सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

आपने क्या कहा (भाग 2)


संजय @ मो सम कौन ? said...
सॉरी भाई, एक साथ पढ़ने के चक्कर में एक-एक पोस्ट नहीं पढ़ी थी, यूँ समझ लो नीरज की तरह रपट गया था: अब एक एक पोस्ट पढ़नी पड़ेगी, लेकिन मन में उल्लास है कि पूरी तफ़सील से चौकड़ी की घुमक्कड़ी समझने को मिलेगी।
जवाब------क्रम से पढो, इस सफ़र में ना पढने में, ना ही चलने में शार्टकट ठीक नहीं है।

Vidhan Chandra said...
एक बात तो तय है की आप लोग यात्रा का मजा नहीं लेते हैं , रिकार्ड बनाने की "धुन" में रहते है!! नीरज भी कोई भगवान नहीं है ! इन्सान ही है, उसे पछाड़ने के चक्कर में अगर आप कहीं (भगवान न करे ) गिर जाते या आप को कुछ हो जाता तो? हम घुमक्कड़ हैं और उसका आनंन्द स्वयं के लिए लेते हैं , वो अलग बात है कि ब्लॉग के जरिये अपनी भावनाएं दूसरों से शेयर कर लेते हैं. बीस मिनट लेट ही सही नीरज पहुंचा न आप के पास अगर मैं होता तो एक घंटा लेट होता! अगर हमें जल्दी नहीं है तो बिना बात जल्दी क्यों करें संदीप जी !! आपके फोटो अच्छे हैं , नीरज कि सलाह मानकर फोटो वाटरमार्क नहीं किये इसके लिए धन्यवाद!!
जवाब------घुमक्कड़ तो हर तरह का मजा उठाते है कभी तेज कभी धीमे, जब सभी तेज चल सकते हो तो क्यों नहीं चले? पहले जाने वाले को आराम भी सबसे ज्यादा मिलता है। उस समय कुछ तो उन्हे उतराई की रफ़्तार भी दिखानी थी दूसरी बारिश होने का डर भी था जिससे कि मार्ग फ़िसलन भरा हो जाता, रात की बारिश ने तो वैसे ही ऐसी-तैसी की हुई थी।

मदन शर्मा said...
मैं समय न मिलने और कुछ व्यक्तिगत कारणों से बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ. बहुत सुन्दर चित्र मय प्रस्तुति  लेकिन एक बात याद रखिये ये तीर्थ स्थल हमें एक दुसरे से जोड़ने के लिए ही बनाये गए हैं देवी देवताओं की पूजा तो एक बहाना है एक दुसरे के नजदीक आने का !!
जवाब------बिल्कुल ठीक कहा आपने।

सुबीर रावत said...
संदीप जी, इस पोस्ट के बारे में कुछ तो नीरज जी ने लिखा है और कुछ मै भी लिख दूं तो आप नाराज ना होना. जब रोहडू से आप चले तो रास्ते में हाटकोटी जगह पड़ी होगी. हाटकोटी में हाटेश्वरी देवी का कांगड़ा शैली में बना हुआ भव्य मन्दिर है. शायद आपने देखा नही. वैसे रोहडू का नाम आज विश्व भर में है क्योंकि world wrestling champion दलीप सिंह राणा उर्फ़ खली जी रोहडू के रहने वाले हैं. रोहडू, हाटकोटी व आराकोट पबार नदी के दायें तट पर स्थित है और त्यूणी के ठीक पहले पबार और टोंस नदी का संगम है.(पबार नदी का अस्तित्व यहाँ पर समाप्त हो जाता है. टोंस नदी हर की दून से आ रही है, जहाँ आप सितम्बर में जाने वाले हैं). आपने त्यूणी में टोंस को पार करना था और फिर दायीं ओर मुड़ जाना था आप चकराता पहुँच जाते. परन्तु आपके लेख से लगता है कि आपने टोंस को पार ही नहीं किया और दायें तट पर चलते रहे. अठारह किलोमीटर पर आपको अटाल नाम का छोटा सा क़स्बा अवश्य पड़ा होगा जो कि देहरादून जिले का ही हिस्सा है. फिर अटाल से आप रोणहाट की ओर बढे या सिलाई की ओर, पता नहीं चल पा रहा है. आपने मीनस नाम की जगह पर टोंस नाम की जगह को पार किया होगा...... बाहरहाल.
आपके हिम्मत और आपके जज्बे की दाद देनी होगी. आपकी सामग्री ज्ञानवर्धक तो है ही उत्साहवर्धक भी है. और अपने को देख कर दुःख भी होता है कि यार मै क्यों नहीं संदीप जी के साथ हो लिया.खैर.
जवाब------अगली बार चलना।

रेखा said...
हमारे लठ देखकर बोला कि पहले गन्ना खिलाओ तब बताऊँगा कि पेट्रोल पम्प कहाँ है, जब उसके मुँह के आगे लठ अडा दिये तो उसकी आँखे फ़टी की फ़टी रह गयी कि गन्ने लठ कैसे हो गये।
कभी कभी ऐसे भी लोग रस्ते में मिलते है ...
जवाब------सच में हमारे लठ देखकर उसे गन्ने जैसे लगे उसने जब ध्यान से देखा तो उसकी बोलती बन्द।

vidhya said...
इतना सुन्दर फोटो इतना सुन्दर सफ़र बहुत ही मन को छु लिए /हनुमान जी का मूर्ति बहुत सुन्दर है मुझे भी जानेका उत्साह हो रहा है लेकिन bike मै आनन्द ही निराली है सुंदर
जवाब------बाइक की बराबरी किसी रोमांच में कोई वाहन नहीं कर सकता है।

Vidhan Chandra said...
भैया! गलतियाँ तो नीरज ने निकाल दी , लेकिन नीरज भाई बाईक से घूमने का भी अपना एक मजा है , वैसे सीख लो बाईक चलाना !! अरे आगे अभी बहुत यात्राये करनी है , बाईक से स्पीड बढ़ जाएगी ...........जिंदगी एक सफ़र है सुहाना .....यहाँ कल क्या हो किसने जाना ....! आप की एक फोटो चोरी की है माफ़ करना !!
जवाब------अब नीरज के साथ जब जाऊँगा, जब वो बाइक चलानी जान जायेगा।

डॉ टी एस दराल said...
सुन्दर तस्वीरें । एक झरने के लिए बड़े पापड़ बेलने पड़े। लेकिन प्रयास सार्थक रहा ।
जवाब------पापड बेलना सफ़ल रहा। 80 किमी आना जाना व दो किमी पैदल चलना वसूल हुआ।

चन्द्रेश कुमार said...
सुन्दर यात्रा चल रही है. ऐसे दृश्य के लिए धन्यवाद. भाई मात्र 95 फीट ऊँचा झरना देखकर घबरा गए. कुछ दिनों पहले मैं मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के 'पचमढ़ी' गया था वहां ऐसे कई फाल थे, कम से कम 6 झरने तो जरुर ही हैं जिसमे से सबसे ऊँचा 350 फीट का था लेकिन मैंने नहाया 250 फीट वाले में.
जवाब-----भले ही वो झरने ऊँचे हो लेकिन इतने खतरनाक नहीं है।

दीपक बाबा said...
वाह....... चकराता...चौधरी साहेब, दिल्ली से चकराता तक का रास्ता भी बता देते...
जवाब------सब कुछ बता दिया है बाबा जी। अब आपको शिकायत नहीं होगी।

Meri Soch said...
jaat ji aapke hai thaat ji, sach mei aap apni life ko kitne ache se jeete hai, kash mai bhi aap hi ki tarah hoti, aapke lekh padh ke boht acha lagta hai or sath sath pahado ke darshan maja hi aa jata hai, aap job wagairah nahi karte kya, bas ghumte hi rehte hai hahaha
जवाब------सरकारी कर्मचारी हूँ। तीन महीने में एक सप्ताह का अवकाश आसानी से मिल जाता है।

दर्शन कौर said...
इतना सुंदर नजारा देखकर तबियत खुश हो गई संदीप ! चकराता का नाम सुना जरुर था आज तुमने दिखा भी दिया ...दूर का द्रश्य देखकर समझ नहीं आया की इतने बड़े झरने में पानी कहाँ से आया होगा ..वो भी इतना ढेरो पानी ? क्योकि ऊपर तो मुझे खेत दिखाई दे रहे हें और चप्पल पहनोगे तो फिसलोगे तो जरुर न ?
जवाब------ये झरना पेडों से घिरा हुआ है इसलिये दिखाई नहीं देता है। हमें भी दूर से कुछ नहीं दिखा था।

अरुण कुमार निगम said...
कालसी के बारे में बिल्कुल ही अंजान थे. एक नई जानकारी देने का शुक्रिया. सारनाथ के संग्रहालय में अशोक स्तम्भ को जरूर देखा है. यात्रा वृत्तांत बड़ा ही मनोरम.
जवाब------कालसी के बारे में कम ही लोग जानते है। सारनाथ में फ़ोटो नहीं लेने देते यहाँ कोई रोक नहीं है।

Vaanbhatt said...
जाट देवता आप महान हैं जो हमें घर बैठे अदभुत जगहों के दर्शन करा देते हैं...वो भी कानून तोड़ के...शुक्रिया...
जवाब------इस दुनिया में सब महान है। बेकार का बोर्ड लगाया हुआ है। यहाँ फ़ोटो पर कोई रोक नहीं है।

रविकर said...
सडक पर एक सीमेंट से भरा हुआ ट्रक भी उसके साथ-साथ मैंने पानी में जाता हुआ देखा था। सडक खिसकने के बाद सिर्फ़ इतना मार्ग बचा था जिसपर पैदल यात्री या बाइक ही जा सकती थी। मेरी बाइक तो निकल गयी थी महाराष्ट्र वाले दोस्तों की सूमो तीन दिन बाद जाकर निकल पायी थी। बढ़िया प्रस्तुति |बधाई ||
जवाब------इस यात्रा के बारे में भी बताऊँगा।

Arunesh c dave said...
बिना टिकट के जो आप हमे सफ़र कराते हैं उसका मजा ही कुछ और है
जवाब------खर्च करने के बाद असली मजा आता है। जैसे मरने के बाद स्वर्ग का पता चलता है, वैसे ही सफ़र का हाल है।

संजय @ मो सम कौन ? said...
दिल की पुकार सुनी जाती है, कल रात ही एक मेल भेजी थी कि भाई नई पोस्ट कब डाल रहे हो और आज ये दिख गई। ये वही यमुना है न जो दिल्ली तक आते आते एक गंदा नाला बन चुकी होती है? कितना बेरहम है आदमी, कुदरती अनमोल चीजों की कद्र नहीं करता। सभी चित्र नयनाभिराम दृश्य समेटे हैं, अच्छे लगे।
जवाब------दिल्ली में वजीराबाद पुल से आगे तो यमुना एक गन्दा नाला ही रह जाती है।

नीरज जाट said...
हां, आज दाहिने-बायें का चक्कर ठीक है। और मैं शिलालेख के इतिहास वाले एक पैराग्राफ को कॉपी करके अपने यहां लगाना चाहता हूं। बस, अनुमति दे देना। इंतजार कर रहा हूं।
जवाब------जिसे जो चाहे ले लो।

ब्लॉ.ललित शर्मा said...
ब्राह्मी पढनी नहीं आती वर्ना कब का पढ़ चुके होते इस शिलालेख को..........:)
जवाब------सीख लो इसे भी।

अभिषेक मिश्र said...
विस्तृत और महत्वपूर्ण जानकारी मिली इस पोस्ट से साथ ही चांदनी चौक से जुडी स्मृतियों की भी.
जवाब------चांदनी चौक व पौंटा साहिब का आपस में गहरा सम्बन्ध है।

नीरज जाट said...
मैं सोच रहा था कि इस पोस्ट में इतना टाइम क्यों लगाया जा रहा है। अब समझ में आया कि गुरू का पूरा इतिहास, जांच-पडताल के बाद, खोज-खंगाल के बाद; टाइम तो लगना ही था।
वाकई कमाल की ऐतिहासिक जानकारी दी है भाई।
जवाब------कुछ जानकारी भी देने में क्या हर्ज है।

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...
गुरु गोविंद सिंह के बारे में काफी विस्तार से जानकारी देने के लिये आभार.आपकी नजर बहुत ही सूक्ष्म है. दर्शनीय स्थल के साथ सम्बंधित जानकारियाँ भी पाठकों को देकर कृतार्थ कर देते हो.आपकी पोस्ट तो शालेय पाठ्यक्रम में शामिल होनी चाहिये.
जवाब------जानकारी देनी भी चाहिए।

दर्शन कौर said...
पहले चित्र में -बड़े गुरूद्वारे के पास जो छोटा सा झोपड़ा दिख रहा हैं --असल में वही स्थान गुरु गोविन्द सिंह जी का हैं --वही वो रहते थे ?पौंटा साहेब की याद दिलाने का शुक्रिया संदीप ...
निशाने साहेब नहीं ..निशान साहेब कहते हैं संदीप ...और ' कवि दरबार' के नीचे मैंने भी फोटू खिचवाया था... एक गलती और हैं --गुरु गोविन्दसिंह जी ने पञ्च प्यारो को गुरु का दर्जा नहीं दिया? गुरु का दर्जा तो ग्रन्थ साहेब को मिला हैं ..पञ्च प्यारे यानी सिक्ख धर्म के पहले ५ व्यक्ति ...जिन्होंने अपना शीश धर्म के लिए कुर्बान किया ..आज जो भी सिक्ख धर्म अपनाता हैं वो पञ्च प्यारो के हाथो अमृत -पान करता हैं और उन्ही के हाथो अमृत -पान करके गुरु गोविन्दराय गुरु गोविन्द सिंह बने .
जवाब------इन्ही गुरु ने अपनी आखिरी साँसे नान्दॆड साहिब सचखण्ड में ली।

संजय @ मो सम कौन ? said...
भक्ति, शक्ति, सेवा, श्रद्धा सबका मिलाजुला अनुभव होता है किसी ऐतिहासिक गुरुद्वारे में जाकर। संबंधित स्थान का संक्षिप्त इतिहास भी बताना आपकी घुमक्कड़ी को विस्तार देता है। नीरज को जन्मदिन की बधाई। आईसक्रीम फ़ेवरेट डिश लगती है, बढ़िया है।
 जवाब------आईसक्रीम सबसे ज्यादा पसन्द है मुझे।

Suresh kumar said...
संदीप भाई आपने पोंटा साहिब गुरूद्वारे के इतिहास की बहुत ही अच्छी जानकारी दी | आप वहां गए तो आपने थोड़ी बहुत सेवा जरुर करनी चाहिए थी| हमें सभी धर्मों की इज्जत करनी चाहिए | सबसे ज्यादा मज़ा आता है गुरुद्वारे के लंगर में मैंने कई बार खाया है |
जवाब------लंगर में सेवा करना भी पुण्य का कार्य है।

Bhushan said...
बढ़िया वर्णन. पौंटा साहब के दर्शन कराने के लिए आभार. आपने देखा होगा कि गुरुद्वारों में प्रसाद शुद्ध देसी घी में बनता है और गुरुवाणी पाठ शुद्ध शास्त्रीय संगीत में. आपको धन्यवाद.
जवाब------शुद्ध देशी घी।

veerubhai said...
जैसे उडी जहाज को पंछी ,उडी जहाज़ पर आवे ,इन उन्मुक्त पंछियों को दिल्ली आने पर कैसा लगता होगा .
जवाब------बहुत अच्छा लगता है, घर पर आकर भी।

vidhya said...
यात्रा वर्णन बहुत अच्छी रही| खूबसूरत चित्र. पूरे आनन्द के साथ समाप्त की गई यात्रा सबने अपने-अपने हिस्से का हिसाब चुका दिया था। किसी का किसी पर कोई बकाया नहीं रहा था "यह तो बहुत अच्छी बात है न मुझे भी जाने का शौक हो रहा है मगर आप की तरह उर्जा है कि नहीं पता नहीं, धन्यवाद|
जवाब------अगले साल जाने की तैयारी अभी से शुरु कर दो। तब तक ऊर्जा भी आ जायेगी।

Arunesh c dave said...
भाई जब कहीं जंगल यात्रा का कार्यक्रम हो तो खबर करना हम और ललित भाई पहुंच जायेंगे बहुत दिनों से जिम कार्बेट के आस पास के जंगलों को देखने की इच्छा है मन में
जवाब------मैं सोच रहा हूँ कि छतीसगढ के जंगल देखने की, जिम कार्बेट के वन भी अच्छे है।

Jeet Bhargava said...
हमारे और सुरेशजी के ब्लॉग से घूमते-घामते आपके धाम (ब्लॉग) पे पहुंचे तो आप तो बड़े घुम्मक्कड़ निकले !! खैर हमने सोचा क्यो ना आपके अड्डे पे दस्तक दे दी जाए। किस माटी के बने हो भाई?? घूमने के लिए इतनी ऊर्जा कहाँ से लाते हो? फिल्मों मे सनी और धर्मेंद्र पाजी जैसे अलहदा जट्ट देखे थे। आज सच मे जट्ट की फितरत देख ली. हम तो यही कहेंगे ''मतवाले जाट, निराले ठाठ!'' बाबा भोलेनाथ हर सफर मे आपकी रक्षा करे..
जवाब------मतवाले जाट के ठाठ निराले ही होते है।

रेखा said...
आप दो यात्राओं के बीच कितने दिन का अन्तराल रखतें हैं .....मुझे तो विश्राम करने में ही कई दिन लग जाएँगे ,आपको शत -शत नमन
जवाब------साल में चार यात्रा, तीन महीने में एक, दो महीने बाद दूसरी यात्रा। 

डॉ टी एस दराल said...
पूरा विवरण पढ़कर यही लग रहा है कि अलग अलग किस्म के लोगों ने मिलकर यात्रा ठीक ठाक कैसे पूरी की ।
जवाब------एक जैसे दिमाग के तो शायद ही कभी हो पाते हो।

संजय @ मो सम कौन ? said...
लौट के मितर घर को आये - देख लो तुम्हारे चक्कर में मुहावरा बदल दिया है। पूरी यात्रा का वर्णन मस्त लगा। डेली पैसेंजरी के दौरान बावली गाँव के बारे में कुछ किस्से सुने थे, याद आ गये।
उम्मीद है कि योँ ही लोगों ने प्रचारित कर रखे होंगे। अगली यात्रा\घुमक्कड़ी के लिये अग्रिम शुभकामनायें।
जवाब------बावली गाँव के बारे जितनी कहावते है सब सच है!

Suresh kumar said...
संदीप भाई ये तो पता था की आप साईकल चलाते हो पर हर रोज 30 किलोमीटर चलाते हो इस बात का अभी पता चला | बहुत ही अच्छी बात है इससे शरीर हमेशा तंदरुस्त रहेगा | बाकि तो हमें पहले ही सब कुछ पता था
जवाब------- ये है सेहत/स्टेमिना का राज।


डॉ टी एस दराल said...
एक अनुभवी ट्रेकर की तरह आपने बहुत सही टिप्स दिए हैं .
ट्रेकिंग में खुश रहना बहुत ज़रूरी है और सहयोग की भावना भी होनी चाहिए. साथ ही किसी भी खतरे या विपरीत परिस्थिति से सामना करने का भी साहस रखना चाहिए. चलते हुए आस पास के नज़ारों का भरपूर आनंद उठाना चाहिए, लेकिन स्पीड मेंटेन करना भी ज़रूरी होता है .सभी का परिचय अच्छा लगा .
जवाब---------आपकी बात सौ प्रतिशत सही है। जो माने उसका भला भी हो, जो ना माने उस पर
आफ़त आयेगी।  

12 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति ||
बधाई |

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कितना कुछ तो कहना है।

Bhushan ने कहा…

धन्यवाद संदीप जी.

रेखा ने कहा…

चटपटी और मसालेदार प्रस्तुति ...

डॉ टी एस दराल ने कहा…

दिलचस्प टिप्पणियां और प्रतिटिप्पणियां .

veerubhai ने कहा…

अपने पन से लिखी गईं हैं तमाम बातें .हम भी अहि कहेंगे -बेटर लेट दें नेवर .जल्दी का काम शैतान का .आत्रा मौज के लिए है प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं .प्रतिभागी होना बडभागी होना है .

abhi ने कहा…

वाह, ये तो अलग तरह की पोस्ट हो गयी भाई, :)
वैसे फ़िलहाल तो पहले की कुछ पोस्ट जो पढ़ा नहीं था मैंने, वो पढ़ रहा हूँ आज :)

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

मान लिया जी, आगे भला ही होगा :)

Suresh kumar ने कहा…

Bahut hi sundar post hai bhai.

सुबीर रावत ने कहा…

संदीप जी, अब postmortem ही करते रहोगे या और भी कुछ दिखाओगे ?

Unlucky ने कहा…

धन्यवाद् अपना वक़्त निकल कर मेरे ब्लॉग पर टिपण्णी करने के लिए, आपका ब्लॉग काफी अच्छा है, आशा है की इसी तरह कुछ बेहतरीन पढ़ने मिलेगा आपके ब्लॉग से,

Girls & Guys these days have gone wild for uploading a picture on Face book .
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जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

सुबीर जी, अगर आपको अपने दोस्तों की प्रतिक्रिया का जवाब देना पोस्टमार्टम लगता है तो ये आपकी मानसिकता है, हमें तो इस तरह दोस्तों के प्यारे-प्यारे शब्दों का जवाब देना अच्छा लगता है वो इसलिये कि आखिर पढने वालों को भी तो पता चले कि उनकी राय के बारे में मेरा क्या ख्याल है?

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