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रविवार, 12 अगस्त 2012

SAHASTRADHARA & TAPKESHWAR MAHADEV TEMPLE, DEHRADUN सहस्रधारा व टपकेश्वर महादेव मंदिर, देहरादून

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धमालचौकडी करने के इरादे लिये हमारे पास लगभग पूरा दिन ही पडा था। यहाँ मैंने क्या-क्या गजब ढहाया वो बताता हूं। सहस्रधारा में कितनी धारा है? यहाँ आने से पहले मेरे मन में यही प्रश्न बार-बार कोंध रहा था। जैसे ही बस से बाहर निकला तो एक ठन्डी हवा का झोंका ऐसा आया कि उसने मार्च की गर्मी में भी ठण्डक का अहसास करा गया कि यहाँ गर्मी में लोग ऐसे ही नहीं आते है कुछ तो खास बात है। बस से उतर कर हम दोनों आगे की ओर बढ चले। मामाजी का लडका नवीन उर्फ़ बबलू यहाँ पहले भी कई बार आया था, जिस कारण उसे यहाँ के बारे में अधिकतर जानकारी पहले से ही थी। जिसका फ़ायदा मुझे बहुत हुआ। सबसे पहले हम दोनों गुरु द्रोणाचार्य की गुफ़ा में गये। यह गुफ़ा अब शायद मन्दिर के रुप में बना दी गयी है। बीस साल पहले ऐसा नहीं था। तब शायद यह एक साधारण सी गुफ़ा ही थी जिसके बारे में बताया गया था कि यह महाभारत के कौरवों व पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की गुफ़ा है, वे यहाँ कुछ दिन रहे थे। बताने वाले तो यही बताते है कि देहरादून का नाम गुरु द्रोण के कारण ही पडा है। अब इस बात में कितनी सच्चाई है, मैं नहीं जानता। उस गुफ़ा को देखकर, हम दोनों आगे की ओर बढे। 

शनिवार, 11 अगस्त 2012

DEHRADUN RAILWAY STATION & SAHASTRADHARA देहरादून शहर व सहस्रधारा भ्रमण

इस यात्रा को शुरू से पढ़े       
देहरादून का माजरा बीस साल पहले जरुर गाँव था लेकिन आज ऐसा नहीं है। आज यह गाँव भी पूरी तरह शहरीकरण के रंग में रंग चुका है। मैंने आपको बताया था कि माजरा गाँव से पहले एक लोहे का पुल आया था। आज से बीस साल पहले की बात बता रहा हूँ कही आप आज 2012 में वहाँ जाकर तलाशने लगो कि लोहे का पुल तो हमने पार ही नहीं किया। वैसे आज भले ही वह तत्कालीन लोहे का पुल पार नहीं करना होता है लेकिन वह पुल आज भी अपनी जगह पर ही मौजूद है। उस लोहे के पुल की बायी तरफ़ देहरादून जाते समय, सीमेंट वाला बडा व नया पुल कई साल पहले बना दिया गया था। लोहे वाला पुल भले ही एक गाडी के आवागमन के लिये रहा होगा, क्योंकि वह पुल अंग्रेजों का बनवाया हुआ था। उस पुल की एक खासियत यह थी कि उसमें एक भी नट-वोल्ट व वेल्डिंग का प्रयोग नहीं हुआ था। जिन लोगों ने दिल्ली का यमुना नदी पर बना लोहे का पुराना पुल देखा होगा उन्हे याद आ गया होगा कि कैसा पुल रहा होगा। पुल पार करने के लिये यहाँ भी वाहन चालकों को सामने से आने वाली गाडी का ध्यान रखना होता है। यहाँ वैसी परेशानी नहीं आयी जैसी डाट वाली गुफ़ा पार करने वाले पुल पर आती है। डाट वाली गुफ़ा के पास वाला जो मन्दिर है उसके बारे में एक बात एक ब्लॉगर महिला मित्र ने मेरे ब्लॉग पर बतायी है कि देहरादून व आसपास जब भी कोई नया वाहन खरीदता है तो वह इस मन्दिर में जरुर प्रसाद चढाता है। मेरे मामाजी के पास कई ट्रक है और एक बार नया ट्रक लेने के अवसर पर मैं भी वही देहरादून में मौजूद था। मामाजी भी अपने नये ट्रक को लेकर यहाँ इसी मन्दिर पर आये थे। उसके बाद ही उन्होंने ट्रक को अपने कार्य में लगाया गया था।

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