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रविवार, 21 जनवरी 2018

Mathura-Vrindavan one day tour मथुरा-वृंदावन की एक दिवसीय यात्रा



मथुरा-वृंदावन, भरतपुर-डीग यात्रा-01            लेखक -SANDEEP PANWAR
इस यात्रा में आपको मथुरा-वृंदावन के मुख्य दर्शनीय स्थलों की यात्रा करायी जा रही है। मथुरा-वृंदावन के उपरांत आपको महाराजा सूरजमल का भरतपुर वाला अजेय लोहागढ किला व महाराजा सूरजमल का अन्य महल डीग जल महल भी घूमाया जायेगा। इस यात्रा को आरम्भ से पढने के लिये यहाँ क्लिक करना न भूले। इस लेख की यात्रा दिनांक 10-09-2016 को की गयी थी।
MATHURA-VRINDAVAN TEMPLE TOUR मथुरा-वृंदावन की सैर, मुख्य मन्दिरों के दर्शन

रविवार, 30 जुलाई 2017

Shri Shani Dev Mandir, kokilavan शनिदेव मंदिर, कोकिलावन


दोस्तों, आज के लेख में आपको कोकिलावन स्थित शनिधाम की यात्रा पर ले जा रहा हूँ। यह बहुत बड़ी यात्रा नहीं है क्योंकि यह यात्रा शनि मंदिर की रात भर में की गयी यात्रा है। इस मंदिर को हमने रात के समय देखा था। सबसे पहले आपको बताता हूँ कि हम यहाँ तक कैसे पहुँचे? यहाँ पहुँचना कोई ज्यादा मुश्किल नहीं है। मेरा यहाँ जाने का कोई इरादा भी नहीं था। हमारे पड़ौस में जगतपुर गांव में टैम्पों ट्रेवलर का मालिक रहता है। वह लगभग हर अमावस्या वाली रात को अपने टेंपो ट्रैवलर से इस शनि धाम मंदिर पर आता है। उसी ने आस पडोस के लोगों से कहा हुआ है कि यदि किसी को मथुरा वाले शनिधाम मंदिर मेरे साथ जाना हो तो उससे पड़ौसी होने के नाते सौ रुपए किराया ही लिया जाएगा। दिल्ली से मथुरा आने-जाने का किराया देखा जाये तो यह बहुत ही कम है क्योंकि दिल्ली वाले घर से शनि धाम की दूरी 127 किलोमीटर है।
शनिधाम कोकिलावन, कोसीकला, मथुरा Sri Sani Dev Temple, Kokilavan, kosi kalan

बुधवार, 23 जुलाई 2014

Orccha- Jahangir Mahal ओरछा का जहाँगीर महल

KHAJURAHO-ORCHA-JHANSI-10

इस यात्रा के सभी लेख के लिंक यहाँ है।01-दिल्ली से खजुराहो तक की यात्रा का वर्णन
02-खजुराहो के पश्चिमी समूह के विवादास्पद (sexy) मन्दिर समूह के दर्शन
03-खजुराहो के चतुर्भुज व दूल्हा देव मन्दिर की सैर।
04-खजुराहो के जैन समूह मन्दिर परिसर में पार्श्वनाथ, आदिनाथ मन्दिर के दर्शन।
05-खजुराहो के वामन व ज्वारी मन्दिर
06-खजुराहो से ओरछा तक सवारी रेलगाडी की मजेदार यात्रा।
07-ओरछा-किले में लाईट व साऊंड शो के यादगार पल 
08-ओरछा के प्राचीन दरवाजे व बेतवा का कंचना घाट 
09-ओरछा का चतुर्भुज मन्दिर व राजा राम मन्दिर
10- ओरछा का जहाँगीर महल मुगल व बुन्देल दोस्ती की निशानी
11- ओरछा राय प्रवीण महल व झांसी किले की ओर प्रस्थान
12- झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का झांसी का किला।
13- झांसी से दिल्ली आते समय प्लेटफ़ार्म पर जोरदार विवाद

आज के लेख में दिनांक 28-04-2014 को की गयी यात्रा के बारे में बताया जा रहा है। यदि आपको इस यात्रा के बारे में शुरु से पढना है तो ऊपर दिये गये लिंक पर क्लिक करे। इस यात्रा में अभी तक आपने पढा कि खजुराहो के बाद ओरछा यात्रा में ओरछा का किला देखने पहुँचा ही था कि मुकेश जी का फ़ोन आ गया। मुकेश जी अपने कहे अनुसार मात्र 5 मिनट में ही किले के प्रवेश द्वार पर पहुँच गये। मुकेश जी ने अपनी बाइक टिकट खिडकी के पास ही खडी कर दी। कल रात हम दोनों ने यही पर लाईट एन्ड साऊंड शो देखा था। जिसमें मुकेश जी के नाना जी भी साथ थे। अब दिन में नाना जी साथ नहीं आये। रात में किला देखना और अगले दिन उसे दिन के उजाले में देखना एक अलग ही अनुभव रहा। मुकेश जी बोले चलो संदीप जी पहले जहाँगीर महल देखने चलते है। किले के अन्दर जाने वाले दरवाजे अभी बन्द थे।
जहाँ मुकेश जी ने अपनी बाइक खडी की है उसके ठीक बराबर में एक विशाल दरवाजा है। इस दरवाजे के ठीक पार एक बोर्ड लगा हुआ है उस बोर्ड पर लिखा है कि राजा महल, जहाँगीर महल व शीश महल सीधे हाथ वाली दिशा में है जबकि नाक की सीध में जाने पर राय प्रवीण महल व हमाम खाना आदि के लिये जाया जा सकता है। वैसे भी जहाँगीर महल जाने का मुख्य मार्ग भी राय प्रवीण महल के सामने से होकर जाता है। हम वापसी में इसी मार्ग से आये थे। रात वाली सीढियों से चढते हुए जहाँगीर महल के सामने बने शीश महल पहुँच गये। रात को भोजन यही किया गया था। यहाँ के कर्मचारी व अधिकारी मुकेश जी को अच्छी तरह जानते है। आखिर आबकारी विभाग के अफ़सर जो ठहरे। आबकारी विभाग के अधिकारी को होटल वाले ना पहचाने ऐसा कैसा हो सकता है?
रात में जिन सीढियों पर टार्च की जरुरत आन पडी थी दिन में उन सीढियों की हालत देखी। अंधेरे में इन सीढियों पर आवागमन खतरे से खाली नहीं है। शीश महल राजाओं के समय में मेहमान खाना हुआ करता था। आजकल यह सरकारी होटल में बदल दिया है। सरकार ने यह बहुत ही अच्छा किया कि मेहमान खाने में आज भी मेहमान को ठहराने का प्रबन्ध किया जाता है। उस समय राजाओं के मेहमान मुफ़्त में यहाँ ठहरा करते होंगे जबकि आज यहाँ ठहरने के दाम चुकाने पडते है। सुख सुविधा में आज भी वैसा ही ठाट-बाट देखने को मिलता है जैसा राजाओं के काल में होता होगा। मुकेश जी ने शीश महल के एक कर्मचारी से कहा कि जहाँगीर महल देखना है इसका दरवाजा कौन खोलेगा? वैसे जहाँगीर महल खुलने में कुछ मिनट बाकी थे। शीश महल के कर्मचारी ने जहाँगीर महल खोलने वाले कर्मचारी से पूछा कि क्या दरवाजा खोल दिया गया है उसने कहा, हाँ दरवाजा खुला है आप लोग अन्दर जा सकते है।
ओरछा में कई महल है जिनमें राजनिवास, जहाँगीर महल, राजमहल, शीश महल प्रमुख है। आजकल इन सब में जहाँगीर महल को लोग सबसे ज्यादा देखने आते है। इस महल के बनने के पीछे बुन्देल राजा व मुगल बादशाह जहाँगीर की दोस्ती होना मुख्य वजह रहा है। इतिहास अनुसार निर्दयी क्रूर मुगल बादशाह अकबर (कुछ इतिहासकार जिन्होंने अकबर के पैसे खाये होंगे उन्होंने अकबर को तथाकथित रुप से महान बताने का षडयंत्र चलाया) ने अपने खास सेनानायक अबुल फ़जल को इकलौते शहजादे बागी सलीम उर्फ़ जहाँगीर को काबू में करने के लिये भेजा था। अबुल फ़जल सलीम को काबू कर पाता? उससे पहले सलीम की बुन्देल राजा वीरसिंह देव के साथ दोस्ती हो गयी। राजा वीरसिंह देव ने अबुल फ़जल का कत्ल करवा दिया। सलीम ने मुगल बादशाह बनने के बाद वीरसिंग देव को ओरछा जागीर की पूरी जिम्मेदारी दे दी थी। राजाओं महाराजाओ के समय दोस्ती दुश्मनी की कहानी बहुत देखने सुनने को मिलती है। जिसमें कई बार विश्वास करना भी मुश्किल हो जाता है यह हकीकत में हुआ भी होगा कि नहीं?
यहाँ आने से पहले इस महल की वास्तुकला के बारे में बहुत सुना था आज पहली बार इस महल को जानने परखने का मौका मिल रहा है। जहाँगीर महल में घुसते ही जो नजारा आँखों के सामने आया उसे देख आँखे खुली रह गयी। यहाँ पर सबसे ज्यादा काम पत्थरों पर किया गया है। इस महल को हवा महल भी कह दे तो ज्यादा गलत नहीं होगा। इस महल की चारों दीवारों में पत्थर की सैंकडों जालियाँ वाली खिडकी है। सबसे बडा कमाल तो यह है कि हर जाली एक दूसरे से अलग बनी हुई है। कोई भी दो जाली एक जैसी नहीं है। मैंने शुरु में सभी जालियों के अलग होने वाली बात पर ध्यान नहीं दिया था।
जब मुकेश ने मुझसे पूछा कि इन जालियों में क्या कुछ विशेष दिखता है? तब मैंने इन्हे छूकर देखा। इससे पहले मैं सोच रहा था कि यह लकडी की बनी जालियां होंगी। लेकिन हाथ लगाकर पता लगा कि यह पत्थर की बनी जालियाँ है। मुकेश जी ने यह कहकर मुझे आश्चर्यचकित कर दिया कि यहाँ की सभी जालियाँ डिजाइन में एक दूसरे से अलग है। मैंने अब तक लिये गये फ़ोटो देखे तो मुकेश जी बात सही निकली। अब मैंने आगे आने वाली  सभी जालियों को बारीकी से देखना आरम्भ कर दिया।
यह महल तीन मंजिल का बना है। जिसमें प्रत्येक मंजिल की वास्तुकला कमाल की है। यहाँ का खुला गलियारा देखने लायक है। यहाँ के वास्तुशिल्प की एक खास बात मुकेश जी ने बतायी कि यहाँ की वास्तुशिल्प हिन्दू व मुस्लिम वास्तुकला का मिलाजुला संगम है। मुकेश जी ने इनका अन्तर भी दिखाया कि वो देखो एक किनारा हिन्दू शिल्प से बना है तो दूसरा किनारा मुस्लिम वास्तुकला को समेटे हुए है। जानवरों की मूर्तियाँ से लेकर पत्तों व फ़ूलों आदि के डिजाइन यहाँ देखे जा सकते है। इस महल के बीचो-बीच एक जगह ऐसी है जहाँ पर पत्थर की शिला पर बैठने का स्थान बनाया गया है। यहाँ बैठकर फ़ोटो लेते समय आगरे के तेजो महालय (ताज महल का असली नाम) की याद हो आयी। हमने इस शिला पर बैठकर फ़ोटो लिया और अपने आगे के कार्य में लगे गये।
इस महल में घूमते समय मुकेश जी ने अपना फ़र्ज जमकर निभाया। यहाँ पहली बार मुझे लगा कि मुकेश जी अपनी जैसे खोपडी वाले इन्सान है। जब एक जैसे आचार-विचार के दो मानव एक साथ किसी कार्य में लगे हो तो उस कार्य को करने में अलग सुकून मिलता है। यही सुकून हम दोनों को महसूस हो रहा था। मुकेश जी इस महल में कई बार आ चुके है। मैंने कहा, कई बार क्यों? वीआईपी लोगों के साथ अक्सर यहाँ आना पडता है उनके साथ गाइड भी होता है। गाइड जो बाते उन्हे बताता है वे बाते मुझे किसी फ़िल्म की तरह याद हो गयी है इसलिये इस महल में घुसते ही गाइड वाली फ़िल्म मेरे दिमाग में चालू हो जाती है। मुकेश की याददास्त कमाल की है। वैसे भी मुकेश भाई अपनी तरह इतिहास विषय के प्रेमी है। इतिहास विषय भी बडा कमाल का है इसमें जितना घुसो इसमें उतना रोमांच बढता जाता है।
बीते लेख में मैंने आपको यहाँ के इतिहास की कुछ खास बाते बतायी थी आज उसकी दूसरी किस्त में कुछ अन्य बाते बताता हूँ। बुन्देल के वीर हरदौल के बारे में मैंने बीते लेख में जिक्र किया था। ओरछा के लोक गीत संगीत में हरदौल का अहम स्थान है। एक समय ऐसा आया था जिसमें ओरछा राज्य में मुगल जासूसों का काफ़ी प्रभाव हो गया था। यह समय 1625-30 के आसपास का रहा होगा। मुगल जासूसों की साजिशों के कारण यहाँ के राजा को यकीन दिया दिया गया कि उसके भाई हरदौल के उसकी रानी के साथ अवैध सम्बन्ध है। हरदौल अपने बडे भाई का आज्ञाकारी था। राजा ने अपनी रानी को परखने के लिये कहा कि यह लो जहर। इसे ले जाकर हरदौल को पिला दो।
रानी जहर लेकर हरदौल के पास गयी तो सही, लेकिन उसे जहर नहीं पिला सकी। रानी ने हरदौल को सारी बात बता दी। हरदौल ने खुद को व रानी को निर्दोष साबित करने के लिये वह जहर खुद ही पी लिया। मुगल बादशाहों की राह में हरदौल एक बहुत बडे कांटे की तरह था। जिसे वे किसी भी कीमत पर हटाना चाहते थे। हरदौल के बारे में कहा जाता है कि वह बहुत बलशाली थी। जिसके आगे मुगलों की एक ना चलती थी। ताकत के बल पर उसको जीतना मुमकिन नहीं था। इसलिये मुगलों ने ऐसी कुटिल चाल चली थी। हरदौल जहर पीने के बाद चल बसा। राजा को अपनी गलती पर बडा पश्चाताप हुआ। यही से ओरछा के बुन्देल राज्य का पतन आरम्भ होना शुरु हो गया था। ओरछा का बुन्देल शासन सन 1783 में समाप्त हो गया।
जहाँगीर महल में कुल 136 कमरे बताये जाते है। इन सभी कमरों में शानदार चित्रकारी भी की गयी थी। आज चित्रकारी मुश्किल से ही देखने को मिलती है। समय बीतने के साथ चित्रकारी के रंग गायब होते जा रहे है। महल की सभी चौखट पत्थर की बनी हुई है। दरवाजे लकडी के है। मैं सोच रहा था कि चौखट भी लकडी की ही होंगी लेकिन मुकेश जी ने बताया तो मैंने उनकी जाँच की थी। सहसा मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई पत्थर में भी इतनी नक्काशी कर सकता है? यहाँ की हर चीज में हिन्दू मुस्लिम शैली का संगम है जो पत्थर की चौखट में भी देखने को मिलता है। चौखट के बाद ऊपर की मंजिल की चलते है।
सीढियों से ऊपर चलते समय मुकेश जी बोले। संदीप जी रुको। मैंने समझा, आगे कुछ गडबड है जिस कारण मुझे रुकने को कह रहे है। दीवार पर चारों एक छज्जा बनाया गया है इस छज्जे में हाथियों की मूर्तियाँ वाले स्तम्भ बनाये है। एक लाईन हाथियों की है जो अपनी सून्ड में कमल का फ़ूल लटकाये हुए किसी का स्वागत करते हुए दिख रहे है तो दूसरी लाईन में मुस्लिम शैली के साधारण स्तम्भ दिखायी देते है। मुस्लिम शैली तो बेजान दिखती है। जिसमें जीवन जैसे क्रिया वाले शिल्प नदारद रहते है।
जहाँगीर महल की छत से राज महल, चतुर्भुज मन्दिर, शीश महल के अतिरिक्त ओरछा की झलक भी दिखायी देती है। जहाँगीर महल की बेतवा किनारे वाली जालियों से बेतवा नदी भी  दिखायी देती है। जहाँगीर महल के आसपास बहुत जगह खाली दिखायी देती है। राजाओं के काल में इस खाली पडी भूमि में सेना आदि के रहने का प्रबन्ध किया जाता होगा। ओरछा पथरीली भूमि वाला इलाका है। यहाँ से जिधर नजर जाती है हरियाली युक्त पथरीली भूमि दिखायी देती है।
महल की छत पर भ्रमण करने के दौरान महल के सबसे ऊपर वाले गुम्बद पर एक चील/गिद्द बैठा दिखायी दिया। गिद्द की नजर हमारी ओर नहीं थी। मुकेश जी बोले संदीप जी उसका एक फ़ोटो लीजिए ना। गिद्द आसानी से कैमरे की पकड में नहीं आ रहा था। हमने कुछ देर तक उसके दाये-बाये होने की प्रतीक्षा की, लेकिन वह अपनी जगह से टस से मस ना हुआ तो हमें अंदेशा हुआ कि कही यह गिद्द नकली तो नहीं है। शुक्र रहा कि थोडी देर बाद गिद्द ने अपनी मुन्डी थोडी सी हिलायी तो पक्का हो गया कि गिद्द पत्थर का नहीं है। हम इसी आशा से आगे बढे कि हो सकता है कि आगे किसी अन्य किनारे से गिद्द कोई अच्छा पोज दे ही दे।
जहाँगीर महल की पत्थर से बनी जालीदार खिडकियाँ और इनमें बने मोर आदि के चित्र एकदम जीवंत दिखायी देते है। यहाँ बनी सभी जालीदार खिडकियाँ एक दूसरे से अलग है मुझे इस बात पर बडा ताज्जुब हुआ कि कारीगरों ने कितनी सावधानी व मेहनत से इन जालियों को बनाया होगा। यहाँ सैकडों जालियाँ है जो सभी पत्थर की बनी हुई है। इन सभी को बनाने के लिये पत्थर पर छैनी-हथौडे का प्रयोग किया गया है। पत्थर की इन जालियों में छैनियों के निशान आज भी ऐसे दिखायी देते है जैसे इन्हे कुछ दिन पहले बनाकर यहाँ स्थापित किया गया हो।  
हमारी दोस्ती ने जहाँगीर महल की घुमक्कडी का जमकर लुत्फ़ उठाया। झरोखों में खूब फ़ोटो लिये। जब दोनों मनमौजी एक जैसे विचार वाले हो तो फ़िर मस्ती करने से कौन रोक सकता है? मैं सोच रहा था कि मुकेश जी शर्मीले स्वभाव के होंगे लेकिन यहाँ उनके साथ घूमते हुए दिल खुश हो गया। फ़ोटोग्राफ़ी के मामले में मुकेश जी कम नहीं थे। हम दोनों फ़ोटो लेने लायक लोकेशन तलाश लेते थे। जिसको अच्छी लोकेशन मिलती थी कैमरा उसके हाथ में पहुँच जाता था। यहाँ किसने ज्यादा फ़ोटो लिये कहना मुश्किल है।
यहाँ के बारे में मेरे वर्दीधारी दोस्त मुकेश चन्दन पाण्डेय जी ने घुमक्कडी करते समय गाइड का रोल भी बखूबी निभाया। यहाँ के हर कोने में हिन्दू व मुस्लिम शैली के वास्तुशिल्प का उदाहरण सामने मिलता था। एक दीवार पर हिन्दू शैली मिलती थी तो उसके ठीक सामने वाली दीवार मुस्लिम वास्तुशिल्प का लबादा ओढे मिलती थी। मैं भारत के सैंकडो स्थलों की यात्रा की है। इस प्रकार की मिली जुली संस्कृति मुझे अन्य किसी स्थल पर देखने को नहीं मिली।
जहाँगीर महल में बहुत सारी बाते ऐसी थी जिनमें कुछ ना कुछ खास था लेकिन मुझे यहाँ की सबसे महत्वपूर्ण वास्तु शिल्प पत्थर वाली जाली में बनाया गया सुराख ने मुझे खासा प्रभावित किया था। पत्थर वाली जाली में एक सुराख देखा। यहाँ के पत्थरीले जालीदार झरोखों की जालियों में छोटे-छोटे सुराख देखकर मैं दंग रह गया। जाली बनाने तक तो बात फ़िर भी ठीक थी। इन जालियों में सुराख बनाने वाली कारीगरों की वास्तुकला को मेरा सलाम। इन सुराखों को बनाने के क्रम में ना जाने कितनी जाली जालियाँ पूरी होने से पहले टूट गयी होंगी? फ़िर भी कारीगरों की मेहनत काबिल तारीफ़ है।
यहाँ जहाँगीर महल के बीचों बीच एक फ़ुव्वारा लगाने वाला स्थल भी है। महल के प्रांगण में अष्टकोणीय कुन्ड बने हुए है। इन कुन्डों में भी दोनों शैली (हिन्दू-मुस्लिम) का मिला जुला रुप है। महल के प्रांगण में आकर एहसास होता है कि हम किसी विशाल हवेली के अन्दर खडे है। इस जगह का नाम महल अवश्य है लेकिन इसका क्षेत्रफ़ल राजस्थान की बडी हवेलियों जैसा है। राजस्थान की कई हवेलियाँ इससे बडी भी हो सकती है। इस महल के भीतर का देखने लायक सब कुछ देख लिया तो बाहर आने की बारी थी। महल से बाहर आते समय मुकेश जी ने मुझे मुख्य दरवाजे के ठीक ऊपर वाली छत पर देखने को कहा। मैंने ऊपर देखा तो ऐसा लगा जैसे नीच का ऊपर फ़र्श से जाकर छत से चिपक गया हो। छत पर फ़र्श जैसा मारबल कैसे बनाया गया होगा?
मुख्य दरवाजे की छत ने मुझे अचम्भित कर दिया। उस उलझन से बाहर निकल कर दरवाजे पर पहुँचा तो मुकेश जी बोले संदीप जी यहाँ मुख्य दरवाजे के पत्थर में की गयी शानदार नक्काशी देखिये। यहाँ भी दोनों शलियाँ दिखायी दी। दरवाजे की चौखट में दो विभिन्न प्रकार के रंग देखने को मिले। मुझे लगा कि यहाँ तो लकडी का उपयोग हुआ होगा। लेकिन मेरा भ्रम यहाँ भी टूट गया। इस दरवाजे की चौखट भी पत्थर की ही निकली।
आखिरकार जहाँगीर महल से बाहर निकल ही आये। इसके मुख्य प्रवेश दरवाजा की ऊँचाई भूमि तल से एक मंजिल की ऊपर है। दरवाजे के दोनों किनारों पर पत्थर के हाथी बनाये गये है इन हाथियों को बनाने के पीछे भी संदेश छिपा है। इनमें से एक हाथी की सून्ड में जंजीर बनी है तो दूसरे हाथी की सून्ड में फ़ूलों का हार दिखायी देता है। जंजीर वाले हाथी का साफ़ संदेश है दोस्ती नहीं निभायी तो दुश्मनी झेलने को तैयार हो जाओ। फ़ूल वाले हाथी का साफ़ इशारा है कि हम आपका स्वागत फ़ूलों से करते है यदि आपको फ़ूलों से स्वागत पसन्द नहीं आया हो तो दूसरे हाथी की बात पर अमल करना हम जानते है।
जहाँगीर महल भले ही समाप्त हो गया हो लेकिन जहाँगीर महल के आश्चर्यचकित करने वाले पल अभी जारी थे। जैसा मैंने पहले कहा कि महल समतल भूमि से एक मंजिल ऊँचाई पर है। महल के दरवाजे तक पहुँचने के लिये कुछ सीढियों उतरनी पडी। इन सीढियों पर राजा के उपयोग में आने वाले घोडे, ऊँट व हाथी जैसे भिन्न-भिन्न ऊँचाई वाले जानवरों की सवारी करने के लिये अलग-अलग ठिकाने (प्लेटफ़ार्म) बनाये गये है। इनसे हाथी, घोडे या ऊँट पर सवार होने में आसानी होती थी।
जहाँगीर महल से नीचे आते ही वह अमेरिकी पुन: मिल गया जो खजुराहो से साथ आया था। वही जो होटल में साथ ठहरा था। अमेरिकी जिसका नाम पेट्रिक है सही मौके पर मिला। हमे उस समय कोई ऐसा बन्दा चाहिए था जो हम दोनों मनमौजियों का एक फ़ोटो ले सके। पेट्रिक भारत के नार्थ इस्ट की रहने वाली किसी भारतीय लडकी से शादी करने वाला है जिसने इसे हिन्दी के कुछ शब्द सिखा दिये है। अगर पेट्रिक ने पहले बता दिया होता तो वह हिन्दी के कुछ शब्द जानता है तो मुझे बेवजह अंग्रेजी की ऐसी तैसी ना करनी पडती। हमारा फ़ोटो लेने के बाद उसका भी एक फ़ोटो लिया गया। पेट्रिक का फ़ोटो सबसे आखिर में है जबकि पेट्रिक का लिया गया फ़ोटो सबसे ऊपर है। इसके बाद पेट्रिक अन्दर चला गया। जबकि हम यहाँ बचे अन्य स्थल देखने चले गये। (यात्रा जारी है।)













































गुरुवार, 19 जून 2014

Khajuraho- Vaman & Jwari temple वामन व ज्वारी मन्दिर

KHAJURAHO-ORCHA-JHANSI-05

आज के लेख में दिनांक 27-04-2014 की यात्रा के बारे में बताया जा रहा है। खजुराहो की यात्रा के अन्तिम पडाव में बचे दो मन्दिर देखने जा रहा हूँ। इन्हे देखने के लिये जैन मन्दिर देखकर वापसी में गाँधी चौक पर आना पडता है। यहाँ से वामन व ज्वारी मन्दिर के लिये जाना पडता है। इन दोनों मन्दिरों तक पहुँचने के लिये खजुराहो के एक अति पिछडे आवासीय इलाके के मध्य से होकर जाना पडा। जब आटो वाला इस इलाके से निकल रहा था तो मैंने सोचा था कि हो सकता है ऑटो वाले का घर यहाँ हो, या किसी काम से यहाँ होकर निकल रहा हो लेकिन जब वह उस बस्ती से आगे निकल गया तो माजरा समझ आ गया। बस्ती समाप्त होते ही सीधे हाथ एक तालाब दिखायी देने लगा। मार्ग की हालत एकदम गयी गुजरी थी। पक्की सडक की बात ही तो छोडो उसे तो कच्ची सडक भी कहना सही नहीं होगा।
इस यात्रा के सभी लेख के लिंक यहाँ है।01-दिल्ली से खजुराहो तक की यात्रा का वर्णन
02-खजुराहो के पश्चिमी समूह के विवादास्पद (sexy) मन्दिर समूह के दर्शन
03-खजुराहो के चतुर्भुज व दूल्हा देव मन्दिर की सैर।
04-खजुराहो के जैन समूह मन्दिर परिसर में पार्श्वनाथ, आदिनाथ मन्दिर के दर्शन।
05-खजुराहो के वामन व ज्वारी मन्दिर
06-खजुराहो से ओरछा तक सवारी रेलगाडी की मजेदार यात्रा।
07-ओरछा-किले में लाईट व साऊंड शो के यादगार पल 
08-ओरछा के प्राचीन दरवाजे व बेतवा का कंचना घाट 
09-ओरछा का चतुर्भुज मन्दिर व राजा राम मन्दिर
10- ओरछा का जहाँगीर महल मुगल व बुन्देल दोस्ती की निशानी
11- ओरछा राय प्रवीण महल व झांसी किले की ओर प्रस्थान
12- झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का झांसी का किला।
13- झांसी से दिल्ली आते समय प्लेटफ़ार्म पर जोरदार विवाद
 


सडक किनारे नीम का एक पेड टूटा हुआ पडा था। यह पेड जरुर आँधी में ही टूटा होगा। पेड काफ़ी बडा था। तना खोखला होने के कारण यह कमजोर हो गया था। पेड की वे टहनियाँ काटी जा चुकी थी जिससे मार्ग अवरुध होने की गुंजाइ थी। ऑटो के सामने कुछ बकरियाँ आ गयी जिससे ऑटो को कुछ देर रुकना पडा। जैसे ही बकरियाँ हटी तो ऑटो आगे बढा। यहाँ सीधे हाथ मैदान के आखिरी छोर पर एक मन्दिर दिखायी दे रहा है। ऑटो वाला उस मन्दिर की ओर ना मुडकर सीधा चला जा रहा था तो मैंने सोचा कि यह कोई आलतू फ़ालतू मन्दिर होगा तभी तो ऑटो वाला मुझे वहाँ लेकर नहीं जा रहा है।
सडक पर थोडा आगे जाते ही उल्टे हाथ तालाब की ओर एक अन्य मन्दिर था जो देखने में ज्यादा पुराना नहीं लग रहा था। यह मन्दिर सफ़ेद रंग का था इसके प्रांगण में हनुमान जी की मूर्ती थी। जिससे देखकर आसानी से अनुमान लगा लिया कि यह हनुमान मन्दिर ही होगा। जब उस मन्दिर के सामने पहुँचे तो अपना अंदाजा सही निकला। इस मन्दिर में लाउडस्पीकर पर पूजा-पाठ/प्रवचन आदि की ध्वनि साफ़ सुनायी दे रही थी। मन्दिर के प्रांगण में कुछ भक्त जन भी विराजमान थे। उनसे अपना कोई लेना देना नहीं था अत: अपुन वहाँ नहीं रुके।
यहाँ से करीब 400 सौ मीटर आगे जाते ही खजुराहो की पहचान बन चुके मन्दिरों जैसा ही एक मन्दिर दिखायी दिया। एक ऑटो हमारे से थोडा सा आगे था जब वह ऑटो उस मन्दिर के सामने जाकर रुक गया तो तय हो गया कि अब अन्तिम बचे दो मन्दिरों में यह भी शामिल है। ऑटो वाले ने एक पेड की छांव में ऑटो खडा कर दिया। मैंने अपाना बैग वही छोड कैमरा सम्भाला और इस मन्दिरों को देखने चल दिया।
सबसे पहला फ़ोटो मन्दिर की चारदीवारी में लगे लोहे के ग्रिल वाले गेट से लिया गया। उसके बाद मन्दिर परिसर में दाखिल हुआ तो सम्पूर्ण मन्दिर देख लिया। इस मन्दिर का मुख्य दवार भी पूर्व की ओर ही बना हुआ है। यहाँ भी एक विशाल चबूतरे पर इस मन्दिर का निर्माण किया गया है। चबूतरे की ऊँचाई लगभग दस फ़ुट ऊँची तो रही होगी। इस मन्दिर का नाम वामन मन्दिर है जो वहाँ लगे एक बोर्ड से पता लगा। मन्दिर देखकर नीचे उतरा तो एक फ़ोटो ग्राफ़र पीछे पड गया कि फ़ोटो खिचवा लो। ना भाई, मुझे अपने फ़ोटो खिचवाने का ज्यादा शौंक नहीं है। उसने कुछ चित्र वाली पुस्तिका भी दिखायी लेकिन उसका मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पडा। मेरा कैमरा पीठ पीछे था जब मैंने अपना कैमरा आगे की ओर किया तो वह चुपचाप खडा हो गया।
मन्दिर से बाहर आते ही ऑटो वाले से कहा, अब आखिरी मन्दिर कहाँ है? उसने कहा वो देखो सामने 300-400 मी के फ़ासले पर मैदान के उस किनारे पेडों के बीच जो मन्दिर दिख रहा है बस वही देखना बाकि रह गया है। ठीक है तुम ऑटो को थोडी देर में लेकर आना तब तक मैं पैदल देख आता हूँ। पेडों के बीच से होते हुए आगे बढने लगा तो गर्मी से बचने के लिये पेड की छांव में आराम करता एक खच्चर बैठा दिखायी दिया। मुझे नजदीक आते देख वह उठ खडा हुआ। मेरी इरादा उसे तंग करने का नहीं था। लेकिन जब वो खडा होकर मुझे घूरने लगा तो मैंने उसका फ़ोटो ले लिया। फ़ोटो लेने के बाद भी उसने घूरना नहीं छोडा तो मैं उससे बचता हुआ आगे बढने लगा। आगे निकलकर देखा कि वह गर्दन मोडकर भी घूर रहा है। कैमरे का जूम प्रयोग कर एक फ़ोटो और ले लिया।
आगे चलकर तालाब से निकली पानी की धार को पार करना था लेकिन उसके ठीक पहले आम का एक पेड था जिस पर छोटे-छोटे व कच्चे आम लगे हुए थे। कुछ आम स्वयं टूट कर नीचे गिरे पडे थे। जो सूख कर खराब हो गये थे। अगर आम अच्छी हालत में होते तो खाने पर विचार किया जा सकता था। चलो पानी की धार पार कर आगे चलते है। पानी की धार सम्भल कर पार की उसके बाद ज्वारी मन्दिर ज्यादा दूर नहीं बचा था। मन्दिर परिसर में दाखिल होने के बाद चबूतरे पर चढने का मार्ग तलाशते हुए पूर्वी छोर पर जाना पडा। यह मन्दिर भी पूर्वी दिशा की ओर बना हुआ है। चबूतरे पर चढकर मन्दिर देखा गया। इसका चबूतरा भी काफ़ी ऊँचाई पर जिससे आसपास का इलाका दूर तक दिखायी दे रहा था।
इन दोनों मन्दिरों में मध्य प्रदेश सरकार की ओर से कर्मचारी देखभाल के लिये तैनात मिले। जो इसकी साफ़-सफ़ाई के साथ रखवाली भी करते होंगे। मन्दिरों को देखने का क्रम पूरा हो चुका है। अब खजुराहो छोडने का समय आ गया है। ऑटो वाला अभी वही खडा है उसे मोबाइल पर कॉल कर बुलाया। जब तक ऑटो वाला घूम कर मेरे पास आता तब तक मैं उसकी ओर चल दिया था। ऑटो वाला उसी सफ़ेद मन्दिर के सामने मिला जहाँ लाउड स्पीकर पर प्रवचन चल रहे थे। यहाँ एक कुएँ पर दो महिलाएँ कपडे धोने में व्यस्त थी। आज भी कुएँ के पानी के भरोसे जीवन क्रिया चलते देख आश्चर्य होता है। ऑटो में बैठने से पहले तालाब के फ़ोटो लिये गये। आखिर में कुएँ पर कपडे धोने में लगी महिलाओं के फ़ोटो लेकर बस अडडे की ओर बढ चले।
थोडी देर में बस अडडे पहुँच गये। ऑटो वाले को 300 सौ रुपये देने थे लेकिन मेरे पास खुले नहीं थे। उसके पास 200 सौ खुले नहीं थे। 500 सौ खुले कराने के लिये एक कोल्ड ड्रिंक ली गयी। हम दोनों ने आधी-आधी कोल्ड ड्रिंक पी। खुले रुपये मिलने के बाद उसका हिसाब चुकता कर दिया। बस अडडे पर खजुराहो रेलवे स्टेशन जाने के लिये बस तैयार खडी थी। लेकिन मुझे ऑटो में बैठकर जाना था। इसलिये वहाँ खडे ऑटो वाले से बात की तो उसने कहा कि वह चाय पीने के बाद जायेगा। जब तक उसने चाय पी तब तक उसका ऑटो सवारियों से भर गया।
ऑटो में दो महिलाओं के साथ उनके दो बच्चे भी सवार थे। मेरे गले में कैमरा लटका देख उनका चेहरा कोतुहल से भर गया था। उनमें से एक अपनी माँ को इशारा कर कैमरे के बारे में कुछ कहना चाह रहा था। मैने उस गरीब की भावनाओं का सम्मान करते हुए उसके गले में कैमरा लटका कर कहा। लो फ़ोटो खीच कर देखो। पहले तो वह सकपका गया लेकिन उसके बाद उसने कई फ़ोटो खींचे तो उसका चेहरे की खुशी देखने लायक थी। उस गरीब बच्चे की कमीज में बटन भी नहीं थे। बाद में मैने उस बच्चे का एक फ़ोटो भी लिया। अपना फ़ोटो देखकर वह बहुत खुश हुआ। उस गरीब को इतने में ही बहुत सारी खुशी मिल गयी इसमें मेरा क्या घिस गया?
चाय पीते ही ऑटो वाला हमें लेकर खजुराहो की दिशा में चल दिया। खजुराहो रेलवे स्टेशन की केवल तीन सवारियाँ ही थी। बाकि अन्य सवारियाँ ग्वालियर व भोपाल की दिशा में किसी अन्य स्थल की रही होंगी। जब खजुराहो रेलवे स्टेशन वाला फ़ाटक आया तो खजुराहो की दो सवारियाँ वहीं उतर गयी। उनके साथ मैं भी फ़ाटक पर ही उतर गया। ऑटो वाले को सीधे चले जाना था यानि रेलवे स्टेशन पर जाना नहीं था इसलिये फ़ाटक पर उतरना सही फ़ैसला रहा। मेरे साथ उतरे दो बन्दे फ़ाटक पर बने रेलवे आवास में चले गये। मैंने रेलवे लाइन के साथ-साथ स्टॆशन की ओर बढना आरम्भ किया। (यात्रा जारी है।)





























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