सुबह जब हम नुरपुर से चले थे तो सड़क किनारे मिले ताजे-ताजे आम खाते हुए चले आ रहे थे। इसी तरह 24 किमी कब पार हो गये पता ही नहीं चला। आगे चलकर एक तिराहा आया। वहाँ लगे बोर्ड़ से मालूम हुआ कि हम कितनी 24 किमी दूर आ गये है। इस तिराहे का तीसरा मार्ग धर्मशाला की ओर चला जाता है। उन दिनों इस सड़क पर निर्माण कार्य होने के कारण हम उधर से नहीं आये थे। इस तिराहे से जरा सा आगे चलते ही एक नदी के पुल से ठीक पहले हिमाचल पुलिस का बैरियर/कम चैक पोस्ट बना हुआ है। जब हम आम खा रहे थे तो स्कारपियो वाले हमारे से आगे निकल गये थे। जैसे ही हम इस चैक पोस्ट के आगे पहुँचे तो पुलिस वालों ने हमारी बाइक पर महाराष्ट्र के नम्बर देखकर हमें रोक कर बाइक के पेपर व लाइसेंस दिखाने को कहा। अब उस समय हमारे पास ना तो लाईसेंस थे ना ही बाइक के पेपर। हमारे बैग व मराठों के बैग गाड़ी में रखे हुए थे। हमारे लाइसेंस व बाइक के पेपर उन्ही बैग में रखे हुए थे। पहले तो पुलिस वालों ने अपनी दहाड़ी बनाने की पूरी कोशिश की, हमने उन्हे सारी बात बतायी भी लेकिन वे बिना पेपर देखे हमें आगे जाने देने को तैयार नहीं थे। दहाड़ी बनाने वाले पुलिस वालों की औकात देखिये उन्होंने ड़र के मारे दिल्ली के नम्बर की स्कारपियों के पेपर आदि देखे बिना ही जाने दिया था। अगर उनके पेपर देखे होते तो शायद तब तक हम भी वहाँ पहुँच जाते! हमने गाड़ी वालों को फ़ोन कर रुकने को कहा। इतने में मनु भाई को अपना दैनिक जागरण में काम करने वाला भाई याद आ गया। मनु ने पुलिस वालों को अपने दैनिक जागरण से जुड़े होने के बारे में बताया तो पुलिस वाला एकदम गिरगिट की तरह रंग पलट कर बोला, अरे आपने पहले क्यों नहीं बताया कि आप अखबार वाले हो? खैर पुलिस वालों ने हमारे 5-7 मिनट खराब कर दिये थे।
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सोमवार, 15 अप्रैल 2013
Dalhousie- Panjpulla a beautiful place ड़लहौजी में पंचपुला ने दिल खुश कर दिया।
हिमाचल की स्कार्पियो-बस वाली यात्रा-06 SANDEEP PANWAR
सुबह जब हम नुरपुर से चले थे तो सड़क किनारे मिले ताजे-ताजे आम खाते हुए चले आ रहे थे। इसी तरह 24 किमी कब पार हो गये पता ही नहीं चला। आगे चलकर एक तिराहा आया। वहाँ लगे बोर्ड़ से मालूम हुआ कि हम कितनी 24 किमी दूर आ गये है। इस तिराहे का तीसरा मार्ग धर्मशाला की ओर चला जाता है। उन दिनों इस सड़क पर निर्माण कार्य होने के कारण हम उधर से नहीं आये थे। इस तिराहे से जरा सा आगे चलते ही एक नदी के पुल से ठीक पहले हिमाचल पुलिस का बैरियर/कम चैक पोस्ट बना हुआ है। जब हम आम खा रहे थे तो स्कारपियो वाले हमारे से आगे निकल गये थे। जैसे ही हम इस चैक पोस्ट के आगे पहुँचे तो पुलिस वालों ने हमारी बाइक पर महाराष्ट्र के नम्बर देखकर हमें रोक कर बाइक के पेपर व लाइसेंस दिखाने को कहा। अब उस समय हमारे पास ना तो लाईसेंस थे ना ही बाइक के पेपर। हमारे बैग व मराठों के बैग गाड़ी में रखे हुए थे। हमारे लाइसेंस व बाइक के पेपर उन्ही बैग में रखे हुए थे। पहले तो पुलिस वालों ने अपनी दहाड़ी बनाने की पूरी कोशिश की, हमने उन्हे सारी बात बतायी भी लेकिन वे बिना पेपर देखे हमें आगे जाने देने को तैयार नहीं थे। दहाड़ी बनाने वाले पुलिस वालों की औकात देखिये उन्होंने ड़र के मारे दिल्ली के नम्बर की स्कारपियों के पेपर आदि देखे बिना ही जाने दिया था। अगर उनके पेपर देखे होते तो शायद तब तक हम भी वहाँ पहुँच जाते! हमने गाड़ी वालों को फ़ोन कर रुकने को कहा। इतने में मनु भाई को अपना दैनिक जागरण में काम करने वाला भाई याद आ गया। मनु ने पुलिस वालों को अपने दैनिक जागरण से जुड़े होने के बारे में बताया तो पुलिस वाला एकदम गिरगिट की तरह रंग पलट कर बोला, अरे आपने पहले क्यों नहीं बताया कि आप अखबार वाले हो? खैर पुलिस वालों ने हमारे 5-7 मिनट खराब कर दिये थे।
सुबह जब हम नुरपुर से चले थे तो सड़क किनारे मिले ताजे-ताजे आम खाते हुए चले आ रहे थे। इसी तरह 24 किमी कब पार हो गये पता ही नहीं चला। आगे चलकर एक तिराहा आया। वहाँ लगे बोर्ड़ से मालूम हुआ कि हम कितनी 24 किमी दूर आ गये है। इस तिराहे का तीसरा मार्ग धर्मशाला की ओर चला जाता है। उन दिनों इस सड़क पर निर्माण कार्य होने के कारण हम उधर से नहीं आये थे। इस तिराहे से जरा सा आगे चलते ही एक नदी के पुल से ठीक पहले हिमाचल पुलिस का बैरियर/कम चैक पोस्ट बना हुआ है। जब हम आम खा रहे थे तो स्कारपियो वाले हमारे से आगे निकल गये थे। जैसे ही हम इस चैक पोस्ट के आगे पहुँचे तो पुलिस वालों ने हमारी बाइक पर महाराष्ट्र के नम्बर देखकर हमें रोक कर बाइक के पेपर व लाइसेंस दिखाने को कहा। अब उस समय हमारे पास ना तो लाईसेंस थे ना ही बाइक के पेपर। हमारे बैग व मराठों के बैग गाड़ी में रखे हुए थे। हमारे लाइसेंस व बाइक के पेपर उन्ही बैग में रखे हुए थे। पहले तो पुलिस वालों ने अपनी दहाड़ी बनाने की पूरी कोशिश की, हमने उन्हे सारी बात बतायी भी लेकिन वे बिना पेपर देखे हमें आगे जाने देने को तैयार नहीं थे। दहाड़ी बनाने वाले पुलिस वालों की औकात देखिये उन्होंने ड़र के मारे दिल्ली के नम्बर की स्कारपियों के पेपर आदि देखे बिना ही जाने दिया था। अगर उनके पेपर देखे होते तो शायद तब तक हम भी वहाँ पहुँच जाते! हमने गाड़ी वालों को फ़ोन कर रुकने को कहा। इतने में मनु भाई को अपना दैनिक जागरण में काम करने वाला भाई याद आ गया। मनु ने पुलिस वालों को अपने दैनिक जागरण से जुड़े होने के बारे में बताया तो पुलिस वाला एकदम गिरगिट की तरह रंग पलट कर बोला, अरे आपने पहले क्यों नहीं बताया कि आप अखबार वाले हो? खैर पुलिस वालों ने हमारे 5-7 मिनट खराब कर दिये थे।
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