बुधवार, 27 मार्च 2013

Shidi Ghat Trek to Bhimashankar Jyotirlinga सीढ़ी घाट से भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की खतरनाक ट्रेकिंग

भीमाशंकर-नाशिक-औरंगाबाद यात्रा-02
जैसे ही हमने सड़क छोड़कर सीढ़ी घाट की ओर जाने के लिये चावल के खेतों में बनी हुई पगड़न्ड़ी पर चलना शुरु किया तो वहाँ पर खेत की मेंढ (ड़ोल) में बड़े-बड़े सुराख दिखायी दे रहे थे। हमने अंदाजा लगाया कि यह सुराख चूहों के बिल ही होंगे, लेकिन उनमें से एक आध-सुराख साँप के बिल का भी तो हो सकता था। मैं पहले ही चप्पल में चल रहा था, इसलिये साँप का विचार मन में आते ही सोचा कि क्यों ना जूते पहन लिये जाये। क्या पता कहाँ साँप टकरा जाये, लेकिन इस ट्रेक में बार-बार मिलने वाले झरने व नदियों के पानी में भीगने की आशंका के कारण मैंने सोच लिया था कि जहाँ तक हो सकेगा मैं यह यात्रा चप्पल में ही करुँगा। थोड़ा सा आगे चलते ही खेतों के बीच एक कुँआ मिला। यह पहला ऐसा कुँआ मिला जो ऊपर तक लबालब भरा हुआ था। ऊपर तक भरने का एक ही कारण था कि यह नदी किनारे बना हुआ था। यहाँ पर दो स्थानीय महिला अपने वस्त्रों से उनका मैल अलग करने की मेहनत में लगी हुई थी।

यह कुआ और पीछे वो गाँव व उसकी पगड़न्ड़ी जहाँ से होकर हम यहाँ तक आये है।

मस्त पगड़न्ड़ी।
हमने कपड़े धोने वाली महिलाओं से भी एक बार मालूम कर ही लिया था कि सीढ़ी घाट वाला मार्ग यही है या कोई दूसरा? उनकी हाँ होते ही हम आगे चल पड़े। हमें खंड़स में एक युवक मिला था उसने कहा कि यदि आपको गाईड़ चाहिए तो मैं आपके लिये गाईड़ का काम करुँगा। विशाल ने खंड़स में रुककर एक कप चाय पी थी तभी वह युवक हमारे पास आया था। विशाल ने बताया था कि जब मैं पहली बार यहाँ आया था तो मैंने खंड़स से एक आदमी को गाईड़ के रुप में साथ ले लिया था। लेकिन वो आदमी गणेश घाट से कुछ आगे जाकर दूर से यह बताकर कि बस अब भीमाशंकर आने वाला है, अपने पैसे लेकर भाग आया था जबकि भीमाशंकर वहाँ से कई किमी दूर है। कपड़े धोने वाली महिलाओं से कुछ आगे जाने पर हमें Y आकार में दो पगड़न्ड़ी दिखाई दी। यहाँ एक बार परेशानी में पड़ गये कि किधर जाये। फ़िर सोचा कि चलो पहले सीधे हाथ वाले मार्ग पर चलकर देखते है। हम उस मार्ग पर लगभग 200-300 मीटर तक चले गये, लेकिन आगे जाकर यह मार्ग समाप्त हो गया तो हमें मजबूरन वापिस उसी जगह आना पड़ा जहाँ से यह मार्ग Y आकार में हुआ था।

तु छुपा है कहाँ, जरा बाहर तो आ।



ये जोश से तरोताजा युवक।
 जब हम गलत वाले मार्ग पर गये थे तो हमें वहाँ झाड़ियों को हटाकर मार्ग बनाते हुए जाना पड़ा था जिससे हमें शक हो चला था कि यह सही वाला मार्ग नहीं है। आगे चलकर इस मार्ग पर केवल भैसों व गाय के पैरों के ही निशान बने हुए थे। यहाँ पगड़न्ड़ी पर कीचड़ ही कीचड़ जमा था। वापिस आने के बाद अब बची हुई दूसरी पगड़न्ड़ी पर चलने लगे तो कुछ आगे जाकर यह पगड़न्ड़ी खेतों के बीच से होकर जाती हुई दिखायी दी। और आगे चलकर यह पगड़्न्ड़ी घने जंगलों के बीच से होकर आगे बढ़ती रही। यहाँ हमें कई किमी तक कोई नहीं मिला था इसलिये हमें आशंका थी कि कही हम फ़िर से गलत मार्ग पर तो नहीं आ गये है। चूंकि मार्ग में पगड़न्ड़ी लगातार मिलती जा रही थी इसलिये हमारे सामने मार्ग में भटकने की कम समस्या आ रही थी। हम अक्ट्बर के महीने में यह यात्रा कर रहे थे इसलिये हमें चारों ओर हरियाली ही हरियाली दिखायी दे रही थी। अगर कोई फ़रवरी या मार्च में यहाँ आयेगा तो उसे शायद सूखे के दर्शन करने पड़ेंगे।

काश सारा मार्ग ऐसा ही होता तो!

घनघोर जंगल पार करना होता है।
हम पगड़ंड़ी पर लगातार चलते जा रहे थे। दो घन्टे बाद जाकर हमें तीन लड़के मिले, ये लड़के जंगल में चिड़ियों का शिकार करते हुए घूम रहे थे। विशाल ने इन लड़कों से भी पता किया कि सीढ़ी अभी कितनी दूरी पर है। आगे चलकर हमें एक मैदान पार करना पड़ा। मैदान पार करते ही हमें सीढी वाला पहाड़ दिखायी देने लगा। अभी हम कुछ ऊँचाई पर चल रहे थे लेकिन यहाँ मैदान से आगे चलते ही हमें काफ़ी दूर तक लगातार नीचे उतरना पड़ा। आगे जाकर पानी की छोटी-छोटी धाराएँ मिलती गयी। हम इन धाराओं को पार करते हुए आगे बढ़ते रहे। मैंने चप्पल पहनी हुई थी इसलिये मैं इन धाराओं में अपने पैर भिगो देता था, जिससे मुझे वहाँ की गर्मी में भी ठन्ड़क का अहसास होता था। विशाल जूते पहने हुए था इसलिये वह पानी से बचकर निकल रहा था।


जहाँ jatdevta लिखा है। वही से होकर जाना है।

वो सबसे ऊपर वाला पहाड़ दिख रहा है वही जाना है। 
 आगे चलकर हमारा ताजे बहते पानी की एक धारा से सामना हुआ। इसे पार करने के लिये हमें थोड़ी दूर नदी के साथ ऊपर की ओर चलना पड़ा। यहाँ कुछ दूर पहले ही एक छोटी सी धारा के किनारे हमें एक छोटा सा केकड़ा दिखायी दिया था। जब हम उस केकड़े के नजदीक पहुँचे तो वह हमें देखकर एक छोटे से पत्थर के नीचे दुबक गया था। हम उसका फ़ोटो लेकर ही आगे बढ़े थे। बड़ी नदी पार करने के उपराँत एक हम एक जगह बैठ गये थे। हम यहाँ विश्राम करने के लिये लगभग आधा घन्टा बैठे रहे थे। यहाँ पर मन हुआ कि चलो नहा ले, लेकिन पैदल यात्रा अभी बहुत बाकि थी इसलिये स्नान करने का विचार स्थगित कर दिया गया। स्नान के बदले नदी के पानी में हाथ, मुँह, सिर और तौलिया भिगोने के बाद हम आगे की यात्रा पर चल दिये। मार्ग में इतने शानदार-शानदार नजारे थे कि हमें बीच-बीच में रुक-रुक उन्हें देखना पड़ रहा था। जब नजारों से मन भर जाता तो हम आगे बढ़ना शुरु कर देते थे। जब चारों ओर हरिलायी का साम्राज्य फ़ैला हो तो फ़िर मन कहाँ टिक पाता है? 

पानी का जीव।

कल-कल बहती धारा।

यह जाट किस सोच में बैठ गया? जाट को क्या हुआ?

नहा धो, अरे नहीं सिर्फ़ मुँह धोकर छोरा जोश से भरकर तैयार है।
 आगे चलकर हम घने जंगलों में प्रवेश करते जा रहे थे। यहाँ कई बार मार्ग भटकने की नौबत भी आने को हुई थी। लेकिन हमारे देश के पढ़े-लिखे समझदार लोगों के द्धारा फ़ैलायी गयी गन्दगी प्लास्टिक के मार्ग में पड़े होने  के कारण हमें मार्ग तलाशने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी थी। जंगल में बोतल/प्लास्टिक तो हर थोड़ी दूर पर मिल ही रही थी, साथ ही टोफ़ियों के छोटे-छोटे रैपर भी जहाँ-तहाँ बिखरे हुए थे। ऐसी जगह पर पढ़े-लिखे लोग अपनी समझदारी का परिचय इस प्रकार की गंदगी फ़ैला कर देते है। मैं कभी यात्रा के दौरान टॉफ़ी, चाकलेट, आदि कुछ नहीं खाता हूँ इसलिये मुझे कभी इस प्रकार की गंदगी फ़ैलाने का मौका मिलने की सम्भावना भी उत्पन्न नहीं हो सकी है। लेकिन जब लोगों को इस तरह की गंदगी फ़ैलाते हुए देखता हूँ तो लगता है कि ऐसे लोगों के ऐसी सुन्दर जगह पर आने पर पाबन्दी लग जानी चाहिए। अगर लोगों पर पाबन्दी नहीं लगा सकते तो खाने-पीने की इन चीजों पर तो पाबन्दी लग ही जानी चाहिए।

जय हो, देश के पढ़े लिखे लोगो।

अरे जरा सम्भल कर, रिपट मत जाना।

बोम्बे वाला के दोस्त।
 आगे चलकर एक जगह से उन सीढियों के दर्शन हुए तो पहले रुककर उसका फ़ोटो लिया था उसके बाद ही आगे मंजिल की ओर बढ़ चले थे। यहाँ पर मार्ग की हालत बहुत फ़िसलन भरी हो चली थी। विशाल ने मुझे बार-बार कहाँ कि संदीप भाई आप जूते क्यों नहीं पहनते हो? मैं हर बार यही कहता रहा कि बस आगे चलकर पहन लूँगा। बीच में एक जगह पानी में मैंने हल्की सी फ़िसलन महसूस की थी जिसके बाद मैं बहुत सम्भल कर ऊपर की ओर बढ़ रहा था। यहाँ एक जगह पहाड़ पर घास चरते गाय के झुंड़ को देखकर विशाल काफ़ी  सहम सा गया था। मैंने कहा ऐसा क्यों घबरा रहे हो? विशाल ने कहा कि एक बार पहले भी मैं लाल रंग की टी शर्ट पहने हुए था और गाय ने मुझ पर हमला बोल दिया था। आज फ़िर से मैं लाल रंग की शर्ट पहने हुए हूँ और यदि आज फ़िर गाय ने हमला बोला तो मेरे पास बचकर भागने के लिये मार्ग भी नहीं है। मैंने मजाक में बात लेते हुए कहा कि ठीक है यदि गाय तुम्हारे पीछे पड़ेगी तो खाई में छलाँग लगा देना। लेकिन जब विशाल ने वहाँ ऊपर आने से मना कर दिया तो मैंने कहा लाल रंग का ही पंगा है ना तो चल यह टी शर्ट उतार कर बैग में ड़ाल कर पचास मीटर नंगे बदन चल दे भाई। यह बात विशाल की समझ में आ गयी। आगे की 100 मीटर दूरी विशाल ने नंगे बदन पार की थी। लगता था कि गाय बिना लाल रंग की टी-शर्ट के उसे पहचान नहीं पायी थी। उस समय विशाल का कैमरा मेरे पास ही था और मैने उसकी नंगे बदन में एक फ़ोटो भी ले ली थी। इस यात्रा के सारे फ़ॊटो विशाल के कैमरे से ही लिये गये है।

अरे वो दिखी सीढ़ी।

मजेदार चढ़ाई है। श्रीखन्ड़ की याद आ गयी थी।

आज जा भाई आ जा, असली चढ़ाई तो अभी बची हुई है।

जैसे ही हम खतरनाक सी दिखने वाली छोटी सी चढाई को चढ़कर सीढियों के पास आये तो सीढियों की स्थिति देखकर लगा कि बेटे जान बचानी है तो यहाँ से वापिस भाग ले। सीढियाँ ठीक ऐसी खाई पर लगायी गयी है कि यदि रस्सी के सहारे झूलती इन सीढियों से एक बार कोई नीचे टपक गया या गिर गया तो अल्ला, साँई जैसी काल्पनिक  ताकते तो खैर उसे क्या बचायेगी, अगर कही असली परमात्मा होगा तो! उसकी भी नानी याद आ जायेगी। आज की यात्रा इस रोमांचक बिन्दू पर लाकर रोक रहा हूँ, अगले लेख में इस यात्रा के सबसे खतरनाक टुकड़े की यात्रा कराये जायेगी।





इस यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे दी गयी सूची में दिये गये है।
बोम्बे से भीमाशंकर यात्रा विवरण
01. दिल्ली से दादर-नेरल तक ट्रेन यात्रा, उसके बाद खंड़स से सीढ़ी घाट होकर भीमाशंकर के लिये ट्रेकिंग।
02. खंड़स के आगे सीढ़ी घाट से भीमाशंकर के लिये घने जंगलों व नदियों के बीच से कठिन चढ़ाई शुरु।
03. भीमाशंकर ट्रेकिंग में सीढ़ीघाट का सबसे कठिन टुकड़े का चित्र सहित वर्णन।
05. भीमाशंकर मन्दिर के सम्पूर्ण दर्शन।
नाशिक के त्रयम्बक में गोदावरी-अन्जनेरी पर्वत-त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग आदि क विवरण
06. नाशिक त्रयम्बक के पास अन्जनेरी पर्वत पर हनुमान जन्म स्थान की ट्रेकिंग।
07. हनुमान गुफ़ा देखकर ट्रेकिंग करते हुए वापसी व त्रयम्बक शहर में आगमन। 
08. त्रयम्बक शहर में गजानन संस्थान व पहाड़ पर राम तीर्थ दर्शन।
09. गुरु गोरखनाथ गुफ़ा व गंगा गोदावरी उदगम स्थल की ट्रेकिंग।
10. सन्त ज्ञानेश्वर भाई/गुरु का समाधी मन्दिर स्थल व गोदावरी मन्दिर।
11. नाशिक शहर के पास त्रयम्बक में मुख्य ज्योतिर्लिंग के दर्शन
औरंगाबाद शहर के आसपास के स्थल।
12. घृष्शनेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन
13. अजंता-ऐलौरा गुफ़ा देखने की हसरत।
14. दौलताबाद किले में मैदानी भाग का भ्रमण।
15. दौलताबाद किले की पहाड़ी की जबरदस्त चढ़ाई।
16. दौलताबाद किले के शीर्ष से नाशिक होकर दिल्ली तक की यात्रा का समापन।
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6 टिप्‍पणियां:

संजय अनेजा ने कहा…

रोच्चक :)

Vishal Rathod ने कहा…

मेरी सबसे रोचक और डरावनी यात्रा यही थी अब तक. इससे बड़ी समस्या अभी तक नहीं आई थी और संदीप भाई वोह गाय नहीं बैल से डरता था . बैल को लाल रंग से पंगे होते है . मेरे पीछे भागा था एक बार और मैंने जान बचाकर भागा था.

आगे और भी डरावना सफर है .

दर्शन कौर धनोय ने कहा…

पानी का जीव नहीं खाने का जीव ..महाराष्ट्र में केकड़ा बड़े चाव से खाते है संदीप ! बहुत ही डरावना सफ़र है ये ..ये सीढियाँ भी काफी पुराणी लगती है कही जंग भी लगा होगा ...मेरे तो अभी से हाथ पैर सुन्न है ..आगे क्या होगा .....

Vaanbhatt ने कहा…

रोचक यात्रा वृतांत...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

चित्र देखकर ही यात्रा का एक तिहाई आनन्द मिल जाता है।

Ritesh Gupta ने कहा…

यह यात्रा पहले भी विशाल के लेखो में पढ़ चुका हूँ...पर मातृभाषा हिंदी में पढ़कर अच्छा लगा....

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