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सोमवार, 24 सितंबर 2012

Trekking to Gaumukh Glacier-Gangotri गौमुख ग्लेशियर तक सफ़ल ट्रेकिंग व गंगौत्री तक किसी तरह लौट कर आना (पैर का बुरा हाल)

सीरिज गंगौत्री-गौमुख
     4.  TREKKING TO GANGOTRI-BHOJBASA-CHEEDBASA भाग 4 गंगौत्री-भोजबासा-चीडबासा तक ट्रेकिंग


भोजबासा में एक दुकान पर मैगी खाकर, हमारी पुलिस चौकडी फ़िर से गौमुख यात्रा के लिये आगे बढ चली। सामने ही गौमुख गलेशियर तक हमें एकदम सीधा दिखाई दे रहा था। यहाँ से आगे का ट्रेकिंग मार्ग ज्यादा कठिन नही है। भोजवासा से आगे चलते हुए हम एकदम सीधे घाटी में नहीं उतरे थे, क्योंकि घाटी में उतर कर दुबारा ऊपर चढना पडता जो उस थकावट में बहुत तकलीफ़ देय होता। इस कारण हमने थोडा सा लम्बा मगर आसान मार्ग अपनाया था जो पहाड के समानान्तर दिखाई दे रहा था। कोई एक किमी चलने के बाद इस मार्ग पर पर कच्ची पगडन्डी के स्थान पर पत्थरों का बना हुआ मार्ग आ जाता है यह मार्ग लगभग एक-डेढ किमी से ज्यादा का था। जिसपर पैदल चलने में बहुत परॆशानी आ रही थी। पत्थर मार्ग में बिछाये जरुर गये थे लेकिन उनमें कुछ भरा नहीं गया था जिससे उनके बीच में मेरा पैर कई बार अटक गया था। जिससे मुझे कई बार झटका सा लगा था। फ़िर भी ज्यादा परेशान हुए बिना, हम वह पथरीला मार्ग भी पार कर गये। पथरीले मार्ग के बाद कुछ दूर तक मार्ग बहुत ही आसान था।

जैसे ही आसान मार्ग समाप्त हुआ तो हमें पता लग गया कि अब आफ़त आने वाली है। देखने में तो मार्ग बहुत आसान था लेकिन वहाँ उल्टे हाथ वाला पहाड बहुत ही कच्चा था। कच्चे पहाड पर ढलान भी बेहद तीखी थी जिससे हर पल यह डर बना रहता था कि कहीं यह पहाड खिसक ही ना जाये। यह कच्चा पहाड मुश्किल से एक किमी ही था बल्कि उससे भी कम ही होगा, लेकिन यात्रा का यह छोटा सा टुकडा आज भी बेहद ही डरावना बीतता है। इस कच्चे पहाड पर पगडन्डी के एकदम किनारे पर कुतुबमीनार की तरह दिखने वाली मिट्टी व गोल-गोल पत्थर से बनी हुई कच्ची मीनारे थी, ये मीनारे देखने में जितनी हसीन लग रही थी उसके उलट यह उतनी ही डरावनी खूंखार साबित हो सकती थी। यहाँ वापसी में एक जगह बहुत बुरी तरह फ़ँस गये थे। जाते समय तो फ़िर भी हम आसानी से इसे पार कर गये थे लेकिन वापसी में इसने हमारी जान पर बना दी थी।

गौमुख ग्लेशियर के ठीक सामने कुछ देर आराम करते हुए।

सोमवार, 17 सितंबर 2012

TREKKING TO GANGOTRI-BHOJBASA-CHEEDBASA भाग 4 गंगौत्री-भोजबासा-चीडबासा तक ट्रेकिंग


सीरिज गंगौत्री-गौमुख


गंगौत्री मन्दिर देखने के बाद, अगले दिन आसपास के स्थल देखने की चाह मन में उठ रही थी। मैंने भाई को कहा कि कल मैं यहाँ घूम लेता हूँ, उसके बाद परसो गौमुख चले चलेंगे। हमारी बाते भाई के स्टाफ़ के दो अन्य साथी पुलिसवाले भी सुन रहे थे। उन्होंने कहा कि गौमुख तो हम भी जाना चाहते है। मैंने कहा ठीक है चलना है तो कल तो नहीं, परसो तो पक्का चलना ही है। क्योंकि मैं कल यहाँ घूमना चाहता हूँ। इस तरह हमारी गौमुख यात्रा के लिये चार मस्त-मलंग की मस्त चौकडी जाने के लिये तैयार हो गयी थी। अगले दिन मैं सुबह-सुबह उठकर पुलिस चौकी के ठीक सामने सूर्य कुन्ड नाम की जगह जा पहुँचा, मुझे भाई ने बताया गया था कि यहाँ सुबह-सुबह इस झरने नुमा पानी की धार पर जब सूर्य की किरणे पडती है तो यह शानदार इन्द्गधनुष बनाती है। मुझे वह इन्द्रधनुष आज भी अच्छी तरह याद है कि कैसे सूरज की रोशनी पडते ही वहाँ उस झरने नुमा भागीरथी की तेज पानी की धार में  उठते पानी की फ़ुहार में सात रंग अलग-अलग दिखाई पड रहे थे। मैं वहाँ सात-आठ दिन रहा था और शायद ही मैंने कोई दिन उसे देखे बिना जाने दिया हो। इसको देखने के बाद मैं आसपास के बाकि स्थल देखने के लिये चल पडा।

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

Gaumukh to Kedarnath trekking गौमुख से केदारनाथ पैदल यात्रा

गंगौत्री से केदारनाथ पदयात्रा/ट्रेकिंग-1
सावन के महीने में दिल्ली और आस पास के क्षेत्र से हजारों (लाखों हरिदवार से ही लाते है) लोग गौमुख गंगा जल लेने जाते है। इन हजारों में से भी केवल 300-400 लोग ही केदारनाथ जाते हैं। कुल दूरी है 250 किलोमीटर, पैदल जाने में पूरे 9-10 दिन लग जाते है, व बस से यही दूरी लगभग 400 किलोमीटर हो जाती है। हमने भी पैदल जाने की पक्की ठान रखी थी। हम तय तिथि को दिल्ली के अ.रा.ब.अ. से रात के ठीक 9 बजे, दिल्ली से उत्तरकाशी के बीच चलने वाली उतराखंड की एकमात्र (एक ही जाती है) बस में बैठ गए। यह बस हमको सुबह 9 बजे उत्तरकाशी पहुँचा देती है। दिल्ली से उत्तरकाशी की कुल दूरी 400 किलोमीटर है। उत्तरकाशी से गंगोत्री तक दूरी 98 किलोमीटर है और रास्ता बड़ा खतरनाक, केवल 12-15 फुट चौडा ही है। समय लगता है लगभग 4 घंटे, खैर हम भी दोपहर बाद 3 बजे तक गंगोत्री पहुँच गए। मुझको बस में पूरी रात नींद नहीं आई थी। बात ये है, कि मुझे बस में कभी नींद नहीं आती है, लेकिन गजब ये कि रेल में नींद आ जाती हैं। इसलिए गंगौत्री पहुँचते ही फटाफट एक आश्रम में सोने का ठिकाना तलाशा। किराया कुछ नहीं देना था, जो अपनी इच्छा आये वो दे देनी थी। मैं तो जल्दी सो गया, पर मेरे मामा का छोरा जो पूरे रास्ते बस में सोता आया था, लगता था कि देर से सोया था

क्या मजबूत व डरावना पुल है, पानी की स्पीड 40 किलोमीटर से कम न थी

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