भीमाशंकर-नाशिक-औरंगाबाद यात्रा-02
जैसे ही हमने सड़क छोड़कर सीढ़ी घाट की ओर जाने के लिये चावल के खेतों में बनी हुई पगड़न्ड़ी पर चलना शुरु किया तो वहाँ पर खेत की मेंढ (ड़ोल) में बड़े-बड़े सुराख दिखायी दे रहे थे। हमने अंदाजा लगाया कि यह सुराख चूहों के बिल ही होंगे, लेकिन उनमें से एक आध-सुराख साँप के बिल का भी तो हो सकता था। मैं पहले ही चप्पल में चल रहा था, इसलिये साँप का विचार मन में आते ही सोचा कि क्यों ना जूते पहन लिये जाये। क्या पता कहाँ साँप टकरा जाये, लेकिन इस ट्रेक में बार-बार मिलने वाले झरने व नदियों के पानी में भीगने की आशंका के कारण मैंने सोच लिया था कि जहाँ तक हो सकेगा मैं यह यात्रा चप्पल में ही करुँगा। थोड़ा सा आगे चलते ही खेतों के बीच एक कुँआ मिला। यह पहला ऐसा कुँआ मिला जो ऊपर तक लबालब भरा हुआ था। ऊपर तक भरने का एक ही कारण था कि यह नदी किनारे बना हुआ था। यहाँ पर दो स्थानीय महिला अपने वस्त्रों से उनका मैल अलग करने की मेहनत में लगी हुई थी।
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यह कुआ और पीछे वो गाँव व उसकी पगड़न्ड़ी जहाँ से होकर हम यहाँ तक आये है। |
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मस्त पगड़न्ड़ी। |
हमने कपड़े धोने वाली महिलाओं से भी एक बार मालूम कर ही लिया था कि सीढ़ी घाट वाला मार्ग यही है या कोई दूसरा? उनकी हाँ होते ही हम आगे चल पड़े। हमें खंड़स में एक युवक मिला था उसने कहा कि यदि आपको गाईड़ चाहिए तो मैं आपके लिये गाईड़ का काम करुँगा। विशाल ने खंड़स में रुककर एक कप चाय पी थी तभी वह युवक हमारे पास आया था। विशाल ने बताया था कि जब मैं पहली बार यहाँ आया था तो मैंने खंड़स से एक आदमी को गाईड़ के रुप में साथ ले लिया था। लेकिन वो आदमी गणेश घाट से कुछ आगे जाकर दूर से यह बताकर कि बस अब भीमाशंकर आने वाला है, अपने पैसे लेकर भाग आया था जबकि भीमाशंकर वहाँ से कई किमी दूर है। कपड़े धोने वाली महिलाओं से कुछ आगे जाने पर हमें Y आकार में दो पगड़न्ड़ी दिखाई दी। यहाँ एक बार परेशानी में पड़ गये कि किधर जाये। फ़िर सोचा कि चलो पहले सीधे हाथ वाले मार्ग पर चलकर देखते है। हम उस मार्ग पर लगभग 200-300 मीटर तक चले गये, लेकिन आगे जाकर यह मार्ग समाप्त हो गया तो हमें मजबूरन वापिस उसी जगह आना पड़ा जहाँ से यह मार्ग Y आकार में हुआ था।
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तु छुपा है कहाँ, जरा बाहर तो आ। |