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सोमवार, 29 अप्रैल 2013

Bid Monastery to Sunder Nagar via Mandi बीड़ मोनेस्ट्री से मन्ड़ी होकर सुन्दर नगर तक की यात्रा।

हिमाचल की कांगड़ा व करसोग घाटी की यात्रा 07                                                       SANDEEP PANWAR
चाय के बागान अभी समाप्त भी नहीं हुए थे कि खेतों मॆं तिब्बती लोगों द्धारा लगाये जाने वाली रंग बिरंगी झंड़ियाँ दिखायी देने लगी। इन झंड़ियों को तिब्बती लोग बड़ी पवित्र मानते है।  इन पर तिब्बती धर्म ग्रन्थ लिखे होते है। पहले फ़ोटो में खेत में लगी बहुत सारी झड़ियाँ दिखायी दे रही है। जहाँ यह झडियाँ लगी हुई थी वहाँ पर चाय के खेत नहीं थे। इन खेतो में कुछ स्थानीय महिलाएँ कार्य कर रही थी। हम कुछ देर तक उन्हे खेतों मॆं कार्य करते देखते रहे। इसके बाद हम आगे की ओर चल दिये। आगे चलने पर हमें एक और मोनेस्ट्री जैसी दिखायी देने लगी लगी। यहाँ इसके बाहर सड़क पर बहुत सारे रंग बिरंगे पत्थर रखे हुए थे। जिसपर तिब्बती भाषा में कुछ ना कुछ तो अवश्य लिखा हुआ था। पहले हम दोनों इसके अन्दर जाने की सोच रहे थे फ़िर मैंने अपना इरादा बदल दिया, विपिन से कहा कि अगर तुम्हे जाना है तो जाओ नहीं तो चलो आगे मन्ड़ी की ओर चलते है। विपिन बोला नहीं संदीप भाई दोनों देख कर आयेंगे। मैंने कहा देख भाई बात सिर्फ़ फ़ोटो लेने की ही है मैंने इसे बाहर से देख लिया तो मेरे लिये यह ही बहुत बड़ी बात है। जा भाई जा तुम फ़ोटो ले आओ मैं फ़ोटो देखकर ही खुश हो जाऊँगा।

खेर्तों में लगी तिब्बती झडियाँ।े

Paragliding point Bir-Billing monastery पैराग्लाईडिंग सरताज बीड़ की तिब्बती मोनेस्ट्री।

हिमाचल की कांगड़ा व करसोग घाटी की यात्रा 06                                                       SANDEEP PANWAR
बैजनाथ मन्दिर देखने के बाद विपिन को मन्दिर में ही छोड़ मैं सीधा बस अड़ड़े बस में जा पहुँचा। मेरे जाते ही बस चल पड़ी। बस अड़ड़े से निकलते ही बस मन्दिर के आगे पहुँच गयी तो विपिन भी मन्दिर के बाहर ही बस पकड़ने के लिये खड़ा हुआ मिल गया। विपिन के बस में आने के बाद हमारी बस बीड़ के लिये चल पड़ी। हमारी बस मन्ड़ी वाले हाईवे पर आगे बढ़ती हुई अज्जू/आहजू नामक गाँव के मोड़ से उल्टे हाथ ऊपर की ओर मुड़ गयी। यहाँ इस मोड़ पर सीधे हाथ छोटी रेलवे लाईन का स्टेशन भी दिखाई दे रहा था। अगर किसी दोस्त को पठानकोट से इस रेल में बैठकर बीड़ या बिलिंग के लिये आना है तो इस आहजू/अज्जू नामक गाँव पर आकर उतर जाये। यहाँ से उत्तर दिशा में पहाड़ की तीखी चढ़ाई पर बनी सीधी सड़क पर जाने के लिये वाहन मिल जाते है। इस गाँव से जो तेज चढ़ाई बस में बैठकर दिखायी दे रही थी, ऐसी तेज चढ़ाई तो फ़्लाईओवर पर चढ़ते समय भी दिखाई नहीं देती है। बस चालक ने इस चढ़ाई पर बस चढ़ाते समय दूसरे गियर से आगे बढ़ने की हिम्मत की तो बस लोड़ मानकर रुकने लगी जिससे दुबारा से बस को दूसरे गियर में लाना पड़ा। यदि ऐसी सीधी खड़ी चढ़ाई पर परमात्मा ना करे किसी गाड़ी का उतरते समय ब्रेक फ़ेल हो जाये तो उसका क्या होगा? होगा क्या, जितना बड़ा वाहन होगा उतनी बड़ी दुर्घटना घटने की प्रबल सम्भावना बढ़ जायेगी। बस अपनी पूरी ताकत लगाकर 20-25 की गति से ऊपर चढ़ती जा रही थी। इस चढ़ाई को देख हमें साँस लेने की फ़ुर्सत निकालनी पड़ रही थी, नहीं तो हम किसी काम के नहीं रहते। 


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