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शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

Tyimbak- Trimbakeshwar 12 Jyotirlinga Shiva Temple त्रयम्बकेश्वर/त्र्यम्बकेश्वर 12 ज्योतिर्लिंग मन्दिर के दर्शन।

भीमाशंकर-नाशिक-औरंगाबाद यात्रा-11                                                                    SANDEEP PANWAR

पिछले भाग में आपने पढ़ा कि हम दोनों गोदावरी नदी का उदगम बिन्दु स्थल देखने के उपराँत पैदल टहलते हुए त्रयम्बक ज्योतिर्लिंग की ओर चले आये थे। जब हमने अपनी चप्पल जूता घर में जमा करा कर मन्दिर के प्रांगण में प्रवेश किया तो सबसे पहला झटका हमें वहाँ की भीड़ देखकर लगा। इसके बाद अगला झटका हमें दरवाजे पर खड़े मन्दिर के सेवकों की निष्पक्ष भावना देखकर हुआ। जब हमने वहाँ पर मन्दिर दर्शन के लिये भक्तों की लम्बी घुमावदार लाइन देखी और हम भौचक्के से वहाँ खड़े के खड़े रह गये तो हमें लम्बी लाईन के कारण अचम्भित खड़ा देख मन्दिर के सेवक बोले, “क्या आप बिना लाईन के जल्दी दर्शन करना चाहे हैं? हमने पूछा आप इस सेवा के बदले क्या फ़ीस लेते हो। तो उसने कहा था कि आपको 100 रुपये में हम बिना लाईन के मन्दिर दर्शन करा लायेंगे। हमने उनकी बात नकारते हुए उस लम्बी लाईन में लगना स्वीकार कर लाईन में लग गये।




बुधवार, 3 अप्रैल 2013

Godawari River starting point and other place गोदावरी उदगम स्थल सहित अन्य स्थल।

भीमाशंकर-नाशिक-औरंगाबाद यात्रा-09                                                                    SANDEEP PANWAR

हम तेजी से ऊपर चढ़ते जा रहे थे। कुछ तो बारिश में फ़ँसने की चिंता, कुछ अंधेरा होने का ड़र। जब हम पहाड़ के लगभग शीर्ष पर पहुँचे ही थे तो हल्की-हल्की बूँदाबांदी भी शुरु हो गयी थी। हम अपने साथ बैग भी नहीं लाये थे। मेरे बैग में हमेशा एक छाता रहता है लेकिन क्या करे? सबसे पहले मैंने विशाल से कहा कि हम इस पहाड़ के सबसे दूर वाले के कोने में पहले चलते है ताकि उसके बाद सिर्फ़ वापसी करते हुए ही आना होगा। इसलिये हम पहले गोदावरी नदी का उदगम स्थल देखने नहीं गये। जब हम इस पहाड़ पर पहुँचे थे तो हमें वहाँ अपने अलावा कोई और दिखाई भी नहीं दे रहा था। जहाँ यह सीढियाँ समाप्त होती है उससे लगभग आधे किमी से ज्यादा दूरी तक हम सीधे हाथ की दिशा में चलते गये। जब आगे जाने का मार्ग दिखायी नहीं दिया तो मैं वही ठहर गया। विशाल फ़ोटो लेता हुआ पीछे-पीछे आ रहा था। मैंने विशाल से कहा आगे तो जाने के लिये मार्ग ही नहीं है।

पहाड़ के शीर्ष से त्रयम्बक शहर कैसा दिखायी देता है।

बस आ गया पहाड़।

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

Triyambak-Gajanan sansthan and Ram tirath त्रयंबकेश्वर- गजानन महाराज संस्थान व राम तीर्थ

भीमाशंकर-नाशिक-औरंगाबाद यात्रा-08                                                                   SANDEEP PANWAR

जैसे ही हम दोनों ने अन्जनेरी वाले मोड़ से बस में सवार होकर कुछ देर बाद त्रयम्बक शहर में प्रवेश किया तो बस स्थानक से काफ़ी पहले, यही कोई एक किमी पहले ही उल्टे हाथ की ओर गजानन महाराज संस्थान का बोर्ड दिखायी दिया। विशाल तो यहाँ पहले भी आ चुका है इसलिये उसे पता था कि कहाँ उतरना है। विशाल इस संस्थान के सामने ही मोड़ पर बस चालक से कहकर बस रुकवाने के लिये बोलकर उतरने के खड़ा हो गया। अब भला सीट पर बैठकर मैं कौन सा भुट्टे भूनता। मैं भी विशाल के साथ ही इस संस्थान के सामने ही बस से उतर गया। बस से उतरने के बाद हम दोनों थोड़ी सी दूर तक वापिस आये। यहाँ हमने इस संस्थान के प्रवेश मार्ग से अन्दर प्रवेश किया। बाहर सड़क से देखने में यह संस्थान कुछ खास नहीं दिख रहा था। लेकिन जैसे-जैसे हम इसके अन्दर जाते गये, इसकी सुन्दरता में बढ़ोतरी होती रही। हमारा पहला लक्ष्य इस संस्थान में कमरा लेने का था इसलिये हम सीधे इसके कार्यालय पहुँचे। वहाँ पहुँचकर हमारी उम्मीदों पर जोरदार तुषारपात हो गया। कार्यालय वालों ने बताया कि यहाँ दो दिन तक कोई कमरा खाली नहीं है। विशाल ने कमरा खाली न होने का अंदाजा पहले ही लगाया हुआ था क्योंकि जिस दिन हम वहाँ त्रयम्बकेश्वर पहुँचे थे। उस दिन ही वहाँ पर तीन दिन चलने वाला श्राद्ध पक्ष आरम्भ हुआ था। यहाँ हर साल श्राद्ध के आरम्भ होने के अवसर पर भारी भीड़ रहती है अत: सम्भव हो सके तो यहाँ श्राद्ध के शुरु के दिनों में यहाँ आने से हर हालत में बचना चाहिए।   

लगता है जैसे कोई विशाल मन्दिर है।

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

Hanuman cave and Jain cave हनुमान गुफ़ा व जैन गुफ़ा।

भीमाशंकर-नाशिक-औरंगाबाद यात्रा-07                                                                    SANDEEP PANWAR


वापसी की कहानी में काफ़ी मजेदार रही, चढ़ाई में जहाँ साँस फ़ूलने की समस्या आ रही थी। वापसी में ऐसी कोई बात नहीं थी लेकिन वापसी में ढ़लान में उतरना हमेशा जोखिम भरा होता है, कारण हमारा शरीर उतराई की ओर गतिमान होने के कारण यदि हल्का सा झटका भी नीचे की ओर लगता है तो वह काफ़ी खतरनाक साबित हो सकता है। शुरु की कुछ दूरी तो समतल सी भूमि पर ही है इस कारण वहाँ पर ज्यादा खतरा नहीं था। लेकिन जहाँ से उतराई शुरु हो रही थी वहाँ पर तेज ढ़लान होने के कारण सावधानी बरतने की नौबत आ गयी थी। यह तो शुक्र रहा कि इस जगह पर बारिश का मौसम नहीं था। नहीं तो ऐसी जगह बारिश के कारण यदि फ़िसलन भी हो जाये तो फ़िर नानी याद आने में ज्यादा देर नहीं लगती है। मैं सावधानी से नीचे वहाँ तक उतर आया जहाँ तक सीढ़ियाँ बनी हुई थी। मैंने सीढ़ियाँ समाप्त होते ही अपनी गति में अपनी स्टाईल वाला गियर लगाया ही था कि विशाल जैसा कोई बन्दा मुझे तालाब किनारे बैठा हुआ दिखाई दिया। मैंने रुककर देखना चाहा कि यह हरी कमीज में विशाल ही है या कोई और? मैं उस बन्दे के मुड़ने की प्रतीक्षा में कुछ पल वही खड़ा रहा। जैसे ही वो बन्दा मुड़ा तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना ही नहीं रहा। वह विशाल ही था।

हनुमान का नया अवतार। विशाल राठौर, बोम्बे वाला।

रविवार, 31 मार्च 2013

Anjaneri mountain/parvat-Birth place of Hanuman ji अंजनेरी पर्वत-रुद्र अवतार हनुमान जी का जन्म स्थान

भीमाशंकर-नाशिक-औरंगाबाद यात्रा-06                                                                   SANDEEP PANWAR


हम त्रयम्बक जाने वाली बस से अन्जनेरी पर्वत के मोड़ पर उतर गये। यहाँ बस से उतरते ही उल्टे हाथ सड़क किनारे एक दुकान दिखायी दी। हम सीधे उस दुकान में घुस गये। दुकान वाले से अन्जनेरी पर्वत पर आने-जाने के बारे में पता किया। उसने बताया कि अन्जनेरी यहाँ से लगभग 6-7 किमी दूरी पर है जिसमें से आखिरी के 3 किमी ही ज्यादा चढ़ाई वाले है। मैंने सोचा चलो आना-जाना कुल 14-15 किमी है तो है। कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन 14-15 किमी वाली बात पर विशाल के मन में एनर्जी बचाने वाली बात घर गयी थी। उसने कहा कि पहले 4 किमी तो लगभग साधारण सड़क का मार्ग है इसलिये शुरु के चार किमी चलने में क्यों शारीरिक ऊर्जा बर्बाद की जाये। अब साथ जाने वाले का कुछ तो मान रखना ही पड़ता है। साथ वाले की बेईज्जती करना मेरा उसूल नहीं है। लेकिन मैं यदि ऐसे लोगों के साथ यात्रा पर गया हूँ जो दूसरे लोगों के मान सम्मान का ख्याल नहीं रखते है तो मैं दुबारा ऐसे लोगों के साथ जाने से हर सम्भव बचता हूँ। मेरे साथ पहले भी कई बार एक दो जिददी लोग चले गये थे, लेकिन बाद में मैं उनके साथ दुबारा नहीं गया। चलिये अब इस यात्रा की बात हो जाये। विशाल के कहा तो मैंने भी कहा ठीक है भाई 4 किमी किसी वाहन से चल देते है। विशाल ने एक मैजिक वाले से बात की लेकिन उसका जवाब सुनकर विशाल का मुँह फ़टा का फ़टा रह गया। उसका जवाब सुनकर मैं मुस्कुरा रहा था। चलिये आप को भी बता देते है कि उस वाहन वाले ने कहा क्या कहा था? मैजिक वाले ने 4 किमी की दूरी तक, दो बन्दों को छोड़ने के लिये हमसे 500 रुपये की माँग कर ड़ाली। हमने कुछ क्षण उसके जवाब को पचाने में लगाये, लेकिन उसकी बात हजम होने वाली नहीं थी। उसके बाद एक लम्बा साँस लेकर उसे कहा कि दोनों मिलाकर 200 रुपये से ज्यादा नहीं देंगे। यह कहकर मैंने अपना सामान उठा कर चल दिया। 

सड़क से चलते ही यह जैन मूर्ति दिखायी देती है।

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