बुधवार, 8 जुलाई 2020

Bharatpur Lohagarh iron Fort, Unbeatable durg भरतपुर का लोहागढ किला, अजेय दुर्ग

  • मथुरा भरतपुर यात्रा 3         Sandeep Panwar 
मथुरा भ्रमण के बाद भरतपुर का अजेय दुर्ग लोहागढ़ किला देखने चल दिये। 
भरतपुर का नाम महाराजा सूरजमल के अद्भुत साहस और वीरता के कारण मान सम्मान से लिया जाता है।  यदि भरतपुर के महाराजा सूरजमल नहीं हुए होते तो मुझे नहीं लगता कि इतना मान सम्मान देश की 6 करोड से ज्यादा की जाट बिरादरी को वर्तमान समय में मिल पाता। जाट बिरादरी प्राचीन समय से ही मेहनती व लडाकू रही है। 

यदि महाराजा सूरजमल नहीं  हुए होते तो जाट समाज को किसान बिरादरी तक ही सीमित रहना पड़ता। महाराजा सूरजमल और उनके वीर साथियों ने जिस वीरता और बहादुरी से अपना परचम लहराया। वह आज भी याद किया जाता है। 

1761 में महाराजा सूरजमल की फौज ने आगरा के किले पर घेरा डाल दिया था। इस घेराव में किले के भीतर किसी को जाने नहीं दिया गया। किसी को बाहर भी नहीं आने दिया गया था। लगभग 1 महीने की घेराबंदी के बाद महाराजा सूरजमल आगरा किला जीतने में सफल हुए। आगरा किले के अंदर लगभग उस समय के ₹50,00,000 जैसी भारी-भरकम राशि तो मिली ही। इसके अलावा ढेर सारा गोला बारूद, अस्त्र-शस्त्र इत्यादि सामान भी अलग से मिला था। महाराजा सूरजमल ने लगभग सभी महत्वपूर्ण चीजें डीग और भरतपुर के अपने दुर्गों में पहुंचा दी थी। (उर्दू में हिंदी के दुर्ग को किला कहते कहा जाता है।)
आगरा किला जीतने के बाद महाराजा सूरजमल ने लाल किले में ही एक शानदार दरबार का आयोजन भी किया था। इस दरबार में महाराजा सूरजमल उसी सिंहासन पर विराजमान हुए थे। जहां कभी मुगल बादशाह  के अलावा कोई और नहीं बैठ सकता था।
आगरा किला जीतने के बाद महाराज सूरजमल ने वहां सनातन परम्परा अनुसार हवन कर किले को पवित्र भी किया था। इस विजय के साथ ही आगरा फिरोजाबाद का पूरा क्षेत्र भी भरतपुर रियासत के अधीन आ गया था। 
महाराजा सूरजमल द्वारा आगरा किला विजय होने के बारे में दिल्ली के बिरला मंदिर स्थित प्रांगण में एक लेख भी लगा हुआ है।

जाट शासनकाल में मथुरा क्षेत्र पांच भागों में विभाजित था। भरतपुर के महाराजा सूरजमल सिनसिनवार गोत्र से आते है। भरतपुर के वीरों में गोकुला जाट, चूड़ामणि जाट, महाराजा सूरजमल, बदन सिंह, अनूप सिंह, राजाराम मुख्य नाम है।

महाराजा सूरजमल की तरह राजाराम जी भी एक जबरदस्त जाट योद्धा रहे थे। राजाराम जी ने सिकंदरा में अकबर के मकबरे से उसकी कब्र खोदकर आग लगा दी थी। 

भरतपुर इतिहास का जिक्र चल रहा है तो यहां पर एक शानदार घटना/ युद्ध का उल्लेख अवश्य करना चाहता हूँ। हुआ यह था कि ब्रज क्षेत्र के चाहर जाट और राजपूतों के सिकरवार गोत्र (जाट और राजपूत में बहुत सारे गोत्र एक जैसे है।) में अकेला गाँव स्थित एक तालाब को लेकर झगड़ा हो गया था। उस तालाब पर दोनों पक्ष अपना-अपना दावा ठोक रहे थे। आखिर में तय हुआ कि दोनों पक्षों की आमने-सामने की लड़ाई हो जाए। जो पक्ष विजय रहेगा वो तालाब का मालिक होगा। तय समय पर 200 के आसपास जाट योद्धा घासीराम जी के नेतृत्व में लडाई के मैदान पर पहुंच गए थे। लगभग 250 सिकरवार राजपूत भी वहां पर इस लड़ाई के लिए पहुँच गये थे। इस लड़ाई में जाट लडाकों में सिर्फ घासीराम के पास घोड़ा था। अन्य जाट लडाका पैदल थे। उधर राजपूतों के पास 5 घोड़े थे। सुबह से लड़ते-लड़ते दोपहर हो रही थी। अब लड़ाई में जाट पक्ष कमजोर साबित होने लगा था। एक तो इनके पास 50 योद्धा कम थे। दूसरा चार घोड़े कम थे। यहां पर जाट योद्धाओं ने एक योजना बनाई गई कि दूसरे पक्ष के जो 50 लड़के फालतू होने से समस्या नहीं है। असली समस्या उनके 4 घुडसवार ज्यादा होने से हो रही थी। 

इसलिए तय हुआ कि पहले विपक्षी खेमे के 5 घोड़ों पर कब्जा किया जाये। इस काम के लिए 15 लोगों की एक विशेष टीम लगाई गई। हर घुडसवार पर 3/3 लड़के हमले के लिए तय किये गये। तीनों को अलग-अलग काम सौंपा गया। पहला योद्धा घोड़े के पैरों में उलझ जायेगा। जिससे घोड़ा गिर जाएगा। दूसरा योद्धा घोड़े के गिरते ही घुड़सवार को
काबू करेगा। तीसरा योद्धा इन दोनों पर हमला करने वाले विपक्षी सैनिक से बचाव करेगा। इन तीनों में जिसे पहले मौका मिले वो उस घोडा का घुडसवार बन जायेगा। यह योजना कामयाब रही। पांच घोड़े में 4 जाटों के कब्जे में आ गए। पांचवा घुडसवार अपने साथियों का हाल देख मैदान से भाग गया। 
इस अनोखे युद्ध में जाट विजयी रहे। 
अकोला गांव में पंचायत ने मुख्य योद्धा काशीराम का जबरदस्त सम्मान किया था। उन्हें महावीर कहकर संबोधित किया था। 

चलो, भरतपुर इतिहास छोड पुनः अपनी यात्रा पर लौट आते है। 
हम लोग मथुरा की यात्रा करने के बाद भरतपुर के लोहागढ़ दुर्ग के अंदर जा पहुंचे। हमारी टोली दो गाडियों में सवार थी। एक गाडी के के भाई की तो दूसरी अनिल दीक्षित की थी। यहां सबसे पहले संग्रहालय देखा। इस संग्रहालय में उस समय की बंदूकें, तलवार आदि बहुत सारे हथियार सुरक्षित रखे गये थे। 

संग्रहालय को देखने के बाद थोड़ा हट कर महाराजा के किशोरी महल चले गए। यहां महल के सामने ढेर सारे सूचना-पट लगे हुए थे। इन सभी में महाराजा सूरजमल के बारे में जानकारी दी गई थी। बताया गया था कि महाराजा सूरजमल ने कभी किसी शरणार्थी को अपने घर से खाली हाथ वापस नहीं भेजा। 
महाराजा सूरजमल ने मराठा योद्धा मल्हार राव सदाशिवराव भाऊ को भेजे गए पत्र में कहा कि हमारी सीमाओं में किसी प्रकार का उपद्रव नहीं किया जाए। ना ही हमारे यहां के किसी गांव को उजाडा जाए। हमारे यहां किसी नजराने की मांग न की जाए। सदाशिव राव भाऊ ने महाराजा सूरजमल की ये बात मान ली थी। 
1757 में अफगानिस्तान के शासक मोहम्मद शाह अब्दाली ने मथुरा पर चढ़ाई का आदेश दिया था। उसने कहा था कि मथुरा नगर से आगरा तक एक भी इमारत सही सलामत खड़ी ना रहने दी जाए। अब्दाली ने वल्लभगढ़ पर घेरा डाला था। जिस का संचालन स्वयं किया था। और नजीब उद दौला को 20,000 सैनिकों के साथ सूरजमल पर आक्रमण करने के लिए भेजा था। जिस महल के सामने यह सब जानकारी लिखी है। सूरजमल के इस महल को किशोरी महल कहा जाता है। यह महल 18 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में मनाया गया था। सूरजमल की महारानी किशोरी इस महल में निवास करती थी। महाराजा सवाई बृजेंद्र सिंह ने इसका नाम किशोरी महल रखा था।

किशोरी महल में महाराज सूरजमल के राज का एक नक्शा दिया गया था। जिसके अनुसार आगरा, एटा, अलीगढ़, मथुरा, सिनसिनी, होडल, पलवल, बल्लभगढ़, गुडगांव, गाजियाबाद तक का इलाका उनके अधीन आता था

महाराजा सूरजमल का जन्म सन 1707 में हुआ था। और महाराजा सूरजमल की मृत्यु 1763 में दिल्ली के शाहदरा में एक लड़ाई के दौरान हुई थी। दिल्ली में इस स्थान पर महाराजा सूरजमल की समाधी भी बनी हुई है। यह स्थान कडकड डूमा कोर्ट के पास सूरजमल स्टेडियम के नजदीक है। दिल्ली में लडाई में वीरगति के बाद महाराजा के पार्थिव शरीर को गोवर्धन परिक्रमा मार्ग स्थित कुसुम सरोवर ले जाया गया था। जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया था।

महाराजा सूरजमल के पूर्वज गोकुला और उसके चाचा उदय सिंह ने मुगलों के साथ बहुत लड़ाई लड़ी और उन्हें औरंगजेब की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया गया था। जिस कारण धोखे से दोनों को पकड कर आगरा की कोतवाली के सामने मुगल शासकों ने उनकी बोटी-बोटी काट कर फेंक दी गई थी। जिसका बदला महाराजा सूरजमल ने आगरा किला जीत कर लिया था।
चूड़ामण वीर राजाराम के भतीजे थे। जो छापामार युद्ध में अद्भुत लड़ाई करते थे। चूड़ामण अपने राज्य की रक्षा के लिए हमेशा लड़ाई में रहते थे। उनके पास उस समय 10000 योद्धा थे। जिसमें बंदूक, घुडसवार और पैदल सेनाओं की फौज थी। जिसके दम पर उन्होंने सिनसिनी पर अधिकार कर लिया था
महाराजा बदन सिंह ने आमेर की सेना के साथ उनकी घेराबंदी कर ली थी। जिस कारण चुडामण ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी थी।
डीग के महल जिसमें बाग बगीचे का निर्माण किया गया था। सन 1725 में जाकर पूर्ण हुए थे। इन महलों के निर्माण के लिए बंसी पहाड़पुर से संगमरमर का पत्थर लाया गया। बरेठा से लाल पत्थर लाया गया था। 
भरतपुर, कुम्हेर आदि पहुंचाने के लिए 1000 बेलगाडी, 200 घोड़ा गाड़ी और 500 खच्चर को लगाया गया था।
1736 में पेशवा बाजीराव जयपुर आया था। उनके सम्मान में विशाल दरबार आयोजित किया गया।  महाराजा बदन सिंह के प्रतिनिधि के रूप में सूरजमल ने दरबार में भाग लिया था। जयसिंह ने सूरजमल का एक राजकुमार के रूप में स्वागत किया था। 

जयपुर के राजा जयसिंह 1743 में स्वर्गवासी हो गए इसके बाद उनके दोनों पुत्र ईश्वरी सिंह और माधव सिंह में सत्ता के लिए युद्ध छिड़ गया। महाराजा सूरजमल ईश्वरी देवी सिंह की मदद के लिए 10,000 चुने हुए घुडसवार, 2000 पैदल सैनिक कुम्हेर से लेकर गए थे।

वहां एक कहावत बहुत प्रसिद्ध है 
जायो जाटनी साथ में कुल शेरों दिल्ली ढाणी तुरकान लूटो गैरों।

मराठों के बारे में हमें मुगल इतिहास कारों ने पढ़ाया गया कि वे हमेशा मुगलों खिलाफ लड़े। ऐसा भी नहीं है। 
मराठाओं में भी दो धडे थे। उनमें से मल्हार राव व खंडेराव मराठा मुगलों के साथ भी थे। इसका सबसे  अच्छा उदाहरण सन 1754 में मुगल और मराठों ने मिलकर सूरजमल के कुम्हेर किले को घेर लेने का है़। लगभग 4 महीने तक मुगल मराठा फौज ने कुम्हेर किला घेरे रखा। लेकिन वे किले को तोड़कर अंदर नहीं घुस पाए। मराठा खंडेराव ने कुम्हेर की मजबूत किलेबंदी से हार मान ली। आखिरकार सूरजमल जी महाराज विजयी रहे।

कुम्हेर की इस लड़ाई में मल्हार राव का पुत्र खंडेराव एक तोप के गोले के हमले में मारा गया था। 
खंडेराव के पिता मल्हार राव
ने सूरजमल पर हमले की तैयारी के लिए कूटनीति का सहारा लिया।


भरतपुर का लोहागढ़ दुर्ग ऐसे ही अजय किला नहीं कहलाता है। महाराजा सूरजमल ने भरतपुर की सुरक्षा के लिए मजबूत किलेबंदी की थी। इसकी सुरक्षा के लिए ढेरों तोप लगा रखी थी। सबसे बड़ी तोप से 48 पौंड का गोला फेंका जाता था। इस भीमकाय तोप को खींचने के लिए 40 जोड़े बैल के लगते थे। मुगलों के बाद अंग्रेजों ने भी लोहागढ़ से खूब मुकाबला किया। सभी को लोहागढ़ में मुँह की खानी पडी। 

भरतपुर के लोहा गढ़ किले का निर्माण 1732-33 ईसवी में हुआ। ज्योतिष के अनुसार शुभ मुहूर्त और सही दिन निर्धारण होने पर गोवर्धन में गिरिराज महाराज के आशीर्वाद से लोहागढ़ का निर्माण कार्य आरंभ हुआ था। 8 वर्ष लम्बे समय तक इसका निर्माण कार्य निरंतर चलता रहा। 

भरतपुर का किला हिंदुस्तान का सबसे मजबूत और कभी ने जीत सकने वाला एकमात्र दुर्ग था। लोहागढ़ दुर्ग के बाहर ढाई सौ फीट चौड़ी खाई है। जो लगभग 20 फुट गहरी थी। इसमें हमेशा पानी भरा रहता है। वैसे तो आज भी इसमें पानी भरा हुआ है। इस खाई की खुदाई से जो मिट्टी निकली थी। उससे किले के चारों ओर 25 फुट ऊंची और 30 फुट मोटी मिट्टी की दीवार बनाई गई थी। इसमें 10 बड़े बड़े दरवाजे बनाए गए थे। जिनके नाम मथुरापुर, वीरनारायण पोल, अटल बंद पोल, नीम पोल, अन्हा पोल, कुम्हेर पोल, चांदपोल, गोवर्धनपुर जगीना पोल और सूरजपोल बनवाए गए थे। 
पूर्वी दरवाजे के किवाड़ धातुओं के मिश्रण से बने थे। आठ धातु के मिश्रण से बने होने से इन्हें अष्टधातु द्वार कहा जाता था। महाराजा जवाहर सिंह इन दरवाजे को दिल्ली के लाल किला से विजय चिन्ह के रूप में उखाडकर साथ लाए थे।

महाराजा सूरजमल ने आगरा प्रांत के लगभग सभी क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। सन 1756 में अलवर भी भरतपुर राज में शामिल कर दिया था।

14 जनवरी 1761 को हजारों मराठा सैनिक पानीपत की तीसरी लडाई हारकर वापिस लौट रहे थे। बिना शस्त्र, बिना भोजन के अपने प्रदेश लौटते इन भूखे व घायल सैनिकों को भरतपुर पहुंचते ही महाराजा सूरजमल ने उनके इलाज व भोजन का प्रबंध कराया। उसके बाद ही उन्हें आगे जाने दिया। 
मराठा शासक अपनी विशाल सेना के घमंड में आकर 1761 में पानीपत की तीसरी लडाई अब्दाली से लड बैठे थे। 
महाराजा सूरजमल ने उन्हें समझाया भी था। आप लोगों को मैदानी क्षेत्र में लड़ने का अनुभव नहीं है। दूसरा आप लोगों को सर्दी के मौसम में भी लड़ने का अनुभव नहीं है। लेकिन मराठा शासक ने उनकी बात नहीं मानी। जिस कारण अधिक संख्या बल होते भी मराठा को हार झेलनी पड़ी।इसके पीछे यही दो कारण मुख्य रहे। 
पहला कारण मराठा गोरिल्ला युद्ध में महारत हासिल रखते थे। पानीपत मैदानी क्षेत्र था। दूसरा कारण ठंड, महाराष्ट्र में उत्तर भारत के मुकाबले ठंड कम होती है। उत्तर भारत में जनवरी में भयंकर ठंड होती है। यह दो कारण मराठों के हारने के थे।
अब बात करते है अंग्रेजी शासन और भरतपुर शासक में लडाई की। 
अंग्रेजों से लड़ते हुए होलकर नरेश यशवंतराव बचते हुए भरतपुर आ गए। उस समय महाराजा सूरजमल के वंशज रणजीत सिंह शासन करते थे। उन्होंने यशवंतराव को वचन दिया कि आप का बचाव किया जाएगा। चाहे जो हो जाए। जसवंत राव का पीछा करते हुए सन 1805 में अंग्रेज अफसर लॉर्ड लेक ने भरतपुर महाराजा को दूत के जरिए संदेश भिजवाया कि यशवंतराव को हमारे हवाले कर दीजिए। नहीं तो लड़ाई के लिए तैयार रहिए। महाराजा रणजीत सिंह ने जवाब भिजवा दिया कि आप लड़ाई करिए। यशवंतराव को आप के हवाले नहीं कर रहे हैं। लॉर्ड लेक यह बात बहुत बुरी लगी। उसने अपनी सेना लेकर भरतपुर के लोहागढ़ किले पर आक्रमण कर दिया। किले के चारों ओर गहरी खाई थी। सीधे घुसना असम्भव था। इसलिए पहले तोप के गोलों से दुर्ग की दीवार तोड़ने के लिए हमला किया गया। दीवार टूटने से उसमें घुसने का रास्ता बनाया जाए। अंग्रेजी तोप दनादन दीवारों पर हमला कर रही थी। लेकिन मिट्टी की दीवार के आगे तोप के गोले बेदम हो रहे थे। अंग्रेज किले को तोड़ने में नाकाम रहे। इतिहास गवाह है अंग्रेजी फौज ने रिकार्ड 13 बार इस किले पर हमला किया। उसे हमेशा मुंह की खानी पड़ी। तभी यहाँ एक कहावत बनी है। 
हुई मसल मशहूर विश्व में आठ फिरंगी, नौ बोरे, गोरे लड़े किले की दीवारों पर खड़े जाट के दो छोरे।

भरतपुर के बारे में एक खास बात और पता लगी कि भरतपुर रियासत में जो व्यक्ति नौकरी पर रखा जाता था। उसके साथ यह शर्त रखी जाती थी कि उसके वेतन में से एक पैसा हर महीने धर्म के नाम पर काटा जाएगा और प्रत्येक नौकर /सैनिक अफसर यह शर्त मानता था। और राजा द्वारा इकट्ठा किया गया पैसा धार्मिक कामों में ही उपयोग किया था
चलो दोस्तों, इस विवरण के साथ भरतपुर दुर्ग की यात्रा समाप्त होती है। अब हम भरतपुर दुर्ग देखकर डीग के जल महल देखने चल पड़े। 
वैसे तो ये दोनों स्थल मैं अब तक दो बार देख चुका हूँ। 

इस यात्रा में डीग के जल महल इस यात्रा की अंतिम कड़ी थी।
शीघ्र ही इस यात्रा के अगले व आखिरी लेख में आपको डीग के जल महल में कबड्डी खिलायी जायेगी।







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9 टिप्‍पणियां:

शिवम् कुमार पाण्डेय ने कहा…

शानदार.🌻

vijay sharma ने कहा…

आखिर में शुभचिंतकों का प्यार वापस खींची लाया।

शानदार विवरण।

ANIL ने कहा…

आपका दोस्त SANDEEP PANWAR दिन शुक्रवार, जुलाई 10, 2020

10 july 2020 date galati se post ho gai hai shayad ajj ki date 08 july 2020 hai

लोकेन्द्र सिंह परिहार ने कहा…

बहुत ही बढ़िया यात्रा विवरण
देखियो ये नन्हे नन्हे नयनो वाला सचिन को उड़ा न दे☺️

प्रवीण गुप्ता - PRAVEEN GUPTA ने कहा…

श्रीमान जी नमस्कार, मैं एक भूल सुधार करना चाहूँगा. आपने जाटो की जनसंख्या ६ करोड़ लिखी हैं. २०११ के जनसंख्या के अनुसार जाटो की जन संख्या करीब सवा करोड़ हैं. जिसमे उत्तर प्रदेश में २० लाख, हरियाणा में २५ लाख, पंजाब में २५ लाख, राजस्थान में करीब २० लाख हैं. बाकी बचे ३५ लाख और अलग अलग राज्यों में फैले हुए हैं.

Small Traveller ने कहा…

बहुत ही बढ़िया वर्णन भाई साहब

HARI GOVIND MISHRA ने कहा…

Sampurn jankari

virendra chattha ने कहा…

प्रत्येक स्वाधीनता संग्राम में जाटों ने जितनी कुर्बानियां दीं, उनका कोई मुक़ाबला नहीं कर सकता, इसके उपरांत भी इतिहासकारों ने जाटों को इतिहास में उचित स्थान नहीं दिया.

virendra chattha ने कहा…

प्रत्येक स्वाधीनता संग्राम में जाटों ने जितनी कुर्बानियां दीं, उनका कोई मुक़ाबला नहीं कर सकता, इसके उपरांत भी इतिहासकारों ने जाटों को इतिहास में उचित स्थान नहीं दिया.

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