शुक्रवार, 14 मार्च 2014

Sariska- Neelkanth Mahadev Temple सरिस्का-नीलकंठ महादेव मन्दिर

भानगढ-सरिस्का-पान्डुपोल-यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे दिये गये है।
01- दिल्ली से अजबगढ होते हुए भानगढ तक की यात्रा।
02- भानगढ में भूतों के किले की रहस्मयी दुनिया का सचित्र विवरण
03- राजस्थान का लघु खजुराहो-सरिस्का का नीलकंठ महादेव मन्दिर
04- सरिस्का वन्य जीव अभ्यारण में जंगली जानवरों के मध्य की गयी यात्रा।
05- सरिस्का नेशनल पार्क में हनुमान व भीम की मिलन स्थली पाण्डु पोल
06- राजा भृतहरि समाधी मन्दिर व गुफ़ा राजा की पूरी कहानी विवरण सहित
07- नटनी का बारा, उलाहेडी गाँव के खण्डहर व पहाडी की चढाई
08- नीमराणा की 12 मंजिल गहरी ऐतिहासिक बावली दर्शन के साथ यात्रा समाप्त

BHANGARH-SARISKA-PANDUPOL-NEEMRANA-03                           SANDEEP PANWAR

भानगढ से गाड़ी चलते ही दो साथी भूख लगने की बात कहने लगे तो अशोक भाई बोले, चलो सरिस्का पहुँचकर खाना खायेंगे। भानगढ से सरिस्का में प्रवेश दरवाजे की दूरी 30 किमी है। जबकि हमें उससे पहले नीलकंठ महादेव मन्दिर देखने भी जाना है जिसमें कम से कम दो घन्टे का समय लग जाना है। इसलिये तय हुआ कि हाइवे पर पहुँचते ही बैठने लायक जगह देखकर रुक जायेंगे। हाईवे पर आते ही टहला की ओर मुड़ते ही दो दुकाने बनी है इसलिये गाड़ी किनारे लगा कर भोजन की तैयारी होने लगी। अशोक भाई घर से 30 पराँठे व 6 लीटर छाय लेकर आये थे। गाड़ी से खाना निकाल कर सब लोगों के एक साथ बैठने के लिये बैंच व तख्त एक जगह मिला दिये।





तख्त पर मुश्किल से 4-5 लोग ही आ पाये। बाकि दोस्त बैंच पर बैठ गये। अशोक भाई ने सबको पराँठे वितरित कर दिये। अशोक भाई छाय/छाच पीने के लिये प्लास्टिक के ग्लास घर से साथ लाये गये थे। दावत का पूरा प्रबन्ध था। छाच में मिलाने के लिये भूना और पीसा हुआ जीरा तथा नमक भी 2 डिब्बिओं में था। पीसे हुए जीरा व नमक मिलाने पर छाय का स्वाद कई गुणा बढ गया। मैंने एक पराँठा खा चुका था कि तभी अशोक भाई ने एक कटोरी निकाली और कहा संदीप जी चटनी तो निकालनी याद ही नहीं रही। वाह जी वाह, चटनी भी है। दावत का स्वाद बढता ही जा रहा है।

जब हम खाना खा रहे थे तो एक स्वान हमारी ओर रोटी के टुकडे की उम्मीद में देखे जा रहा था। इसे आधा पराँठा दे दिया। उसे रोटी मिलती देख एक मरियल सा स्वान भी रोटी पाने की उम्मीद में वहाँ आ पहुँचा। इसे अशोक जी ने पूरा पराँठा दे दिया। पहले वाला स्वान कुछ ज्यादा ही तकड़ा था। उसने मरियल स्वान की पुंगी बजा कर रख दी। मरियल स्वान को एक रोटी से इतनी खुशी नहीं मिली होगी जितनी मरम्मत तगडे स्वान ने कर दी। मरियल स्वान कू-कू करता हुआ अपनी जान बचाकर वहाँ से भाग खड़ा हुआ। आगे जाकर तगड़ा स्वान एक सुअर के पीछे लग गया। तभी मेरी नजर तिराहे पर खडे चार मुसाफ़िरों पर गयी। उन चारों में तीन लड़कियाँ थी जबकि जबकि लड़का केवल एक ही था। ये चारों शायद अपने अन्य साथियों की प्रतीक्षा कर रहे होंगे ताकि इनका संतुलन बनाया जा सके।

दोपहर का खाना खाने के उपराँत हम सभी गाड़ी में सवार हो गये। अशोक जी ने मुझे आज भी गाड़ी में सबसे आगे वाली सीट दी हुई थी। आगे वाली सीट मिलने का काफ़ी लाभ हुआ। फ़ोटो लेने के लिये अच्छी जगह का चुनाव करने में आसानी होती थी। अगर पीछे वाली किसी सीट पर बैठना पड़ता तो शायद इतने फ़ोटो नहीं ले पाता। आगे वाली सीट देने के लिये अशोक भाई का आभारी हूँ। चालक गाड़ी लेकर चल दिया। लेकिन जब स्कारपियो काफ़ी देर तक धीमे-धीमे चलती रही तो अशोक जी बोले क्या हुआ? गाड़ी तेज चलाओ ना। 

चालक बोला गाड़ी पिकअप नहीं पकड़ रही है। अब क्या करे? मजबूरी में उसी चाल पर चलते रहे। एक किमी बाद गाड़ी ने गति पकड़ ही ली। लेकिन यह खुशी ज्यादा देर ना बनी रही कुछ देर बाद फ़िर गाड़ी धीमी हो गयी। अब यह धीमी तेजी का खेल हमारे साथ काफ़ी देर तक चलता रहा। रात में रुकने का ठिकाना भी पीछे निकल गया था। अगर मेरा फ़िर कभी इस ओर आना हुआ तो इस मन्दिर की धर्मशाला में जरुर ठहरा जायेगा। भानगढ आते समय हमने सड़क किनारे मिलने वाले ठिकाने से 20 लीटर डीजल ड़लवाया था। उस डीजल में ही कुछ मिलावट रही होगी। अब जब तक यह डीजल समाप्त नहीं होगा तब तक गाडी को हिचकोले खाते रहने पडेंगे।

तिराहे से सीधे हाथ टहला की ओर मुड़ गये। इस मार्ग पर टहला के करीब पहुँचकर सड़क के उल्टे हाथ नीलकंठ मन्दिर जाने का बोर्ड़ व सड़क दिखायी दी। मुख्य मार्ग पर सफ़ेद रंग का देव नारायण मन्दिर बना दिखायी देता है। अगर हमें यह नहीं पता होता कि नीलकंठ यहाँ से 8 किमी दूर है तो हम इसे ही नीलंकठ मन्दिर मान चुके होते। मुख्य हाइवे से नीलकंठ मन्दिर वाले मार्ग पर चलने के सीधे हाथ मंगलसर बाँध का पानी दिखायी देता है। हमारी बान्ध देखने की कोई इच्छा नहीं थी।

नीलकंठ मन्दिर तक पहुँचना भी कम रोमांचक नहीं है। शुरु के 6 किमी की सड़क तो फ़िर भी बडे पहिये की गाड़ी (कार नहीं) चलने लायक है लेकिन आखिरी के 2 किमी की तीखी चढाई तो हिमालय की सड़कों से सीधी टक्कर लेती है। अशोक भाई तो यहाँ के अन्तिम दो किमी का तीखी चढाई वाला मार्ग देखकर, वापिस लौटने की बात कहने लगे थे। इस यात्रा में अगर मेरे अलावा दो पहाड़ी मानव नहीं होते तो अशोक भाई शायद ही इस जगह जा पाते। अशोक भाई की चिन्ता अपनी जगह सही थी वे शायद पहली बार इतनी तीखी चढाई पर किसी वाहन में बैठकर चढने जा रहे थे। मुझे ऐसी चढाई देखकर बड़ा अच्छा लगने लगता है। मन ऐसी चढाई देखकर बाग-बाग हो जाता है।

इस चढाई पर सड़क की हालत बेहद ही बुरी अवस्था में मिली। पहाड़ी इलाकों में बहने वाले पानी की भारी मात्रा सड़कों से होकर नीचे बहती है जिससे तारकोल की सड़क ज्यादा दिन टिक नहीं पाती है। एक दो जगह तो स्कारपियो झूले की तरह झूलती हुई आगे निकली थी। इस उबड़-खाबड़ मार्ग को देखकर अशोक भाई बोले कि चलो आगे की यात्रा पैदल करते है। चिन्ता ना करो अशोक जी यह गाड़ी काफ़ी दमदार है इन गड्डों से इसमें कोई समस्या नहीं आने वाली।

चढाई के कारण हमारी गति मुश्किल से 10 किमी की ही थी। इस चढाई में एक मजेदार बात और हुई कि 2 महिलाये ऊपर मन्दिर तक या मन्दिर वाले गाँव नीलकंठ तक पैदल ही जा रही थी। उन्होंने हमारी गाड़ी में बैठने के लिये रुकने का ईशारा किया। लेकिन हमारी गाड़ी में इतनी जगह नहीं थी कि हम उन दोनों को एक साथ बैठा सकते। हाँ एक के लिये जगह हो सकती थी। दूसरी बात गाडी चढाई पर चढ रही थी। चढती गाड़ी का मौसम तोड़ा नहीं जा सकता था। ऊपर से हमारी गाड़ी के पिकअप में समस्या थी। चढती गाड़ी की लगातार रेस दबी होने से गाड़ी का मौसम नहीं टूट सका, नहीं तो मैं सोच रहा था कि यदि चढाई में गाड़ी ने दिक्कत की तो यही से वापिस लौटना पडेगा। नीलकंठ फ़िर कभी देखा जायेगा।

पहाड़ के ऊपर पहुँचते ही दर्रे नुमा जगह में एक दरवाजा दिखाई दिया। इस दरवाजे को देखकर अंदाजा लगाया कि यहाँ जरुर किले जैसी सुरक्षा वाली चार दीवारी भी जरुर होगी। दरवाजे के उस पार जाकर हमें दीवार भी दिखायी दी। दरवाजे के पार करते ही उतराई आरम्भ हो गयी। मुश्किल से आधा किमी भी नहीं गये थे कि नीलकंठ मन्दिर के बारे में एक बोर्ड़ मिला। इस बोर्ड पर लिखा था कि मन्दिर यहाँ से 1 किमी दूर है लेकिन मन्दिर सामने दिख रहा था। झाडियों के बीच से होकर मन्दिर वाले नीलकंठ गाँव में पहुँचे। आखिरकार नीलकंठ मन्दिर में पहुँच ही गये। मन्दिर के ठीक पीछे गाड़ी खड़ी करने की जगह बनाई हुई है।

मैंने गाड़ी से उतरते ही फ़ोटो लेने शुरु कर दिये थे। एक बन्दा बोला यहाँ फ़्री में फ़ोटो नहीं ले सकते। पैसे ले ले भाई, फ़ोटो ले जरुर लेने है नहीं तो यहाँ क्या बाबा जी का ठूल्लू लेने आये है? वह बन्दा बोला पैसे आपको मन्दिर के अन्दर जाने पर जमा कराने होंगे। कुछ बाते मन्दिर के बारे में भी होनी चाहिए। राजा अजयपाल ने इस मन्दिर की स्थापना में अहम किरदार निभाया था। यहाँ लगभग 300 की संख्या में मन्दिर थे। जिनको मुस्लिम आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया था। हमलावरों ने जो मन्दिर नष्ट किये है उन्हे देवरी कहकर पुकारा जाता है। जिस देवता या भगवान का मन्दिर था उसके नाम के साथ देवरी जोड़ दिया गया है।

यहाँ जैन मन्दिर भी थे जिनमें से अब मन्दिर तो कोई नहीं बचा है हाँ सिर्फ़ अपवाद स्वरुप इक्का-दुक्का मूर्ति दिखायी देती है। इस मन्दिर की तुलना मध्यप्रदेश के खजुराहो मन्दिर में बनी मिथुन मूर्तियों से की जाती है लेकिन राजस्थान का असली खजुराहो तो किराडू का मन्दिर है जो धोरों के गढ बाड़मेर में है। राजस्थान का लघु खजुराहो कहा जाने वाला एक अन्य मन्दिर भी है। यह मन्दिर उदयपुर के पास जगत नामक जगह पर है। इसे अम्बिका मन्दिर कहते है। अब अगला निशाना इन दोनों मन्दिरों को देखने का है।

चारदीवारी के चक्कर लगाते हुए हम मन्दिर के प्रांगण में दाखिल हुए। मन्दिर परिसर में जाकर देखा कि वहाँ कुछ लोग बैठे ताश का खेल खेल रहे है। मन्दिर परिसर में पुलिस चौकी का बोर्ड़ देखा। परिसर में बहुत सारी मूर्तियाँ रखी हुई थी। इन मूर्तियों को आसपास के तोडे गये मन्दिरों से लाकर रखा गया है। मैंने 25 रु अदा कर फ़ोटो खींचने के लिये अपनी पर्ची कटा ली। जब तक मैंने पर्ची कटायी तब तक अन्य साथी भी आ पहुँचे।

मुख्य मन्दिर के भवन में शिवलिंग बना हुआ है। जिसकी मोटाई देखकर लगा कि कभी इसकी बहुत मान्यता रही होगी। मंदिर में खम्बों पर बनी शिला व भित्ती चित्र देखकर लगता ही नहीं है यह जगह किसी का क्या बिगाड सकती है? यहाँ की प्रसिद्दी मुगलों तक भी पहुँची। उन्होंने अन्य हिन्दू धर्म स्थलों की तरह इसे भी तहस नहस कर ड़ाला था। यहाँ बहुत सारे मन्दिर बताये जाते थे लेकिन आज मुश्किल से यह मन्दिर ही सही सलामत है। हो सकता है कि इसे भी बाद में पुन निर्मित किया गया हो।

मन्दिर देखकर बाहर आ गये। सामने एक अन्य मन्दिर के खण्ड़हर दिखाई दे रहे थे। साथियों की दिलचस्पी उन खण्ड़हरों में नहीं थी। मैंने कहा आप लोग चलो मैं उस जगह के फ़ोटो लेकर आता हूँ। जैसे ही मैं इस जगह पहुँचा तो यहाँ आकर लगा कि यह मन्दिर उस मन्दिर से भी शानदार रहा होगा। तभी तो इसका पूरी तरह सर्वनाश कर दिया गया है। मन्दिर के फ़ोटो लेकर वापिस आने लगा तो मेरी नजर एक बावली पर पडी। मैंने आवाज देकर अपने साथियों को बुलाया। यह बावड़ी लगभग 4 मंजिल की गहराई लिये हुए होगी। अशोक जी बोले कल आपको नीमराणा की 12 मंजिल गहरी बावली लेकर जाऊँगा।

मन्दिर से वापिस आकर गाड़ी में बैठ गये। गाड़ी चलने से पहले अशोक जी ने सबको कोल्ड़ ड्रिंक देना शुरु कर दिया था। मैंने भी अपना गिलास लेकर जल्द ही निपटा दिया। ठन्ड़ा पीने के बाद कुछ राहत मिली। जब सबने ठन्ड़ा पी लिया तो गाड़ी चालक हमें लेकर सरिस्का की ओर चल दिया। अबकी बार पहाड़ के दर्रे पर बने दरवाजे पर आते ही मैंने चालक से कहा, जरा गाड़ी तिरछी करना, मुझे इस दरवाजे का एक फ़ोटो लेना है। चलती गाड़ी एक पल के लिये रुकवा कर आगे बढे। एक पल फ़ोटो लेने के काफ़ी था।

अब तीखी चढाई जोरदार ढलान में बदल चुकी थी। ढलान पर उतरते हुए अत्यधिक सावधानी बरतनी होती है। यहाँ की सड़क अत्यधिक खराब थी जिस कारण गाड़ी तेज गति में चलानी ही नहीं पड़ी। मुझे याद है कि साच पास पर चढने में समस्या तो आई थी लेकिन उससे ज्यादा आफ़त तो उतराई में आई थी। जब बाइक बन्द करने व ब्रेक लगाने के बावजूद कूदती हुई चली जाती थी। उतराई में सबसे ज्यादा वाहन दुर्घटना ग्रस्त होते है। धीरे-धीरे उतराई पार की। सड़क पर आकर गाड़ी ने कुछ गति पकडी। खराब सड़क होने से मुख्य हाईवे पर पहुँचने में ही हमें आधा घन्टा लग गया।

हाइवे पर आते ही टहला नामक जगह आती है। यहाँ से सरिस्का ज्यादा दूर नहीं रह जाता। हम शानदार सड़क पर सरिस्का की ओर चले जा रहे थे कि अचानक पहाड़ी मार्ग पर एक मोड़ आया तो वहाँ चीख पुकार देखकर मन की हालत खराब हो गयी। मैं सबसे आगे बैठा था इसलिये सबसे ज्यादा मैंने ही देखा था। मैंने उस मोड़ पर किसी का कटा हुआ एक पैर देखा। एक जीप जो शायद वहाँ मोड़ पर कुछ देर पहले ही पलटी थी। उसका हरा कूलेन्ट सड़क पर बिखरा हुआ था। 

कई लोग सड़क किनारे खून से लथ-पथ लेटे हुए थे। कई औरते उनके पास बैठी रोने पीटने में लगी थी। थोड़ा आगे एक सरकारी बस भी खड़ी थी। बस एकदम सही सलामत खड़ी थी जिससे यह अंदाजा लगाने में आसानी हुई कि दुर्घटना ग्रस्त जीप व बस में कोई टक्कर नहीं हुई है। लोकल सवारियों को ढोने में लगी जीपे अत्यधिक सवारियाँ चढा लेती है। सवारियाँ इनके बोनट से लेकर छत पर भी सवार रहती है। उस मोड़ पर जीप चालक अपना संतुलन जीप से खो बैठा होगा। मोड़ पर जीप पलट गयी जिसके नीचे उसकी छत व बोनट पर बैठी सवारियाँ सबसे ज्यादा जख्मी हुई है। उन्ही में किसी सवारी का कटा हुआ पैर मोड़ पर पड़ा हुआ था। अत्यधिक जख्मी लोगों को वहाँ से किसी वाहन में ले जाया जा चुका था। हम उन सबको उनके हाल पर छोड़कर सरिस्का के प्रवेश दरवाजे पर पहुँच गये।
अगले लेख में आपको सरिस्का वन्य जीव अभ्यारण के जंगली जानवरों दर्शन कराये जायेंगे। (यात्रा अभी जारी है।)

























4 टिप्‍पणियां:

  1. पराठे और छाछ देख कर मन करने लगा। हर क्षेत्र में बावड़ी की स्वस्थ परम्परा जलसंचयन के प्रति हमारी कृतबद्धता दिखाती है। जब लोग साथ हों तो आनन्द तो आना ही है।

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  2. सन्दीप जी अबकी बार सुन्दर व अनदेखी जगह घुमा रहे हो हमे .मजा आ गया .

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