गोवा यात्रा-5
रात का खाना खाने के उपरांत, वहाँ पर कैम्प फ़ायर करने की प्रथा बनायी हुई थी। वहाँ एक बात बहुत अच्छी लगी कि कैम्प फ़ायर के नाम पर लकड़ियाँ जलाने की बरबादी करने की सख्त मनाही थी, इसका तोड़ उन्होंने कैम्प फ़ायर स्थल पर चारों और बिजली से जलने वाले नाईट बल्बों (इन्हें कुछ समझदार जीरो वाट का बल्ब भी कहते है, जबकि इनका वाट लगभग दस तो होता ही है।) का एक घेरा बनाया हुआ था। जब कैम्प फ़ायर करने का समय होता था तब एक स्विच से इन्हें जलाकर फ़ायर-फ़ायर कैम्प फ़ायर बोलकर यह रस्म निभायी जाती थी। यह रस्म प्रतिदिन दोहरायी जाती थी। अगली सुबह हमारा शारीरिक दमखम अभ्यास वाला कार्यक्रम शुरु होना था, लेकिन रात को अंग्रेजी नव वर्ष का स्वागत करने के लिये काफ़ी तैयारी की गयी थी। रात के बारह बजने तक वहाँ गीत-कविता-चुटकले आदि से कई लोगों ने अपनी छिपी हुई प्रतिभा का परिचय दिया था। जब बारह बजने वाले थे, तभी यकायक सभी उठ खड़े हुए।
इस यात्रा का पहला लेख यहाँ से देख सकते है।
![]() |
| क्मल ऊपर पहुँचते हुए |
