शुक्रवार, 7 जून 2013

Borra Caves, Araku Valley बोरा गुफ़ा, अरकू घाटी,

EAST COAST TO WEST COAST-10                                                                   SANDEEP PANWAR
अरकू घाटी का रेलवे स्टेशन देखने के बाद हम वहाँ से बोरा गुफ़ा देखने के लिये चल दिये। बोरा गुफ़ा विशाखापट्टनम से लगभग 90 किमी दूरी पर है अरकू यहाँ से 37 किमी दूरी पर पड़ता है जो रेल अरकू घाटी होकर जाती है वही रेल बोरा गुफ़ा के ठीक ऊपर होकर चलती है। सड़क मार्ग से यहाँ जाने पर मुख्य सड़क से कई किमी हटकर बोरा गुफ़ा के लिये जाना पड़ता है। हम अरकू पहाड़ी स्थल से वापसी में विशाखापट्टनम की ओर लौटते समय मस्ती से आ रहे थे। नारायण जी को कार का जीपीएस यंत्र चालू करने को कहा, जब नारायण जी ने कार का जीपीएस यंत्र चालू किया तो यंत्र के कुछ देर बाद ही अंतरिक्ष में सेटलाइट के जरिये हमारी ऊँचाई बतानी आरम्भ कर दी। जब हमने यंत्र आरम्भ किया था तो उस समय हमारी ऊँचाई हजार मीटर से भी काफ़ी ज्यादा थी। जैसे-जैसे हम विशाखापट्टनम की ओर बढ़ते जा रहे थे हमारी ऊँचाई लगातार घटती जा रही थी।





नारायण जी कार चलाने में व्यस्त थे जबकि मैं सफ़र का आनन्द उठा रहा था। नारायण जी यहाँ कई बार आ चुके है। जैसे ही हमने पहाड़ी भाग पीछे छोड़ा तो कार की गति में तेजी आनी स्वभाविक थी। अभी पहाड़ी भाग पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था फ़िर भी हल्के-फ़ुल्के पहाड़ यदा-कदा आते जा रहे थे। जैसे ही वह मोड़ आया जिसका नाम मुलियागुड़ा जंक्शन है। जहाँ से हमें बोरा गुफ़ा के लिये उल्टे हाथ मुड़ना था तो वहाँ नारायण जी ने एक स्थानीय बाशिन्दे से पता कर तसल्ली कर ली कि यही मोड़ बोरा गुफ़ा देखने के जाता है। इस मोड़ से बोरा गुफ़ा की दूरी मुश्किल से 5-6 किमी के आसपास रह जाती होगी। हमारी कार इस उस मोड़ से बोरा की ओर मुड़कर पहाड़ की उतराई-चढ़ाई करने लग गयी। इस सड़क पर चलते समय ज्यादा दूरी तय भी नहीं हुई थी कि सड़क के बीचों-बीच एक बेहद ही सुन्दर विशाल पेड़ खड़ा हुआ दिखा। इस पेड़ को देखकर मैं आश्चर्य से रह गया। इसका फ़ोटो लेने की इच्छा थी सोचा वापसी में ले लेंगे, लेकिन वापसी में भी लेना याद नहीं रहा।

बोरा गुफ़ा जब एक दो किमी दूर रह जाती है तो रेल की पटरी दिखायी देने लगती है। हमॆं सड़क पर बने रेलवे फ़ाटक को पार कर आने बढ़ना पड़ा। यहाँ पर जब हम पहुँचे तो मालगाड़ी आने की वजह से अटक बन्द था जिस कारण कुछ मिनटों का इन्तजार करना पड़ा था। आखिरकार मालगाड़ी निकल जाने के बाद गेटमैन से फ़ाट्क खोला, जिससे हमारी गाड़ी आगे बढ़ सकी। बोरा गुफ़ा से लगभग आधे किमी पहले ही सड़क पर एक बैरियर बनाया हुआ है जहाँ पर दर्शकों को अपने वाहन खड़े करके पैदल ही आगे बढ़ना होता है। आखिरकार हमें भी एक सुरक्षित स्थल देखकर अपनी कार वही खड़ी करनी पड़ी। कार खड़ी करने के बाद हमने अपने-अपने कैमरे सम्भाल लिये, और बोरा गुफ़ा की ओर पैदल ही चल दिये। नारायण जी ने बोरा गुफ़ा के दो टिकट लिये, यहाँ का टिकट काफ़ी मंहंगा था शायद 150/ प्रति पर्यटक का चार्ज लिया जाता है। टिकट लेने के बाद गुफ़ा की ओर बढ़ चले।

गुफ़ा के प्रवेश मार्ग पर हमारे टिकट जाँचे गये उसके बाद हम नीचे खाई की ओर उतरने लगे। यहाँ एक बोर्ड़ पर बोरा गुफ़ा के बारे में काफ़ी जानकारी दी गयी थी। उसका फ़ोटो लिया और आगे बढ़ गये। आगे जाते ही हमें नीचे गहरी खाई दिखाई दी, इस गहरी खाई में एक नदी जिसका नाम घोस्तानी है, बहती हुई दिख रही थी। नदी के किनारे तक पहुँचने का कोई मार्ग नहीं दिख रहा था। इसलिये ऊपर से ही नदी के फ़ोटो लेकर संतुष्ट हो जाना पड़ा। कुछ पल वही खड़े रहे, उसके बाद बोरा गुफ़ा की ओर रुख किया। बोरा गुफ़ा पहली नजर में बड़ी भयानक लगती है क्योंकि यहाँ जाने के लिये लगातार गहरी खाई में उतरना पड़ता है। ऊपर गुफ़ा के मुहाने पर खड़े होकर गुफ़ा के अन्दर झांकने से शरीर में एक अजीब सी झुरझुरी महसूस हो रही थी, अपनी शैतानी खोपड़ी में ख्याल आया कि अगर मेरे घुसते ही यह गुफ़ा ढ़ह गयी तो क्या होगा? लेकिन तभी ध्यान आया कि यह गुफ़ा तो लाखों वर्ष पुरानी है जब आज तक नहीं गिरी तो जाट के डर से कैसे ढ़ह जायेगी। गुफ़ा के मुहाने पर तीन नन्दी जैसी मूर्ती बनायी गयी है।

गुफ़ा में उतरने से पहले ऊपर से कई फ़ोटो लिये गये गये उसके बाद गुफ़ा में उतरते चले गये। गुफ़ा में उतरने के लिये पक्की व बड़ी सीढ़ियाँ बनायी गयी है जिस कारण दर्शकों को गुफ़ा में आने-जाने के लिये काफ़ी सुविधा हो जाती है। इस गुफ़ा के बीच में ऊपर आसमान की ओर एक विशाल सुराख बना हुआ है बताते है कि एक स्थानीय व्यक्ति की गाय/भैंस चराते समय इस सुराख से नीचे गुफ़ा में गिर गयी थी जिस कारण इस गुफ़ा का पहली बार आम लोगों को पता लगा। गुफ़ा में रोशनी करने के लिये बिजली से चलने वाले बल्ब लगाये गये है। गुफ़ा में बीच-बीच में कई स्थान पर लोहे व लकड़ी के जीने भी लगाये गये है। जिससे लोगों को आगे जाने में आसानी होती है। गुफ़ा की कुल लम्बाई लगभग तीन सौ मीटर के आसपास तो रही होगी। इस गुफ़ा में बीच में एक बोर्ड़ लगा हुआ है जिससे पता लगता है कि अरकू घाटी वाली रेलवे लाइन इस गुफ़ा के ठीक ऊपर से होकर चल रही है। आप भी देखिये बोरा गुफ़ा, तब मैं आगे की तैयारी करता हूँ क्योंकि आगे अभी इस यात्रा में नरसिंह भगवान वाला मन्दिर भी दिखाना बाकि उसके बाद श्री शैल के लिये प्रस्थान किया जायेगा। (क्रमश:) 
विशाखापटनम-श्रीशैल-नान्देड़-बोम्बे-माथेरान यात्रा के आंध्रप्रदेश इलाके की यात्रा के क्रमवार लिंक नीचे दिये गये है।
विशाखापटनम-श्रीशैल-नान्देड़-बोम्बे-माथेरान यात्रा के बोम्बे शहर की यात्रा के क्रमवार लिंक नीचे दिये गये है।





















गुफ़ा के बाहर का नजारा।


5 टिप्‍पणियां:

प्रवीण कुमार गुप्ता-PRAVEEN KUMAR GUPTA ने कहा…

गज़ब, विहंगम, आपने बिल्कुल एक नए स्थान के बारे में बताया. धन्यवाद...वन्देमातरम...

रविकर ने कहा…

बढ़िया है भाई जी-
आभार आपका-

Mohit Parashar ने कहा…

sandeep ji , namaskar , bahut achchhi post ki hai , anand aa gaya .

Mohit Parashar ने कहा…

very nice post , good jab sandeep bhai .

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सब फिर से याद आ रहा है।

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