बुधवार, 19 जून 2013

Marriage Ceremony in Maharashtrian Village महाराष्ट्र में ग्रामीण शादी समारोह का चित्रमय विवरण

EAST COAST TO WEST COAST-16                                                                   SANDEEP PANWAR
लड़की के घर पर हमें कुछ काम-धाम तो था नहीं इसलिये हम सीधे गाँव के मन्दिर पहुँचे वहाँ से दुल्हा और दुल्हन की गाड़ी के साथ-साथ बाइक चलाते हुए कुरुन्दा पहुँच गये। कुरुन्दा में शादी के लिये स्थानीय लोगों की भीड़ उमड़ना आरम्भ हो चुकी थी। यहाँ पन्ड़ाल में औरतों यानि महिलाओं के बैठने के लिये अलग स्थान बनाया गया था। जबकि पुरुषों के बैठने के लिये अलग स्थान बनाया गया था। मैं सोच रहा था कि हमारी तरह यहाँ भी शादी में सीमित संख्या में ही आमंत्रित लोग आते होंगे, लेकिन मेरा यह भ्रम उस समय चकनाचूर हो गया जब वहाँ मौजूद लोगों की संख्या हजार से भी ज्यादा हो गयी। शादी में इतने सारे स्त्री-पुरुष एक साथ महसूस होता है कि गाँव की संस्कृति में आज भी अपनापन बना हुआ है।



दिन की शादी थी इसलिये दोपहर बाद का समय होते ही स्टेज पर दुल्हा-दुल्हन को लाने का क्रम आरम्भ हुआ। चूंकि यहाँ दो जोडों की शादी एक साथ हो रही थी इसलिये स्टेज पर चार कुर्सी लगायी गयी थी। यहाँ होने वाली शादी में सबसे बड़ी खास बात यह थी कि दोनों लड़कियाँ अपनी बुआ के यहाँ बहू बनकर जा रही थी। सगे मामा की लड़की की शादी सगी बुआ के लड़के साथ हमारे यहाँ उत्तर भारत में नहीं होती है इसलिये मुझे इस रिश्ते पर थोड़ा सा अचम्भा सा हुआ था लेकिन हमारा भारत इतना विशाल है है कि यहाँ हर 200-300 किमी बाद बोलचाल के साथ-साथ रीति-रिवाज व त्यौहार भी बदलने लगते है। देखा जाये तो यह एक हद तक सही भी है क्योंकि जिस प्रकार दूर के रिश्ते के चक्कर में आजकल दहेज मारपीट के सच्चे झूठे केस अदालत भी बढ़ते जा रहे है। उसे देखते हुए मुझे नजदीकी रितेदारी में शादी एक अति उत्तम उपाय लगा है।

इसी प्रकार के रिश्ते मुस्लिम समाज में भी होते है वहाँ बात कुछ ज्यादा ही गहरी हो जाती है क्योंकि मुस्लिम लोग तो सिर्फ़ सगी बहन को ही शादी के लिये छोड़ते है बाकि अन्य प्रकार की महिला के लिये उनके यहाँ हरी झन्ड़ी रहती है। सगे भाईयों की औलादे भी आपस में शादी करती है, एक तरह से यह घर की अमानत घर में ही रह जाती है। बाहर कैसा रिश्ता मिलेगा? इसका ड़र भी समाप्त हो जाता है। लेकिन बताते है कि वैज्ञानिक कारणों से ज्यादा नजदीकी सम्बन्ध बीमारी की उत्पत्ति का कारण बनते है यदि ऐसा होता तो मुस्लिम समाज तो कभी का बीमार होकर खत्म हो गया होता। खैर किसी के रीति रिवाज का मुझे क्या लेना देना, मुझे शादी का लुत्फ़ लेने दो।

शादी में स्टेज पर दूल्हे-दुल्हन के बैठने के कुछ देर बाद उन्हे उपहार देन का दौर आरम्भ हुआ। मुझे इस बात की जानकारी नहीं थी कि मराठे लोग शादी में लड़की को साड़ी-कपड़े की जगह डिब्बे में बन्द उपहार देते है। मैं तो लड़की की शादी के एक साड़ी लाया था जिसे मैंने शादी से अगले दिन लड़की की माँ को देते हुए कहा था कि हमारे यहाँ का यह रिवाज है। लड़के को हमारे यहाँ कुछ नहीं देते है बल्कि आने वाली नई नवेली बहु को मुँह दिखायी की रस्म के नाम पर नगद भेंट दी जाती है। इस मामले में भी औरते ही नव वधु को मुँह दिखायी दे सकती है। जब स्टेज पर उपहार का दौर थमता दिखायी दिया तो करीबी लोगों ने फ़ोटो खिचवाने का दौर चला दिया। आखिरकार जाट देवता को भी फ़ोटो खिचवाने के लिये पुकारा गया। मैंने भी नव युगलों के साथ एक फ़ोटो खिंचवा ही लिया।

जब यह सब हो रहा था तो पन्ड़ाल में एक पण्डित जी (पुरोहित) शादी की विधि सम्पूर्ण कराने में जूटे हुए थे जो कि माईक पर बैठकर मन्त्रों का उच्चारण कर रहे थे। मेरे साथ मराठी भाषा का लोचा है कि यह मेरे ज्यादा पल्ले नहीं पड़ती है इसलिये जब पुरोहित मन्त्र पर मन्त्र दोहरा रहे थे तो वहा‘ मौजूद लोग तसले में बाँटने वाले बन्दे से लिये गये अनाज के दाने को नव युगलों की ओर उछाल कर आशीर्वाद रुपी भाव पहुँचा रहे थे। हमने भी अन्य सबकी देखादाखी अनाज के दाने नवयुगलों की ओर हवा में उछाले थे लेकिन अनाज उछालते समय थोड़ी गड़बड़ हो रही थी कि भाषा के कारण मुझे पता नहीं चल पाता था कि कब दाने हवा में उछालने है इसलिये जब लोग दाने फ़ैंकते तो उन्हे देख कर ही मैं भी दाने हवा में फ़ैकता था। इस कारण मैं सबसे बाद में दाने हवा में उछाल रहा था। मुझे देख तिड़के मेरे पास आया और बोला कि मैं बताऊँगा कब दाने हवा में उछालने है?

जब शादी का स्टेज वाला कार्यक्रम निपट गया तो वहाँ मौजूद हजार से भी ज्यादा लोग अचानक अपने स्थान पर खड़े हो गये। लोगों ने खड़े होने के साथ ही लाईनों में बैठना आरम्भ कर दिया। जब तक कुछ समझ आता तब तक वहाँ पर शादी वाले घर में मौजूद लोग कागज की पत्तल, पानी का गिलास, पराँठे, सब्जी, नमकीन, आदि लेकर लाईन में बैठे लोगों को परोसने के लिये चल दिये। उन्हे इस प्रकार करता देख अपुन कौन सा पीछे रहने वाले थे। अभी तक तिड़के का कैमरा मेरे पास ही था इसलिये पहले तो मैंने भोजन कार्यक्रम के कुछ फ़ोटो लिये, उसके बाद भोजन परोसने के कार्यक्रम में जी जान से जुट गया। यहाँ मराठे लोग हमारी तरह छोटी रोटियाँ नहीं बनाते है बल्कि बड़ी-बड़ी दो-दो फ़ुट व्यास वाली रोटियाँ बनाते है, परोसते समय इन विशाल रोटियों को काटकर परोसा जाता है। जमीन पर बैठकर भोजन कराने की परम्परा धीरे-धीरे समापन की ओर है। उत्तर भारत में शादी ब्याह जैसे अवसर पर तो यह परम्परा बिल्कुल समाप्त हो चुकी है। अब तो मेज पर भोजन रख दिया जाता है जिसे जितना खाना हो खाओ, जितना बर्बाद करना हो उतना प्लेट में छोड़ आओ। धरातल पर बैठार भोजन करने की प्राचीन विरासत अब सिर्फ़ नाममात्र के लिये ही बची हुई है जो कि किसी विशेष अवसर पर ही दिखायी देती है।

जब अधिकतर लोग खाना खा चुके तो मैंने भोजन परोसने वाले दल से अपने आपको अलग किया और भोजन चट करने वाली पंक्ति में जाकर बैठ गया। सुबह से थोड़ा बहुत कुछ खाया था इसलिये जोर की भूख लगी थी। यहाँ के खाने में सब्जी व काटी गयी रोटी व गुलदाने (मीठे के रुप में) तक तो बात समझ आती थी लेकिन भोजन में नमकीन परोसना कुछ पल्ले नहीं पड़ रहा था। मेरे साथ भोजन के मामले में सबसे बड़ी गड़बड़ यह है कि दाल रोटी तो मैं आसानी से खा लेता हूँ लेकिन चावल खाने के लिये बिना चम्मच बड़ी भारी परॆशानी मानता हूँ। यही झमेला मेरे साथ यहाँ भी हो गया, बिहारियों वाली स्टाईल में चावल खाने मेरे बस की बात नहीं है कि पूरे हाथ की पाँचों अंगुलियों को उसमें पूरी तरह डुबो दिया जाये और मुट्ठी भर-भर के चावल मुँह में ठूँसा जाये। जब मैं खाना छोड़क बैठ गया तो एक संतोष ने पूछा क्या हुआ? मैंने कहा मैं चावल छोड़ दूँगा नहीं तो मेरे लिये एक चम्मच मँगाओ। खैर दिल्ली वाले दोस्त की यह छोटी सी फ़रमाईश पूरी करने में ज्यादा देर नहीं लगी, चम्मच आने के बाद मैंने अपनी पत्तल में रखे हुए चावलों को उनकी मंजिल पर पहुँचाकर सुकून पाया। भोजन को झूठा व फ़ालतू छोड़ना भोजना का सबसे बड़ा अपमान है।

भोजन का दौर पूरा होने में तीन घन्टे लग गये, महिलाएँ भी अपनी जगह पर भोजन करने में जी जान से जुटी हुई थी। मेरी आदत है कि मैं साधारणत: शादियों में बहुत ही कम ही जाता हूँ खासकर लड़कों की शादी बोले तो बारात में जाना मेरे उसूलों के सख्त खिलाफ़ है। बारात में धक्के खाने से बेहतर है अपने घर पर सूखी रोटियाँ खा लो। लड़कियों की शादी में जाना भी कन्यादान देने की मजबूरी होती है अन्यथा मेरा बस चलता है यो मैं किसी अन्य के हाथों कन्यादान भिजवाकर जय राम जी की बोल लेता हूँ। भोजन के दौर के बाद फ़ेरे वाली रस्म की बारी आने ही वाली थी कि बारिश के देवता पता नही किस बात पर नाराज हो बैठे कि उन्होंने आसमान से बूंदों की हल्की-हल्की बौछार आरम्भ कर दी। बारिश बरसते देख कर परिवार वालों व पुरोहित जी ने कपास के धागे के फ़ेरे जैसे बन्धन में नवयुगलों को बान्धना आरम्भ कर दिया। यह परम्परा भी हमारे यहाँ नहीं है हमारे यहाँ तो लड़का-लड़की दोनों पक्ष वाले लोग व उनके सम्बंधी बिना सात फ़ेरे कराये विवाह मानने को तैयार ही नहीं होते है।

ऐसे ही एक शादी में जब पुरोहित ने मात्र तीन फ़ेरों के बाद यह कह दिया कि विवाह पूर्ण हुआ तो वहाँ मौजूद लोग बोल उठे कि सात फ़ेरो बिना शादी हुई ही कहाँ है। पुरोहित भी लगता था कोई जाट खोपड़ी था तुरन्त बोला अगर यह शादी चलनी होगी तो तीन फ़ेरों पर ही चल जायेगी नहीं तो इक्कीस फ़ेरे लगवा लो नहीं चलनी होगी तो कितना भी जोर लगा लियो नहीं चलेगी। सब रस्म पूर्ण होने के बाद आखिरी रस्म लड़की विदा करने की होती है। बाबूराव की लड़की यहाँ से 25 किमी दूर किसी गाँव में जा रही थी इसलिये उन्हे दिन रहते विदा करना था जबकि लड़के की बहू तो सुबह ही अपने घर से विदा हो आयी थी। विदायी के समय जैसे फ़िल्मों में दिखाते है ठीक उसी तरह सजी-धजी गाड़ी लड़की को विदा कराने को तैयार खड़ी थी। परिवार व गाँव की महिलाएँ लड़की को विदा करने गाड़ी तक आयी थी। जब लड़की विदा होकर अपनी ससुराल चली गयी तो सब अपने-अपने घरों को लौटने लगे। मुझे अभी कल का दिन वही रहना था। आज की शाम भी मैं खाली था इसलिये आज शाम को बाबूराव जी के खेतों का बाइक से एक चक्कर लगाने का इरादा कर लिया। (क्रमश:)
विशाखापटनम-श्रीशैल-नान्देड़-बोम्बे-माथेरान यात्रा के आंध्रप्रदेश इलाके की यात्रा के क्रमवार लिंक नीचे दिये गये है।
15. महाराष्ट्र के एक गाँव में शादी की तैयारियाँ।
16. महाराष्ट्र की ग्रामीण शादी का आँखों देखा वर्णन।
17. महाराष्ट्र के एक गाँव के खेत-खलिहान की यात्रा।
18. महाराष्ट्र के गाँव में संतरे के बाग की यात्रा।
19. नान्देड़ का श्रीसचखन्ड़ गुरुद्धारा
20. नान्देड़ से बोम्बे/नेरल तक की रेल यात्रा।
21. नेरल से माथेरान तक छोटी रेल (जिसे टॉय ट्रेन भी कहते है) की यात्रा।
22. माथेरान का खन्ड़ाला व एलेक्जेन्ड़र पॉइन्ट।
23. माथेरान की खतरनाक वन ट्री हिल पहाड़ी पर चढ़ने का रोमांच।
24. माथेरान का पिसरनाथ मन्दिर व सेरलेक झील।
25. माथेरान का इको पॉइन्ट व वापसी यात्रा।
26. माथेरान से बोम्बे वाया वसई रोड़ मुम्बई लोकल की भीड़भरी यात्रा।
विशाखापटनम-श्रीशैल-नान्देड़-बोम्बे-माथेरान यात्रा के बोम्बे शहर की यात्रा के क्रमवार लिंक नीचे दिये गये है।
27. सिद्धी विनायक मन्दिर व हाजी अली की कब्र/दरगाह
28. महालक्ष्मी मन्दिर व धकलेश्वर मन्दिर, पाताली हनुमान।
29. मुम्बई का बाबुलनाथ मन्दिर
30. मुम्बई का सुन्दरतम हैंगिग गार्ड़न जिसे फ़िरोजशाह पार्क भी कहते है।
31. कमला नेहरु पार्क व बोम्बे की बस सेवा बेस्ट की सवारी
32. गिरगाँव चौपाटी, मरीन ड्राइव व नरीमन पॉइन्ट बीच
33. बोम्बे का महल जैसा रेलवे का छत्रपति शिवाजी टर्मिनल
34. बोम्बे का गेटवे ऑफ़ इन्डिया व ताज होटल।
35. मुम्बई लोकल ट्रेन की पूरी जानकारी सहित यात्रा।
36. बोम्बे से दिल्ली तक की यात्रा का वर्णन

















संतोष व कैलाश की नन्ही मुन्नियाँ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. संदीप जी, वाह महाराष्ट्रियन शादी देख कर मन खुश हो गया..मामा - बुआ के बच्चों के बीच शादी ये महाराष्ट्र में होता होंगा, अपने इधर तो ये सब संभव ही नहीं हैं. उत्तर भारत के हिन्दुओ में तो रक्त सम्बन्ध, और एक ही गोत्र में शादी हो ही नहीं सकती हैं. आन्ध्र प्रदेश में तो रेड्डी बिरादरी में सगे मामा कि शादी सगी भांजी से होती हैं...अजब गजब है हमारे हिन्दुस्तान में ये परम्पराए....वन्देमातरम...

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  2. अच्छा वृत्तांत लगा, ऐसे कार्यक्रम में भाग लेने से हमें एक दूसरे की संस्कृति को जानने का अवसर मिलता है।

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