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शनिवार, 31 अगस्त 2013
गुरुवार, 26 जनवरी 2012
SANDEEP PANWAR (JAT DEVTA) संदीप पवाँर (जाट देवता) की पसंद के चुटकुले-jocks, गुदगुदी मनोरंजन
अगर किसी ने सारे पढ लिये तो देखना उसकी आँखे ऐसी तो नहीं हो गयी है।
एक आम सूचना- सभी हंस गुल्ले मैंने किसी न किसी के ब्लॉग के लिये है जिन्हे मैं कई महीनों से एकत्र कर रहा था, मैंने एक भी नहीं लिखा है।पढ़े और जमकर हँसे...........
एक आम सूचना- सभी हंस गुल्ले मैंने किसी न किसी के ब्लॉग के लिये है जिन्हे मैं कई महीनों से एकत्र कर रहा था, मैंने एक भी नहीं लिखा है।पढ़े और जमकर हँसे...........
(मैं तो ब्लॉगिंग छोड रहा था अब झेलों)
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दो औरतें आम के पेड़ के नीचे काफ़ी देर से आपस में बात कर रही थीं, कि तभी एक आम अचानक टूट कर नीचे गिर गया।
पहली औरत बोली- ये आम कैसे गिरा?
दूसरी औरत कुछ बोलने ही वाली थी कि तभी आम हाथ जोड़कर बोला, "मैं पक गया हूँ तुम दोनों की बातें सुनकर।
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एक बार एक जाट और एक राजपूत में बहस चल पड़ी । राजपूत कहता कि हम बड़े और जाट कहता कि हम।
राजपूत बोला- हम हैं 'ठाकुर' जाट बोला- तो क्या, हम हैं 'चौधरी'
राजपूत बोला- हम हैं 'छत्री' (क्षत्रिय) जाट बोला- हम हैं 'तंबू'
राजपूत - 'तंबू' क्या होता है? जाट - छतरी का फूफा
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शिव/भोले ने जब जाट बनाया तो उसे सब कुछ दिया - तेज़ दिमाग़, लंबा चौड़ा शरीर, लेकिन ज़ुबान ना दी, तो पार्वती बोली "प्रभु आपने कितना सुथरा आदमी बनाया है ये जाट. इसे भी ज़ुबान दे दो ताकि यह भी बोल सके" शिवजी ने कहा "ना पार्वती यह बिना ज़ुबान के ही ठीक है" लेकिन पार्वती ना मानी शिवजी के पैर पकड़ लिए पार्वती की ज़िद के चलते शिवजी ने जाट को ज़ुबान दे दी। ज़ुबान मिलते ही जाट बोला "अरे भोले, यो सुथरी सी लुगाई कित से मारी"
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एक जाट हो तो वह जाट होता है।
दो जाट एक साथ हो तो मौज हो जाती है।
तीन जाट एक साथ हो तो कंपनी बन जाती है।
चार जाट एक साथ हो तो फौज बन जाती है।
बुधवार, 11 जनवरी 2012
SANDEEP PANWAR (JAT DEVTA) संदीप पवाँर (जाट देवता) की पसंद के लिंक
आज कोई पोस्ट नहीं लिख रहा हूँ आपको कुछ बात बता रहा हूँ जिसे जानने पर आपको लगेगा कि ये मेरी पसंद की बात क्यों है?
मैंने सोचा कि आप सब के साथ यह खुशी बाँटनी चाहिए।
पहली बात यह है कि उस वेबसाइट का जो अपने आप में अपने क्षेत्र में एक विशेषज्ञ वेबसाइट की हैसियत रखती है, जिसने मुझे अपनी वेबसाइट में लिखने की छूट प्रदान कर दी है। यानि अब मैं वहाँ का मान्यता प्राप्त लेखक बन गया हूँ। वहाँ पर अभी तक 300 लेखक है जिनमें से Top 10 में सबसे ऊपर मेरा स्थान भी आता है।
दूसरी बात भी उसी वेबसाइट का ही है जिसमें मुझे दो और बन्दों (एक बन्दा+एक बन्दी) के साथ वर्ष 2011 का सबसे रोमांचक घुमक्कड चुना गया है।
मैंने सोचा कि आप सब के साथ यह खुशी बाँटनी चाहिए।
उपरोक्त दोनों सम्मान मुझे मिले इसमें नीरज जाट जी का मुख्य रोल है जिनकी वजह से मैं इन्टरनेट पर लिखने लगा।
बीते 13 दिन से कोई लेख नहीं लिख पाया क्योंकि मेरे मामा जी (49 वर्ष) का देहांत हो गया था।
बीते 13 दिन से कोई लेख नहीं लिख पाया क्योंकि मेरे मामा जी (49 वर्ष) का देहांत हो गया था।
अब मैं सोच रहा हूँ कि मैं ब्लॉग पर लिखने की बजाय सिर्फ़ उस वेबसाइट पर ही लिखा करूँ, ब्लॉग मेरा सफ़र शुरु होने की पहली मंजिल थी। मुझे सलाह दीजिए कि मुझे क्या करना चाहिए, हो सकता है कि आपकी कोई सलाह मेरे बहुत काम आ जाये।
जो आपके मन में हो कह देना, मैंने कोई माडरेशन नहीं लगाया हुआ है।
मेरा आखिरी फ़ैसला यह हुआ है कि इस साल के आखिरी तक मैं दोनों जगह लिखूँगा, इसके बाद नये साल से मैं सिर्फ़ अपने ब्लॉग पर ही लिखा करूँगा।
मेरा आखिरी फ़ैसला यह हुआ है कि इस साल के आखिरी तक मैं दोनों जगह लिखूँगा, इसके बाद नये साल से मैं सिर्फ़ अपने ब्लॉग पर ही लिखा करूँगा।
मंगलवार, 27 दिसंबर 2011
"SAMPLA BLOGGER MEET साँपला ब्लॉगर मिलन समापन किस्त "
सांपला सम्मेलन का पहला भाग देखना चाहते हो तो यहाँ क्लिक करे
हॉल में सभी अपना परिचय देते हुए।
तीन बजे तक लगभग सभी मिलन समारोह स्थल पर आ चुके थे जो दो चार लेट-लतीफ़ थे बस वहीं रह गये थे। जो पहले ही समय से आ गये थे उनमें खूब विचार विमर्श हुआ। जो देरी से आये उनको सिर्फ़ जरुरी विचार विमर्श से काम चलाना पडा था। ठीक एक बजे चाय के साथ पनीर वाले ब्रेड, बिस्कुट का प्रबन्ध किया गया था जिसका वहाँ उपस्थित बंधुओं ने पूरा लुत्फ़ उठाया था। इसके बाद अन्दर विशाल हॉल में सबका एक दूसरे से परिचय हुआ। सबने अपना परिचय स्वयं दिया था। नाम से हम सभी को जानते ही थे चेहरे से भी सभी को जाना-पहचाना, कईयों को तो मैं तो पहचान ही नहीं पाया था। जितनी महिला ब्लॉगर वहाँ आयी हुई थी उनमें सबसे अच्छी आदत मुझे ईन्दु पुरी जी की लगी। ईन्दु जी में अपनापन झलक ही नहीं रहा था बल्कि उनका व्यवहार माँ बहन सरीखा ही था। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि किसी महिला से मैं या कोई और पहली बार मिल रहा हूँ। जिस समय मैंने अपना परिचय दिया कि मैं हूँ जाट देवता तो उस समय ईन्दु जी के चेहरे की आश्चर्य जनक खुशी देखने लायक थी। यहाँ से पहले मैं संजय अनेजा जी, बाबा जी, संजय भास्कर जी, केवल राम जी, अन्तर सोहिल जी से मिल चुका था। लेकिन यहाँ एक बार फ़िर सबसे मिलकर बेहद खुशी हुई है। यहाँ एक गडबड हो गयी कि मैं राकेश कुमार जी को नहीं पहचान पाया जब राकेश जी ने कहा और भई जाट देवता क्या मौज हो रही है? तब दिमाग पर जोर डालकर याद आया कि अरे यह तो अपने जिले के ही रहने वाले राकेश कुमार जी है। इसके बाद तो मैं खुशी से राकेश जी के गले लग गया था।
सोमवार, 26 दिसंबर 2011
SAMPLA BLOGGER MEET साँपला ब्लॉगर मिलन 1
यह साँपला का रेलवे स्टेशन है।
साँप ला, साँप ला, साँप ला, साँप ला, साँप ला, "साँपला" नाम ऐसा कि जैसे कोई साँप ला रहा हो यहाँ आने से पहले मैंने भी यही सोचा था कि यहाँ जाने के लिये साँप लेकर जाना होगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं था हमारे घर लोनी से पुरानी दिल्ली से होती ट्रेन सीधी साँपला तक जाती है बल्कि उससे आगे रोहतक तक भी जाती है। मुझे तो साँपला में ब्लॉगर मिलन में जाना था अत: अपुन तो साँपला के रेलवे स्टेशन पर उतर गये, यहाँ स्टेशन से बाहर निकास वाले द्धार पर अन्तर सोहिल जी व्यंजना शुक्ला जी को लेने के लिये आये हुए थे। व्यंजना जी लखनऊ से आयी थी। मैंने दोनों को देख लिया था लेकिन अन्तर सोहिल जी ने मुझे/मेरी ओर नहीं देखा। मैं उन दोनों के पीछे जाकर खडा हो गया। अब देखो कमाल कि जैसे ही ये दोनों वहाँ से चलने लगे तो ये मेरे पीछे से घूमकर निकल चले मैंने पीछे से अन्तर सोहिल जी की स्वेटर पकड ली लेकिन मेरा चेहरा उनकी तरफ़ नहीं था। जैसे ही सोहिल जी ने मेरा चेहरा देखा तो उनके चेहरे की खुशी शब्दों में ब्यान नहीं की जा सकती है, हम दोनों खुशी से एक-दूसरे के गले से लिपट गये। बल्कि सोहिल जी जो कि खुद 60-65 किलो वजन के ही है मुझे 77-78 किलो वजन को गले लिपटे-लिपटे ही उठा लिया था।
सोमवार, 3 अक्टूबर 2011
आपने क्या कहा (भाग 2)
संजय @ मो सम कौन ? said...
सॉरी भाई, एक साथ पढ़ने के चक्कर में एक-एक पोस्ट नहीं पढ़ी थी, यूँ समझ लो नीरज की तरह रपट गया था: अब एक एक पोस्ट पढ़नी पड़ेगी, लेकिन मन में उल्लास है कि पूरी तफ़सील से चौकड़ी की घुमक्कड़ी समझने को मिलेगी।
जवाब------क्रम से पढो, इस सफ़र में ना पढने में, ना ही चलने में शार्टकट ठीक नहीं है।
Vidhan Chandra said...
एक बात तो तय है की आप लोग यात्रा का मजा नहीं लेते हैं , रिकार्ड बनाने की "धुन" में रहते है!! नीरज भी कोई भगवान नहीं है ! इन्सान ही है, उसे पछाड़ने के चक्कर में अगर आप कहीं (भगवान न करे ) गिर जाते या आप को कुछ हो जाता तो? हम घुमक्कड़ हैं और उसका आनंन्द स्वयं के लिए लेते हैं , वो अलग बात है कि ब्लॉग के जरिये अपनी भावनाएं दूसरों से शेयर कर लेते हैं. बीस मिनट लेट ही सही नीरज पहुंचा न आप के पास अगर मैं होता तो एक घंटा लेट होता! अगर हमें जल्दी नहीं है तो बिना बात जल्दी क्यों करें संदीप जी !! आपके फोटो अच्छे हैं , नीरज कि सलाह मानकर फोटो वाटरमार्क नहीं किये इसके लिए धन्यवाद!!
जवाब------घुमक्कड़ तो हर तरह का मजा उठाते है कभी तेज कभी धीमे, जब सभी तेज चल सकते हो तो क्यों नहीं चले? पहले जाने वाले को आराम भी सबसे ज्यादा मिलता है। उस समय कुछ तो उन्हे उतराई की रफ़्तार भी दिखानी थी दूसरी बारिश होने का डर भी था जिससे कि मार्ग फ़िसलन भरा हो जाता, रात की बारिश ने तो वैसे ही ऐसी-तैसी की हुई थी।
मदन शर्मा said...
मैं समय न मिलने और कुछ व्यक्तिगत कारणों से बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ. बहुत सुन्दर चित्र मय प्रस्तुति लेकिन एक बात याद रखिये ये तीर्थ स्थल हमें एक दुसरे से जोड़ने के लिए ही बनाये गए हैं देवी देवताओं की पूजा तो एक बहाना है एक दुसरे के नजदीक आने का !!
शनिवार, 1 अक्टूबर 2011
आपने क्या कहा (भाग 1)
chandresh kumar said...
बहुत अच्छा आगाज़ है तो अंजाम तो बहुत ही धांसू होगा. आपके लिए बस यही कहना है की हम किस किस की नजर को देखें हम तो सबकी नजर में रहते है.क्या करे दोस्त हमने तो किस्मत ही ऐसी पाई है कि हमेशा सफ़र में ही रहते हैं. आगे भी ऐसे ही जरी रखें आपकी आँखों से नीले गगन, प्रकृति का यौवन फूलों कि नाजुक कलियाँ देख कर मन प्रफुल्लित हो जाता है.
जवाब------जब तक इस शरीर में जान है ये घूमना लगा ही रहेगा।
ब्लॉ.ललित शर्मा said...
एकाध कोई उल्टा बोल्या के नही। :)
जवाब------लठ चार-चार हाथ में हो फ़िर किसकी मजाल की कोई उल्टा बोल दे।
नीरज जाट said...
मैं पहले दिन ही दिल्ली से नारकण्डा पहुंच गया और आप बाइक होते हुए भी पिंजौर ही पहुंच सके हैं। सालों लगेंगे आपको अभी मेरी बराबरी करने में। हा हा हामुझे भी बाइक चलानी सीखने दो, फिर देखना भरपूर टक्कर मिलेगी आपको और आपके जोडीदार को। लाइसेंस तो बन गया है। खाना और सोना मेरी कमजोरी नहीं बल्कि मेरी ताकत है। जरा एक बार इस यात्रा में से खुद को हटाकर देखो, कौन भारी पडा? आप को मैं अपना फिटनेस गुरू मानना चाहता हूं। अब मेट्रो में भी एस्केलेटर की जगह सीढियों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। बढिया शुरूआत। और हां, लिंक डालना भी सीखो। जहां पहली बार मेरा नाम लिखा है, वहां ब्लॉग का लिंक लगाया करो।
जवाब------सीख लो बाइक चलानी भी, ये अच्छा किया एस्केलेटर की जगह सीढियों का इस्तेमाल, इस दुनिया में सब गुरु है कोई अपने को कम नहीं मानता है।
निर्मला कपिला said...
तस्वीर चंदाल चौकडी से शुरू हुये मगर अगली हर तस्वीर मे से एक चंडाल गायब होता रहा। सुन्दर यात्रा वृतांट। शुभकामनायें।
जवाब------क्या करते फ़ोटो खींचने के लिये कोई मिलता ही नहीं था।
प्रवीण पाण्डेय said...
उत्तरी सड़को पर धौंकती फटफटिया उतरी।
जवाब------हमारे गाँव में बाइक को फ़िटफ़िटी भी कहते है।
Vidhan Chandra said...
श्रीखंड की यात्रा कठिन है, जो आप लोगों ने सफलता पूर्वक पूरी की!! सहस के धनी आप जैसे लोग चंडाल चौकड़ी न होकर "स्वर्णिम चतुर्भुज" है!!
जवाब------चारों बेहद ही हिम्मत वाले हैं, घूमने के मामले में किस्मत वाले भी।
veerubhai said...
संदीप जाट भाई बहुत सुन्दर प्रस्तुति .नीरज भाई के ब्लॉग पर भी यह वृत्तांत पढ़ा .आपका अंदाज़-ए-बयाँ आपका अपना शानदार नज़रिया प्रस्तुत करता है .
जवाब------शानदार नज़रिया कहो या कि जो देखा जो महसूस किया वो मान लो।
Bhushan said...
बढ़िया यात्रा वृत्तांत. बिण मांग्या सुझाव सै- बाद में इसे संपादित करके पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित कर दें.
जवाब------सोच तो रहा हूँ लेकिन ऐसी तो कई पुस्तक हो जायेगी।
डॉ टी एस दराल said...
भाई ये लट्ठ लेकर यात्रा तो जाट ही कर सकते हैं। बहुत दिलचस्प ।
जवाब------नहीं जी लठ लेकर कोई भी यात्रा कर सकता है बस हिम्मत होनी चाहिए।
गुरुवार, 23 जून 2011
निर्दयी नीरज से सावधान रहना
आज पोस्ट तो संगम से काशी पैदल यात्रा वाली लगानी थी, पर क्या करु मैं इस छोटे भाई नीरज जाट जी का, जिस के कारण मुझे पहले ये पोस्ट लगानी पड रही है।
मैं और नीरज आसपास ही रहते है। कोई तीन-चार किलोमीटर के फ़ासले पर, और मेरे अपने घर से कार्यालय जाते समय बीच मार्ग में ही नीरज जाट जी का कार्यालय भी आता है। अक्सर हमारी मुलाकात होती रहती है।
नीरज के अपने कार्यालय में पानी पीने का जो यंत्र लगा हुआ है, उसमें एक गडबड कर रखी है या अपने आप हो गयी है, ये तो वो ही जाने, वो ये है, कि इस जगह पर पीने के पानी का ये जो कूलर लगा हुआ है, इसमें दो टोंटी है। पानी पीने के लिये आया प्यासा बंदा किस टोंटी से पानी लेगा, जब दो टोंटी में से एक खराब हो व दूसरी सही हो, आपका जवाब भी मेरे जैसा ही होगा कि सही टोंटी में से, बस ये मैंने भी किया एक बार नहीं दो-दो बार,
अब आप सोच रहे होंगे कि इसमें कौन सी पोस्ट लिखने वाली बात थी, अब जरा इससे आगे देख लो कि इस सही टोंटी में से जो पानी निकलता है उसे आप पीना तो दूर हाथ भी नहीं धो सकते हो, क्योंकि सही टोंटी में से निकलने वाला पानी इतना गर्म है कि उसमें चाय की पत्ती व दूध डाल दो तो चाय़ सैंकडों में तैयार हो जायेगी।
इसलिये मैं आप सब को कह रहा हूँ कि जो कोई भी नीरज के पास जाये तो वो अपने पीने का पानी अपने साथ ले जाये, तथा इस टोंटी से हाथ भी ना धोये, नहीं तो चिल्लाते रहना, और निर्दयी नीरज आपको निहारते रहेगा।
देख लो अब भी यही कह रहा है, कि इसी से पानी पी लो।
उसकी बातों में मत आना, नहीं तो चिल्लाते रहना, बाद में।
हद तो तब हो गयी, जब मैं इस टोंटी के फोटो खिच रहा था, तो तब भी नीरज को देखो, इशारा कौन सी टोंटी की तरफ़ कर रहा है। मैं सही टोंटी की और इशारा कर रहा था। मैं नीरज को अपनी शादी की सालगिरह पर आइसक्रीम की दावत का न्यौता देने गया था। जो कि आज है। अब आप बच के रहना इस पानी से?
मंगलवार, 7 जून 2011
मन POEM, GEET
आज पडोस के एक लडके ने अपने स्कूल की वार्षिक कार्यक्रम की पुस्तिका में लिखी हुई एक कविता मुझे दी है,
मैंने इसमें कोई छेडखानी नहीं की है, नाम की भी नहीं,
अगर आपको धन्यवाद देना है, तो उस बच्चे को जिसने ये प्यारी सी रचना मुझे दी है,
कवि "दिनेश रघुवंशी" ने यह प्यारी रचना लिखी है।
जीवन ग्रंथ
जीवन ऐसा चाहिए, मन संतुष्ट होना चाहिए।
रिश्ते कई बार बेड़ी बन जाते हैं
प्रश्नचिह्न बन राहों में तन जाते हैं
ऐसा नहीं किसी से कोई अनबन है
कुछ दिन सिर्फ़ मेरा, अकेले चलने का मन है
अपना बनकर जब उजियारे छ्लते हों
अँधियारों का हाथ थामना अच्छा है
रोज़-रोज़ शबनम भी अगर दग़ा दे तो
अंगारों का हाथ थामना अच्छा है
क़दम-क़दम पर शर्त लगे जिस रिश्ते में
तो वह रिश्ता भी केवल इक बन्धन है
ऐसा नहीं किसी से कोई अनबन है
कुछ दिन सिर्फ़ मेरा, अकेले चलने का मन है
दुनिया में जिसने भी आँखें खोली हैं
साथ जन्म के उसकी एक कहानी है
उसकी आँखों में जीवन के सपने हैं
आँसू हैं,आँसू के साथ रवानी है
अब ये उसकी क़िस्मत कितने आँसू हैं
और उसकी आँखों में कितने सपने हैं
बेगाने तो आख़िर बेगाने ठहरे
उसके अपनों मे भी कितने अपने हैं
अपनों और बेगानों से भी तो हटकर
जीकर देखा जाए कि कैसा जीवन है
ऐसा नहीं किसी से कोई अनबन है
कुछ दिन सिर्फ़ मेरा, अकेले चलने का मन है
अपना बोझा खुद ही ढोना पडता है
सच है रिश्ते अक्सर साथ नहीं देते
पाँवों को छाले तो हँसकर देते है
पर हँसती-गाती सौग़ात नहीं देते
जिसने भी सुलझाना चाहा रिश्तों को
रिश्ते उससे उतना रोज़ उलझते हैं
जिसने भी परवाह नहीं की रिश्तों की
रिश्ते उससे अपने आप सुलझते हैं
कभी ज़िन्दगी अगर मिली तो कह देंगे
तुझको सुलझाना भी कितनी उलझन है
ऐसा नहीं किसी से कोई अनबन है
यह रचना प्रख्यात कवि एवं गीतकार दिनेश रघुवंशी जी की है: यहाँ देखिये:
http://kavyanchal.com/ navlekhan/?p=943
http://kavyanchal.com/
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