BUGYAL लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
BUGYAL लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 13 मई 2013

Aali Bugyal to Vaan Village आली बुग्याल से वाण गाँव तक

ROOPKUND-TUNGNATH 06                                                                             SANDEEP PANWAR
वेदनी बुग्याल के ऊपर-ऊपर बनी पगड़न्ड़ी से होते हुए हम अली बुग्याल की ओर बढ़ते रहे। वेदनी और अली आपस में लगभग जुड़े हुए से दिखाये देते है। जब यहाँ बर्फ़ का साम्राज्य चारों ओर होता है तब दोनों में अलगाव रेखा का निर्धारण करना कठिन काम है। एक मोड़ पर जाकर अली बुग्याल का 2 किमी लम्बा मार्ग दिखायी देने लगता है। तेजी से समतल पगड़न्ड़ी पर बढ़ते हम अली बुग्याल के नजदीक पहुँचते जा रहे थे। आखिरकार कुछ देर में हम अली बुग्याल पहुँच ही गये। जिस मौसम में हम गये थे उस समय हरी घास सूख कर सुनहरी रुप धारण कर चुकी थी। आसपास के नजारे देखकर वापिस लौट चले। बताते है कि अली बुग्याल पर सर्दी में आकर स्केटिंग करने का अपना मजा है। यहां आने के कई मार्ग है।



शनिवार, 11 मई 2013

Vedni Bugyal to Kalu Vinayak वेदनी बुग्याल से कालू विनायक तक

ROOPKUND-TUNGNATH 04                                                                             SANDEEP PANWAR
वेदनी पहुँचते-पहुँचते घनघोर अंधेरा हो गया था। रात का समय था ज्यादा कुछ दिखायी भी नहीं दे रहा था। आसमान में अपनी चमक बिखेरने वाला चाँद भी ना जाने कहाँ गायब हो गया था। थोड़ा आगे जाने पर वेदनी कैम्प की लाईट दिखायी देने लगी। जैसे-जैसे कैम्प के पास पहुँचते जा रहे थे। ठन्ड़ बढ़ती ही जा रही थी। ठन्ड़ का प्रकोप तो मार्ग में भी था लेकिन पैदल चलते रहने के कारण शरीर लगातार गर्म बना रहता है इसलिये ठन्ड़ अपना असर नहीं दिखा रही थी। कैम्प के पास पहुँचते ही घोड़े वालों ने अपना सामान उतारना शुरु कर दिया। दो नौजवान कुछ पीछे चल रहे थे, उन्होंने मोबाइल की टॉर्च जलाई हुई थी जिससे वे आते हुए दिख भी रहे थे। अंधेरे में कैम्प के पास मेरा पैर गीली मिटटी में चले जाने से जूते पर मिटटी लग गयी थी। 


शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

पवाँली कांठा- केदारनाथ पदयात्रा का खूबसूरत पड़ाव Panwali Kantha

गंगौत्री से केदारनाथ पदयात्रा-5
अगली सुबह चार बजे सब सोकर उठ गये थे। नहा धोकर सुबह 6 बजे तक आगे के सफ़र पर चल दिये थे। भैरों चटटी से कोई 2 किलोमीटर आगे तक मार्ग समतल ही है। बीच-बीच में जोंक दिखाई दे जाती थी। जिससे बच कर निकल रहे थे। मैं सबसे आगे चल रहा था, दो किलोमीटर बाद एक दोराहा आ गया यानि Y आकार में मार्ग आ गया, अब क्या करे? कोई बताने वाला भी नहीं था। करने लगे अपने साथियों का इंतजार, कुछ देर बाद वो आये। तब उन्होंने कहा कि अब केवल उल्टे हाथ पर ही मुडना गौरीकुंड तक सीधे हाथ पर कहीं नहीं मुडना है। इस मोड के बाद तो ढलान ही ढलान थी। वह भी कोई छोटी मोटी नहीं, पूरे 11-12 किलोमीटर लम्बी थी। यहाँ एक बात और हुई कि भैरों चट्टी से दो कुत्ते हमारे साथ-साथ ही चल रहे थे। जिन्होंने हमारा पीछा नहीं छोडा। तीन घन्टे बाद जाकर ये उतराई समाप्त हुई। अब कच्ची मिटटी का मार्ग आ गया था जो काफ़ी फ़िसलन भरा था। कोई 300-400 मीटर तक ये कच्चा मार्ग रहा था, इसके बाद जाकर एक गॉव आया, जिसका नाम है भाट गाँव। इस गाँव तक अब सडक मार्ग बन चुका है, जो कि दस किलोमीटर का है, जबकि हम सिर्फ़ दो किलोमीटर के पैदल मार्ग से मुख्य सडक तक गये। इस भाट गाँव से जो पैदल मार्ग है वहाँ से मुख्य सडक दिखाई देती है, और सडक इतनी गहरी खाई में है कि पहली बार देखने में तो होश ही उड जाते है। यहाँ से एकदम सीधी गहरी खाई में से होता हुआ पैदल मार्ग जाता है इस मार्ग पर सीढीदार खेत बने हुए है जहाँ पर किसान काम कर रहे थे। हम यह ढलान मात्र 40-50 मिनट में उतर गये थे और मुख्य सडक पर बने पुल पर आ गये थे। जहाँ से हमें उल्टे हाथ की ओर जाना था, इस पुल से घुत्तू मात्र 5-6 किलोमीटर ही रह जाता है।


ऐसी ही पगडंडियाँ से होकर जाना होता है।

जिधर देखो उधर एक से एक नजारे।

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...