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मंगलवार, 2 जुलाई 2013

Matheran to Mumbai via Vasai Road माथेरान से वसई रोड़ होकर मुम्बई की यात्रा।

EAST COAST TO WEST COAST-26                                                                   SANDEEP PANWAR
माथेरान से नेरल तक जाने वाली ट्रेन स्टेशन पर ही खड़ी थी जब हमें टिकट नहीं मिले तो हमने पैदल ही तीन किमी की दूरी दस्तूरी नाका तक तय करनी आरम्भ कर दी। हमने रेलवे लाईन के किनारे ही पद यात्रा जारी रखी, कुछ देर बाद ट्रेन हमें पीछे छोड़कर आगे बढ़ गयी। पैदल मार्ग में लगातार ढलान थी जिस कारण हमें ज्यादा समस्या नहीं आ रही थी दिन भर से हम पैदल ही चल रहे थे इसलिये पैदल चलने का मन तो नहीं था, लेकिन क्या करते दूसरी ट्रेन भी दो घन्टे बाद जाती। एक तो ट्रेन दो घन्टे बाद जाती दूसरा नेरल पहुँचने में भी दो घन्टे का समय लगाती। इस तरह कुल मिलाकर चार घन्टे बाद नेरल पहुँचना होता।



मंगलवार, 26 मार्च 2013

Delhi-Bombay(Dadar)-Narel-Khandas दिल्ली-दादर-नेरल-खंड़स तक।

महाराष्ट्र के भीमाशंकर-नाशिक-औरंगाबाद की यात्रा-01                                            SANDEEP PANWAR


बीते साल 2012 में जुलाई माह की बात है मुम्बई में रहने वाला दोस्त विशाल राठौर कई बार भीमाशंकर ट्रेकिंग की बात करता रहता था। पहले तो मन में वहाँ जाने का विचार ही नहीं बन रहा था लेकिन विशाल के बार-बार बुलाने के कारण मैंने रेल से बोम्बे जाने के लिये गोल्ड़न टेम्पल मेल से अपना टिकट बुक कर ही दिया था। दिल्ली से बोम्बे तक पहुँचने में कोई खास घटना नहीं घटी थी इसलिये उसका कोई विवरण नहीं दे रहा हूँ। यह ट्रेन सुबह 5 बजे दादर रेलवे स्टेशन पहुँच जाती है। यहाँ पर जैसे ही ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर रुकी तो विशाल अपने कोच के ठीक सामने खड़ा दिखायी दिया। पहले तो गले मिलकर एक दूसरे का स्वागत किया गया। इसके तुरन्त बाद हम दोनों वहाँ से बम्बई लोकल ट्रेन में बैठने के लिये फ़ुटओवर ब्रिज पार कर दूसरी ओर लोकल वाली लाईन पर पहुँच गये। यहाँ पर विशाल ने अपने कार्ड़ से हम दोनों का दादर से नेरल तक जाने का टिकट ले लिया था। 
जाटदेवता के कदम बोम्बे में पड़ ही गये।

बोम्बे लोकल अपनी गति से दौड़ी जा रही है।

इस यात्रा के समय ही मेरे पहली बार बोम्बे की भूमि पर कदम पड़े थे। तो जाहिर है कि बोम्बे लोकल में भी पहली बार सवारी हो रही थी। सुबह का समय होने के कारण बम्बई की जीवन रेखा/ life line कही जाने वाली लोकल रेल में ज्यादा भीड़भाड़ नहीं थी। एक दिन पहले ही बोम्बे का गणपति उत्सव समाप्त हुआ था जिस कारण थोड़ी बहुत भीड़ भी 10-15 किमी तक ही दिखायी दी थी। शुरु में हमें दादर स्टेशन से सीट नहीं मिल सकी थी, लेकिन इस रुट पर नजारे देखने की इच्छा के कारण सीट मिलने का लालच भी नहीं हो रहा था। शुरु-शुरु में विशाल ने मुझे कई बार टोका कि तुम दरवाजे पर खड़े हो, सावधानी से खड़े रहो। गिर जाओगे। बैग को सम्भाल कर पकड़ो। मुझे कई बार विशाल पर आश्चर्य भी हुआ कि अरे यह बन्दा क्या मुझे अनाड़ी समझ रहा है। लेकिन विशाल की चिंता अपनी जगह सही थी, बोम्बे में गेट पर लटकने के कारण हर साल सैंकड़ों हादसे होते रहते है। बिना किसी परेशानी के अपना सफ़र चलता रहा।

कोई बात नहीं इस बार ना सही अगली बार यात्रा करनी ही है।

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