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सोमवार, 9 जनवरी 2017

Baratang's lime stone cave बाराटाँग की चूना पत्थर से बनी गुफा



अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की इस यात्रा में हम डिगलीपुर जाते हुए बाराटाँग उतरकर चूने की गुफा देखने चले दिये। अभी तक हमने मरीना पार्क, चिडिया टापू जैसे स्थल देख चुके है। आदिमानव युग के कुछ मानव अभी भी धरती पर निवास करते है। उनका जारवा क्षेत्र होते हुए यहाँ आये है। अब उससे आगे की कहानी, यदि आप इस यात्रा को शुरु से पढना चाहते हो तो यहाँ चटका लगाये और आनन्द ले।
अंडमान निकोबार बाराटाँग की चूने पत्थर वाली गुफा, BARATANG’S LIME STONE CAVE  
दोस्तों, बाराटाँग आ गया है यहाँ इस बस से उतरते है। अब यहाँ से आगे की यात्रा 10 किमी की स्पीड बोट में बैठकर करनी पडेगी। आज तक स्पीड बोट में बैठना नहीं हुआ। आज पानी के जहाज में तो बैठ ही लिये लगे हाथ यह इच्छा भी पूरी हो जायेगी। LIME STONE CAVE पूरी बाराटाँग से चूने के पत्थर तक पहुँचने का एकमात्र साधन स्पीड बोट ही है वही हमें उस गुफा तक लेकर जायेगी। नीलाम्बर रेंज के अधीन यह गुफा है। पानी में डूबने से बचाने के लिये हमें जो लाइफ जैकेट पहनायी गयी थी। वो आरामदायक बिल्कुल नहीं थी सच बोलू तो अत्यधिक असुविधाजनक थी। यह जैकेट कमर व पेट पर बांधी जाये तो ज्यादा सही रहता है। अब तक मैंने MANGROVE के पेड व उनकी जड के बारे में केवल सुना ही था आज उन्हे पहली बार कई किमी तक देखना हो पाया है। अभी हम लाइम स्टोन की जिन गुफा को देखने जा रहे है। वहाँ, उन गुफा तक पहुँचने के लिये हमारी बोट मैग्रोव के घने जंगल के बीच एक छोटी सी जल की धारा से होते हुए जा रही है। पतली धारा में करीब आधा किमी अन्दर जाकर बोट से उतरना होगा।

मंगलवार, 6 मई 2014

Patal bhuvaneshwar cave detail story पाताल भुवनेश्वर गुफ़ा का विस्तृत विवरण

KUMAUN CAR YATRA-03                                                       SANDEEP PANWAR
इस यात्रा में आपने शुरु के दो लेखों में दिल्ली से भीमताल, नौकुचियाताल व सातताल, नैनीताल, अल्मोडा होकर राई आगर तक की यात्रा पढी है अब उससे आगे चलते है। आज दिनांक 14 अप्रैल 2014 की बात है। रात में राई आगर के जिस होटल में ठहरे थे उसकी मालकिन से रात में ही तय कर लिया था कि सुबह गर्मा-गर्म पानी में स्नान करना है। अत: सुबह 6 बजे गर्मागर्म पानी आ भी गया। नहाने का साबुन लिया नहीं था जिस कारण नहाने में ज्यादा समय नहीं लगा। ठन्ड का मौसम था इसलिये फ़टाफ़ट नहाधोकर अपना सामान अपने बैग में समेट कर गाडी में जा बैठे। इस यात्रा में हम केवल एक जोडी कपडे लेकर ही गये थे। घर से चलते समय हरिदवार के लिये निकले थे। लेकिन उत्तराखण्ड के पिथौरागढ जिले में आ पहुँचे। यहाँ का मौसम काफ़ी ठन्ड वाला है जबकि दिल्ली में काफ़ी गर्मी थी। आज हमारी मंजिल धरती में 100 फ़ीट गहरे बेहद संकरे मार्ग वाली पाताल भुवनेश्वर है। 


शनिवार, 3 मई 2014

Nainital to Patal bhuvaneshwar Cave नैनीताल झील से पाताल भुवनेश्वर

KUMAUN CAR YATRA-02                                                       SANDEEP PANWAR

इस यात्रा के पहले लेख में आपने दिल्ली से रात भर चलकर सुबह-सुबह भीमताल, नौकुचियाताल व सातताल तक की यात्रा देखी। अब उससे आगे। हम चारों गाडी में सवार होकर नैनीताल के लिये बढ चले। आज दिनांक 13 अप्रैल 2014 की बात है। सातताल से नैनीताल जाने के लिये पहले भवाली पहुँचना होता है। भवाली कस्बे/बाजार से एक सीधा मार्ग अल्मोडा जाता है। जबकि ऊपर चढाई की तरफ़ उल्टे हाथ जाने वाला मार्ग नैनीताल व दिल्ली/काठगोदाम के लिये अलग होता है। इस मार्ग पर लगभग तीन किमी चलने के बाद एक तिराहा आता है यहाँ से दिल्ली वाला मार्ग नीचे की ओर कट जाता है जबकि नैनीताल वाला मार्ग ऊपर चला जाता है। हमें नैनीताल जाना था जाहिर है हम भी ऊपर वाले मार्ग पर चलते गये। यहाँ इस तिराहे से नैनीताल की दूरी मात्र 7 किमी ही रह जाती है। नैनीताल पहुंचते ही सबसे पहले नैनी झील के दर्शन हुए। नैनीताल में हमारा स्वागत बारिश ने किया।
 

सोमवार, 24 मार्च 2014

Bhartari cave and Samadhi temple राजा भृतहरि गुफ़ा व समाधी मन्दिर

भानगढ-सरिस्का-पान्डुपोल-यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे दिये गये है।
01- दिल्ली से अजबगढ होते हुए भानगढ तक की यात्रा।
02- भानगढ में भूतों के किले की रहस्मयी दुनिया का सचित्र विवरण
03- राजस्थान का लघु खजुराहो-सरिस्का का नीलकंठ महादेव मन्दिर
04- सरिस्का वन्य जीव अभ्यारण में जंगली जानवरों के मध्य की गयी यात्रा।
05- सरिस्का नेशनल पार्क में हनुमान व भीम की मिलन स्थली पाण्डु पोल
06- राजा भृतहरि समाधी मन्दिर व गुफ़ा राजा की पूरी कहानी विवरण सहित
07- नटनी का बारा, उलाहेडी गाँव के खण्डहर व पहाडी की चढाई
08- नीमराणा की 12 मंजिल गहरी ऐतिहासिक बावली दर्शन के साथ यात्रा समाप्त

BHANGARH-SARISKA-PANDUPOL-NEEMRANA-06                           SANDEEP PANWAR

भानगढ-सरिस्का-पाण्डुपोल देखने के बाद अब महाराजा वीर विक्रमादित्य के बडे भाई राजा भृतहरि उर्फ़ भरथरी की तपस्या स्थली के दर्शन करने चलते है। विक्रम ने ही विक्रम संवत का शुभारभ कराया था। जहाँ अंग्रेजी नव वर्ष 1 जनवरी को शुरु होता है तो वही विक्रम संवत बोले तो हिन्दू नव वर्ष चैत्र मास के नवरात्र के साथ आरम्भ होता है। मैंने उज्जैन में इन्ही राजा की एक तपस्या स्थली देखी थी। आज अलवर जिले में स्थित इनकी दूसरी तपस्या स्थली की बात हो रही है।



शुक्रवार, 7 जून 2013

Borra Caves, Araku Valley बोरा गुफ़ा, अरकू घाटी,

EAST COAST TO WEST COAST-10                                                                   SANDEEP PANWAR
अरकू घाटी का रेलवे स्टेशन देखने के बाद हम वहाँ से बोरा गुफ़ा देखने के लिये चल दिये। बोरा गुफ़ा विशाखापट्टनम से लगभग 90 किमी दूरी पर है अरकू यहाँ से 37 किमी दूरी पर पड़ता है जो रेल अरकू घाटी होकर जाती है वही रेल बोरा गुफ़ा के ठीक ऊपर होकर चलती है। सड़क मार्ग से यहाँ जाने पर मुख्य सड़क से कई किमी हटकर बोरा गुफ़ा के लिये जाना पड़ता है। हम अरकू पहाड़ी स्थल से वापसी में विशाखापट्टनम की ओर लौटते समय मस्ती से आ रहे थे। नारायण जी को कार का जीपीएस यंत्र चालू करने को कहा, जब नारायण जी ने कार का जीपीएस यंत्र चालू किया तो यंत्र के कुछ देर बाद ही अंतरिक्ष में सेटलाइट के जरिये हमारी ऊँचाई बतानी आरम्भ कर दी। जब हमने यंत्र आरम्भ किया था तो उस समय हमारी ऊँचाई हजार मीटर से भी काफ़ी ज्यादा थी। जैसे-जैसे हम विशाखापट्टनम की ओर बढ़ते जा रहे थे हमारी ऊँचाई लगातार घटती जा रही थी।




रविवार, 7 अप्रैल 2013

Ajanta-Ellora caves to Daultabad Fort अजन्ता ऐलौरा गुफ़ा से दौलताबाद किले तक।

भीमाशंकर-नाशिक-औरंगाबाद यात्रा-13                                                                    SANDEEP PANWAR


घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मन्दिर देखकर आगे चल दिये, यहाँ से बाहर आते ही हमें एक मकबरा जैसा भवन दिखाई दिया। चूंकि यह हमारे पैदल मार्ग के एकदम किनारे पर ही था इसलिये हमने इसे देखे बिना नहीं छोड़ा। इसके पास जाकर पता लगा कि यह मकबरा/समाधी महान मराठा योद्धा वीर छत्रपति शिवाजी के पिताजी शाह जी की है। जिस दिन हम वहाँ थे उससे कुछ दिन पहले से ही यह समाधी मरम्मत कार्य के लिये बन्द की हुई थी। यह देख कर थोड़ा सा आश्चर्य हुआ कि जहाँ यह समाधी बनी हुई है वहाँ पर पहली नजर में देखने पर ऐसा लगता है कि जैसे इस समाधी पर सालों से किसी संस्था का ध्यान नहीं दिया गया है। इस समाधी को बाहर से ही देख-दाख कर, हम दोनों पैदल ही आगे मुख्य सड़क की ओर बढ़ते रहे। सड़क पर पहुँचते ही हम उल्टे हाथ की ओर चलने लगे। सीधे हाथ की ओर से हम सुबह यहाँ आये थे।

  शिवाजी महाराज के बापू की समाधी।

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

Grishneshwar Temple (Verul-Daultabad-Aurangabad) घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन (दौलताबाद-औरंगाबाद)

भीमाशंकर-नाशिक-औरंगाबाद यात्रा-12                                                                    SANDEEP PANWAR

रात में कैमरे व मोबाइल चार्ज कर लिये गये थे इसलिये अगले दिन इस बात की कोई समस्या नहीं थी कि किसी की बैट्री की टैं बोल जायेंगी। सुबह 5 बजे मोबाइल के अलार्म बजते ही हम दोनों उठकर औरंगाबाद जाने की तैयारी करने लगे। नहा-धोकर पौने 6 बजे हमने कमरा छोड़ दिया था। कमरा लेते समय कमरे वाली ने हमसे 100 रुपये फ़ालतू जमा कराये थे इसलिये सुबह उनको चाबी देते समय अपने 100 रुपये लेना हम नहीं भूले। हम अभी मुख्य सड़क पर आकर बस अड़ड़े की ओर चल दिये। मुश्किल से आधे किमी ही गये होंगे कि एक बस हमारी ओर आती हुई दिखायी दी। हमने हाथ का इशारा कर बस को रुकवा लिया। इस बस से हम नाशिक पहुँच गये। नाशिक पहुँचकर हम औरंगाबाद जाने वाली बस में बैठ गये। नाशिक से औरंगाबाद लगभग 150 किमी दूर है इसलिये हम आराम से अपनी सीट पर पसरे हुए थे। बस बीच-बीचे में वहाँ के कई शहरों से होकर चलती रही। हम अपनी सीट पर पड़े-पड़े उन्हे देखते रहे।



गुरुवार, 7 मार्च 2013

Mana-Bheem Pul to Ghangaria (Base of Vally of flower) भारत के अंतिम गाँव माणा में भीम पुल से घांघरिया तक

बद्रीनाथ-फ़ूलों की घाटी-हेमकुन्ठ साहिब-केदारनाथ यात्रा-02

बद्रीनाथ मन्दिर के नजदीक कमरा लेने के बाद दर्शन करने के उपराँत हम भारत की सीमा का अंतिम गाँव माणा देखने के लिये निकल पड़े। होटल वाले से माणा के मार्ग की थोड़ी भी ले ली थी। उसने बताया था कि माणा यहाँ से केवल 3 किमी दूरी पर स्थित है। बाइक से जाने में वहाँ कोई समस्या नहीं है लेकिन बीच-बीच में कई झरने आते है जहाँ पर बिना भीगे वे नाले पार नहीं किये जा सकते है। हमने जूते पहने हुए थे पहले सोचा कि चलो बैग से चप्पल निकाल कर पहन ली जाये। लेकिन वहाँ की ठन्ड़ को देखते हुए यही फ़ैसला हुआ कि चलो देखा जायेगा अगर जरुरत पड़ी तो जूते निकाल कर नाला पार कर लिया जायेगा। तीन किमी के मार्ग में कुल चार नाले मिले थे जिनमे से दो नाले तो थोड़े से शरीफ़ निकले, जिन्होंने हमें बिना किसी परेशानी के आगे जाने दिया। आखिरी के दो नाले तो जबरदस्त थे जिन्हे पार करने से पहले बाइक रोककर यह तय किया गया था कि इन्हे पार कैसे करना है? मैंने अपने साथी को इन दोनों नालों पर बाइक से उतार दिया था। बाइक इन पर पार करते समय बेहद सावधानी से पार करनी पड़ती थी। जब मैं पहले नाले को पार कर रहा था तो अगले पहिया के आगे एक पत्थर आ गया, जिसके कारण पहिया हिलने से बाइक का संतुलन बिगड़ने से मुझे अपना एक पैर पानी में रखना पड़ गया था। यह सब इतनी  तेजी से हुआ था कि कब बाइक अटकी, कब पार हुई और कब जूते को पानी ने छु लिया, तेजी से बदलते घटनाक्रम ने बाइक यात्रा के रोमांच से हमें सरोबार कर दिया था। नाला पर करके पहले तो अपना पैर देखा कि कितना भीगा है जब लगा कि अरे बस इतना ही गीला हुआ, तो जान में जान आयी। जूता सिर्फ़ पंजे की ओर से भीगा था। इसके बास एक और नाला आया, यहाँ पर दुबारा से जूते गीले ना हो इस बात पर विचार किया गया। इसका सिर्फ़ एक ही समाधान निकला कि.......

यह माणा गाँव से आगे भीम पुल नाम की जगह है।

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