शुक्रवार, 8 मार्च 2013

Vally of flowers फ़ूलों की घाटी में एक दिन (हेमकुंठ के पास)

बद्रीनाथ-फ़ूलों की घाटी-हेमकुन्ठ साहिब-केदारनाथ यात्रा-03

गोविन्द घाट से घांघरिया तक कुल 13-14 तेरह/चौदह किमी की दूरी है। वैसे तो यह दूरी कोई ज्यादा लम्बी नहीं है लेकिन इसमें लगातार चढ़ाई चढ़ते जाने के कारण इतनी कठिन लगने लगती है कि नानी याद आने लगती है। अगर कोई बन्दा बिना तैयारी के यहाँ आ जाये तो उसकी हालत पतली होनी तय है। घांघरिया यहाँ  मुख्य आधार कैम्प का कार्य करता है क्योंकि फ़ूलों की घाटी व हेमकुंठ साहिब के साथ ही तिप्राम्बक नामक ग्लेशियर में रुकने का कोई प्रबन्ध ना होने के कारण रात को आकर यही ठहरना पड़ता है। हमें यह दूरी पार पाने में 5  घन्टे का समय लग गया था। चढ़ाई पर विजय पाने का अपना हमेशा से एक जूनून जैसा रहा है। इसलिये मैं अपनी फ़िटनेस बनाये रखने के लिये लोकल में बाइक का प्रयोग 30-40 किमी तक की दूरी के लिये कभी नहीं करता हूँ। गोविन्दघाट से घांघरिया तक का मार्ग एक नदी के किनारे-किनारे बनाया गया है। नदी का जल देखने में ऐसा लगता है जैसे यह पानी नहीं, दूध की धारा हो। चूंकि हम दोपहर के एक बजे घांघरिया पहुँच गये थे इसलिये हमने हेमकुन्ठ साहिब जाने के लिये चलना शुरु कर दिया था। घांघरिया पार करने के करीब एक किमी आगे जाने के बाद हमें पता लगा कि इस समय हेमकुन्ठ साहिब नहीं जाया जा सकता है।

फ़ूलों की घाटी में घुसते ही यह फ़ोटो लिया गया था।

आखिर इस समय हेमकुन्ठ जाने में क्या परॆशानी है? जब हमने हेमकुन्ठ से वापसी कर रहे भक्त से यही बात की तो उसने कहा कि वहाँ पर जाने की दूरी भले ही 6 किमी शेष बची हो लेकिन चढ़ाई इतनी तीखी है कि समय 5-6 घन्टे लग ही जाता है। मैंने थोड़ा नहीं बहुत ज्यादा आश्चर्य से उसको देखा और कहा ऐसा क्या है? उसकी चढ़ाई में? हमारी बात सुनकर उस बन्दे ने कहा कि वो देखो ऊपर उस चोटी को ध्यान से आपको रंग बिरंगे निशान हिलते जुलते देख रहे है कि नहीं। मैंने कहा हाँ दिख तो रहे है। बस वही से होकर जाना होता है वह इस ट्रेकिंग का अर्ध-विराम स्थल है। इसी से अंदाजा लगा लो कि आगे अभी कितनी चढ़ाई बाकि है? उसी बताये अनुसार मेरे मुँह से निकला ओर तेरी तो कहाँ फ़ँस गये? एक बार सोचा कि हेमकुंठ साहिब जाये या नहीं, यही से लौट चलते है। कौन सा कोई देखने वाला है। फ़ूलों की घाटी देखकर वापिस भाग जायेंगे। उस चढ़ाई को देखकर मन में थोड़ी सी शंका उत्पन्न हुई थी कि आसानी से पूरी भी हो जायेगी या नहीं। उस चढ़ाई को कल सुबह पर छोड़ दिया गया। पहले तो आज का आधा दिन खाली पड़ा हुआ। इसलिये हमने आज बाकि समय फ़ूलों की घाटी घूम कर आने का इरादा बना लिया। घांघरिया से आगे एक किमी जाने पर पैदल मार्ग Y आकार में बदल जाता है। यहाँ से सीधा जाने वाला मार्ग हेमकुंठ साहिब चला जाता है। जबकि उल्टे हाथ की ओर जाने वाले से फ़ूलों की घाटी पहुँचा जा सकता है। हम उल्टे हाथ वाले मार्ग पर चल दिये, अभी मुश्किल से कुछ सौ मीटर ही गये होंगे कि यहाँ पर एक बैरियर पर हमें रोक दिया गया कि आप यहाँ से आगे नहीं जा सकते हो। यार हद ही हो गयी कमीने पन की, ऊपर मार्ग खतरनाक बताकर हेमकुंठ साहिब जाने नहीं देते। यहाँ से आगे तुम जाने नहीं देते हो। आखिर तुम लोग गोविन्दघाट पर ही एक बोर्ड़ लगा दो ताकि वहाँ से आगे कोई आये ही नहीं।

देखो जितने फ़ूल देखने है।

जब हमने उनसे रोकने की वजह जाननी चाही तो उन्होंने कहा कि आप लोग यहाँ वन्य जीव अभ्यारण की सीमा में है, यहाँ से आगे आपको यहाँ का तय शुल्क अदा करके ही आगे जाना होगा। अच्छा, यह बात है। दो बन्दों का कितना शुल्क देना होगा? हम उस समय 40 रुपये प्रति बन्दे के हिसाब से 80 रुपये देकर, बदले में रसीद प्राप्त कर फ़ूलों की घाटी जाने के अधिकारी बन गये। बैरियर से थोड़ा आ आगे जाते ही एक नदी पार करने के लिए नीचे गहराई में उतरना पड़ा। नदी पार कर फ़िर से उतने ही ऊपर चढ़ना भी पड़ा इसलिये इस चढ़ाई में खाम्मा खाँ साँस फ़ूला दिया। अरे जंगलियों मतलब वन विभाग वालों सीधा-सीधा पुल बना देते तो क्या तुम्हारे बाप का कुछ घट जाता! उल्टा लाभ ही होता इसी बहाने कुछ घोटाला करने का मौका लग जाता। जो हमारे देश में संतरी से लेकर मन्त्री तक करने में व्यस्त है। देश जाये भाड़ में, जो जा भी रहा है। अरे-अरे बात हो रही थी फ़ूलों की घाटी की, तो चलिये आगे चलते रहो।

पीछे जो पहाड़ दिख रहा है। 7-8 किमी दूर है वहाँ तक फ़ूल ही फ़ूल है।

इस उतराई-चढ़ाई वाले पुल से फ़ूलों की घाटी मुश्किल से तीन किमी ही रह जाती है। यहाँ पर पगड़न्ड़ी की चौड़ाई बहुत ही तंग है। यदि कोई घुमक्कड़ लापरवाही से चलेगा तो उसका खाई में लुढ़कना तय है। जब हम इस खतरनाक जगह से गुजर रहे थे तो बेहद ही सावधानी से यहाँ का बीस फ़ुट का टुकड़ा पार किया था। यह टुकड़ा सिर्फ़ नदी के मुहाने पर ही खतरनाक है अन्य जगह पर यह बहुत ही आसान मार्ग है। यहाँ पर सामने नदी पार एक विशाल पहाड़ दीवार की तरह अड़कर खड़ा हुआ है। इस नदी नुमा ढ़लान को पार करते ही एक अलग ही दुनिया का दीदार होने लगता है। आगे बढ़ने से पहले हम कुछ देर रुक कर साँस रोक कर (कुछ सेकिंड़ तक) इस खूबसूरत स्थल का आनन्द उठाया। जब मन को कुछ तसल्ली हुई कि बस बहुत देख लिया तो आगे की ओर बढ़ गये।

जाट आराम के मूड़ में है।

आगे जाने पर कुछ दूर तक फ़ूलों की विशाल कुदरती खेती का लुत्फ़ उठाकर देखते हुए आगे बढ़ते रहे। यहाँ पर नदी के उस पार भी शानदार फ़ूलों के खेत सरीखे बड़े-बड़े खेत दिखायी दे रहे थे। उन्हें देख कर ऐसा लगता था कि यहाँ पर कोई तो है जिसने इतनी मेहनत करके इतने सारे फ़ूल पौधे यहाँ दस किमी के क्षेत्र में उगाये हुए है। वह कौन है जिसने यह कारनामा किया है हम जानते तो है लेकिन उसको पहचानते नहीं है। यह इलाका इतना विशाल है कि एक दिन में देखना किसी भी हालत में सम्भव ही नहीं है। वैसे यह जगह इतनी खूबसूरत है कि यदि यहाँ कई दिन भी रुका जाये तो भी मन नहीं भरेगा। हमने यहाँ मात्र 6 घन्टे ही बिताये थे जिसमें से दो घन्टे तो आने जाने में ही खर्च हो गये थे। आगे चलकर एक जगह मैदान नुमा जगह आती है वहाँ से चारों ओर का नजारा दिखायी देता है। हम यहाँ से कुछ आगे जाकर वापिस आ गये थे।

जाट दा स्टाइल

यहाँ की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहाँ पर रात में रुकना मना है। बताते है कि रात में यहाँ के असली निवासी जंगली जानवरों को घूमने का मौका देने के कारण आम जनता के लिये रात में ठहरना मना है। यहाँ का सबसे नजदीकी आवास घांघरियाँ ही है। यदि कोई अपना टैंट साथ लेकर जाये तो उसे पहले वन विभाग की चौकी से पूछ लेना चाहिए। कही बाद में कोई पंगा होने पर पछताना ना पड़ जाये। हमने अंधेरा होने से कुछ पहले ही वहां से वापिस आना शुरु कर दिया था। जब हम जा रहे थे तो एक विदेशी महिला फ़ोटोग्राफ़र वहाँ के फ़ोटो खीचने में मस्त थी। जब हम वापसी कर रहे थे तो वह महिला हमें उसी स्थान के थोड़ा सा ही आगे मिली थी जहाँ हमने उसे छोड़ा था। अपनी टूटी फ़ूटी अंग्रेजी में हमने यह पता लगाया कि वह मलेशिया से आयी है। उसके अन्य साथी आगे गये थे। जो सम्भवत: रात होने तक वापिस आ गये होंगे। जहाँ हमने अपने फ़ोटो लेट कर खिचवाये थे वहाँ पर एक स्थानीय लड़का पहाड़ी गाना गा रहा था। जिसे एक विदेशी ने अपने मोबाइल में कैद कर लिया था। उनके लिये यह लम्हा बहुत यादगार रहा होगा। रात में हमने एक होटल में खाना खाया। उस समय वहाँ पर 5 रुपये की एक रोटी मिल रही थी। हम दो बन्दों का बिल 160 रुपये आया था। आज के समय हो सकता है कि यह 200/250 का आंकड़ा पार कर जाये। रात में ठहरने के लिये हमने एक रेस्ट हाऊस में 100 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से ठहरने का किराया तय किया था। अगले दिन सुबह चार बजे उठकर हेमकुंठ साहिब की ट्रेकिंग यात्रा पर निकलना था इसलिये रात को जल्दी सोने की तैयारी करने लगे, लेकिन रात में ठन्ड़ इतनी भयंकर थी कि.......  

इस यात्रा के अगले लेख में आपको हेमकुन्ठ साहिब की झील में स्नान कराया जायेगा।

बद्रीनाथ-माणा-भीम पुल-फ़ूलों की घाटी-हेमकुंठ साहिब-केदारनाथ की बाइक bike यात्रा के सभी लिंक नीचे दिये गये है। 
भाग-01 आओ बाइक पर सवार होकर बद्रीनाथ धाम चले। Let's go to Badrinath Temple
भाग-02 माणा गाँव व भीम पुल से घांघरिया तक
भाग-03 फ़ूलों की घाटी की ट्रेकिंग Trekking to Velly of flowers
भाग-04 हेमकुंठ साहिब गुरुद्धारा का कठिन ट्रेक/Trek
भाग-05 गोविन्दघाट से रुद्रप्रयाग होते हुए गौरीकुंड़ तक।
भाग-06 गौरीकुंड़ से केदानाथ तक पद यात्रा, व केदारनाथ से दिल्ली तक बाइक यात्रा।
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5 टिप्‍पणियां:

MANU PRAKASH TYAGI ने कहा…

ये दोनो पोस्ट बिना लिखे ही ? ऐसी ठंड में आप नहा सकते हो मैने मणिमहेश में देखा था ।
एक बात और बताओ कि उस वक्त कैमरा रील वाला ही था ना ?

दिनेश पारीक ने कहा…

बेहद प्रभाव साली देख कर मन आनंदित हो उठा बहुत खूब

आप मेरे भी ब्लॉग का अनुसरण करे

आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में

तुम मुझ पर ऐतबार करो ।

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राजेश सहरावत ने कहा…

jaat devta kab le chal rahe ho

RITESH GUPTA ने कहा…

जाट देवता जी....फूलो की घाटी की इतनी सुन्दर शब्दों में यात्रा कराने के लिए धन्यवाद....

दर्शन कौर धनोय ने कहा…

फूलों की घाटी तो गई नहीं पर हेमकुंड साहेब की कठिन यात्रा की है ..वो नदी याद हो आई जहाँ आप बैठे है ..और नदी का प्रचण्ड का प्रवाह भी ..

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