शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

पवाँली से त्रियुगीनाराय़ण तक, Panwali to Tiryuginarin, trekking

गंगौत्री से केदारनाथ पदयात्रा-6


पवाँली कांठा बुग्याल में रात को रुकने में कोई खास परेशानी नहीं है बस आपको शहरों वाली सुख सुविधा नहीं मिलेगी एकदम गाँव का माहौल है रहन-सहन से लेकर खान-पान तक सब कुछ, यहाँ तक कि इतनी ऊँचाई पर तो मोबाइल भी कभी-कभार ही काम करता है वह भी किसी एक खास कोने में जाने के बाद ही। यहाँ से किसी भी दिशा में जाने पर पहला गाँव कम से कम 17-18 किमी से ज्यादा दूरी पर है इसका मतलब साफ़ है कि बीच का सारा इलाका एकदम सुनसान मानव तो कभी-कभार ही नजर आते है, हम वैसे तो दो ही थे। मैं और मेरे मामा का छोरा। लेकिन इतने लम्बे सफ़र में साथ चलते-चलते सभी अपने से लगने लगे थे। सभी अच्छे दोस्त बन गये थे। ज्यादातर दिल्ली के आसपास के रहने वाले थे। रात को चूल्हे के समने बैठ कर गर्मागर्म रोटी खायी थी। कुछ ने शुद्ध देशी घी से बने हुए आलू के परांठे बनवाये थे। यहाँ पर पवाँली में खाने में देशी घी का प्रयोग किया जाता है। उसके दाम कुछ ज्यादा लेते है जो आम भोजन से 10-15 रुपये ज्यादा है। रात में दस बजे तक खा पी कर सोने की तैयारी होने लगी। यहाँ पर रात में कभी-कभार भालू आने का खतरा होता है। अत: सबको यह चेतावनी दे दी गयी कि रात में हो सके तो झोपडीनुमा घर से अकेले बाहर ना निकले। निकलना जरुरी हो तो पहले बाहर का माहौल देख ले व टार्च जला कर दूर तक एक नजर जरुर घुमा ले ताकि किसी किस्म का खतरा ना रहे। अब बात सोने की आयी तो एक झोपडीनुमा घर में आराम से 10-12 लोग सो सकते है। जानवरों के लिये अलग झोपडे होते है। सोने के लिये कोई पलंग या चारपाई नहीं होती है, सबको जमीन पर बिछे लकडी के फ़टटों पर या दीवार पर बने टांड नुमा दुछत्ती पर सोना होता है ओढने व बिछाने के लिये कम्बल की कोई कमी नहीं होती है। हमने भी दो-दो कम्बल लिये व आराम से लकडी के फ़टटों पर बिछा कर सो गये।
ये भोले के भक्तों की कावंड झूलती हुई।







अब चलते है पवाँली से आगे।

ये देखो मार्ग धार के ऊपर है।

सुबह उजाला होने के समय सब लोग उठ गये। सामने ही एक झरना जैसी छोटी सी जल की धारा बह रही थी सुबह के सभी जरुरी कार्य किये व नहा धोकर तैयार हो गये, लेकिन यहाँ इस जगह पर पानी इतना ठन्डा था जिससे कि नहाने के अरमान मात्र दो मिनट में ही पूरे हो गये नहीं तो सोच रहा था कि 10-15 मिनट तो मौज ली जायेगी। नहाने के बाद मन में ख्याल आया कि जरा इस जल की धारा का आरम्भ बिन्दु देखा जाये तो जी मैं अकेला चल दिया उस धारा के साथ-साथ मुझे ज्यादा दूर नहीं जाना पडा मुश्किल से आधा किमी जाने पर ही मुझे वो जगह मिल गयी जहाँ से ये जल की धारा का आरम्भ हो रहा था। अब फ़टाफ़ट उसी जगह वापिस आया जहाँ सब लोग रुए हुए थे। सभी नहा धोकर आज की यात्रा पर चलने को तैयार थे। सबने अपना दैनिक पूजापाठ गंगाजल आरती व भोले नाथ की आरती का जाप किया व अपनी काँवर व अपना बैग अपने कंधों पर लाधकर आगे की पद यात्रा पर चल दिये। आज सारा दिन उतराई ही उतराई आने वाली थी जबकि बीते दिन केवल चढाई ही चढाई थी।
फ़ूलों का मेला


मार्ग में फ़ूल ही फ़ूल है।

पवाँली से चलने के कोई दो किमी के बाद एक जगह और आती है जहाँ पर भी दो झोपडीनुमा घर मिलते है यहाँ भी रात्रि विश्राम किया जा सकता है। अब यहाँ से आगे का सफ़र पहाड की धार पर शुरु हो गया था, पहाड की धार वो जगह होती है जो पहाड का सबसे ऊपर का भाग होता है जैसे घाटी सबसे नीचे का हिस्सा होता है वैसे ही पहाड का सबसे ऊपर का हिस्सा धार कहलाता है। मार्ग के दोनों और गहरी-गहरी खाईयाँ थी, पूरा मार्ग पर दाये बाये ऊपर नीचे जहाँ भी नजर जाये हर जगह फ़ूल ही फ़ूल खिले हुए थे।

यह सफ़ेद फ़ूल

इतना बड़ा पत्ता

मग्घू

हम सुबह छ: बजे चले थे आठ बजने तक धुन्ध ने सब कुछ छिपा लिया था धुन्ध आने के बाद कुछ नहीं दिखाई दे रहा था दिखाई दे रही थी तो बस वो पगडंडी जिस पर हम चले जा रहे थे। इस धुन्ध में चलते हुए कब दो घन्टे बीत गये पता ही नहीं चला। एक जगह पर कुछ भेड-बकरी बैठी हुई थी यहाँ से थोडा आगे जाने पर एक जबरदस्त ढलान आ गयी थी जिस पर उतरने के बाद एक छोटा सा किन्तु बेहद ही सुकून देने वाला झरना नजर आया सबने अपना डेरा यहाँ डाल दिया था झरना का ताजा पानी पीने के बाद ही आगे के लिये चले थे। लेकिन झरने से चलते ही एक जोरदार चढाई जो 200 मी ही होगी, लेकिन सबकी साँस फ़ूला गयी थी।




इस छोटी सी चढाई पर ऊपर आने के बाद दो लोहे के एंगल गाडे हुए मिले जिसके बारे में बताया कि जिला आरम्भ होने की( सीमा की) निशानी है। टिहरी गढवाल जिले से अब हम रुद्रप्रयाग जिले में प्रवेश कर रहे थे। आम शब्दों में कहे तो ये एक ऐसा बार्डर था जहाँ मुश्किल से ही कोई पहुँच पाता है। इस जिले के बार्डर से आगे का सारा मार्ग ठीक था, धुन्ध भी गायब हो गयी थी। यहाँ से जो ढलान शुरु होती है वो सीधी त्रियुगीनारायण होते हुए सोनप्रयाग तक जाती है। इस ढलान पर आराम से उतरा जा रहा था कोई समस्या नहीं थी। मार्ग में ज्यादा खाई भी नहीं थी अब पेड पौधे दुबारा से साथ निभाने आ गये थे जो ज्यादा ऊँचाई के कारण साथ छोड गये थे। जिस पगडंडी पर हम जा रहे थे अब इसकी चौडाइ भी 4-5 फ़ुट हो गयी थी। बीच-बीच में 2-3 स्थान पर कई पेड गिरे हुए मिले| जिनपर  हम किसी के ऊपर से किसी के नीचे से होते हुए निकल गये। एक मोड पर दो झोपडे नजर आये समय हुआ था। कोई 11 बजे का समय हुआ था। हमारे पुराने साथियों ने बताया कि इस जगह को मग्गू (मग्घू)  चटटी के नाम से जाना जाता है यहाँ पर एक दुकान हुआ करती है लेकिन आज दुकान बन्द है शायद सामान लेने गया होगा, इस जगह पर भी रात को रुकने का प्रबंध हो जाता होगा यदि दुकान वाला वहाँ आता होगा तो वैसे यह दुकान तो एकदम घनघोर जंगल में है जहाँ हमें दूर तक भी कोई नजर नहीं आया था।


इस जगह भोले नाथ का विवाह मण्ड़प लगा था।


यहाँ से आगे सीधे हाथ पर मार्ग घूम जाता है और हम भी उसी के साथ चलते रहते है। यहाँ से कोई दो तीन किमी आगे जाने के बाद मार्ग में एक जगह पर उल्टे हाथ पर कोई सात-आठ पुराने मकान नजर आये और जब हम उन घरों के पास गये तो देखा कि वे तो खण्डहर मात्र बाकि है कभी किसी ने कोई गाँव या बस्ती बसायी होगी या कुछ और पता नहीं। इन पुराने मकानों के ऊपर लंगूरों का कब्जा था जो यहाँ पर सैकडों की संख्या में थे और हमें देखते ही पेडों पर जा बैठे थे। यहाँ से आगे जाने पर पगडंडी के अलावा एक मार्ग और दिखाई देने लगा था अब देखने में तो लग रहा था कि ये बारिश के पानी के बहने के कारण बना मार्ग है लेकिन इस पर इसांनों के चलने के भी चिन्ह थे अत: काफ़ी सोच विचार करने के बाद ये फ़ैसला हुआ कि पगडंडी छोड कर इसी ढलान वाले उबड-खाबड मार्ग पर चला जाये पुराने साथी बता रहे थे कि अब हमें जाना तो नीचे ही है पगडंडी काफ़ी घूम कर आ रही है और ये पानी वाला मार्ग सीधा नीचे जा रहा है और हम उतर गये उसी मार्ग पर जो सच में बहुत ढलान वाला था कोई दस मिनट बाद हमें वो पगडंडी फ़िर मिल गयी जिसे हम छोड कर आये थे यहाँ पर हमें स्थानीय गाँव के लोग भी आते हुए मिले उन्होंने बताया कि जिस मार्ग से आप आये हो पूरे दो किमी कम चलना पडता है लेकिन बहुत सावधानी पूर्वक। अब तो पगडंडी भी पक्के पत्थरों की आ गयी थी कुछ आगे जाने पर गाँव भी आ गया था। इस गाँव का नाम है त्रियुगीनारायण ये वो जगह है जहाँ पर भोलेनाथ का विवाह हुआ था। ठीक उसी जगह एक मंदिर भी बना हुआ है और मन्दिर के हवन कुन्ड में अग्नि भी जलायी हुई थी। जिसके बारे में कहा जाता है कि इसी हवन कुन्ड के चारों ओर भोलेनाथ ने अपने फ़ेरे लिये थे।

यहाँ सामने ही पुलिस चौकी थी जिस के पास ही बुलन्दशहर के कोई भोले के भक्त भन्डारे का आयोजन कर रहे थे। दोपहर के 2 बज गये थे हमें भी भूख लगी थी तो हम भी जा पहुँचे भन्डारे में दाल-भात/चावल का पेट भर स्वाद लिया, पूरी आलू की सब्जी साथ में। खा पी कर बैठे ही थे मोबाइल अभी भी नेटवर्क पहुँच से बाहर था लेकिन हमें मोबाइल निकाल कर देखते हुए किसी ने बताया कि आप सामने उस पत्थर पर चढ जाओ तो नेटवर्क काम करता है और कहीं मोबाइल काम नहीं करता है दो दिन हो गये थे घर बात किये हुए पहुँच गये उस पत्थर पर जहाँ खडे होकर नेटवर्क काम करता है। कई और बंदे भी यहाँ मोबाइल पर बाते कर रहे थे। मैंने भी घर पर बात की और बता दिया कि आगे अब मोबाइल काम करता रहेगा। यहाँ इस गाँव तक सडक बन चुकी है जीप व छोटे वाहन आते जाते है। लेकिन ये सडक वाला मार्ग 22 किमी का है और पैदल वाला मात्र 7-8 किमी का ही है हमें तो जाना भी पैदल ही था। यहाँ से उल्टे हाथ पर पैदल मार्ग है जिसका उपयोग अब कम किया जाने लगा है। यहाँ से सोनप्रयाग तक सारा का सारा मार्ग ऐसा है कि दूर से नजर भी नहीं आता है, ये ऊपर जाने वाली सडक को भी दो बार काटता है व जब सडक को काटता है तो समझ जाओ कि अब सोन प्रयाग आने वाला है सोनप्रयाग से पहले यहाँ जोंक भी मिलती है जिससे सावधान रहना जरुरी है सोनप्रयाग में यह पैदल मार्ग पुल के पास निकलता है जहाँ से आगे जाकर पुल पार करने पर गौरीकुंड सिर्फ़ 5 किमी ही रह जाता है।


बाकि है वो जगह जहाँ पर सिर कटा गणेश का, गौरी कुंड व केदारनाथ तक अगली किस्त में




गोमुख से केदारनाथ पद यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे दिये गये है।

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3 टिप्‍पणियां:

प्रवीण गुप्ता-PRAVEEN GUPTA ने कहा…

राम राम जी, बढते चलो यात्रा में आनंद आ रहा हैं, आपकी साथ साथ हम भी भ्रमण कर रहे हैं. वन्देमातरम...

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बढिया यात्रा, अच्छा विवरण

संजय अनेजा ने कहा…

पढ़कर भोले और भोले के भक्तों के लिये आदर महसूस हो रहा है।

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