बुधवार, 19 जून 2013

Maharashtrian Marriage rituals (preparation) महाराष्ट्रियन गाँव में शादी की तैयारियाँ

EAST COAST TO WEST COAST-15                                                                   SANDEEP PANWAR
रात को करीब आठ बजे जाकर कुरुन्दा गाँव में पहुँचना हो सका। वहाँ जाकर देखा कि अधिकतर लोग कल होने वाली शादी के कार्य की तैयारी में लगे पड़े थे। मेरे लिये यह पहला मौका था जब मैं किसी महाराष्ट्रियन शादी में शामिल होने जा रहा था अभी तक मैंने उत्तर भारतीय हिन्दी भाषी राज्यों की शादियाँ ही देखी थी। रात को कोई नौ बजे के आसपास बाबूराव (जिनके यहाँ शादी थी) की इकलौती व सबसे छोटी लड़की की कुछ रस्म करने के लिये पन्ड़ाल में लाया गया। इस प्रकार रस्म हमारे यहाँ घर की चार दीवारी के अन्दर ही समपन्न करायी जाती है। इस रस्म के तुरन्त बाद लड़की घर के अन्दर चली गयी। रात में मैंने बाबूराव से पता किया कि आपके तो छोटे लड़के की भी कल इसी पन्ड़ाल में ही शादी होने वाली है ना, लेकिन वो कही नजर नहीं आ रहा है। मेरी बात का जवाब मिला कि हमारे यहाँ लड़का शादी से पहली रात ससुराल में बिताता है जहाँ उसको हल्दी आदि लगाने की रस्म निभानी होती है। ऐसा गजब कैसे?


रात को पन्ड़ाल में ही सभी के लिये खाने का प्रबन्ध किया गया था। इसलिये पन्ड़ाल के नीचे धरातल पर बैठकर पत्तल पर भोजन का स्वाद चखा गया था। यहाँ इस गाँव में चूंकि मैं कई बार आ चुका हूँ इसलिये गाँव के बहुत सारे व्यक्ति मुझे जानते-पहचानते है। इनमें बाबूराव के यहाँ तो मैं शादी में शरीक होने के लिये आया हुआ ही था इसके अलावा कैलाश देशमुख (जो मुझे स्टेशन से गाँव तक बाइक पर लाध कर लाया था) के परिवार से मिलकर भी ऐसा लगता है कि जैसे छोटे भाई के परिवार से मिलने आया हूँ। इस परिवार में सबसे अच्छी बात यह है कि परिवार के सभी सदस्य सुगमता से हिन्दी बोलते व समझते है। इन दोनों के अलावा एक दोस्त और है जिसे आप सब भली भाँति जानते है वह है संतोष तिड़के। संतोष के साथ मैंने कई यात्रा की हुई है जैसे लेह वाली बाइक यात्रा व मणिमहेश वाली यात्रा। इनके परिवार में संतोष के अलावा हिन्दी बोलने व समझने में संतोष की लड़कियाँ ही समझदार है जबकि संतोष की घरवाली सन 2009 तक ठीक-ठाक हिन्दी बोलती थी अब पता नहीं क्या हुआ कि हिन्दी की टाँग भी नहीं तोड़ पाती है।

रात को सोने की बात आयी तो मैंने कहा कि मैं तो शादी के पन्ड़ाल में ही सोना चाहता हूँ। पता नहीं किसी ने मेरी बात सुनकर कहा था कि शादी के पन्ड़ाल में शादी शुदा नहीं सोते है मैंने कहा ठीक है मुझे कुवारा मान लो। घरवाली तो यहाँ से 1500 किमी से भी ज्यादा दूर बैठी है। खैर हँसी मजाक का एक लम्बा दौर चलने के उपराँत रात को एक बजे के करीब सोने के इरादे से मैंने दहेज में दिये या लिये जाने वाले बैड़ पर टाँगे फ़ैला दी। मुझे लेटता देख उन्होंने समझ लिया कि दिल्ली वाले को नीन्द आ रही है इसलिये इन्हे इनके हाल पर छोड़ देना चाहिए। वहाँ एक बन्दा यह जानने के बाद कि दिल्ली वाला बहुत बड़ा घुमक्कड़ है मेरी यात्राओं के बारे में पूछने बैठ गया था। उसे संक्षेप में अपनी यात्राओं की झलक दिखायी और कहा कि अगर सभी यात्राओं को जानने की इच्छा है तो पूरा दिन का समय चाहिए, दो-चार घन्टे से क्या खाक जानकारी मिलेगी? वहाँ फ़रवरी माह में भी ठन्ड़ नहीं सता रही थी। इसलिये रात में खुले टैन्ट में मजे की नीन्द आयी। खुले में सोने का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि सुबह उठते समय शरीर में आलस बिल्कुल भी नहीं होता है।

सुबह रोशनी होते ही अपुन की उठने की आदत है। कुछ लोग होते है जो धूप से पिछवाड़ा गर्म होने से पहले नहीं उठ पाते है। सुबह उठने के बाद दैनिक क्रियाकलापों से निपटने के उपराँत पता लगा कि शादी का कार्यक्रम दोपहर के समय का है इसलिये मेरे पास कम से कम तीन घन्टे का समय एकदम खाली था इसलिये सोचा कि चलो आसपास घूम आया जाये। मैंने यह बात पास बैठे बाबूराव को बतायी तो उन्होंने कहा मेरे लड़के की ससुराल यहाँ से केवल चार किमी दूरी पर ही है तुम वहाँ घूम आओ, लगे हाथ टोकाई माता के पहाड़ी वाले मन्दिर पर होकर आना। यह बात अति उत्तम लगी। बाबूराव जी ने अपने पडौसी को बाइक देकर मेरे साथ भेज दिया। पहले तो हम सीधे टोकाई माता के मन्दिर के लिये चल दिये, बाबूराव के लड़के की ससुराल भी इसी मार्ग पर आती है उसके लिये मन्दिर से आधा किमी पहले सीधे हाथ जाने वाले मार्ग पर एक किमी जाना पड़ता है। कई किमी चलने के बाद यह मन्दिर आता है, कुरुन्दा से एक शार्टकट मार्ग नान्देड़ के लिये निकलता है यह मन्दिर उसी मार्ग पर है।

टोकाई माता के मन्दिर तक पहुँचने से पहले मन्दिर कई किमी दूर से ही दिखना आरम्भ हो जाता है। मन्दिर वाली पहाड़ी तक पहुँचने के लिये पहाड़ी के दूसरी ओर जाकर बनी हुई पक्की सड़क पर अपनी बाइक धीरे-धीरे चढ़ रही थी। बाइक मैं ही रहा था, बाइक का मालिक मेरे साथ पीछे ही बैठा हुआ था इसलिये बाइक सड़क में पड़े हुए खड़ड़ो में थोड़ी सावधानी से निकालनी पड़ रही थी। लगभग आधा किमी की चढ़ाई के उपराँत मन्दिर के सामने जा पहुँचे। मन्दिर के सामने ही बाइक खड़ी करके मन्दिर के दर्शन करने चल दिये। इस क्षेत्र में आसपास के जितने भी गाँव है बताते है कि उनकी टोकाई मन्दिर में बहुत आस्था है। मेरी नजर में आस्था मतलब अंधविश्वास है। भगवान तो हर स्थान पर मौजूद है इसलिये किसी खास स्थान के बारे में ज्यादा महत्व देना अंधविश्वास को बढ़ावा देता है। वैसे मन्दिर बहुत ज्यादा बड़ा तो नहीं है मात्र एक कमरे में सिमटा हुआ मन्दिर है। इस मन्दिर में संतोष तिड़के की दुकान का प्रचार करता हुआ एक बड़ी सी तस्वीर वाला पोस्टर भी दिखायी दिया था। संतोष ने अपने पोस्टर के बारे में मुझसे मालूम भी किया था।

टोकाई मन्दिर देखने के बाद आसपास के नजारे देखने लगे। मन्दिर ऊँचाई पर एक पहाड़ी की चोटी पर बना हुआ है इसलिये आसपास दूर-दूर तक खेत ही खेत व गाँव दिखाई पड़ रहे थे। जिस कैमरे से मैंने यह फ़ोटो लिये थे वह संतोष का कैमरा था जो उस समय मेरे पास ही था। कैमरे से सड़क पर गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहे स्थान के दो फ़ोटो लिये गये जिसमें एक साधारण फ़ोटो है दूसरा जूम कर लिया गया फ़ोटो है। फ़ोटो लेने के बाद हमारी मंजिल बाबूराव के लड़के की ससुराल थी इसलिये मैंने बाइक उस मार्ग दौड़ा दी जिससे हम यहां तक आये थे। थोड़ा वापिस आते ही हमें उल्टे हाथ मुड़ना पड़ा। यहाँ से लड़के की ससुराल भी जल्द ही आ गयी। जैसे ही हमने बाइक लड़की के घर के सामने रोकी तो पता लगा कि लड़का व लड़की गाँव के मन्दिर में गये हुए है वहाँ से सीधे कुरुन्दा के शादी समारोह पन्ड़ाल में पहुँचेंगे। (क्रमश:)

विशाखापटनम-श्रीशैल-नान्देड़-बोम्बे-माथेरान यात्रा के आंध्रप्रदेश इलाके की यात्रा के क्रमवार लिंक नीचे दिये गये है।
15. महाराष्ट्र के एक गाँव में शादी की तैयारियाँ।
16. महाराष्ट्र की ग्रामीण शादी का आँखों देखा वर्णन।
17. महाराष्ट्र के एक गाँव के खेत-खलिहान की यात्रा।
18. महाराष्ट्र के गाँव में संतरे के बाग की यात्रा।
19. नान्देड़ का श्रीसचखन्ड़ गुरुद्धारा
20. नान्देड़ से बोम्बे/नेरल तक की रेल यात्रा।
21. नेरल से माथेरान तक छोटी रेल (जिसे टॉय ट्रेन भी कहते है) की यात्रा।
22. माथेरान का खन्ड़ाला व एलेक्जेन्ड़र पॉइन्ट।
23. माथेरान की खतरनाक वन ट्री हिल पहाड़ी पर चढ़ने का रोमांच।
24. माथेरान का पिसरनाथ मन्दिर व सेरलेक झील।
25. माथेरान का इको पॉइन्ट व वापसी यात्रा।
26. माथेरान से बोम्बे वाया वसई रोड़ मुम्बई लोकल की भीड़भरी यात्रा।
विशाखापटनम-श्रीशैल-नान्देड़-बोम्बे-माथेरान यात्रा के बोम्बे शहर की यात्रा के क्रमवार लिंक नीचे दिये गये है।
27. सिद्धी विनायक मन्दिर व हाजी अली की कब्र/दरगाह
28. महालक्ष्मी मन्दिर व धकलेश्वर मन्दिर, पाताली हनुमान।
29. मुम्बई का बाबुलनाथ मन्दिर
30. मुम्बई का सुन्दरतम हैंगिग गार्ड़न जिसे फ़िरोजशाह पार्क भी कहते है।
31. कमला नेहरु पार्क व बोम्बे की बस सेवा बेस्ट की सवारी
32. गिरगाँव चौपाटी, मरीन ड्राइव व नरीमन पॉइन्ट बीच
33. बोम्बे का महल जैसा रेलवे का छत्रपति शिवाजी टर्मिनल
34. बोम्बे का गेटवे ऑफ़ इन्डिया व ताज होटल।
35. मुम्बई लोकल ट्रेन की पूरी जानकारी सहित यात्रा।
36. बोम्बे से दिल्ली तक की यात्रा का वर्णन





निर्माणाधीन हनुमान मन्दिर

इमली का सैकड़ो साल पुराना पेड़













2 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

वाह, नयी व्यवस्थाओं का अवलोकन।

प्रवीण कुमार गुप्ता-PRAVEEN KUMAR GUPTA ने कहा…

बड़ी बड़ी रोटिया, मेरे ख्याल से एक ही रोटी से आदमी का पेट भर जाता होगा...जय जय महाराष्ट्र

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