रात को पंचतरणी में मजबूरी में रुकना पड़ा था। हम रात में जहाँ ठहरे थे वहाँ पर हमें सोने के लिये मोटे-मोटे कम्बल दिये गये थे। मैं रात में नौ बजे सू-सू करने के लिये टैन्ट से बाहर आया, बाहर आकर पाया कि वहाँ का तापमान माइनस में चला गया था। मैं फ़टाफ़ट जरुरी काम कर वापिस टैंट की ओर भागा। इतनी देर में ही मुझे ठन्ड़ ने जबरदस्त झटका दे दिया था। मेरी कम्बल में घुसते समय ऐसी हालत हो गयी थी जैसे मैं अभी-अभी ठन्ड़े पानी के कुंड़ से नहाकर बाहर निकला हूँ। किसी तरह कम्बल में घुसकर राहत की साँस पायी। जब मैं घुसा था तो मेरे दाँत दे दना-दन बजते जा रहे थे। मेरे साथी ने मुझसे पूछा क्या हुआ? मैंने उससे कहा, बेटे एक बार बाहर जाकर घूम आ फ़िर पूछना क्या हुआ? खैर थोड़ी देर बाद जाकर कम्बल में गर्मायी आ गयी थी। रात में ठीक-ठाक नीन्द आ गयी थी। सुबह अपने सही समय 5 बजे उठकर अमरनाथ गुफ़ा जाने की तैयारी शुरु कर दी। यहाँ पर मुझे भण्ड़ारे वालों ने आधी बाल्टी गर्म पानी दे दिया था। जिससे मैंने नहाने में प्रयोग कर दिया था। मेरा साथी यहाँ पर बहने वाली पाँच धाराओं में जाकर नहाकर आया था। नहा-धोकर हम उस जगह पहुँच गये थे जहाँ पर सेना के जवान पगड़न्ड़ी वाले मार्ग की अत्याधुनिक औजारों से तलाशी ले रहे थे। आतंकवादियों कच्चे मार्ग में रात को माइन्स दबा देते है। जिससे कि सुबह यदि जिस यात्री का पैर उस पर पड़ जाये तो वह माइन्स के साथ उड़ जायेगा। जब सेना के जवान मार्ग के सही सलामत होने की हरी झन्ड़ी हिलाते है तो यात्रियों को आगे जाने की अनुमति दे दी जाती है। यात्रियों को बताया जाता है कि मार्ग से हटकर ना चले।
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कर लो अमरनाथ गुफ़ा के दर्शन |