रुद्रप्रयाग से अपना साथी मुझे अकेला छोड़कर
दिल्ली के लिये रवाना हो गया। मैंने अपनी बाइक गौरीकुंड़ के लिये दौड़ा दी। बाइक
पर अकेले सवारी करते हुए मैंने महसूस किया कि बाइक पर अकेला होने के कारण बाइक
आसानी से पहाड़ पर चढ़ती जा रही है। पीछे किसी के बैठने पर बाइक का संतुलन बनाने
में सावधानी रखनी पड़ती थी। अकेला होने पर जो आराम मिला, उसका
मुझे बहुत लाभ हुआ। मैं मुश्किल से दो घन्टे से पहले ही गौरीकुंड़ पहुँच चुका था।
गौरीकुंड़ पहुँचते ही घड़ी में समय देखा तो दोपहर के 11 बजने
जा रहे थे। सबसे पहले तो बाइक को किसी सुरक्षित स्थान पर खड़ा करना था उसके बाद
आगे जाने की कार्यवाही पर अमल करना था। मैं गौरीकुंड़ में घुसते ही सबसे पहले सीधे
हाथ की ओर दिखायी देने वाले कमरों में जगह देखने के लिये बात बात की, वहाँ
पर मौजूद एक कर्मचारी बोला कितने आदमी हो, मैंने कहा कि मैं तो अकेला हूँ उस आदमी ने मुझे
किराया मात्र 50 रुपये बताया था। मैंने तुरन्त 50 रुपये
उसको दे दिये। उसने मुझे सबसे नीचे का सड़क किनारे वाला कमरा दिया था मेरी बाइक
उसने मेरे कमरे के अन्दर ही खड़ी करवा दी थी। मैंने बाइक खड़ी कर अपने बैग से
फ़ालतू सामान निकाल कर सिर्फ़ एक जोड़ी कपड़े व नहाने का सामान व बरसात से बचने की
पन्नी वाला बुर्का लेकर गौरीकुंड़ के गर्म पानी में स्नान करने के लिये चला गया।
केदारनाथ मन्दिर |