे पहले रात्रि विश्राम हेतू पालमपुर शहर पहुँचना था। सड़क से पालमपुर जाने के लिये बस आटो/जुगाड़ आदि के इन्तजार में खड़े हो गये। 10-15 मिनट बाद जाकर एक बस आयी हम उस बस में सवार होकर पालमपुर पहुँच गये। बस ने हमें पालमपुर के बस अड़ड़े पर उतार दिया। पालमपुर का विशाल बस अड़ड़ा देखकर मैं दंग रह गया। इतना बड़ा बस अड़ड़ा वो भी पहाड़ों में मिलना एक करिश्में जैसा लग रहा था। कमरा देखने के पहले बस अड़ड़े पर एक चाऊमीन की दुकान पर पहुँचे, दुकान वाला दुकान बन्द करने की तैयारी करने लगा था। हमने उसे चाउमीन बनाने के लिये कहा तो वो तैयार हो गया। थोड़ी देर में ही दुकान वाले ने गर्मागर्म चाउमीन बनाकर हमारे सामने पेश कर दी। हमने बड़े सुकून से चटखारे ले ले कर चाउमीन का रात्रि भोजन किया। जब चाउमीन खाकर दुकान वाले को पैसे देने लगे तो लगे हाथ दुकान वाले से रात में रुकने का बढ़िया उचित दर की कीमत वाला ठिकाना मालूम कर लिया। दुकान वाले ने बताया था कि बस अड़ड़े से बाहर निकलते ही आपको एक गेस्ट हाऊस दिखायी देगा उसमें कमरे व डोरमेट्री में आपको आसानी सही कीमत में स्थान मिल जायेगा।

Pathankot-Kangra-Jogindernagar narrow gauge Toy/hill Train पठानकोट-कांगड़ा-जोगिन्द्रनगर की नैरो गेज वाली रेलवे लाइन की यात्रा।

हिमाचल की कांगड़ा व करसोग घाटी की बस यात्रा 03                                                SANDEEP PANWAR

नगरोटा सूरियाँ नामक गाँव में बस व छोटी रेल दोनों ही आती है। नगरोटा नाम से हिमाचल में दो जगह है एक का नाम नगरोटा है दूसरे का नाम नगरोटा सूरियाँ है। हमने बस वाले से कहा "देख भाई हमें नगरोटा से छोटी  रेल में बैठकर पालमपुर व बैजनाथ की ओर जाना है। इसलिये हमें ऐसी जगह उतार देना जहाँ से रेलवे स्टेशन नजदीक पड़ता हो। पीर बिन्दली से नगरोटा तक का सफ़र छोटी-मोटी सूखी सी पहाडियाँ के बीच होकर किया गया था। फ़ोटॊ खेचने के लिये एक भी सीन ऐसा नहीं आया जिसका फ़ोटॊ लेना का मन किया हो। जैसे ही नगरोटा में बस दाखिल हुई तो हमने एक बार फ़िर बस कंड़क्टर को याद दिलाया कि भूल मत जाना। कंड़क्टर भी हमारी तरह मस्त था बोला कि आपको तसल्ली बक्स उतार कर स्टॆशन वाला मार्ग बताकर आगे जायेंगे। थोड़ा सा आगे चलते ही कंड़क्टर ने हमें खिड़की पर पहुँचने को कहा। जैसे ही बस रुकी तो देखा कि हमारी बस एक पुल के ऊपर खड़ी है, मैंने सोचा कि यहाँ कोई नदी-नाला होगा, जिसका पुल यहाँ बना हुआ है। जब कंड़क्टर ने कहा कि यह पुल रेलवे लाईन के ऊपर बना हुआ है। आप इस पुल के नीचे उतर कर उल्टे हाथ आधे किमी तक पटरी के साथ-साथ चले जाना आपको स्टेशन मिल जायेगा।

जाट देवता कांगड़ा नैरो गेज की यात्रा पर है।

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

Masroor- Rock cut Temples मशरुर- शैल मूर्तिकला के 15 मन्दिरों का समूह

हिमाचल की कांगड़ा व करसोग घाटी की बस यात्रा 02                                                SANDEEP PANWAR

मशरुर जाने वाली बस ने पीर बिन्दली से 5-6 मिनट में ही हमें मशरुर पहुँचा दिया। मन्दिर से आधा किमी पहले बने बस सटैंड़ पर बस ने हमें उतार दिया था। इसके बाद बस वहाँ से मुड़कर वापिस चली गयी। हमने मन्दिर की ओर चलना शुरु कर दिया। कुछ दूर चलते ही सड़क ऊपर जाती हुई मुड़ जाती है। हमने समझा कि सड़क एक चक्कर लगाकर इस पहाड़ पर आयेगी। इसलिये हम सड़क छोड़कर सीधे पहाड़ पर चढ़ गये। पहाड़ पर चढ़्ते ही हमें एक गाँव जैसा माहौल दिखायी दिया। वहाँ कुछ लोग खेतों में कार्य कर रहे थे। हम दोनों उनके खेतों से होते हुए उनके गाँव में पहुँच गये। गाँव में जाकर एक आदमी से पता किया कि मन्दिर कहाँ है? उन्होंने कहा कि इन घरो के पीछे जो स्कूल है उसके पार करते ही मन्दिर है। मन्दिर के पास रहने वाले किसान जाट बिरादरी से सम्बन्ध रखते है। यहाँ आसपास बहुत ज्यादा आबादी तो नजर नहीं आ रही थी फ़िर इतनी कम आबादी के लिये स्कूल बनाना समझ नहीं आ रहा था। जैसे ही स्कूल पार किया तो शैल मन्दिर के अवशेष दिखायी देन लगे।

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

Bus journey Chamba to (Kangra) Masroor चम्बा से कांगड़ा के मशरुर तक की बस यात्रा

हिमाचल की कांगड़ा व करसोग घाटी की बस यात्रा 02                                                SANDEEP PANWAR

चम्बा में गाड़ी वालों ने सही समय पर बता दिया था कि वे दिल्ली वापिस जा रहे है। जिससे हमें अपना यात्रा कार्यक्रम बदलने का समय मिल गया। मैंने और विपिन ने कांगड़ा की छोटी रेल व करसोग घाटी सहित कुछ अन्य स्थल देखने की योजना बना ड़ाली। मनु भी हमारे साथ चलने को कह रहा था लेकिन मनु के पास भारी बैग था जिस कारण हमने मनु को भी दिल्ली भेज दिया। विधान व उसके दोस्त सिर्फ़ मणिमहेश तक के लिये ही आये थे। हमारे यात्रा कार्यक्रम बदलने का सबसे ज्यादा प्रभाव बाइक वालों पर हुआ। लेकिन कहते है जो हुआ अच्छा ही हुआ। मराठे दो बाइक से यहाँ तक चले आये थे। जबकि उनके पास एक बाइक बजाज की मात्र 100 cc की प्लेटिना थी। मैंने पहली बार बाइक देखते ही बोल दिया था कि यह बाइक दो सवारी पर पूरी यात्रा नहीं करवा सकती है। हमारी यात्रा बदलने पर संतोष तिड़के ने कहा अब हम कहाँ जाये? मैंने अपनी तरफ़ से कोई सलाह देने से पहले उनके मन की लेने की सोची थी। मराठे बोले कि उन्हे बद्रीनाथ जाना है। अरे वाह, बद्रीनाथ जाने का जोश मणिमहेश यात्रा के बाद भी बना हुआ था। मैंने संतोष को अम्बाला तक इसी मार्ग से वापिस जाने की सलाह दी। अम्बाला के बाद मराठे सहारनपुर देहरादून होकर बद्रीनाथ के लिये हमारे चलने के कुछ देर बाद ही प्रस्थान कर गये थे।


Chamba dispute, change vehicle चम्बा विवाद के बाद आगे की यात्रा बस से

हिमाचल स्कारपियो यात्रा (समाप्त)-19                                                                     SANDEEP PANWAR

भरमौर का चौरासी मन्दिर देखने के बाद चम्बा के लिये प्रस्थान कर दिया गया। भरमौर से मात्र दो-तीन किमी की पद यात्रा करने पर भरमाणी माता का मन्दिर भी है बाइक वाले तो उसे भी देख आये थे, गाड़ी होने व थकावट के कारण हमने भरमाणी मन्दिर देखने की योजना छोड़ देनी पड़ी। अगर थके ना होते तो भरमाणी तक जरुर जाते। हमारे साथ तीन धुरन्धर ऐसे थे जिनके बारे में यह अनुमान नहीं लग रहा था कि यह पहाड़ों में आये ही क्यों थे? गाड़ी वाले ज्यादातर गाड़ी के अन्दर ही बैठे रहने में खुश रहते थे। गाड़ी वालों की आपसी बातचीत से यह शंका होने लगी कि कही यह चम्बा से ही वापसी तो नहीं भाग जायेंगे। चलिये पहले चम्बा चलते है वहाँ रात को ठहरना ही है तब कुछ सोच-विचार किया जायेगा कि अगली मंजिल कौन सी होगी? असली घुमक्कड़ वही है जो पहले से तय मंजिल को भी हालात देखते हुए तुरन्त बदल ड़ालने में देरी ना करे। चम्बा से काफ़ी पहले एक पुल पार करना पड़ता है जहां पहाड़ से आयी एक नदी ने पहाड़ को बहुत घिसा हुआ था। कुछ मिनट यहाँ रुककर इस कुदरत के करिश्में  को देखा गया। इसके बाद उसी मार्ग पर चलते हुए आगे आने वाली सुरंग पार कर चम्बा में उसी मार्ग से प्रवेश किया जिस मार्ग से यहाँ हड़्सर तक आये थे। भरमौर से चम्बा आते-जाते समय एक जगह से मणिमहेश पर्वत की चोटी दिखायी देती है। जाते समय तो चोटी दिखायी दी थी वापिस आते समय देखने की फ़ुर्सत ही नहीं हुई।

भरमौर से राख-चम्बा की ओर जाते समय यह नजारा आता है।

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

Bharmour Temple- The group of 84 temples भरमौर स्थित चौरासी मन्दिरों का समूह

हिमाचल की स्कार्पियो वाली यात्रा-18                                                                        SANDEEP PANWAR

हड़सर से भरमौर कस्बा की सड़क दूरी मात्र 12 किमी ही है इसलिये अपना वाहन हो तो इस दूरी को पार करने में 15-20 मिनट मुश्किल से लगते है। लेकिन यदि अपना वाहन नहीं है तो यही दूरी पार करने में कई घन्टे से ज्यादा भी लग सकते है। भरमौर पहुँचने से पहले ही हड़सर से चलते समय ही मैंने बाइक व गाड़ी वालों को बता दिया था कि भरमौर में एक हजारों साल पुराना मन्दिरों का समूह है जिसमें 84 मन्दिर बताये जाते है। जिसे मन्दिर नहीं देखना हो, वह मन्दिर के बाहर सड़क पर ही खड़ा रह सकता है। जो देखना चाहेगा वो मन्दिर परिसर में जाकर मन्दिर देख आयेगा। मन्दिर देखने के लिये आधे घन्टे का समय मिलेगा। जैसे ही हमारी गाड़ी भरमौर के मुख्य मोड़ पर पहुँची तो वहाँ बने एक प्रवेश द्धार से यह अंदाजा लगाने में आसानी हो गयी कि यही मार्ग भरमौर के चौरासी मन्दिर समूह तक जाता है। यह मन्दिर तो मैंने भी पहले नहीं देखा था। इसलिये गाड़ी से उतरकर पहले एक दुकान वाले से मन्दिर की दूरी मालूम की, दुकान वाले ने बताया था कि मन्दिर यहाँ से लगभग 300-350 मीटर दूर ही होगा। मन्दिर के पास गाड़ी खड़ी होने की जगह नहीं थी इसलिये सबको बताया गया कि मन्दिर आधा किमी दूर भी नहीं है लेकिन वहाँ गाड़ी खड़ी करने की जगह नहीं है इसलिये मन्दिर तक पैदल ही जाना होगा। पैदल जाने के नाम से अथवा थकावट के नाम से गाड़ी वाले तीनों दिलदार अपनी सीट से ऐसे चिपक कर बैठ गये जैसे उन्हे फ़ेविकोल से चिपकाया गया हो। गाड़ी वालों ने मन्दिर देखने से साफ़ मना कर दिया।


sundrasi-Dancho to hadsar सुन्दरासी से धन्छो होकर हड़सर जाकर ट्रेकिंग का समापन

हिमाचल की स्कार्पियो वाली यात्रा-17                                                                        SANDEEP PANWAR

बरसात के पानी वाले सीधे शार्टकट से उतरते ही सुन्दरासी दिखायी देने लगता है। सुन्दरासी पहुँचते-पहुँचते आसमान में सूरज देवता ने अपना गर्म रुप दिखाना आरम्भ कर दिया था। ऊपर नहाते समय शरीर का हर अंग ठन्ड़ के कारण तबला-वादन/कथक कली और ना जाने क्या-क्या करने लगा था। जब सूर्य महाराज की शरण में अपुन का शरीर आया तो शरीर को गर्म करने के लिये ओढ़ी गयी गर्म चददर भी उतार कर कंधे पर ड़ाल दी गयी। धन्छो पहुँचने तक यह गर्म चददर बैग के अन्दर पहुँच चुकी थी। सुन्दरासी आने के बाद मार्ग में लगातार तेज ढ़लान मिलनी शुरु हो जाती है। तेज ढ़लान का लाभ यह है कि शरीर तेजी के साथ नीचे की ओर भागने को तैयार रहता है लेकिन लगातार तीखी ढ़लान ही उतराई में पैरों के पंजे में दर्द उत्पन्न होने से सबसे बड़ी दुश्मन भी बन जाती है। सुन्दरासी पहुँचकर लगभग आधे साथियों ने दस मिनट का विश्राम लिया। कई साथी यहाँ बिना विश्राम किये धन्छो के लिये प्रस्थान कर गये थे। मैने बड़े वाला शार्टकट मार कर अपना काफ़ी समय और मार्ग बचा लिया था उसका लाभ यहाँ कुछ मिनट विश्राम कर उठाया गया। विश्राम करने के बाद यहाँ से चलने की बारी थी। सिर्फ़ दिल्ली वाले राजेश जी की टीम सबसे पीछे चल रही थी, बाकि अन्य सभी आगे जा चुके थे।

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

Manimahesh to Sudrasi मणिमहेश से सुन्दरासी तक बर्फ़ीला व पथरीला सफ़र

हिमाचल की स्कार्पियो वाली यात्रा-16                                                                        SANDEEP PANWAR

हिमालय की पवित्र झील में स्नान और देव तुल्य समान पर्वत के दर्शनों के बाद वहाँ ठहरने का कोई अन्य कारण नहीं था। यहाँ के नजारे तो कल शाम को ही तसल्ली से देखते हुए आये थे। ऊपर आते समय शारीरिक थकान व आसमान में बादलों के आ जाने के कारण फ़ोटो लेने में भी दिल भरा नहीं था। लेकिन पहाड़ों की सबसे बड़ी खासियत यही होती है दोपहर बाद भले ही कितने बुरे हालात हो जाये, सुबह सवेरे सुहावना दिलखुश मौसम मिल ही जाता है। ऐसा मैंने लेह वाली बाइक यात्रा में भी देखा है। अब तक लगभग 100 से ज्यादा बार पहाड़ों में घूमने के लिये जा चुका हूँ जिसमें से अपवाद स्वरुप एक-दो यात्रा में ही सुबह के समय भी खराब मौसम से सामना हुआ है। मणिमहेश से गौरीकुन्ड तक की सवा किमी यात्रा करने में कोई खास समस्या नहीं आती है। यहाँ वापसी में मैंने एक बार फ़िर से पीछे रहकर चलने में ही अपनी भलाई समझी। दिल्ली वाले राजेश जी बाद में पहुँचे व विधान के सबसे आखिर में स्नान करने के कारण सभी को देर ना हो इसलिये अन्य साथियों को कह दिया गया कि जिसे चढ़ाई में समस्या आई थी कृप्या वे नीचे उतराई में जाते समय सावधानी से व अन्य साथियों से पहले चलने का कष्ट करे। यहाँ मनु, मराठे आदि कई बन्दे कुछ मिनट पहले ही नीचे भेज दिये गये थे। मेरे साथ विपिन रह गया था।




सोमवार, 22 अप्रैल 2013

Manimahesh lake and parvat/mountain मणिमहेश पर्वत व पवित्र झील में डुबकी।

हिमाचल की स्कार्पियो वाली यात्रा-15                                                                        SANDEEP PANWAR

रात को सोते समय हमने एक-एक कम्बल ही लिया था, लेकिन जैसे-जैसे समय बीत रहा था तेजी से वहाँ का तापमान भी गिरता जा रहा था। जल्दी ही हमें दूसरा कम्बल भी लेना पड़ गया। रात में ठन्ड़ ज्यादा तंग ना करे, इसलिये दो कम्बल ऊपर व एक कम्बल नीचे बिछा लिया गया था। जहाँ हम सो रहे थे ठीक हमारे सामने ही उसी दुकान में 3-4 लोग और भी बैठे हुए थे। वे सभी दारु पीने में लगे हुए थे। उन्हे दारु पीते देख मुझे राजेश जी की याद आ गयी। अपने राजेश जी भी इनका साथ देने के तैयार हो सकते थे। यदि वे यहाँ होते तो! राजेश जी का पता नहीं चल पाया कि वे रात में कहाँ तक पहुँचे थे यह बात तो निश्चित थी कि वे गौरीकुन्ड़ तक नहीं पहुँच पाये थे। क्योंकि गौरीकुन्ड़ तक आने के बाद मणिमहेश तक पहुँचना बेहद आसान है। विधान अंधेरा होने से पहले हमारे पास झील पर पहुँच चुका था विधान के अनुसार राजेश जी घोड़े वाले की इन्तजार में रुक गये थे। घोड़े वाला उन्हे लेकर आ जायेगा। लेकिन राजेश जी सुबह होने पर ही ऊपर पहुँच पाये थे। रात आराम से कट गयी, कई-कई कम्बल लेने का फ़ायदा यह हुआ कि हमें सोते समय ठन्ड़ ने तंग नहीं किया। मणिमहेश पर्वत की समुन्द्र तल से ऊँचाई 5653 मीटर यानि 18564 फ़ुट है। झील की ऊँचाई 4950 मीटर है। यह पर्वत हिमालय के पीरपंजाल पर्वतमाला में आता है।



शनिवार, 20 अप्रैल 2013

Gauri Kund to manimahesh lake and parvat पार्वती/गौरी कुन्ड़

हिमाचल की स्कार्पियो वाली यात्रा-14                                                                        SANDEEP PANWAR


गौरीकुन्ड़ मणिमहेश यात्रा में मणिमहेश झील व पर्वत से लगभग एक किमी पहले ही पगड़न्ड़ी के किनारे उल्टे हाथ आता है। इसलिये ऊपर जाते समय पहले ही गौरीकुन्ड़ की यह छोटी सी झील भी देख लेनी चाहिए। वैसे हमने यह झील जाते समय नहीं बल्कि वापसी आते समय देखी थी लेकिन हम तीन बन्दों के अलावा अन्य सभी ने यह झील जाते समय ही देख ली थी इसलिये आप सबको भी गौरीकुन्ड़ की यात्रा पहले ही करा देते है। यात्रा के दिनों में यहाँ पुरुषों का आना मना है इसलिये पहली बार वाली यात्रा में मैंने यह झील बाहर से ही देखी थी अबकी बार हमने इस झील को किनारे पर जाकर अच्छी तरह देखा था। मणिमहेश की तुलना में यह झील उसकी आधी तो छोड़ो चौथाई भी नहीं लगती है। हमने इस झील के सभी कोणों से फ़ोटो लेकर अपनी संतुष्टि की थी। हम तो यहाँ यात्रा आरम्भ होने से लगभग महीने भर से ज्यादा समय से पहले ही आ गये थे। इसलिये यहाँ किसी किस्म की रुकावट नहीं थी। यहाँ से आगे चलने के तुरन्त बाद एक चाय की दुकान दिखायी देती है। हम भी सीधे हाथ वाले मार्ग बन्दर घाटी वाले से काफ़ी जल्दी पहुँच गये थे। इस दुकान पर पहुँवने से पहले हल्की-हल्की बारिश की बूँदाबांदी आरम्भ हो गयी थी। हमें वहाँ कुछ पन्नी पड़ी हुई दिखायी दी हमने इन पन्नी को ओढ़कर बारिश से अपना बचाव किया था। ऊपर वाले का शुक्र/शनि जो भी हो सही रहा कि बारिश कहर बरपाने से पहले ही बन्द हो गयी थी।


गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

Manimahesh trekking Hadsar/Harsar to Dhancho हड़सर से धनछो तक मणिमहेश की कठिन ट्रेकिंग

हिमाचल की स्कार्पियो वाली यात्रा-12                                                                        SANDEEP PANWAR

रात में हमने मणिमहेश की यात्रा के आरम्भ स्थल हड़सर में तीन कमरे 250 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से तय कर लिये। यहाँ हमें सिर्फ़ एक रात्रि ही हडसर में रुकना था, दूसरी रात्रि तो हमने ऊपर पहाड पर मणिमहेश झील के किनारे ही रुकने का कार्यक्रम बनाया हुआ था। रात का खाना खाने के लिये हमें अपने कमरे से लगभग 300 मीटर पीछे  जाकर रात्रि भोजन करने के जाना पड़ा था। जहाँ हम ठहरे हुए थे वहाँ पर सिर्फ़ काम चलाऊ कमरे थे। रात का खाना खाकर सोने के लिये कमरे में पहुँचे तो वहाँ पर हमने कमरे वाले से पीने के लिये पानी माँगा तो उसके नौकर ने दूसरे कमरे के शौचालय से ही बोतले भरनी शुरु कर दी थी उसे शौचालय से पीने का पानी भरता देख खोपड़ी खराब हो गयी। पहले तो उसे जमकर सुनाया उसके बाद उन बोतलों को वही फ़ैंक कर अपनी बोतले लेकर बाहर सड़क पर आ गये। खाना खाकर आते समय मैने एक नल से पानी बहता हुआ देखा था। उस नल से रात्रि में पीने के लिये काम आने लायक जल भरकर कमरे में पहुँचे। हमारे कमरे के बराबर से नीचे बहती नदी के पानी की जोरदार आवाज पूरी रात आती रही। सुबह पहाड़ पर 15000 फ़ुट की ऊँचाई 14-15 किमी में  चढ़नी थी। अपना नियम सुबह जल्दी चलने का रहता है इस बात को सबको बता दिया गया था। साथ ही चेतावनी भी दे दी गयी थी कि सुबह जो देर करेगा वो बाद में आता रहेगा। सुबह ठीक 6 बजे हड़्सर छोड़ देने का फ़ैसला रात में ही बना लिया था।

मानचित्र

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