रविवार, 20 जनवरी 2013

गोवा के यूथ हॉस्टल कैम्प में रॉक/चट्टान आरोहण Rock climbing in Goa at YHAI Camp

गोवा यात्रा-5
रात का खाना खाने के उपरांत, वहाँ पर कैम्प फ़ायर करने की प्रथा बनायी हुई थी। वहाँ एक बात बहुत अच्छी लगी कि कैम्प फ़ायर के नाम पर लकड़ियाँ जलाने की बरबादी करने की सख्त मनाही थी, इसका तोड़ उन्होंने कैम्प फ़ायर स्थल पर चारों और बिजली से जलने वाले नाईट बल्बों (इन्हें कुछ समझदार जीरो वाट का बल्ब भी कहते है, जबकि इनका वाट लगभग दस तो होता ही है।) का एक घेरा बनाया हुआ था। जब कैम्प फ़ायर करने का समय होता था तब एक स्विच से इन्हें जलाकर फ़ायर-फ़ायर कैम्प फ़ायर बोलकर यह रस्म निभायी जाती थी। यह रस्म प्रतिदिन दोहरायी जाती थी। अगली सुबह हमारा शारीरिक दमखम अभ्यास वाला कार्यक्रम शुरु होना था, लेकिन रात को अंग्रेजी नव वर्ष का स्वागत करने के लिये काफ़ी तैयारी की गयी थी। रात के बारह बजने तक वहाँ गीत-कविता-चुटकले आदि से कई लोगों ने अपनी छिपी हुई प्रतिभा का परिचय दिया था। जब बारह बजने वाले थे, तभी यकायक सभी उठ खड़े हुए। 
                                            इस यात्रा का पहला लेख यहाँ से देख सकते है।
क्मल ऊपर पहुँचते हुए


Jatdevta on the top
Anil मंजिल के नजदीक

वहाँ जैसे ही बारह बजने की घोषणा की गयी तो सबने एक दूसरे को नये साल की बधाईयाँ व शुभकामनाएँ देनी शुरु की। इसके साथ ही वहाँ पर शादी ब्याह की तरह शानदार आतिशबाजी का प्रबन्ध भी किया गया था। यहाँ की गयी आतिशबाजी ने दिल खुश कर दिया था। मेरे साथ पहली बार गया अनिल यह सब रौनक देखकर आश्चर्यचकित हो उठा था। यह सारा रंगारग कार्यक्रम देखकर हम अपने टैन्ट की और बढ़ चले। रात को सोने की तैयारी में ही साढ़े बारह बजने जा रहे थे। सुबह जल्दी उठना भी था, यहाँ का मौसम और दिल्ली का मौसम लगता था जैसे एक दूसरे की सौतन हो। अपने-अपने टैन्ट में लेटे-लेटे कब नींद आयी, मुझे पता ही लग पाया, वैसे किसी को नींद आने का पता लग जाता हो तो मुझे जरुर बताना। 

अनिल  सफ़ल वापसी करते हुए\

दिल थाम कर साथी गण देखते हुए।

सुबह उठते ही सबसे पहली प्राथमिकता अपनी दैनिक क्रिया से निवृत होना रहता था। उसके बाद आज सुबह हमारी शारीरिक श्रम-शक्ति का दम-खम पता लगाने का अवसर आने वाला था। वैसे मैं लगभग 20,000 फ़ुट तक ऊँचाई तक की ट्रेकिंग कर चुका हूँ मुझे वहाँ कभी कोई खास परेशानी नहीं आयी थी। आज हमारे सामने पहली चुनौती एक कृत्रिम दीवार पर चढ़कर, उसके दूसरी और सफ़लता से उतरने की थी। पहले सब लोगों को एक साथ बैठाकर पहले फ़ोटो से लेकर सातवे फ़ोटो तक में दिखायी गयी लोहे की दीवार पर चढ़ने व उससे नीचे उतरने के बारे में कुछ बारीकियाँ समझायी गयी थी। यहाँ पर पुरुष एक तरफ़ व महिलाएँ एक तरफ़ बैठी थी, सबसे पहले दो महिलाओं की बारी आयी थी जिसमें वे दोनों असफ़ल रही थी। यहाँ इस लोहे की दीवार में हाथ से पकड़ने के लिये छोटे-छोटे हुक जैसे लगाये गये होते है, जिसको सावधानी से पकड़ते हुए ऊपर चढ़ना होता है, यहाँ चढ़ते समय सबसे ज्यादा ध्यान रखने वाली बात (चिपकने वाली बात) पर कई असफ़ल लोगों ने ध्यान नहीं दिया था। इस दीवार पर ऊपर की बढ़ते समय इस दीवार नुमा चढ़ायी पर लगभग चिपकते हुए चढ़ना पड़ता है। जो इससे चिपक गया वो सफ़ल हो गया।

संजय भाई हल्की सी चूक से हवा में लटक गये।

हमारे ग्रुप की हिम्मत वाली महिला मंजिल की ओर बढ़ते हुए।

शाह मंजिल की ओर, चढ़ता हुआ।

अपनी त्रिमूर्ति में से सबसे पहले कमल भाई का नम्बर आया था, वैसे तो कमल भाई उत्तरकाशी स्थित नेहरु पर्वतारोहण संस्थान NEHRU MOUNTAINIRING INSTITUTE (NIM) से एक माह का पर्वतारोहण का कोर्स सफ़लता पूर्वक कर चुके है लेकिन उस बात को कई साल हो चुके है। आज कई साल बाद, पुन: हाथ आजमाने का मौका कमल भाई ने हाथ से जाने नहीं दिया था। अन्य प्रतिभागियों की तरह कमल भाई ने सुरक्षा बैल्ट बाँधते हुए दीवार पर चढ़ने को तैयार हो गये थे, कमल भाई चीते सी फ़ुर्ती से इस बीस फ़ुट से ज्यादा ऊँची दीवार पर आसानी से जा पहुँचे थे, ऊपर चढ़कर नीचे उतरना ज्यादा कठिन तो नहीं होता है लेकिन खतरनाक बहुत होता है, नीचे उतरते हुए जरा सी ढील दी नहीं कि धड़ाम से नीचे गिरने का खतरा बना रहता है। ऊपर चढ़ने में भले ही हमारे ग्रुप के आधे सैनिक असफ़ल रह गये थे लेकिन नीचे उतरने में सभी सावधानी व आसानी से उतर आये थे। एक-एक कर सबकी बारी आती जा रही थी।

साईकिल वाला ग्रुप जाने की तैयारी में है।

हमारे से पहले वाला ट्रेकिंग ग्रुप।

जैसे ही अपनी बारी आयी तो दिल धक-धक करने लगा (जैसे कभी माधुरी दीक्षित का करता था) मैंने भी सुरक्षा बैल्ट बाँधकर लोहे की दीवार पर चढ़ना शुरु किया ही किया था कि मुझे याद आया कि मुझे इस दीवार से चिपकते हुए ऊपर चढ़ना है, मैं आधी से ज्यादा दीवार पर चिपकते हुए चढ़ता रहा, लेकिन जैसे ही मुझे इस दीवार में हाथ फ़साँने लायक जगह मिली तो मैंने चिपकना छोड़ कर ऊपर की ओर लपकना शुरु किया, जब मैं सबसे ऊपर वाले छोर पर पहुँचा तो वहाँ जाकर मेरे लिये ( सबके लिये ही ) एक विचित्र स्थिति आयी थी कि यह दीवार ऊपर से झुकी हुई थी जिससे इसके ऊपरी छोर पर चढ़ने के लिये दोनों किनारे पर दो जंजीर नुमा कडे लगाये गये थे। मैंने दोनों कडों को अलग-अलग हाथों से पकड़कर अपनी एक टाँग ऊपर घुसा दी, ऊपर दो सहायक पहले से ही वहाँ पर मदद के लिये खड़े हुए थे, उन्होंने मुझे ऊपर खिचने के लिये हाथ बढ़ाया तो मैंने कहा हट जा भाई एक एक तरफ़ और इसके साथ ही मैं एक किनारे पर लगभग लेटकर ऊपर चला गया, जैसे ही मैं नीचे उतरने लगा तो एक सहायक ने कहा कि नीचे उतरते हुए पैर सीधे रखना सही होगा, पैर मुड़ने की स्थिति में घुटने फ़ुटने का ड़र उत्पन्न हो जाता है। घुटने फ़ुटने के नाम से मैंने एक बार भी घुटने नहीं मोडे थे। लेह-लद्धाख वाली बाइक यात्रा में काली बर्फ़ पर बाइक फ़िसलने से मेरा घुटना जख्मी हुआ था, अत: मैं दुबारा कोई सा भी घुटना जख्मी नहीं कराना चाहता था।

हमारे से पहले वाले ट्रेकिंग ग्रुप की अग्रणी महिलाएँ।

हमारे से पहले वाला ट्रेकिंग ग्रुप आगे बढ़ते हुए।

हमारे से पहले वाला ट्रेकिंग ग्रुप अपनी बस में प्रवेश करते हुए।

नीचे आते ही सबने मुझे मुबारकबाद दी, मैं आश्चर्यचकित था कि ऐसा मैंने क्या कर दिया है? जो मुझे मुबारकबाद दे रहे हो, तब कई लोगों ने बताया कि आपका ऊपर चढ़ने का तरीका (style) सबसे अनोखा(unik) था। आपने जो टांग वहाँ घुसायी थी उसके हम मुरीद हो गये है। मैंने मोबाइल अनिल को दिया हुआ था साथ ही कहा भी था कि ऊपर जाते समय तीन चार फ़ोटो ले लियो, लेकिन ताऊ ने ऊपर जाते समय एक ही लिया था, वो टाँग वाला फ़ोटो उसने लिया ही नहीं था। खैर मेरे बाद अनिल ने भी सफ़लता से इस दीवार का आरोहण कर ही लिया था। इसके बाद कई और बन्दे यहाँ सफ़ल रहे, असफ़ल भी बहुत थे, यहाँ हमारे ग्रुप से एकमात्र महिला इस कृत्रिम दीवार पर चढ़ने में सफ़ल रही थी जिनका नाम रेणु यादव है रेणू जी दिल्ली पुलिस में उपनिरीक्षक के पद पर कार्यरत है। इनका घर हमारे घर से मुश्किल से तीन किमी दूर पर ही है।

अब बारी अपने साथियों की। यह अनिल है।

जाटदेवता नाम ही काफ़ी है। जिनका बिन्दास मिजाज व अस्सी किलो वजन सब पर भारी है।

इसके बाद हमारा ग्रुप आज ट्रेकिंग पर जाने वाले ग्रुप को विदा करने के लिये मुख्य प्रवेश मार्ग पर आ गया था, यहाँ हमने अपने से पहले वाले ग्रुप को ट्रेकिंग पर विदा किया था। हमारा ग्रुप इस साल का आखिरी ग्रुप था। गेट के बाहर ही बस आयी हुई थी जिसमें बैठकर वो ग्रुप अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गया था। थोड़ी देर बाद घोषणा हुई कि आज हमारा ग्रुप चार-पाँच किमी की ट्रेकिंग करने जायेगा अत: सब अपना बैग अपने कंधे पर लादकर गेट के पास पहुँच जाये। हम तो यहाँ आये ही इस काम के लिये थे कि किसी तरह गोवा में घूमने का मौका लगे, तो हम सब पाँच-पाँच की लाईन में एक साथ खड़े हो गये थे जहाँ पर सबसे पहले गिनती शुरु हुई, जिसके बाद हम छोटी सी ट्रेकिंग पर रवाना हो गये थे।   

यह स्पेशल टैन्ट है।

नये साल की तैयारी के लिये लगाया गया था।


अपनी फ़ौज हमले के लिये तैयार है। 

अगले लेख में आप पढ़ना कि हमने गोवा कैम्प में किस प्रकार पहली मस्ती भरी समुन्द्री ट्रेकिंग/ पदयात्रा की थी।





गोवा यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे क्रमवार दिये गये है। आप अपनी पसन्द वाले लिंक पर जाकर देख सकते है।

भाग-10-Benaulim beach-Colva beach  बेनाउलिम बीच कोलवा बीच पर जमकर धमाल
भाग-13-दूधसागर झरने की ओर जंगलों से होकर ट्रेकिंग।
भाग-14-दूधसागर झरना के आधार के दर्शन।
भाग-15-दूधसागर झरने वाली रेलवे लाईन पर, सुरंगों से होते हुए ट्रेकिंग।
भाग-16-दूधसागर झरने से करनजोल तक जंगलों के मध्य ट्रेकिंग।
भाग-17-करनजोल कैम्प से अन्तिम कैम्प तक की जंगलों के मध्य ट्रेकिंग।
भाग-18-प्राचीन कुआँ स्थल और हाईवे के नजारे।
भाग-19-बारा भूमि का सैकड़ों साल पुराना मन्दिर।
भाग-20-ताम्बड़ी सुरला में भोले नाथ का 13 वी सदी का मन्दिर।  
भाग-21-गोवा का किले जैसा चर्च/गिरजाघर
भाग-22-गोवा का सफ़ेद चर्च और संग्रहालय
भाग-23-गोवा करमाली स्टेशन से दिल्ली तक की ट्रेन यात्रा। .
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9 टिप्‍पणियां:

  1. Wow Jatdevta Baujee - Very good post. I also quit Ghumakkar.com and now I have my own blog.

    Nandan was too bossy and I left.

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    1. वाधवा जी आपका ब्लॉग देखकर बहुत खुशी हुई है, दूसरों के घर से अपना घर हजार गुणा बढ़िया होता है, अपना घर आखिर अपना होता है।

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  2. वाह, आपका तो प्रवास आनन्दमय दिख रहा है।

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    उत्तर
    1. प्रवीण पाण्डेय जी एक कहावत तो आपने सुनी ही होगी "जहाँ जाट वहाँ ठाट"। अत: आनन्दमय तो होना ही था।

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    2. बलवान भाई राम राम,

      मोहित तू रहन दे, और बलवान आगे देख, वाली बात भी मजेदार थी, यह कहने वाला बन्धु आजकल दिखायी नहीं दे रहा है।

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  3. एडवेंचर कैम्प बड़ा रोमांचक लग रहा है।

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  4. संदीप भाई.....
    इस तरह के कैम्प में मिलजुल कर मस्ती करना और दिए गए कार्य को करने का अपना मजा कुछ अलग होता हैं...और आपने भी खूब मस्ती की....| इस कैम्प के बारे कुछ प्रकाश डाले .....|

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  5. रोमांचक, उम्दा प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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