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बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

Sukhi Top-Gangnani-Bhatwari to Lata Ganga Bridge सुक्खी टॉप से गंगनानी, भटवारी होते हुए लाटा गंगा पुल तक

गोमुख से केदारनाथ पद यात्रा-3

रात को अंधेरा होते-होते हम लोग झाला गाँव पहुँचे थे। यह गाँव गंगौत्री जाते समय हर्षिल से कई किमी पहले पड़ता है। यहाँ पर एक पुल से गंगा नदी पार करते ही रात में ठहरने के लिये बहुत सारे होटल आदि बने हुए है। मैं कई बार बाइक से यहाँ से होकर गया हूँ लेकिन कभी गंगौत्री से उत्तरकाशी के बीच रात में नहीं रुका था। आज पहला मौका मिल रहा था जो मैं झाला में रुक रहा था। अगर हम गंगौत्री से सुबह जल्दी चले होते तो आज की रात गंगनानी में ठहरने की योजना बना ड़ालते। सुबह उठते ही नहा धोकर चलने की तैयारी करने लगे। हम तो नहा धोकर अपनी सही समय 6 बजे तैयार हो गये थे\ लेकिन हमारे ग्रुप में कुछ दो-तीन बुढ़्ढे थे। वे सुबह चलने में बहुत ढ़ीले थे। जिस कारण पहले दिन गंगौत्री से चलने में दोपहर करायी थी। अब यहाँ से चलने में भी सात से ज्यादा बजा दिये थे। इनके साथ मेरी यह पहली व आखिरी यात्रा थी इनके ऐसे रवैये के बाद मैंने इनके साथ दुबारा कभी यात्रा नहीं की थी।  


इन थके हुए को मत देखो, इनके पीछे गंगा की गहराई देखो
गंगा की धार देखो।

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

Gangotri to Harsil गंगौत्री से हर्षिल, झाला ट्रेकिंग तक

गोमुख से केदारनाथ ट्रेकिंग यात्रा-2

 दूसरे दिन अपने ग्रुप के बूढ़े यात्रा सुबह बजे सो कर उठे थे। जबकि अपना नियम है कि जल्दी उठोजल्दी चलोजल्दी रुको। लेकिन हमारे इस ग्रुप में अनसट उठने में ढीले थे। हमारी यात्रा तो एक दिन पहले ही शुरु हो गयी थीलेकिन नासपीटों/ नौरत्नों की यात्रा आज से शुरु होनी थी। हम कल ही 40 किमी ट्रेकिंग कर आये थे। सुबह के 11 बजे गंगोत्री मंदिर पर नहाने धोने के लिये पहुँच गए। एक गजब देखा था कि सारे के सारे नौरत्न, पक्के नास्खेत थे, गंगौत्री मंदिर में अन्दर जाकर दर्शन भी ना किये। जब बात आयी नहाने की तो सब के सब पानी के ठन्डे होने की बात कह कर चुप बैठे रहे तो जाट देवता से नहीं रहा गयासबसे पहले जा कर हाथ मुहँ धोये। 

यहाँ इस तरह आराम से खड़ा होने के लिये दमदार जिगर होना चाहिए, जो ऐसे गेरे नत्थू खेरे में नहीं पाया जाता।

गंगौत्री में गंगा जल की तूफ़ानी गति

शनिवार, 8 सितंबर 2012

HARSHIL-LANKA-BHAIRO GHATI-GANGOTRI, भाग 3 (हर्षिल-लंका-भैरों घाटी-गंगौत्री)

सीरिज गंगौत्री-गौमुख
गंगनानी से थोडा सा आगे चलते ही एक जगह पहाड से छोटे-छोटे पत्थर सडक पर गिर रहे थे। ड्राईवर को जैसे ही ऊपर से पत्थर आते दिखाई दिये, उसने तुरन्त बस के ब्रेक लगा दिये। चूंकि मैं आगे वाली सीट पर ही बैठा हुआ था अत: मुझे साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था कि पत्थर कहाँ से आ रहे है? साफ़ दिखाई दे रहा था कि पत्थर सामने वाली पहाडी के ऊपर से आ रहे थे। मैंने ड्राईवर से कहा, “क्या इन छोटे-छोटे से पत्थर के कारण गाडी रोकी है? चालक ने कहा हाँ, गाडी तो रोकी है लेकिन इन छोटे-छोटे पत्थर के कारण नहीं, बल्कि बडे-बडे पत्थर के कारण, मैंने कहा बडा पत्थर है कहाँ? चालक ने कहा लगता है कि तुम पहाड में पहली बार यात्रा कर रहे हो। जब मैंने उसे कहा कि हाँ कर तो रहा हूँ लेकिन उससे क्या हुआ? अब चालक ने मुझे बताया कि जब भी पहाड से छोटे-छोटे पत्थर या रेत आदि कुछ भी गिर रहा हो तो उसके नीचे से कभी नहीं निकलना चाहिए। क्योंकि बडे पत्थर से पहले हमेशा ऐसे ही छोटे मोटे पत्थर आते है उसके बाद बडा पत्थर आता है और बडा पत्थर जानलेवा व विनाशकारी होता है। जो एक बडी बस को भी अपने साथ खाई में धकेल सकता है। चालक की ये बाते सुनकर मेरी बोलती बन्द हो गयी। लेकिन ड्राईवर ने बहुत काम की बात बता दी थी जो मुझे आज तक भी याद है बाइक यात्रा में कई बार मेरे काम भी आयी है। खैर कुछ देर के इन्तजार के बाद, जब छोटे-मोटे सभी पत्थर आने बन्द हो गये तो हमारी बस आगे बढ चली। आगे-आगे जैसे ही हमारी बस बढती जा रही थी वैसे ही मार्ग भी खतरनाक होता जा रहा था। उस पर चढाई भी जबरदस्त आ गयी थी। एक तरह ऐसे पहाड जहाँ से पत्थर गिरने का भय, दूसरी ओर गहरी खाई जिसमें भागीरथी अपनी तूफ़ानी रफ़तार से नीचे की ओर शोर मचाती हुई लुढकती जा रही थी।


देख लो

सोमवार, 3 सितंबर 2012

FIRST GAUMUKH TREKKING पहली गौमुख ट्रेकिंग/यात्रा, भाग 2 (टिहरी-उत्तरकाशी-गंगनानी)


टैम्पो में हल्का सा झटका, सडक पर आये छोटे से गडडे में पहिया आने के कारण महसूस हुआ था। जैसे ही झटका लगा, मैंने पीछॆ मुडकर देखा तो काली सायी रात में ठीक से यह भी दिखाई नहीं दिया था। कि असली में वह गडडा था या कोई छोटा सा पत्थर पडा हुआ था। जब हमारा टैम्पो उस पुलिया से आधे किमी से भी ज्यादा दूरी पार कर गया तो टैम्पो चालक बोला “अब कोई खतरा नहीं है।” यह सुनकर सबकी जान, जो पता नहीं कहाँ अटकी पडी थी? वापस शरीर में आ गयी, जिससे सबके चेहरे चहकने लगे। मैंने व कई सवारियों ने उससे पूछा कि आखिर वहाँ उस पुलिया पर भूत वाली कहानी क्या है? तब चालक ने बताया था कि कुछ दिन पहले एक औरत सडक पार करते हुए किसी गाडी की चपेट में आ गयी थी। जिसके बाद अक्सर यहाँ पर उसी पुलिया के आसपास, जहाँ उसकी मौत हुई थी, वह भूत के रुप में अचानक गाडी के सामने आ जाती है जिस कारण कई वाहन चालक उसको असली औरत समझते हुए उसको बचाने के चक्कर में अपना वाहन दुर्घटनाग्रस्त कर बैठते है। वैसे मैं दिन में कई बार उस पुलिया के पास थोडी देर रुककर गया हूँ, लेकिन मुझे दिन में वहाँ ऐसा-वैसा कुछ दिखाई नहीं दिया। अब भूत की सच्चाई का भी मैं कुछ नहीं कह सकता कि वहाँ सच में भूत था या फ़िर ऐसे ही डराने के लिये अफ़वाह उडायी हुई थी।

पहाड में एक गांव।

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