सोमवार, 4 मार्च 2013

First Manimahesh Kailash trekking yatra पहली मणिमहेश कैलाश ट्रेकिंग यात्रा

सन 2006 के जुलाई माह की बात है मैं अपनी ड़यूटी पर बैठा अपने कार्य से फ़्री होने पर कही जाने की योजना बना रहा था कि तभी हमारे कार्यालय में काम करने वाली दो महिलाएँ कुछ काम से मेरी सीट पर आ धमकी। मैं अपना नक्शा और पेपर वही छोड़ उनका काम करने लगा तो उनमें से एक की नजर मेरे नक्शे की पुस्तिका व योजना बनाने वाले सादे पेपर पर चली गयी। जब उनका कार्य समाप्त हो गया तो वे अपनी सीट पर चली गयी। उन्हे वहाँ से गया एक-आध मिनट ही हुआ था कि वे दोनों पुन: वहाँ आ धमकी। मैं उनके जाते ही फ़िर से अपनी योजना को अमल में लाने के लिये जुट चुका था। उन्होंने मेरी घूमने की योजना के बारे में पूछा तो मैंने कहा कि मैं आगामी सप्ताह होने वाली मणिमहेश यात्रा पर जाने की सोच रहा हूँ। इस पर उन्होंने भी मेरे साथ मणिमहेश यात्रा पर चलने की बात कही। मुझे वैसे तो किसी के साथ जाने पर कभी आपत्ति नहीं होती है। लेकिन मेरे साथ पहली बार दो ऐसी महिला जाने के लिये कह रही थी, जिन्हें मैं सिर्फ़ कार्यालय के काम से जानता था। पारिवारिक या रिश्तेदार महिलाएँ होती तो कोई बात नहीं थी। यात्रा में किसी प्रकार की कोई उल्टी-सीधी ऊँच-नीच वाली घटना घटित हो, इससे पहले मैंने उन्हें टालने के लिये बहाना बनाते हुए कहा कि मैं वापसी में सीधे दिल्ली नहीं आऊँगा। वे दोनों भी पक्की घुमक्कड़ (बहुत घूम चुकी है।) रह चुकी थी, इसलिये उन्होंने कह दिया कि कोई बात नहीं, हम दोनों अकेली वापिस आ जायेंगी। वे दोनों महिलाएँ उम्र में मुझसे कई साल बड़ी थी। इसलिये ज्यादा खतरे वाली बात भी नहीं थी। जब मुझे यह पक्का यकीन हो गया कि ये दोनों इस यात्रा में हर हालत में जायेगी ही तो मैंने भी अपने अनमने मन से उनको हाँ कहना ही पड़ा कि ठीक है चलो जो होगा देखा जायेगा। 



यात्रा पर प्रस्थान करने वाली तिथि से एक दिन पहले जाकर मैंने बस अड़ड़े से हिमाचल रोड़वेज बुकिंग केन्द्र से दिल्ली से चम्बा जाने वाली बस के तीन टिकट बुक करा दिये थे। बस अगले दिन शाम 6 बजे की थी जिस कारण हम तीनों अपना-अपना सामान/बैग डयूटी पर आते समय साथ ही ले आये थे। शाम को कार्यालय का समय समाप्त होने के बाद हम सीधे बस अड़ड़े पहुँच गये। इससे पहले मैं दिल्ली से गंगौत्री तक की यात्रा बस से कर चुका था। बस अपने ठीक समय दिल्ली से चल पड़ी, जब हमारी बस अम्बाला पार कर आगे निकली तो एक जगह सड़क पर एक बड़ी कार एक ट्रक में पीछे से घुसी हुई थी। इस कार को टक्कर लगे दो-तीन मिनट ही हुए होंगे। जब हमारी बस इस कार के पास पहुँची थी तो तब इसका चालक बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था। चालक के दूसरी ओर की छत पूरी तरह साफ़ हो चुकी थी। कार चालक के बराबर वाली पर बैठी सवारी की गर्दन धड़ से अलग होकर शायद कार की पिछली सीट पर कही पड़ी थी। यह दर्दनाक मंजर देखकर मेरा मन बहुत विचलित हुआ था। हमारी बस वहाँ से बिना रुके आगे बढ़ती गयी। आगे जाने पर एक पुलिस जीप को हमारी बस के चालक ने उस घट्ना की जानकारी दे दी थी। सुबह 4 बजे के करीब हमारी बस पठानकोट Pathankot पहुँच गयी थी, यहाँ बस का चालक बदल गया था। इसके बाद हमारी बस चम्बा की और बढ़ती हुई, अचानक ड़लहौजी के बस अड़ड़े तक जाकर वापिस चम्बा की ओर आयी थी। इस तरह मैंने पहली बार ड़लहौजी इस तरह बस में बैठे-बैठे ही देखा था। सुबह 9-10 के बीच हमारी बस चम्बा पहुँच गयी थी। यहाँ हमने सुलभ शौचालय में जाकर अपना नित्यकर्म निपटान किया उसके बाद भरमौर जाने के लिये अगली बस में बैठ गये। इस बस ने हमें कई घन्टे तक अपनी टुलक-टुलक चाल से खूब तंग किया था। चम्बा से भरमौर तक जाने में इस बस ने पूरे चार घन्टे लिये थे। भरमौर जाते ही एक जीप वाला हड़सर जाने के लिये तैयार खड़ा था। हम तुरन्त उस जीप में सवार हो गये। जब जीप ने हमें हड़सर में उतारा तो शाम के 5 बजने वाले थे। हमने हड़सर में रुकने की बजाय मणिमहेश पैदल मार्ग पर चलना शुरु कर दिया।


हमें पैदल चलते हुए दो घन्टे ही हुए होंगे कि हमें एक भंडारा दिखायी दिया। उस समय अंधेरा होने जा रहा था। भन्ड़ारे वालों ने हमें आगे जाने नहीं दिया। हम रात में वही ठहर गये थे। यह भण्ड़ारा पंजाब के एक भक्त लगाते है। यह भक्त केवल अपने दम पर भन्ड़ारा लगाते है। इन्होंने अपने यहाँ कोई दान पात्र भी नहीं बनावाया था। श्रीखन्ड़ कैलाश की यात्रा में भी यह भक्त ड़न्ड़ाधार की चढ़ाई में धाचडू में भी एकलौता भन्ड़ारा लगाते है। अगले दिन सुबह उस भण्ड़ारे से चलकर आठ बजे तक धनछो पार कर लिया था। यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते मार्ग की कठिन हालत दिखायी देने लगी थी। बीच-बीच में भक्त लोगों के लिये भण्ड़ारे लगे हुए थे। जहाँ पर आम लोगों स्थानीय लोगों ने भी यात्रियों के रुकने के लिये काफ़ी प्रबन्ध किया गया था। खाने पीने व रहने की कोई समस्या नहीं आ रही थी। धन्छो से आगे बढ़ने के बाद उल्टे हाथ एक टेढ़ी-मेढ़ी पगड़न्ड़ी ऊपर आसमान की ओर जाती हुई दिखायी दे रही थी। पहली नजर में ऐसा लग रहा था जैसे कोई बड़ा सा साँप पहाड़ पर लेटा हो। हम धीरे-धीरे इस चढ़ाई को पार कर गये। आगे जाकर मार्ग की कठिनता कुछ कम दिखायी दे रही थी। धीरे-धीरे हम इतनी ऊपर पहुँच गये थे कि वहाँ से पीछे देखने पर ऐसा लगता था कि जैसे हम आसमान में उड़ रहे हो। साथ चल रहे एक यात्री ने बताया कि इस पहाड़ के दूसरी ओर भी एक पैदल मार्ग है। मैंने सोचा था कि वापसी उसी मार्ग से करुँगा लेकिन साथ गयी महिला के कारण इसी मार्ग से लौटना पड़ा था। लेकिन मैंने अपनी दूसरी मणिमहेश यात्रा में उस पार वाले मार्ग का ही प्रयोग किया था। किसी तरह पार्वती कुन्ड़ तक पहुँच गये। यहाँ जाने पर साथी गयी महिला ने थकान होने पर मणिमहेश झील जाने के लिये एक खच्चर कर लिया था। यहाँ से झील एक किमी की दूरी पर रह जाती है। मैं भी खच्चर से थोड़ा पीछे ही चल रहा था। झील पहुँचकर वहाँ का एक चक्कर/परिक्रमा लगायी गयी, उसके बाद मणिमहेश पर्वत के सामने स्थित पवित्र झील में ड़ुबकी लगा कर स्नान किया गया था। यहाँ पानी बेहद ही ठन्ड़ा था इसी ठन्ड़े पानी में एक साधु ने लम्ब लोट लगायी थी। यहाँ की भयंकर ठन्ड़ में डुबकी लगाना हर किसी के सहन शक्ति की बात नहीं होती है। स्नान कर हमने वापसी की यात्रा शुरु की। जिस प्रकार हम आसानी से चढ़ गये थे, आधा मार्ग उतरने के बाद पैरों के पंजे बहुत दर्द करने लगे थे। हड़सर पहुँचते-पहुँचते हमें रात हो गयी थी। रात में हड़सर में ही विश्राम किया था, भीड़ की बहुत ज्यादा मारामारी थी, इस कारण मेरे साथ गयी महिलाएँ तो धर्मशाला में अन्दर चली गयी थी, मैं बाहर बरामदे में अन्य पुरुष भक्तों के साथ रात बिताने हेतू बैठ गया था। लेकिन थकावट के कारण जैसे-जैसे नींद ने तंग किया वैसे-वैसे मैं भी अन्य लोगों की भीड़ में जाने कब किधर को लुढ़क कर सो गया। सुबह चार बजे आँख खुल गयी थी इसलिये अब दिल्ली जाने की तैयारी शुरु कर दी। वहाँ भरमौर से हमें सीधे चम्बा की बस मिल गयी थी, चम्बा आने के बाद पठानकोट की बस में बैठकर पठनकोट तक आ गये। पठानकोट से दिल्ली की बसे आसानी से मिल गयी थी। अगले दिन सुबह तक दिल्ली पहुँच पाये थे।

इस तरह इस यात्रा का समापन हुआ। चलिये पिछले साल वाली मणिमहेश यात्रा भी समय लगते ही दिखायी जायेगी। कल आपको इन्दौर से पातालपानी वाले रुट पर चलने वाली मीटर गेज बोले से छोटे रुट की रेल यात्रा करायी जा रही है। यह रुट अत्यधिक ढ़लान वाला है।




2 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति है भाई जी -
आभार आपका ||

MANU PRAKASH TYAGI ने कहा…

ये तो ऐसा ही दिखता है आज भी । और हां जाट देवता तब भी नहाये थे और आज भी

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