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गुरुवार, 28 मार्च 2013

Shidi Ghat Danger Trekking सीढ़ी घाट की खतरनाक चढ़ाई

भीमाशंकर-नाशिक-औरंगाबाद यात्रा-03
जब हम सीढ़ियों के बेहद करीब आये तो वहाँ की हालत देखकर एक बार तो आँखे फ़टी की फ़टी रह गयी। मन में सोचा कि यार जान ज्यादा कीमती है या यह खतरनाक मार्ग पार करना ज्यादा अहमितय रखता है। विशाल ने एक बार फ़िर कहा संदीप भाई चप्पल की जगह जूते पहन लो अब मार्ग ज्यादा डेंजर लग रहा है। मैं अब तक दो बार विशाल को जूते में परॆशान होते हुए देखा था इसलिये मैंने जूते पहनने का विचार त्याग दिया था। एक कहावत तो सबने सुनी ही होगी कि जब सिर ओखली में रख दिया तो फ़िर मुसल की मार से कैसा ड़रना? अगर ऐसी खतरनाक चढ़ाई से ड़र गये तो फ़िर आम और खास में फ़र्क कैसे पता लगेगा। शायद विशाल ने एक बार बोला भी था कि संदीप भाई यहाँ से वापिस चलते है। गणेस घाट से चले जायेंगे। मैंने कहा ठीक है वापसी जरुर चलेंगे पहले थोड़ा सा आगे जाकर देखते है यदि आगे इससे भी ज्यादा खतरनाक मार्ग मिला तो वापिस लौट आयेंगे। इतना कहकर मैं सीढ़ियों पर चढ़ने लगा। जैसे-जैसे मैं कदम रखता जाता वैसे ही सीढ़ी हिलती जा रही थी। ध्यान से देखा तो पाया कि सीढ़ी रस्सी के सहारे पहाड़ पर बाँधी हुई है।

यहाँ से सीढ़ी घाट की पहली नजदीकी झलक मिलती है।

अब तो चढ़ना ही पडेगा।

बुधवार, 27 मार्च 2013

Shidi Ghat Trek to Bhimashankar Jyotirlinga सीढ़ी घाट से भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की खतरनाक ट्रेकिंग

भीमाशंकर-नाशिक-औरंगाबाद यात्रा-02
जैसे ही हमने सड़क छोड़कर सीढ़ी घाट की ओर जाने के लिये चावल के खेतों में बनी हुई पगड़न्ड़ी पर चलना शुरु किया तो वहाँ पर खेत की मेंढ (ड़ोल) में बड़े-बड़े सुराख दिखायी दे रहे थे। हमने अंदाजा लगाया कि यह सुराख चूहों के बिल ही होंगे, लेकिन उनमें से एक आध-सुराख साँप के बिल का भी तो हो सकता था। मैं पहले ही चप्पल में चल रहा था, इसलिये साँप का विचार मन में आते ही सोचा कि क्यों ना जूते पहन लिये जाये। क्या पता कहाँ साँप टकरा जाये, लेकिन इस ट्रेक में बार-बार मिलने वाले झरने व नदियों के पानी में भीगने की आशंका के कारण मैंने सोच लिया था कि जहाँ तक हो सकेगा मैं यह यात्रा चप्पल में ही करुँगा। थोड़ा सा आगे चलते ही खेतों के बीच एक कुँआ मिला। यह पहला ऐसा कुँआ मिला जो ऊपर तक लबालब भरा हुआ था। ऊपर तक भरने का एक ही कारण था कि यह नदी किनारे बना हुआ था। यहाँ पर दो स्थानीय महिला अपने वस्त्रों से उनका मैल अलग करने की मेहनत में लगी हुई थी।

यह कुआ और पीछे वो गाँव व उसकी पगड़न्ड़ी जहाँ से होकर हम यहाँ तक आये है।

मस्त पगड़न्ड़ी।
हमने कपड़े धोने वाली महिलाओं से भी एक बार मालूम कर ही लिया था कि सीढ़ी घाट वाला मार्ग यही है या कोई दूसरा? उनकी हाँ होते ही हम आगे चल पड़े। हमें खंड़स में एक युवक मिला था उसने कहा कि यदि आपको गाईड़ चाहिए तो मैं आपके लिये गाईड़ का काम करुँगा। विशाल ने खंड़स में रुककर एक कप चाय पी थी तभी वह युवक हमारे पास आया था। विशाल ने बताया था कि जब मैं पहली बार यहाँ आया था तो मैंने खंड़स से एक आदमी को गाईड़ के रुप में साथ ले लिया था। लेकिन वो आदमी गणेश घाट से कुछ आगे जाकर दूर से यह बताकर कि बस अब भीमाशंकर आने वाला है, अपने पैसे लेकर भाग आया था जबकि भीमाशंकर वहाँ से कई किमी दूर है। कपड़े धोने वाली महिलाओं से कुछ आगे जाने पर हमें Y आकार में दो पगड़न्ड़ी दिखाई दी। यहाँ एक बार परेशानी में पड़ गये कि किधर जाये। फ़िर सोचा कि चलो पहले सीधे हाथ वाले मार्ग पर चलकर देखते है। हम उस मार्ग पर लगभग 200-300 मीटर तक चले गये, लेकिन आगे जाकर यह मार्ग समाप्त हो गया तो हमें मजबूरन वापिस उसी जगह आना पड़ा जहाँ से यह मार्ग Y आकार में हुआ था।

तु छुपा है कहाँ, जरा बाहर तो आ।

मंगलवार, 26 मार्च 2013

Delhi-Bombay(Dadar)-Narel-Khandas दिल्ली-दादर-नेरल-खंड़स तक।

महाराष्ट्र के भीमाशंकर-नाशिक-औरंगाबाद की यात्रा-01                                            SANDEEP PANWAR


बीते साल 2012 में जुलाई माह की बात है मुम्बई में रहने वाला दोस्त विशाल राठौर कई बार भीमाशंकर ट्रेकिंग की बात करता रहता था। पहले तो मन में वहाँ जाने का विचार ही नहीं बन रहा था लेकिन विशाल के बार-बार बुलाने के कारण मैंने रेल से बोम्बे जाने के लिये गोल्ड़न टेम्पल मेल से अपना टिकट बुक कर ही दिया था। दिल्ली से बोम्बे तक पहुँचने में कोई खास घटना नहीं घटी थी इसलिये उसका कोई विवरण नहीं दे रहा हूँ। यह ट्रेन सुबह 5 बजे दादर रेलवे स्टेशन पहुँच जाती है। यहाँ पर जैसे ही ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर रुकी तो विशाल अपने कोच के ठीक सामने खड़ा दिखायी दिया। पहले तो गले मिलकर एक दूसरे का स्वागत किया गया। इसके तुरन्त बाद हम दोनों वहाँ से बम्बई लोकल ट्रेन में बैठने के लिये फ़ुटओवर ब्रिज पार कर दूसरी ओर लोकल वाली लाईन पर पहुँच गये। यहाँ पर विशाल ने अपने कार्ड़ से हम दोनों का दादर से नेरल तक जाने का टिकट ले लिया था। 
जाटदेवता के कदम बोम्बे में पड़ ही गये।

बोम्बे लोकल अपनी गति से दौड़ी जा रही है।

इस यात्रा के समय ही मेरे पहली बार बोम्बे की भूमि पर कदम पड़े थे। तो जाहिर है कि बोम्बे लोकल में भी पहली बार सवारी हो रही थी। सुबह का समय होने के कारण बम्बई की जीवन रेखा/ life line कही जाने वाली लोकल रेल में ज्यादा भीड़भाड़ नहीं थी। एक दिन पहले ही बोम्बे का गणपति उत्सव समाप्त हुआ था जिस कारण थोड़ी बहुत भीड़ भी 10-15 किमी तक ही दिखायी दी थी। शुरु में हमें दादर स्टेशन से सीट नहीं मिल सकी थी, लेकिन इस रुट पर नजारे देखने की इच्छा के कारण सीट मिलने का लालच भी नहीं हो रहा था। शुरु-शुरु में विशाल ने मुझे कई बार टोका कि तुम दरवाजे पर खड़े हो, सावधानी से खड़े रहो। गिर जाओगे। बैग को सम्भाल कर पकड़ो। मुझे कई बार विशाल पर आश्चर्य भी हुआ कि अरे यह बन्दा क्या मुझे अनाड़ी समझ रहा है। लेकिन विशाल की चिंता अपनी जगह सही थी, बोम्बे में गेट पर लटकने के कारण हर साल सैंकड़ों हादसे होते रहते है। बिना किसी परेशानी के अपना सफ़र चलता रहा।

कोई बात नहीं इस बार ना सही अगली बार यात्रा करनी ही है।

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