गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

Ganga bridge Lata, Belak, Budhakedar, to bhairav chatti गंगा पुल से बेलक, बूढ़ा केदार होते हुए भैरव चट्टी तक।

गोमुख से केदारनाथ ट्रेकिंग/पद यात्रा-4

भटवारी होते हुए हम रात में लाटा गाँव पहुँच गये थे। हमने यही रात्रि विश्राम भी किया। इसी गांव से केदारनाथ  पैदल जाने वाले यात्री, गंगा नदी पर बने झूला पुल को पार करते हुए 15 किलोमीटर दूर कठिन चढाई पर बेलक नाम के छोटे से बुग्याल में पहुंच कर दोपहर में आराम करते है। हमने भी यह झूला पार कर बेलक के लिये प्रस्थान कर दिया था। कुछ दूर तक तो मार्ग ठीक-ठाक चढ़ाई वाला था, लेकिन उसके बाद जो चढ़ाई शुरु होती है, उसकी पूछो मत, सबकी हवा खराब थी, हर कोई पसीने से तर बतर हो गया था। रही सही कसर खून पीने वाली जौंक ने कर दी थी। जैसे ही जौंक वाला इलाका शुरु हुआ, वैसे ही सभी की चलने की गति अप्रत्याशित रुप से तेज हो गयी थी। किसी तरह बेलक तक पहुँचे थे। बेलक पहुँचने से पहले एक जगह खिचड़ी वाला भण्ड़ारा लगा हुआ था, पहले उस भण्ड़ारे जम कर खिचड़ी खायी गयी थी।

ये ही वो झूला पुल है


बेलक बुग्याल

बेलक में रात में रुकने का भी इंतजाम है। 

बेलक

बेलक से आगे उतरे ही उतराई है, घना वन, शरीर पर चिपकने वाली जोंक का खतरा, बेलक की उतराई के बाद एक झाला नाम का गाँव यहाँ भी आता है। इसके बाद बूढ़ाकेदार आते आते रात हो जाती है। यहाँ एक स्कूल में हमारे रात का रुकने का इंतजाम था। अगले दिन बूढाकेदार से चलते ही लोहे के पुल को पार करके एक बोर्ड दिखाई दिया, जिस पर लिखा था कि केदारनाथ वाया पवाँली 85 किलोमीटर एवं वाया घनस्याली 180 किलोमीटर सडक मार्ग द्वारा। हमारा इरादा तो पवांली बुग्याल से होकर जाने का था, इसलिए नहीं की दूरी कम है, क्योकि यह मार्ग चढाई का होने के साथ में दुर्लभ नज़ारे देखने का मौका भी तो इसी पवाँली वाले मार्ग पर ही था। इसलिये पवाँली को कैसे छोड़ सकते थे?

चददर वला मुरादनगर के कुर्सी गाँव का रहने वाला है

अरे यह सही लिखा है

बेलक से 22 किलोमीटर कि दूरी पर बूढा केदार पहुंच कर रात्रि विश्राम करते है

इसकी भी जरुरत थी

इसलिये हम बूढाकेदार से सडक का रास्ता छोड कर पहाडों के रास्ते विनयखाल की तीन किलोमीटर की जबरदस्त चढ़ाई चढ़ते हुए गए। पहले तीन किलोमीटर ही जबरदस्त चढाई वाले थे। उसके बाद कई किमी तक आरामदायक सड़क से होते हुए हम लोग भैरो चट्टी की ओर बढ़ रहे थे। भैरोचट्टी से पहले भी दो-तीन किमी थका देने वाले थे आखिरकार भैरोचटटी में जा कर रात्रि में डेरा डाल दिया गया था। विनय खाल से आगे का मार्ग एकदम समतल सा ही है। भैरोचट्टी से तीन किलोमीटर पहले से मंदिर तक चढाई का रास्ता है। चढ़ाई ऐसी कि एक बार फिर सबके जोर लग जाते है। यह जोरदार चढ़ाई भी किसी तरह हमने बैठ-बैठ कर से पार कर ही ली थी।
                                                               विनयखाल से पहले

विनय खाल में एक पहाड़ी रखवाला

भैरो चटटी में

वाह स्वर्ग में

वो रहा भैरों बाबा का मन्दिर

भैरों चट्टी में हम शाम को चार बजे आ गये थे। हम चाहते तो आराम से घुत्तू कस्बे तक अंधेरा होने से पहले जा सकते थे, लेकिन हमारे पास कई दिन का समय था इसलिये हमने कोई जल्दबाजी नहीं की। सबसे पहले यहाँ के पुजारी से रात में रुकने के इंतजाम के बारे में पूछा तो पुजारी जी ने बताया कि मेरे पास एक ही कमरा है उसमें सिर्फ़ परिवार वालों को ही रुकने दिया जाता है और जो छ्डे या कहो कि हमारे जैसे मुस्टंडे होते है, उनके लिये तो सामने का टीन का छप्पर जहाँ आप लोग बैठे हुए हो। वही जहाँ आपके साथ एक साधु भी विराजमान है। आप वहाँ रात को ठहर सकते हो, पुजारी की ये बात सुनते ही अपने होश खराब। दीवार के नाम पर तीन फ़ुट की चारदीवारी व छत के नाम पर टीन का आसरा। मैं बोला कि पुजारी जी यहाँ भालू का खतरा नहीं है क्या? पुजारी ने कहा कि भालू का खतरा तो है लेकिन भालू कभी भी इतने लोगों के बीच आने की हिम्मत नहीं करता है। रही बात कपडों की तो पुजारी ने रात में ऒढने-बिछाने के लिये कम्बल दे दिये थे।

हरा भरा मैदान, पहाड़ की भाषा में बोले तो बुग्याल

बरसाती पानी

एक सन्यासी भैरव चट्टी में, इनके सर के बाल साढ़े पांच फुट से भी लम्बे थे,
रात का रुकने का प्रबन्ध तो हो गया अब बारी पेट पूजा की थी। एक बार फ़िर से पुजारी को तंग किया गया। कि हमें खाने के लिये दाल-चावल तो साथ लाये है बस बर्तन चाहिए बनाने के लिए। लेकिन गजब हो गया जब पुजारी ने कहा कि भैरों मंदिर में चावल बनाने व खाने की बात नहीं हो सकती है। अब क्या करे हम तो चावल व मसाले ही लाये थे। अब विनयखाल बाजार इतनी दूर है कि अब वहाँ तक जाकर वापस आना भी मुश्किल है। चलो भाईयों सो जाओ, सुबह चलकर घूत्तू में ही कुछ खायेंगे। हम सोने की तैयारी कर ही रहे थे कि पुजारी  एक परात में आटा लेकर आ गये व बोले अगर तुम लोग अपने आप रोटी बना सकते हो तो यह लो आटा व मेरे साथ आकर कुछ आलू भी ले लो जिससे तुम आलू की सब्जी बना लेना। यह सुनते ही अपनी नींद गायब देखो जीवन में किसी ने सच कहा है कि अगले पल क्या होगा? किसी को नहीं पता। कहाँ तो हम भूखे पेट सोने की तैयारी कर रहे थे। अब देखो कि आटा व आलू की सब्जी की दावत उडाने का प्रबंध भी हो गया है। हम कुल मिलाकर 10-12 लोग थे, जितने भी उस समय वहाँ ठहरे हुए थे। जिनमें से हम नौ लोग काँवड वाले यात्री थे बाकि दो पहाड के लोकल स्थानीय बंदे थे। सबने मिलकर रोटी-सब्जी बनायी, मैंने भी रोटी बनाने में मदद की। चार लोग रोटी बनाने में, तीन लोग सब्जी बनाने में लगे थे। लगभग एक घन्टे में रात का खाना बनकर तैयार हो गया था। खाना ठीक-ठाक था, रोटी भी कुछ कच्ची कुछ पक्की बनी थी। सबने मिलकर खाना खाया था। खा पीकर सब नौ बजे तक सो गये थे।
लम्बे बाल वाले सन्यासी घूम रहे है

सुन्दर

क्या कहने?

जय हो आसपास के 24 गाँव के देवता भैरव की

एक यहाँ भी




गोमुख से केदारनाथ पद यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे दिये गये है।

.
.
.
.

5 टिप्‍पणियां:

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

आपका सफर वाकई दिलचस्प है
आनंद आ गया..

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्रकृति का सौन्दर्य..

Vikas Gupta ने कहा…

अद्भुत

anil sharma ने कहा…

जाटदेवता प्रणाम
अच्छी जानकारी दी रास्ते की।

Mahesh Gautam ने कहा…

शानदार यात्रा लेख गुरुदेव

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...