शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

Church of Goa- Bom Jesus Basilica गोवा का प्राचीन चर्च बोम जीसस बासिलिका।

गोवा यात्रा-21
बस से उतरने के बाद हमें कुछ दूर तक वापिस चलना पड़ा था। यह विशाल सी दिखाई देने वाली इमारत असलियत में कोई चर्च थी जिसका नाम बोम जीसस बासिलका लिखा हुआ थ। सड़क के दूसरी ओर भी सफ़ेद रंग से नहायी हुई दो और विशाल चर्च दिख रही थी। सड़क पार वाली चर्च अगले लेख में दिखाई जायेगी। सबसे पहले हम इस चर्च को चारों और से देखना चाहते थे। इसलिये हम इसके चारों और एक चक्कर लगाने चल पड़े। लेकिन यह क्या इसके दूसरी ओर जाते ही एक गली आ गयी, इसलिये हमें वापिस यही आना पड़ा। बाहर से अच्छी तरह देखने के बाद हम इसके अन्दर प्रवेश करने वाला दरवाजा तलाश करने लगे।

पढ़ लो



दूर से एक झलक

पीछे वाली गली से ऐसा दिखायी देता है।

दीवार से एकदम सटकर

अब ऊपर देख लो
इसका प्रवेश मार्ग थोड़ा सा अलग है सड़क की तरफ़ सीधे नहीं है जिस कारण पहली नजर में दिखता ही नहीं है। हमने लोगों को एक और जाते हुए देखा तो हम भी उधर ही चल दिये। वहाँ जाकर देखा तो पता लगा कि अरे यही से अन्दर जाना है। दरवाजे के बाहर ही दो लोग एक छ फ़ुटे विशाल सितारे को ठीक करने में लगे हुए थे। यहाँ पर हम अपने बैग सहित अन्दर प्रवेश कर गये थे। अन्दर का विशाल हॉल देखने में बहुत भव्य लग रहा था। हॉल में दोनों ओर लोगों के बैठने के लिये काले रंग की कुर्सी/बैंच लगी हुई थी। देखने में सैकड़ों साल पुरानी लग रही थी। हो सकता है कि जब से चर्च बना हो तब से ही यहाँ पर हो। चर्च अन्दर से सफ़ेद था, बस सामने वाला वह भाग जिसमें मूर्ति आदि लगा हुई थी, वही सुनहरा रंग से पुता हुआ था। दूर से देखने में तो यह सोने की चढ़ी हुई परत जैसा लग रहा था। लेकिन असलियत में लकड़ी पर पुता हुआ रंग ही था।

यह इसका मुख्य द्धार है।

यह सितारा पाँच फ़ुट से भी बड़ा था।

चर्च का विशाल हाल

यह इसका पूजा स्थल है।

ध्यान रखा था।
अन्दर चारों ओर एक खामोशी सी पसरी हुई थी। मैंने और अनिल ने कुछ खुसर-पुसर की तो लोग हमारी ओर देखने लग गये। वो अलग बात है कि हमारी खुसर-पुसर भी धमाकेदार होती है। जब हम उस हिस्से में पहुँचे जहाँ लोग अपने प्रभु को मस्का लगाने में व्यस्त थे तो मैं थोडी देर रुककर उन्हें देखता रहा, फ़िर वहाँ से आगे सरक लिये। आगे चलते ही हॉल से अलग होकर एक कमरे में घुसते हुए चलने लगे, वहाँ सब आपसे मे बाते कर रहे थे। यही हमें एक बुत दिखाई दिया। जो एक सूली पर लटकाया हुआ था। यह ईसाईयों के भगवान का बुत/मूर्ती थी। इसे किसने व क्यों मारा उससे मुझे कुछ लेना देना नहीं था। अत: मैं वहाँ से आगे चला ही था। कि वहाँ पर एक शीशे में एक ताबूत दिखाई दिया था, उस पर लिखा हुआ देखने पर पता लगा कि यह यहाँ के किसी बापू/फ़ादर का ताबूत है इसमें उसकी लाश भी रखी हुई है।

यहाँ भी कोई बैठता होगा किसी खास मौके पर

लो जी इनके इसु मसीह की अंतिम समय की हालत देख लो।

एक पादरी की लाश इस ताबूत में बन्द है।

सेंट फ़्रांसिस जेवियर यही नाम है।

चर्च में अन्दर एक खूबसूरत नजारा
हमारे देखने लायक जितना कुछ था वह हमने देख लिया था, इसलिये हम वहाँ से बाहर आने के लिये चल दिये। बाहर आते समय यहाँ का एक विशाल आँगन/गलियारा देखने को मिला था यह आँगन बहुत खूबसूरत लग रहा था। इसकी छत का फ़ोटो देखिये, इसमें लकड़ी की कितनी कड़ी लगायी गयी है। आजकल तो सरिया व कंक्रीट की छत बनायी जाती है। बाहर आते समय यहाँ पर कुछ निशानियाँ पुसतके आदि विक्रय करने के लिये रखी हुई थी मेरी इनमें कोई रुची नहीं नहीं थी। यहाँ से हम बाहर निकल आये। बाहर आकर इसकी खूबसूरती को निहार कर हम चल दिये।

लकड़ी की छत

जो पढ़ना है पढ़ लो, मैं यही सब क्यों लिखू।

ऊपर वाला आधा फ़ोटो है यह पूरा है।

अब चले सड़क पार, दूसरा महा गिरजाघर देखने वास्ते

पहला गिरजाघर देखने के बाद हम दोनों सामने वाले गिरजा को देखने चल पड़े। इस वाले गिरजाघर की तरह दूसरा वाला भी काफ़ी बड़ा बना हुआ था।



गोवा यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे क्रमवार दिये गये है। आप अपनी पसन्द वाले लिंक पर जाकर देख सकते है।

भाग-10-Benaulim beach-Colva beach  बेनाउलिम बीच कोलवा बीच पर जमकर धमाल
भाग-13-दूधसागर झरने की ओर जंगलों से होकर ट्रेकिंग।
भाग-14-दूधसागर झरना के आधार के दर्शन।
भाग-15-दूधसागर झरने वाली रेलवे लाईन पर, सुरंगों से होते हुए ट्रेकिंग।
भाग-16-दूधसागर झरने से करनजोल तक जंगलों के मध्य ट्रेकिंग।
भाग-17-करनजोल कैम्प से अन्तिम कैम्प तक की जंगलों के मध्य ट्रेकिंग।
भाग-18-प्राचीन कुआँ स्थल और हाईवे के नजारे।
भाग-19-बारा भूमि का सैकड़ों साल पुराना मन्दिर।
भाग-20-ताम्बड़ी सुरला में भोले नाथ का 13 वी सदी का मन्दिर।  
भाग-21-गोवा का किले जैसा चर्च/गिरजाघर
भाग-22-गोवा का सफ़ेद चर्च और संग्रहालय
भाग-23-गोवा करमाली स्टेशन से दिल्ली तक की ट्रेन यात्रा। .
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4 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

चित्रभरी यात्रा..

दर्शन कौर धनोय ने कहा…

इस चर्च के बारे में बहुत कुछ सुना है ....बहुत अफवाहे सुनी है ..कुछ पता लगते तो बात होती ..कहते है की जिस पादरी की लाश या ममी रक्खी है उनके पैर पर मांस है और हाथो से आज भी खून निकलता है और साल में एक बार उस ममी को नहलाते है जब उनका जन्मदिन आता है इत्यादि ! देखने की बहुत इच्छा है देखते है कब पूरी होगी ..

G.N.SHAW ने कहा…

बहुत ही सुन्दर यात्रा |

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

देर से सही इंसाफ का परचम लहराएगा - ब्लॉग बुलेटिनआज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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