मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

Junagarh fair and climbing to Girnar mountain जूनागढ़ का महाशिवरात्रि मेला और गिरनार पर्वत की भयंकर चढ़ाई

गुजरात यात्रा-08

पोरबन्दर से आते समय जो बस हमें मिली थी उसने हमें जूनागढ़ के बस अड़ड़े पर उतार दिया था। यहाँ से गिरनार पर्वत की तलहटी तक जाने के लिये हमें अभी लगभग 6-7 किमी यात्रा और करनी थी। जिस बस में हम यहाँ तक आये थे उसी बस के कई यात्री गिरनार मेले में भागीदारी करने जा रहे थे। उन्हीं से हमें पता लग गया था कि जूनागढ़ के बस अड़डे से ही आपको गिरनार पर्वत के आधार तक जाने के लिये दूसरी बस मिल जायेगी। हम पोरबन्दर वाली बस से उतर कर बस अड़ड़े में ही गिरनार जाने वाली बस के बारे में पता कर, उसकी और बढ़ चले। मेले के दिनों में गिरनार जाने के लिये बहुत भीड़ रहती है जिस कारण यहाँ पर गिरनार वाली बस के लिये एक अलग से काऊँटर बनाया गया होता है। पहले जाकर टिकट लेनी होती है उसके बाद बस में बैठने वाली लाईन में लगना होता है। जैसे ही बस की सीट फ़ुल हो जाती है वैसे ही वह बस चल देती है उसकी जगह दूसरी बस आ जाती है। हम चारों भी एक बस में सवार होकर जूनागढ़ के गिरनार पर्वत के लिये चल दिये। जब हम गिरनार की ओर बढ़ रहे थे तो मार्ग में मिलने वाली भीड़ देखकर हम समझ गये कि यहाँ रात रुकने के लिये आसानी से जगह मिलने वाली नहीं है। बस से उतर कर हमने रात ठहरने के लिये कई जगह कोशिश की लेकिन कही भी जगह नहीं मिल पायी। रात के साढ़े सात बज चुके थे इसलिये पहले हमने पेट पूजा करने के लिये एक ढ़ाबे के यहाँ ड़ेरा ड़ाल दिया था।

भीड़ की मारामारी

चारों और बुरा हाल



यह क्या मायाजाल है?

खाना खाने के बाद जब हम फ़्री हुए तो समय देखा, घड़ी पूरे आठ बजा रही थी। चूंकि रात ठहरने के लिये कोई प्रबन्ध नहीं हो पाया था, इसलिये  हम लोग अंसमजस की स्थिति में आ गये थे कि सारी रात कैसे काटी जाये? अगर रात के 2-3 भी बजे होते तो भी कोई समस्या नहीं थी। क्योंकि सुबह 4-5 के बीच उठने की तो अपुन को आदत बनी हुई है। अचानक दिमाग का घन्टा बोला क्यों ना रात में ही चढ़ाई कर ली जाये। जैसे ही मैंने यह विचार सबको बताया तो सारे तुरन्त तैयार हो गये। इसके बाद हमने अपना बैग उठाकर इस गिरनार पर्वत की चढ़ाई चढ़ना शुरु कर दिया। जब हम इस स्थान के प्रवेश स्थान पर पहुँचे तो देखा कि वहाँ कुछ अन्य लोग भी ऊपर जाने की तैयारी करने में लगे हुए है। हम चारों में से अनिल व प्रेम (भोले के चिपकू भक्त) पहाड़ की चढ़ाई के मामले में थोड़ा फ़िसड़्डी थे। इनके बारे में मैंने अपनी गौमुख से केदारनाथ पद यात्रा करते समय मैंने जान लिया था कि ये दोनों चढ़ाई में टुलक-टुलक जागेंगे, उतराई में भले ही कुछ तेज उतर जाये। लेकिन अपुन ठहरे सुपरफ़ास्ट रफ़्तार वाले, चढ़ाई हो या उतराई उससे अपने को कोई फ़र्क नहीं पड़ता है अपनी स्पीड़ दोनों में एक जैसी रहती है। अच्छे-अच्छे सूरमा चढ़ाई में मुँह फ़ाड़ देते है। चूंकि मैं अपनी दमदार स्पीड़ के कारण हमेशा आगे चला जाता हूँ इसलिये मैं अपने साथ जाने वालों से कह देता हूँ कि देख भाई मेरे साथ चलने के चक्कर में चक्कर खाकर मत गिर जाना। मैं तुम्हारी टुलक-टुलक बुग्गी वाली गति में चलूँगा तो मेरी हालत खराब हो जायेगी और यदि तुम मेरी गति से चलोगे तो तुम वापसी में आने लायक भी नहीं रहोगे। अत: दोनों के लिये अच्छा यही है कि दोनों अपनी-अपनी चाल से चलते रहे आगे जो भी रहे (ज्यादातर तो अपुन या अपुन जैसे ही रहते है।) वो एक-एक किमी जाने के बाद रुककर पीछे आने वाला का इन्तजार किया करेगा, जैसे ही पीछे वाला आ जायेगा, इन्तजार करने वाला अगले स्थान पर चला जायेगा।

चल भाई एक तो फ़ोटो आया सीढ़ियों का

घुप अंधेरा

यह क्या हो रहा है?

इस चढ़ाई में मेरे साथ चलने वाला लड़का पहाड़ी था, पौड़ी गढ़वाल का रहने वाला था। इसलिये मुझे पक्का विश्वास था कि वह बन्दा मेरा साथ जरुर निभायेगा और हुआ भी वैसा भी, उस लड़के ने मेरा जमकर साथ निभाया था। हम दोनों ने एक साथ चलना शुरु किया तो सच में दिल खुश हो गया, बहुत दिनों बाद कोई ऐसा मिला था जि चढ़ाई में जमकर साथ निभाता चला गया। हमने पहला विश्राम जुनागढ़ के गिरनार पर्वत में तीन किमी बाद आने वाले किले में जाकर लिया था। बीच बीच में कुछ जोशीले बन्दे हमारा साथ निभाने की कोशिश जरुर करते थे लेकिन थोड़ी देर बाद जब उन्हें यह अहसास होता था कि ये तो पागल है, तो वो हमारा साथ छोड़ कर सुस्ताने बैठ जाते थे। जब हम किले पर पहुँचकर कुछ देर विश्राम करने के लिये रुके तो हमारी बाते सुनकर एक बन्दा बोला था, क्या आप यहाँ तक बिना रुके आये हो? जब हमने कहा कि अगर तुम्हे यकीन नहीं है चलो नीचे तुम्हारे साथ दुबारा से ऊपर की ओर बिना रुके चलकर आयेंगे। यह सुनकर वो बेचारा चुप। यहाँ पर आगे चलकर जैन मन्दिर आते है, अंधेरा चारों और फ़ैला हुआ था। अपना कैमरा तस्वीर लेने में लाचार हो चुका था। आगे जाने पर सीढियों वाला मार्ग कुछ दूर तक समतल भूमि में बदल गया था। यही कही गोरखनाथ की धूनी जली हुई थी। जहाँ कुछ बाबा टाईप लोग बैठे हुए थे। हम उन्हें देखते हुए आगे बढ़ते गये। आगे जाने पर हम तो सोच ही रहे थे कि बस हो गयी यह चढ़ाई पूरी, लेकिन जैसे ही हमें आगे उतराई दिखाई दी तो अपनी तो टाँगों के नीचे से जमीन और सिर के ऊपर से आकाश भी खिसकता हुआ महसूस होने लगा। बात ही ऐसी थी कि जहाँ हम खड़े थे वहाँ से नीच की ओर जबरदस्त खाई दिखाई दे रही थी जिस पर बनी सीढियाँ देखकर अपने होश में जोश भरा जा रहा था। मैंने नीचे से आते एक बन्दे से पूछा कि आखिरी बिन्दु कहाँ है? जब उसने बताया कि वो देखो आसमान में जो लाईट/रोशनी दिख रही है, बस वही आखिरी  मंजिल है।  जब मैंने ऊपर देखा तो पहली नजर में दिल पर जोर का धक्का सा लगा और मुँह से निकला अरे बाप अभी तक तक तो हम कुछ भी नहीं चढे है असली चढ़ाई तो अब आयेगी। हमारे लिये सबसे राहत की बात यह थी कि रात का समय व ठन्ड़ी हवा चलने से पैदल चलने में कुछ भी कठिनाई नहीं आ रही थी।
पहाड़ से खाई की रोशनियाँ
रात में अपने फ़ोटो ही ठीक आ सकते है।

जैन मन्दिर

हम एक बार फ़िर सिर की टोपी कसकर लगाकर पहले खाई की ओर उसके बाद ऊपर की ओर दम फ़ाड़ू चढ़ाई पर चढ़ने में लग गये। बीच में सीधे हाथ हनुमान जी के एक मन्दिर तक जाने का मार्ग दिखाई दे रहा था। लेकिन हमें तो ऊपर जाना था अत: हम सीधे ऊपर चढ़ते गये। इस उतराई व चढ़ाई को पार करने में हमें आधा घन्टा लग गया था। ऊपर आकर एक छोटे से कमरे में भोलेनाथ शिव का छोटा सा मन्दिर देखा। शिव को नमस्कार कर हम दोनों वहाँ से वापिस चल दिये। इसी उतराई चढ़ाई को दुबारा पार करते हुए हम उस स्थान पर रुक गये जहाँ पर यह खाई शुरु हुई थी। समय देखा रात के बारह बजने वाले थे। अभी तक हमारे भक्त साथी यहाँ तक भी नहीं आये। जब हमें इन्तजार करते हुए आधा घन्टा से भी ज्यादा हो गया तो वे दोनों दिखायी दिये। हमने उनके बैग अपने पास रखवाकर उन्हें कहा जाओ और आने जाने में कुछ जल्दी करना। हम निश्चित थे कि वो दोनों दो बजे से पहले वापिस नहीं आयेगें। हमारे पास पूरे दो घन्टे का समय था जिसे हमने एक हल्की सी झपकी लेकर बिता दिया था हमें लेटा देखकर वहाँ पर लेटने वालों की भीड़ जमा हो गयी थी। जैसे ही हमारे साथी आये, वैसे ही हम भी उठकर बैठ गये। कुछ देर विश्राम कर हम चारों नीचे की ओर चल पड़े। वापसी में सारा सफ़र ठीक रहा, लेकिन आखिरी के आधे किमी में पैर की पिंड़लियाँ में हल्का-हल्का कसाव महसूस हो रहा था जिस कारण सभी धीरे-धीरे उतर रहे थे। यह कसाव सिर्फ़ सीढियों पर ही दिखाई देता था सड़क पर चलते समय सब कुछ सामान्य था। सुबह चार बजे हम उसी स्थान पर आ गये थे जहाँ हमने रात में खाना खाया था। थोड़ा आगे जाने पर एक सुलभ शौचालय देखकर फ़ारिग हुए उसके बाद सोमनाथ जाने के लिये बस स्थानक की ओर चल दिये। गिरनार से लोकल शेयरिंग वाला आटो पकड़ कर हम बस अड़ड़े पहुँच गये, जहाँ से कुछ देर में ही हमें सोमनाथ जाने वाली बस मिल गयी थी। 
लो जी हम आ गये सोमनाथ

सुबह 5 बजे तक हम गिरनार पर्वत की सफ़ल चढ़ाई व उतराई कर बस स्थानक में लौट आये थे। अब हम एक बस में बैठकर सोमनाथ की ओर बढ़ चले।


गुजरात यात्रा के सभी लेख के लिंक क्रमानुसार नीचे दिये गये है।

भाग-01 आओ गुजरात चले।
भाग-02 ओखा में भेंट/बेट द्धारका मन्दिर, श्री कृष्णा निवास स्थान
भाग-03 द्धारकाधीश का भारत के चार धाम वाला मन्दिर
भाग-04 राधा मन्दिर/ श्रीकृष्ण की अर्धांगिनी रुक्मिणी देवी का मन्दिर
भाग-05 नागेश्वर मन्दिर भारते के 12 ज्योतिर्लिंग में से एक
भाग-06 श्रीकृष्ण के दोस्त सुदामा का मन्दिर
भाग-07 पोरबन्दर गाँधी का जन्म स्थान।
भाग-08 जूनागढ़ का गिरनार पर्वत और उसकी 20000 सीढियों की चढ़ाई।
भाग-09 सोमनाथ मन्दिर के सामने खूबसूरत चौपाटी पर मौज मस्ती
भाग-10 सोमनाथ मन्दिर जो अंधविश्वास के चलते कई बार तहस-नहस हुआ।
भाग-11 सोमनाथ से पोरबन्दर, जामनगर, अहमदाबाद होते हुए दिल्ली तक यात्रा वर्णन
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7 टिप्‍पणियां:

संजय अनेजा ने कहा…

हमने भी एक बार रात के समय नीलकंठ महादेव, फ़िर उसके ऊपर पार्वती माता का मंदिर और उससे आगे झिलमिल गुफ़ा तक पैदल परेड किया था, अद्भुत अनुभव था। इस पोस्ट से वो रात याद आ गई।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

रोचक विवरण..

दर्शन कौर धनोय ने कहा…

गिरनार चाय तो पढ़ी है पर गिरनार पहाड़ के बारे में कभी सुना नहीं था ..दिन होता तो दर्शन भी हो जाते ..यात्रा को पढ़कर मुझे वेश्नो देवी की यात्रा याद हो आई जो हमने कई बार रात को ही की थी .....बढ़िया सफ़र जारी है

Archana ने कहा…

एक बार मौका मिला था यमनोत्री पैदल और केदारनाथ बस! पाँच किलोमीटर रह गया ..आगे पैदल नहीं गये..देर हो जाने के कारण ....पर अद्भुत अनुभव...

MANU PRAKASH TYAGI ने कहा…

मै तो इन सीढियो को देखकर ही डर गया था दस हजार सीढिया बाप रे बाप

प्रेमलता पांडे ने कहा…

सुंदर वर्णन !
हमने भी जनवरी 2011 में अम्बाजी और दत्तात्रेय का मंदिर देखा था पैदल पूरी दस हजार सीढियाँ चढ़कर, दस घंटे लगे थे वापिस होटल तक पहुँचने में ।
जैन मंदिर तो वहाँ का मुख्य आकर्षण हैं।

amitgoda ने कहा…

गिरनार की यात्रा की है, मगर बहुत पहले, पुराने दिनों की यादे ताज़ा हो गयी

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