सोमवार, 15 अप्रैल 2013

Dalhousie- Panjpulla a beautiful place ड़लहौजी में पंचपुला ने दिल खुश कर दिया।

हिमाचल की स्कार्पियो-बस वाली यात्रा-06                                                             SANDEEP PANWAR

सुबह जब हम नुरपुर से चले थे तो सड़क किनारे मिले ताजे-ताजे आम खाते हुए चले आ रहे थे। इसी तरह 24 किमी कब पार हो गये पता ही नहीं चला। आगे चलकर एक तिराहा आया। वहाँ लगे बोर्ड़ से मालूम हुआ कि हम कितनी 24 किमी दूर आ गये है। इस तिराहे का तीसरा मार्ग धर्मशाला की ओर चला जाता है। उन दिनों इस सड़क पर निर्माण कार्य होने के कारण हम उधर से नहीं आये थे। इस तिराहे से जरा सा आगे चलते ही एक नदी के पुल से ठीक पहले हिमाचल पुलिस का बैरियर/कम चैक पोस्ट बना हुआ है। जब हम आम खा रहे थे तो स्कारपियो वाले हमारे से आगे निकल गये थे। जैसे ही हम इस चैक पोस्ट के आगे पहुँचे तो पुलिस वालों ने हमारी बाइक पर महाराष्ट्र के नम्बर देखकर हमें रोक कर बाइक के पेपर व लाइसेंस दिखाने को कहा। अब उस समय हमारे पास ना तो लाईसेंस थे ना ही बाइक के पेपर। हमारे बैग व मराठों के बैग गाड़ी में रखे हुए थे। हमारे लाइसेंस व बाइक के पेपर उन्ही बैग में रखे हुए थे। पहले तो पुलिस वालों ने अपनी दहाड़ी बनाने की पूरी कोशिश की, हमने उन्हे सारी बात बतायी भी लेकिन वे बिना पेपर देखे हमें आगे जाने देने को तैयार नहीं थे। दहाड़ी बनाने वाले पुलिस वालों की औकात देखिये उन्होंने ड़र के मारे दिल्ली के नम्बर की स्कारपियों के पेपर आदि देखे बिना ही जाने दिया था। अगर उनके पेपर देखे होते तो शायद तब तक हम भी वहाँ पहुँच जाते! हमने गाड़ी वालों को फ़ोन कर रुकने को कहा। इतने में मनु भाई को अपना दैनिक जागरण में काम करने वाला भाई याद आ गया। मनु ने पुलिस वालों को अपने दैनिक जागरण से जुड़े होने के बारे में बताया तो पुलिस वाला एकदम गिरगिट की तरह रंग पलट कर बोला, अरे आपने पहले क्यों नहीं बताया कि आप अखबार वाले हो? खैर पुलिस वालों ने हमारे 5-7 मिनट खराब कर दिये थे।





इसी मार्ग से चले आ रहे है।

यह पेड़ ब्रेड़ वाली दुकान के सामने था।

ड़लहौजी का बन्दर

बर्फ़बारी करने वाला रहस्मयी पेड़।

गाड़ी होते हुए भी शार्टकट मारने की आदत से बाज नही आये।

पुलिस वालों को वही उस पुल पर छोड़कर, हम फ़िर से आगे अपनी मंजिल की ओर बढ़ चले। 5-6 किमी आगे जाने पर हमारे गाड़ी वाले साथी एक जगह रुके हुए थे। उन्हे पूरी बात बतायी और आगे चलने को कहा। यहाँ कुछ लोगों को सुबह नाश्ता करने की आदत थी जिस कारण एक दुकान देखकर सबने ब्रेड़ और उस पर जैम लगाकर खाना शुरु किया। राजेश जी दिल्ली से ही जैम का नया डिब्बा लेकर आये थे। कुछ देर में चाय भी बनकर आ गयी थी। चूंकि मैं चाय नहीं पीता हूँ इसलिये चाय का ठीक से ध्यान ही नहीं है। यहाँ सुबह का ब्रेड़ वाला नाश्ता कर आगे बढ़ चले। आगे का सफ़र भी मजे से कट रहा था। धीरे-धीरे हम लोगों ने ड़लहौजी में प्रवेश कर ही लिया। ड़लहौजी में प्रवेश करने के बाद हम सीधे वहाँ के मुख्य तिराहे वाले बस अडड़े पर जाकर ही रुके। यहाँ पर कुछ देर रुककर आसपास के स्थलों की जरुरी जानकारी ले ली गयी। मनु ने अपने लिये एक पेट के सामने लटकाने वाला छोटा सा बैग भी लिया था। यहाँ पता लगा कि सबसे पहले पंचपुला देखने चले जाओ। पंजपुला जाने वाले मार्ग के बारे में पता कर कुछ दूर पैदल ही चल दिये। यहाँ एक बन्दर हमें ड़राने की काफ़ी कोशिश कर रहा था, वह बन्दर तब तक हमें बन्दर-घुड़की देता रहा जब तक हम वहाँ से आगे आगे चलते नहीं बने। यहाँ हम पैदल ही सड़क पर बने शार्ट कट से नीचे जाने लगे तो एक पेड़ पर जाकर नजर ठहर गयी। वहाँ पर उस पेड़ से ताजा बर्फ़बारी होने जैसा आभास करने के लिये रुई जैसे फ़ोहे उड़ रहे थे। वे फ़ोहे काफ़ी अधिक मात्रा में थे जिस कारण बर्फ़बारी जैसा माहौल उत्पन्न हो रहा था। हमें उस पेड़ का नाम याद नहीं रहा इसलिये मैं तो उसे बर्फ़बारी वाला पेड़ ही कहता हुँ। 

पंजपुला आने वाला मार्ग।

सरदार अजीत सिंह की समाधी। (भगत सिंह के चाचा या कोई और)
समाधी पर छोटी सी झील

चले मन्दिर

चानमारी जाने के लिये ट्रेकिंग मार्ग


ऊपर झरने से नीचे का नजारा

शार्टकट पार करते ही गाड़ी में बैठ पंजपुला की ओर चले गये। पंचपुला आते ही सबसे पहले वहाँ का जायजा लिया कि वहाँ देखने लायक क्या-क्या है? जब यह पता लग गया कि यह स्थल बहुत ज्यादा बड़ा नहीं है तब हमने वहाँ सबसे पहले सरदार अजीत सिंह की समाधी देखी। यह अजीत सिंह सरदार भगत सिंह के चाचा ही है या कोई और? इस समाधी के ठीक साथ लगी हुई एक छॊटी सी झील भी बनी हुई है। इतनी छोटी झील हमारे जैसे बावलों के किसी काम की नहीं थी। हमने इस झील में नीचे उतरकर देखने की इच्छा भी नहीं की। यहाँ ऊपर पहाड़ पर एक मन्दिर बना हुआ था। नीचे सड़क से देखने पर ही लग रहा था कि मन्दिर तक पहुँचना मजेदार अनुभव रहेगा। लेकिन हमने पहले वहाँ पर बताये गये एक झरने को देखने का निश्चय किया। यहाँ पर पहली बार गाड़ी वाले तीनों प्राणी के अन्दर जीवन जैसा कुछ दिखायी देने लगा नहीं तो मैं सोच बैठे था कि यार यह तीनों जीव गाड़ी लेकर यहाँ आये ही क्यों है? हमने झरने की ओर चढ़ना शुरु किया ही किया था कि हमें वहाँ रस्सी व ड़न्ड़ों से बना हुआ एक पुल दिखायी दिया। जैसे ही हम पुल पर चढ़ने लगे तो एक बन्दा भागा-भागा आया और बोला कि इस पुल पर चढ़ने के एक बन्दे के 150 रुपये लगेंगे। हमने उसे कहा देख भाई हम 12 बन्दे है अगर हम 6-8 बन्दे भी तुम्हारे पुल पर चढ़ेंगे और 50 रुपये के हिसाब से देंगे तो भी तुम्हे 300-400 रुपये मिल जायेंगे। लेकिन वो नहीं माना। हम भी उसए हाथों लूट जाने को तैयार नहीं हुए। 
इसे पार करने का चार्ज 150 रुपये था।

जाट देवता हमेशा टॉप पर ही क्यों मिलता है?
विधान की मस्ती

वहाँ से आगे जाने पर हमें वहाँ आये लोगों की की गयी कार गुजारी देखने को मिली थी। इस शानदार स्थल को लोग दारु व शराब पीने का अड़ड़ा बना कर छोड़ दे रहे है। वहाँ हमें ऊपर जाते समय बहुत सारी बियर व शराब की बोतल पड़ी हुई दिखायी दे रही थी। हमने झरने पर पहुँचकर खूब धमाल-चौकडी की। उस समय बारिश का मौसम नहीं था जिस कारण झरने में पानी बेहद ही कम था। मुझे हमेशा से ही कुछ ऊँट-पटाँग करने की सूझती रहती है अत: यहाँ मैंने इस झरने के टॉप तक पहुँचने का मार्ग तलाश कर टॉप पर जा बैठा। मुझे देख अन्य सभी वहाँ पहुँचने लगे। विधान को फ़ोटो लेने के लिये नीचे ही रोका गया। उसके बाद वहाँ से उतरने के लिये दूसरा कठिन वाला मार्ग देख नीचे उतरने लगे। इस कठिन मार्ग को देख कई तो वापिस चले गये। दो-तीन मुश्किल में भी फ़ँस गये थे। लेकिन ऐसे मस्ती अगर यात्रा में ना हो तो यात्रा पर जाना ही बेकार है। इसलिये जिसे रोमांच पसन्द नहीं है वो अपने घर बैठे उसके लिये घर का पंलग ही बेहतरीन स्थल है। इस प्रकार के मनमौजी वाले कार्य करने के लिये ऊपर वाले ने हम जैसे घुमक्कड़ इस पृथ्वी पर अवतरित किये हुए है। झरने से वापिस आने के बाद हम वहाँ एक दुकान पर बैठ गये। जिसे जो खाना था उसने वो खाया था। दो-तीन मेरे जैसे भी थे जिन्होंने कुछ नहीं खाया था। यहाँ पर मुझे मेरी सदाबहार टोपी जैसी एक टोपी दिखायी दी थी लेकिन झरने से वापिस आते वक्त लेने की सोच मैंने जाते समय नहीं ली, वापसी में ध्यान ही नहीं रही।



यहाँ सब कुछ देखकर आगे अपनी अगली मंजिल की ओर बढ़ चले। यहाँ से दो-तीन किमी चलते ही एक जगह पीने के पानी के ठिकाने पर भी कुछ बताया गया था। हमने उसके भी फ़ोटो ले लिये थे। हमारी अगली मंजिल खजियार थी लेकिन उससे पहले आने वाला काला टोप नामक स्थल भी हमारी सूची में बहुत पहले से पक्का हो चुका था इसलिये काला टोप कैसे छूट सकता था। हम लकड़ मन्ड़ी नामक जगह पहुँच गये वहाँ से हमें मुख्य सड़क छोड़कर जंगल में बनी हुई कच्ची पगड़न्ड़ी पर आगे के तीन किमी तय करने थे। इस जगह लकड मन्ड़ी पर पहले एक बैरियर पर हमारी गाड़ी की पर्ची काटी गयी। बाइक की पर्ची भी काटी गयी थी। इसके बाद जैसे ही काला टोप जाने वाले कच्चे मार्ग पर मुड़े तो यहाँ पर भी एक बैरियर लगा हुआ था जिस पर लिखा था कि तीन किमी जाने के लिये पैदल यात्री से कोई शुल्क नहीं लिया जा रहा था। जबकि गाड़ी वालों से 200 रुपये व बाइक वालों से 50 रुपये लिये जा रहे थे। हमने तीनों वाहन के रुपये जमाकर रसीद प्राप्त कर ली, रसीद मिलते ही बैरियर ऊपर आसमान में उठ गया। हमारा काफ़िला अपनी मुख्य मार्ग की मंजिल छोड़कर तीन किमी दूरी पर स्थित सुन्दर सी मंजिल देखने के लिये प्रस्थान कर गया। (क्रमश:)


लकड़ मन्ड़ी से काला टोप मार्ग

हिमाचल की इस यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे दिये गये है।
01. मणिमहेश यात्रा की तैयारी और नैना देवी तक पहुँचने की विवरण।
02. नैना देवी मन्दिर के दर्शन और भाखड़ा नांगल डैम/बाँध के लिये प्रस्थान।
03. भाखड़ा नांगल बांध देखकर ज्वालामुखी मन्दिर पहुँचना।
04. माँ ज्वाला जी/ज्वाला मुखी के बारे में विस्तार से दर्शन व जानकारी।
05. ज्वाला जी मन्दिर कांगड़ा से ड़लहौजी तक सड़क पर बिखरे मिले पके-पके आम
06. डलहौजी के पंजपुला ने दिल खुश कर दिया। 
07. डलहौजी से आगे काला टोप एक सुन्दरतम प्राकृतिक हरियाली से भरपूर स्थल।
08. कालाटोप से वापसी में एक विशाल पेड़ पर सभी की धमाल चौकड़ी।
09. ड़लहौजी का खजियार उर्फ़ भारत का स्विटजरलैंड़ एक हरा-भरा विशाल मैदान 
10. ड़लहौजी के मैदान में आकाश मार्ग से अवतरित होना। पैराग्लाईंडिंग करना।
11. ड़लहौजी से चम्बा होते हुए भरमौर-हड़सर तक की यात्रा का विवरण।
12. हड़सर से धन्छो तक मणिमहेश की कठिन ट्रेकिंग।
13. धन्छो से भैरों घाटी तक की जानलेवा ट्रेकिंग।
14. गौरीकुन्ड़ के पवित्र कुन्ड़ के दर्शन।
15. मणिमहेश पर्वत व पवित्र झील में के दर्शन व झील के मस्त पानी में स्नान।
16. मणिमहेश से सुन्दरासी तक की वापसी यात्रा।
17. सुन्दरासी - धन्छो - हड़सर - भरमौर तक की यात्रा।
18. भरमौर की 84 मन्दिर समूह के दर्शन के साथ मणिमहेश की यात्रा का समापन।
19. चम्बा का चौगान देखने व विवाद के बाद आगे की यात्रा बस से।
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9 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
नवरात्रों की बधाई स्वीकार कीजिए।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

खजियार गये कि नहीं..

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार १६ /४/ १३ को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है ।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

पंज्पुला पहले ऐसा नहीं था। लेकिन चाय पकोड़े बड़े अच्छे थे।

चन्द्रकांत दीक्षित ने कहा…

विधान की मस्ती टाइटल वाले फोटो में झरने के दायीं तरफ एक चेहरे की आकृति नजर आ रही है क्या आपने भी गौर किया ?

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

सदा की तरह सुहाना सफ़र!

सरिता भाटिया ने कहा…

sunder jankari
yahan bhi padharen ....
गुज़ारिश : ''यादें याद आती हैं.....''

रश्मि शर्मा ने कहा…

सुहाना सफ़र....एक सलाह, अगर उचि‍त लगे तो तस्‍वीर के कि‍नारे अपना नाम दें...बीच में तस्‍वीर की खूबसूरती में रूकावट सी महसूस हुई मुझे...

Ajay Kumar ने कहा…

मै चन्द्रकांत दीक्षित जी की बात से सहमत हूँ लगता तो मुझे भी ऐसा ही है ।

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