बुधवार, 12 मार्च 2014

Bhangarh-India's most haunted place भानगढ-भारत का सबसे बदनाम भूतहा किला

भानगढ-सरिस्का-पान्डुपोल-यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे दिये गये है।
01- दिल्ली से अजबगढ होते हुए भानगढ तक की यात्रा।
02- भानगढ में भूतों के किले की रहस्मयी दुनिया का सचित्र विवरण
03- राजस्थान का लघु खजुराहो-सरिस्का का नीलकंठ महादेव मन्दिर
04- सरिस्का वन्य जीव अभ्यारण में जंगली जानवरों के मध्य की गयी यात्रा।
05- सरिस्का नेशनल पार्क में हनुमान व भीम की मिलन स्थली पाण्डु पोल
06- राजा भृतहरि समाधी मन्दिर व गुफ़ा राजा की पूरी कहानी विवरण सहित
07- नटनी का बारा, उलाहेडी गाँव के खण्डहर व पहाडी की चढाई
08- नीमराणा की 12 मंजिल गहरी ऐतिहासिक बावली दर्शन के साथ यात्रा समाप्त

BHANGARH-SARISKA-PANDUPOL-NEEMRANA-02                           SANDEEP PANWAR

हमारी गाड़ी घाटा व थाना गाजी नामक जगह की ओर से आयी थी। उसके बाद हम अजबगढ के खण्ड़हरों से होते हुए भानगढ तक पहुँचे। आज आपको भानगढ के भूतों वाले किले में घूमाया व इसके बारे में विस्तार से बताया जा रहा है। जयपुर से सरिस्का/ अलवर जाने वाले मुख्य मार्ग से भानगढ किले की दूरी लगभग 3 किमी हटकर है। इस मोड़ से कोई एक किमी पहले सरिस्का की ओर सारा माता मन्दिर आता है। यहाँ रात ठहरने के ठिकाना मिल जाता है। यह मन्दिर भानगढ से वापिस आते समय सीधे हाथ पड़ता है।




भानगढ जाने के कई मार्ग है। जयपुर से अलवर आने वाली बस भानगढ तिराहे से होकर जाती है। उसके बाद बाँस का गोला तिराहे से बस सीधे हाथ टहला की ओर होकर आगे चली जाती है। अगर दिल्ली से जाये तो एक मार्ग सरिस्का होकर जाता है जिसमें सरिस्का जंगल पार करते ही टहला नामक जगह आती है। इस मार्ग में अलवर शहर बीच में आता है। जयपुर से भानगढ की दूरी 75 किमी है जबकि दिल्ली से भानगढ की दूरी 250 किमी है। रात में ठहरने के लिये महँगा होटल चाहिए तो सरिस्का मौजूद है। यदि सस्ता व ठीक-ठाक ठिकाना चाहिए तो सारा मन्दिर की धर्मशाला है ना। बाँस का गोला तिराहे से भानगढ किला जाते समय भानगढ तिराहे से एक किमी पहले सारा माता मन्दिर आता है।

हमारी गाड़ी भानगढ जाते समय गोला का बाँस नामक तिराहे से सीधे हाथ मुड़कर जयपुर की दिशा में चल पड़ी। इस चौराहे से सीधे चलते रहने पर टहला या सरिस्का आ जायेगा। भानगढ देखकर हम वापसी में टहला होकर ही जायेंगे।  भानगढ तिराहे पर पहुँचकर यह मुख्य मार्ग छोड़ना पड़ा। ग्रामीण मार्ग जैसा दिखने वाला मार्ग है। जिस पर चलते हुए हम भानगढ किले के ठीक सामने पहुँचे। किले के बाहर 30 रु पार्किंग शुल्क देने के बाद हमारी गाड़ी पार्किंग इलाके में जा पायी। गाड़ी से उतर कर किले में प्रवेश किया जाये। उससे पहले भानगढ किले की रोचक दास्तान की बात करते है। 

भानगढ का किला आमेर के राजा भगवन्त दास ने 1573 में बनवाया था। इनके 2 बेटे थे राजा मानसिंह व माधो सिंह। यह वही मान सिंह थे जो मुगल अकबर के नवरत्नों में शामिल थे। माधो सिंह यहाँ भानगढ में रहने लगे। इनके 3 बेटे हुए। सुजान सिंह, छत्रसिंह व तेजसिंह। माधो सिंह के बाद छत्रसिंह उसका उतराधिकारी बना। 

छत्रसिंह की 1630 को लड़ाई के मैदान में ही मौत हो गयी। इसके साथ ही भानगढ का महत्व घटना आरम्भ हो गया। छत्रसिंह का बेटा अजबसिंह हुआ। अजबसिंह भी मानसिंह की तरह मुगलों का कर्मचारी बना। इसी अजब सिंह ने भानगढ से पहले अजबगढ नाम का शहर बसाया था। हम कल अजबगढ के बीच से होकर आये थे। अजबगढ के खन्ड़हर देखकर आज भी लगता है कि इस शहर की शान उस समय बड़ी निराली रही होगी।

अजबसिंह के बेटे काबिलसिंह व जसवन्त सिंह अजबगढ में रहे जबकि इनका तीसरा लड़का हरीसिंह भानगढ में रहता था। माधोसिंह (हरीसिंह के लड़के) के दो वशंज मुसलमान भी बन गये। जिन्हे भानगढ दे दिया गया। मुगल शासन के कमजोर होने पर आमेर के राजा सवाई जयसिंह ने फ़ायदा उठाया। उन्होंने 1720 में इन्हे मारकर भानगढ पर कब्जा जमा लिया। इस इलाके में पानी की कमी पहले से ही महसूस हो रही थी। सन 1783 के अकाल में बिना पानी में यह किला पूरी तरह उजड़ कर सुनसान हो गया।

मुख्य दरवाजे से अन्दर दाखिल हुए तो सबसे पहले भानगढ किले की मजबूत दीवार दिखायी देती है। भानगढ का किला बेहद चौड़ी व मजबूत चारदीवारी से घिरा हुआ दिखायी देता है। मुख्य दरवाजे से अन्दर जाते ही सीधे हाथ हनुमान मन्दिर दिखायी देता है। हनुमान जी को भूत प्रेतों का दुश्मन माना जाता है। जबकि शिव शंकर को भूतों का राजा माना जाता है। इस किले में दोनों मन्दिर देखकर अचम्भा होता है। आगे चलते ही घरों के अवशेष दिखाई देते है। इन खन्ड़हरों से आगे जाने पर बाजार जैसी हालात वाले दुकानों के खन्ड़हर मिले। सडक के दोनों तरफ़ एक जैसी दिखने वाली दुमंजिला सी दिखने वाली दुकानों का बुरा हाल दिखायी दिया।

थोड़ा और आगे जाने पर नृतकियों (कोठा) की हवेलियाँ दिखायी दी। आज यहाँ वीराना है। कभी यहाँ घूंघरु की छनछन व ढोल की मस्तानी थाप सुनायी देती होगी। वही आज श्मसान जैसा सन्नाटा दिखायी देता है। नृतकियों (रंडियों) के ठिकाने के बाद आगे चलते है। बाजार को पार करने के बाद किले के महल वाले हिस्से में दाखिल हुए। यहाँ सीधे हाथ एक मन्दिर दिखायी दिया जिसका नाम गोपीनाथ लिखा हुआ है। मन्दिर की हालत काफ़ी बेहतर स्थिति में है। 

मन्दिर एक ऊँचे चबूतरे पर बनाया गया है। पहली नजर में ही लगता है इस मन्दिर में कोई पूजा पाठ नहीं होती होगी। अशोक भाई मन्दिर में अन्दर जाने के लिये जूते निकालने लगे तो मैंने कहा अशोक जी यह मन्दिर अभिशप्त है। पूजा पाठ वाला नहीं है। अत: इसमें कोई मूर्ति भी नहीं मिलेगी। जिससे यह एक इमारत से ज्यादा कुछ नहीं है फ़िर जूते क्यों निकाले जाये? 

मैंने मन ही मन सोचा कि यह जगह वैसे भी भूतहा के नाम से बदनाम है अगर बिना भगवान वाले मन्दिर में ही कोई भूत निकल आया तो बिन जूते भाग भी नहीं पायेंगे। जूते पहने रखने में ही भलाई है। इस मन्दिर के चबूतरे पर चढने के बाद दूसरा मन्दिर भी दिखायी दिया। जिसका नाम सोमेश्वर महादेव है। दोनों मन्दिरों की दीवारों व छत पर की गयी नक्काशी बहुत शानदार है। 

सोमेश्वर मन्दिर के मुख्य भवन में शिवलिंग दिखायी देता है। बाहर नन्दी भी विराजमान है। पुराणों में वर्णित कहानियों अनुसार नन्दी व शिव का अटूट रिश्ता आज भी बदस्तूर जारी है। कुछ लोग पुराणों को ऊपर वाले के रचित मानते है। लेकिन जहाँ तक मुझे लगता है कि पुराण हो या कुरान, एक बात तो निश्चित है कि परमात्मा जरुर है। जिसे हम सभी अलग-अलग रुप व धर्म अनुसार मानते चले आ रहे है। जिसके लिये सभी अपने-अपने तर्क भी दे देंगे। यह तर्क वितर्क मामले को उलझाने के लिये ही उतपन्न किये जाते है। ताकि आम लोग असली बात तक पहुँच ना जाये। धर्म के नाम पर चल रही दुकान बन्द ना हो जाये। धार्मिक प्रवचन कुछ ज्यादा ही हो गया। इससे पहले कोई पुराण या कुरान अंधभक्त मुझे आशाराम बापू घोषित करे। चलो मन्दिर के पीछे केवडे की खुशबू आ रही है केवडे का जंगल देखने चलते है।

सोमेश्वर मन्दिर के ठीक पीछे केवडे का जंगल है। मन्दिर की छत पर जाने के बाद हमने देखा कि दीवार के पीछे केवडे का घनघोर जंगल है। हम सभी एक-एक कर मन्दिर की छत से सटी किले की दीवार पर कूदते चले गये। हमारे एक साथी को मन्दिर की छत से किले की दीवार पर कूदने के दौरान पैर के पंजे में मोच आ गयी। जहाँ से हम कूदे थे उसकी ऊँचाई मुश्किल से 7-8 फ़ुट रही होगी। ताजी-ताजी मोच थी उस समय तो ज्यादा तकलीफ़ नहीं हुई लेकिन दो-तीन घन्टे बाद साथी का चलना भी दुर्भर हो गया। 

सोमेश्वर मन्दिर के ठीक पहले पानी की एक बावली है। देखने से यह एक तालाब जैसी लगती है क्योंकि यह लगभग फ़ुल भरी हुई है। केवडे के जंगल से थोड़ा-थोड़ा पानी लगातार बहता दिख रहा था यह बावडी उसी पानी से भरी हुई है। इस बावड़ी में हो सकता है कि आसपास के गाँव के लोग अपनी श्रद्दा अनुसार नहाते भी होंगे। बावली का पानी बहुत गन्दा है लेकिन बरसात के दौरान इसकी स्वयं सफ़ाई हो जाती होगी। बावडी में लोगों को नहाने से रोकने के लिये लोहे के कंटीले तार बिछाकर रोकने का प्रबन्ध किया हुआ है। ठन्ड़ का मौसम था। नहीं तो मन तो हमारा भी था कि इस प्रकार की किसी बावड़ी में नहाया जाये। महाराष्ट्र के भीमाशंकर मन्दिर में इस प्रकार की स्नान बावड़ी में एक बार स्नान कर चुका हूँ।

केवडे के जंगल में हमारे साथ एक मजेदार घटना हुई थी। जब हम मन्दिर की छत से केवडे का जंगल देख रहे थे तो हम सभी को केवडे के जंगल से मदहोश कर देने वाली खुशबू आ रही थी। हमने सोचा कि यही केवडे की खुशबू है। लेकिन हमारी खुशी ज्यादा देर ना बनी रह सकी। केवडे का जंगल पार करने के बाद हमें उसके एक किनारे पर कुछ लोग धूप बत्ती जलाते हुए मिले। इस स्थान पर उस धूप खुशबू की अधिकता होने पर हमें सच्चाई पता लगी कि जिसे हम केवडे की खुशबू सोच रहे है। वास्तव में वह अगरबत्ती या धूप बत्ती की महक है। हमने सोचा था कि यही केवडे की सुगन्ध होगी। जिसे देखते हुए हम उस ओर चले आये थे। अगर हमें धूप बत्ती वाले लोग दिखायी ना देते तो हम इसी भूल में रह जाते कि हमने केवड़े की महक सच में देखी थी।

मन्दिर देखने के बाद आगे चलते है। हमें सामने किले की तीन मंजिला भवन की इमारत दिखायी दे रही थी। कैमरे का जूम करके देखा गया कि इसकी ऊपरी मंजिल पूरी तरह धवस्त हो गयी है। अरावली पर्वत श्रृंखला में स्थित भानगढ किले के खण्ड़हरों को लोगों ने भूतों का अड़ड़ा मान लिया है। आज भले ही यह भूतों का अड़ड़ा माना जाता हो लेकिन इस किले के अन्दर 16-17 वी शती तक जिन्दगी खिलखिलाया करती थी। 

आज भले ही किले के अन्दर खण्ड़हर छत विहीन दिखायी देते हो लेकिन कभी तो यहाँ का बाजार, मन्दिर, महल आदि शान बान से खडे थे। यहाँ भानगढ के भूतों को मैंने देखा है? यह प्रमाण के साथ किसी ने नहीं कहा। किसी ने यहाँ के भूत प्रमाण के साथ नहीं देखे। जो भी यहाँ के भूतों का जिक्र करता है वो सुनी सुनाई बात दूसरों को बताता है। उसके बाद भी यह किला सरकारी आंकडों में देश का सबसे ड़रावना स्थल माना जाता है। 

अब चलते है इस किले के खन्ड़हर होने के पीछे प्रचलित कुछ चुनिन्दा कहानियों में से एक के बारे में। भानगढ के किले के बारे में कहा जाता है कि यह रातों रात आलीशान किले से खन्ड़हर में बदल गया था। इस किले में किसी भी इमारत में छत सही सलामत नहीं बची है। जबकि मन्दिर सारे सही सलामत है। भानगढ के बारे में कई कहानी बतायी जाती है जिसमें से सिंधिया नाम के तांत्रिक की कहानी ज्यादा प्रचलित है। 

तांत्रिक का दिल यहाँ की राजकुमारी रत्नावती पर आ गया। तांत्रिक ने एक दिन राजकुमारी की दासी को बाजार से तेल खरीदते हुए देख लिया। तांत्रिक ने तुरन्त अपना कमाल दिखा दिया। तांत्रिक ने उस तेल पर जादू टोना कर दिया। यदि यह तेल राजकुमारी लगा लेती तो राजकुमारी उसके पास खिंची चली आती लेकिन किस्मत भी बड़ी कुत्ती चीज होती है। राजा को रंक व रंक को फ़कीर बना ड़ालती है।

तेल की शीशी राजकुमारी के हाथ से फ़िसल कर एक बडे पत्थर पर गिर गयी। अब तांत्रिक का जादू तो तेल पर हो चुका था। उसका असर तो होना ही था। तांत्रिक असर उस पत्थर पर चल गया। पत्थर महल से निकल कर तांत्रिक से जा चिपका। तांत्रिक को अगर पता होता कि तेरे मंत्र में इतनी शक्ति है तो शायद वह तेल पर मन्त्र ना फ़ूकता? पत्थर ने तांत्रिक को जमकर प्यार किया जिसका नतीजा यह हुआ कि तांत्रिक पत्थर से कुचले जाने पर मर गया। दम तोड़ते तांत्रिक ने शाप दे दिया कि मन्दिर को छोड़ कर सारा किला ढह जायेगा। आसपास के गाँव के लोग मानते है कि उसी तांत्रिक के कारण रातों रात किला खण्ड़हर में बदल गया। रत्नावती व भानगढ के मरे लोगों की आत्मा अब भी किले में भटकती है।

इस किले में सूर्यास्त के बाद सूर्योदय होने तक रुकना मना है। कुछ लोग यहाँ के बारे में बहुत सारी ड़रावनी बाते करते है। लेकिन हमें यहाँ कुछ भी ऐसा नहीं मिला या महसूस हुआ कि जिसे एक पल को भी ड़र पैदा हो सके। नजदीक के गाँव के लोग कहते है भानगढ किला जंगल में बना है जिस कारण रात में लकडभग्गे व सियार यहाँ घूमते है। इसी कारण रात में यहाँ घूमने पर रोक है। असलियत क्या है? नहीं पता।

भानगढ देखने के बाद टहला की ओर चल दिये। किले से बाहर आकर गाड़ी में बैठ गये। पता लगा कि दो साथी कम है। मजाक करने लगे कि कही भूतों ने तो नहीं पकड़ लिया। लेकिन सब ठीक था। ऊपर से कूदने पर पैर में आयी मोच से एक साथी चलने में दिक्कत महसूस कर रहा था। गाड़ी में बैठने के दौरान सामने एक छतरी दिखायी दे रही थी। गाडी के ऊपर बिजली का खम्बे पर सिर्फ़ एक ही तार दिखायी दे रहा था। सिर्फ़ एक तार से बिजली कैसे सप्लाई हो सकती है। एक साथी ने बताया कि जमीन से अर्थ लेने के कारण एक तार से ही ग्यारह हजार वोल्ट की बिजली सप्लाई हो जाती है। 

गाड़ी चलते ही कुछ साथी भूख लग रही है कि रट लगाने लगे। अशोक भाई बोले कि चलो सरिस्का पहुँचकर खाना खायेंगे। लेकिन भूख के कारण सरिस्का तक कौन जायेगा लगता है कि इन्हे यही खाना देना पडेगा। पहले भूतों के गढ से बाहर तो निकलों। अब हमें सरिस्का जाना था। लेकिन जयपुर के रहने वाले दोस्त विधान ने मुझे बताया था कि जाट भाई नीलकंठ मन्दिर जरुर देखकर आना। टहला से 8 किमी दूर है। 

मुख्य मार्ग पर सफ़ेद रंग का बना देव नारायण मन्दिर है। इस मन्दिर के थोड़ा आगे मंगलसर बाँध दिखायी देता है। नीलकंठ मन्दिर तक पहुँचना भी रोमांचक है। अशोक भाई तो यहाँ का दो किमी का तीखी चढाई वाला मार्ग देखकर वापिस लौटने की बात कहने लगे थे। अगले लेख में आपको इसी नीलकंठ मन्दिर के दर्शन कराये जायेंगे। (यात्रा अभी जारी है।)































6 टिप्‍पणियां:

  1. भाई मै अभी तक भानगढ़ नही गया पर टी.वी ओर अखबार मे इस की यह कहानी पढी व सुनी है तो इसे देखने का मन है पता नही कब जा पाऊगा.
    आपके सभी फोटो दर्शनीय है,लंगूर की पुछं वाला फोटो बहुत फनी है

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन वर्ल्ड वाइड वेब को फैले हुये २५ साल - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. भानगढ़ किले के बारे में संक्षिप्त जानकारी और इतनी सुन्दर तस्वीरों के लिए आपका सादर धन्यवाद।।

    नई कड़ियाँ : 25 साल का हुआ वर्ल्ड वाइड वेब (WWW)

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  4. बहुत गहन अध्ययन करा दिया...भानगढ़ की हिस्ट्री का...खूबसूरत जगह लगी...भुत भी भाग गए होंगे आपकी सेना को देख कर...

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  5. बड़े ही सुन्दर चित्र। इतना बड़ा निर्माण और वह भी त्यक्त।

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शालीन शब्दों में लिखी आपकी बात पर अमल किया जायेगा।

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