गुरुवार, 20 मार्च 2014

Padu Pole-A big hole in a mountain हनुमान व भीम मिलन स्थल- पाण्डु पोल

भानगढ-सरिस्का-पान्डुपोल-यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे दिये गये है।
01- दिल्ली से अजबगढ होते हुए भानगढ तक की यात्रा।
02- भानगढ में भूतों के किले की रहस्मयी दुनिया का सचित्र विवरण
03- राजस्थान का लघु खजुराहो-सरिस्का का नीलकंठ महादेव मन्दिर
04- सरिस्का वन्य जीव अभ्यारण में जंगली जानवरों के मध्य की गयी यात्रा।
05- सरिस्का नेशनल पार्क में हनुमान व भीम की मिलन स्थली पाण्डु पोल
06- राजा भृतहरि समाधी मन्दिर व गुफ़ा राजा की पूरी कहानी विवरण सहित
07- नटनी का बारा, उलाहेडी गाँव के खण्डहर व पहाडी की चढाई
08- नीमराणा की 12 मंजिल गहरी ऐतिहासिक बावली दर्शन के साथ यात्रा समाप्त

BHANGARH-SARISKA-PANDUPOL-NEEMRANA-05                           SANDEEP PANWAR

हमारी गाडी पान्डु पोल मन्दिर के सामने जा पहुँची। यह वही मन्दिर बताया गया है जहाँ महाबली भीम के मार्ग में श्रीराम भक्त हनुमान जी की पूँछ आ गयी थी। गाडी से उतर कर मन्दिर की ओर बढने लगे। मन्दिर की सीढियों के सामने से होते हुए मन्दिर से आगे निकल गये। कुछ साथी मन्दिर के अन्दर जाने लगे तो अशोक भाई ने उन्हे वापिस बुलाया। अशोक भाई के साथ मेरी बात पहले ही हो चुकी थी। तय हुआ था कि मन्दिर जाने से पहले पाण्डु पोल झरना वाला स्थान देखने जायेंगे। अशोक जी यहाँ कई बार आ चुके है जिसमें एक बार उन्हे पाण्डु पोल तक जाने की अनुमति नहीं मिली थी। जैसे ही हम मन्दिर के आगे से घूमते हुए मन्दिर के पीछे पहुँचे तो देखा कि सामने से कुछ लोग चले आ रहे है।



अशोक जी ने उनसे पूछा कि पोल तक जाने से कोई रोक तो नहीं रहा है? जवाब मिला नहीं। फ़िर क्या था अशोक जी के चेहरे की चमक बयां कर रही थी कि हम पोल तक जा सकते है। इससे पहल अशोक जी सोच रहे थे कि यदि किसी वर्दीधारी ने पहले की तरह वहाँ जाने से रोका तो उसको अनुरोध कर आगे जाने की कोशिश करेंगे। लेकिन अधिकांश वर्दी धारी अनुरोध से ज्यादा लालच वाली बात पर जल्द अमल करते है। हम उस हालात के लिये भी तैयार थे। लेकिन जब कोई रोकने टोकने वाला मिला ही नहीं तो फ़िर चिंता काहे की? हमारा काफ़िला पोल की ओर बढने लगा।
मार्ग खुला होने के कारण हमारी गति अप्रत्याशित रुप से कुछ अधिक हो गयी थी। एक साथी के पैर में मोच के कारण दर्द हो गया था। उसकी आने की उम्मीद नहीं के बराबर थी। लेकिन बाद में पता लगा कि वह भी हमारे पीछे-पीछे आ रहा था। जिस रुखी-सूखी सी नदी को गाड़ी में बैठकर काफ़ी देर से देखते चले आ रहे थे। अब वही नदी, पैदल चलते हुए हमारा साथ निभा रही थी। जंगल में यात्रा/ट्रेकिंग करने में जो मजा पैदल चलने में आता है वह आनन्द गाडी में सवार होकर कहाँ आता है?
हम धीरे-धीरे आगे बढते जा रहे थे। मैंने अशोक भाई से यह नहीं पूछा था कि मन्दिर से पोल कितनी दूर है? मेरा अनुमान था कि पोल मन्दिर से ज्यादा से जयादा 500-700 मीटर दूर होगा। लेकिन जब हमें चलते हुए 5-6 मिनट से ज्यादा हो गयी तो मुझे लगने लगा कि पोल अभी काफ़ी दूर है। सामने एक कुटिया जैसी जगह दिखायी दी तो एक बार लगा कि हम पोल तक आ गये है। पोल के पास एक चेतावनी दर्शाता बोर्ड़ दिखायी दिया। इस बोर्ड़ अनुसार यहाँ इस जगह अब तक कितने लोग मारे जा चुके है। उस बोर्ड़ में सबसे मजेदार बात सबसे आखिरी में लिखी थी। वहाँ लिखा था क्या आप यहाँ खाली बाकस में अपना नाम लिखवाना चाहोगे। आज देश के मौजूदा हालत देखते हुए सिर्फ़ खुजलीवाले का नाम इस बाक्स में लिखा जा सकता है।
बिना रुके आगे बढते रहे। अभी तक पक्की काली सडक मिल रही थी। यहाँ से आगे पक्की सडक समाप्त होकर केवल पत्थर ही पत्थर दिखायी देने लगे। खजूर के पेडों की अधिकता वाले जंगल में हमें भी खजूर के पेडों के बीच से झुककर आगे बढना पडा। जैसे-जैसे हम आगे बढते जा रहे थे। नजारे एक से एक दिखायी दे रहे थे इसी के साथ पगडन्डी साधारण रुप से विकराल रुप धारण कर चुकी थी। बीच-बीच में कई जगह कूद-कूद कर आगे बढना पडा। जिस साथी को पैर में मोच आयी थी। यह पगडन्डी उसके लिये बहुत भयंकर साबित हुई। मेरा पैर खुद दो बार फ़िसल गया था। जिस कारण सावधानी से चलते हुए आगे जाना पडा। पैर सही सलामत तो मार्ग की चिन्ता नहीं। लेकिन उल्टा हो जाये तो फ़र्श पर चलना भी हिमालय पर चढने जैसा प्रतीत हो जाता है।
खजूर के पेड पर शाखाएँ तो नहीं होती है। शाखाओं की जगह लम्बे पत्ते होते है। बचपन में गाँव के पास वाले खेतों में खडे खजूर के पेडों से नीचे गिरे इन बडे लम्बे पत्तों से खेलने का साधन बनाया करते थे। इन पत्तों को देखकर अपना बचपन आया आ गया। मैंने कैमरा एक साथी को पकडा कर इसे चलाते हुए एक फ़ोटो भी ले ही लिया। अशोक जी बोले पाण्डु पोल नजदीक ही है। अब तक हम एक किमी से ज्यादा आ चुके थे। लंगूर हमारे मार्ग किनारे बैठे हुए मिल रहे थे। स्थानीय लोग आस्था के कारण इन लंगूरों को खाने के लिये चने आदि लेकर आते है। एक जगह तीन लंगूर एक साथ बैठे हुए थे। इन्हे देखते ही मुझे कर्मचन्द गाँधी की याद आ गयी। जिसका कोई भी आन्दोलन सफ़ल ना होने के बावजूद उसे अंग्रेजों की भारत में बनायी राजनीतिक संगठन कांग्रेस का मुख्या होने के नाते आजाद भारत में कथित राष्ट्र पिता बना दिया गया था। यह गाँधी वो वकील था जिसने भगत सिंह का कोर्ट में मुकदमा लडने से मना कर दिया था। इसी के कारण सुभाष बोस को कांग्रेस अध्यक्ष पद पर चुने जाने के बावजूद, अपने पद से त्याग पत्र देना पडा था।
सामने कुछ सीढियाँ दिखायी दे रही है। इन पर चढते हुए ऊपर पहुँच गये। ऊपर जाते ही साँस रोककर देखने वाला नजारा था। सामने पहाड में एक विशाल छिद्र/ सुराख/होल दिखायी दे रहा था। असलियत में तो यह सुराख पानी के निकलने से बना होगा लेकिन इसके पीछे एक कहानी भी बतायी जाती है कि भीम ने अपनी गदा से इस पहाड में यह सुराख बनाया था। मुझे भीम वाली बात पर जरा सा भी यकीन नहीं है।
बडे सुराख की हमारे सिर से ऊँचाई लगभग 40-50 फ़ुट रही होगी। ऊपर जाने का मार्ग नहीं था। उसके बावजूद कुछ हिम्मतवाले चट्टानों को पकड कर ऊपर पहुँच गये थे। ऐसी खतरनाक जगह ऊपर चढना आसान नही होता। लेकिन असली आफ़त तो ऊपर से नीचे उतरने में होती है। ऊपर गये लोग जब नीचे उतरने लगे तो उनकी हालत देखने लायक थी। अगर मैं अकेला होता तो वहाँ गये बिना मानने वाला नहीं था। अशोक भाई ने कहा, संदीप जी यह देखो इस पहाड के उल्टे वाले किनारे पर सीढियों के बने होने के निशान देख रहे हो। अरे हाँ, यह क्या है? यहाँ ऊपर तक पक्की सीढियाँ बनी हुई थी। लेकिन दो साल पहले बरसात में ज्यादा पानी आने से यह सीढियाँ पानी में बह गयी। जिसके बाद यहाँ दुबारा सीढियाँ नहीं बनायी जा रही है। हम इस जगह के लगभग बीच में खडे थे। दोनों तरफ़ के फ़ोटो लेकर वापिस चल दिये।
ऊँचाई से पानी गिरने के कारण नीचे की तरफ़ गहरा कुन्ड बना हुआ है जहाँ काफ़ी मात्रा में पानी जमा था। बरसात के दिनों में यहाँ जबरदस्त वाटर फ़ाल बनता होगा। अगर कभी मौका लगेगा तो एक बार बरसात के दिनों में यहाँ की यात्रा अवश्य करुँगा। वापसी में पक्की सीढियों पर सबको लाईन में खडे होने का कह, मैं सबसे आगे चला आया। अपने पूरे गिरोह का एक फ़ोटो तो लेना ही था। फ़ोटो लेकर मन्दिर के दर्शन करने चल दिये। पोल से मन्दिर तक आने में 20 मिनट का समय लगा होगा।
मन्दिर के सामने वाली सीढियों पर आते ही जूते निकाल कर एक ओर रख दिये। दिल्ली जैसे शहरो में मन्दिरों या अन्य धार्मिक स्थलों से जूते चोरी होने की पूरी उम्मीद रहती है लेकिन यहाँ ऐसा नहीं था। जुराब निकालने की आवश्यकता नहीं पडी। मन्दिर में प्रवेश करते ही घन्टा बजाने की प्रथा बनायी गयी है। कहते है भगवान को पता लग जाता है कि भक्त आया है। इसका अर्थ यह हुआ कि मन्दिर के बाहर भगवान को पता ही नहीं होता कि क्या चल रहा है? जहाँ तक मुझे लगता है कि घन्टा पुजारी को यह बताने के लिये लगाया गया होगा कि जाग पुजारी जाग, एक मुर्गा (भक्त) कटने के लिये आया है। परमात्मा की भक्ति के लिये कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए।
सीढियाँ चढते ही मुख्य मन्दिर दिखायी देता है। यहाँ हनुमान जी की लेटे हुए स्थिति में मूर्ति बनायी गयी है। मूर्ति दर्शन कर फ़ोटो लिया। कुछ लोग पुजारी से माथे पर टीका/तिलक लगवा रहे थे। मुझे यह दिखावा पसन्द नहीं है। हनुमान जी को राम-राम कर आगे चल दिये। मुख्य मन्दिर का गर्भ गृह सिर्फ़ एक कमरे जितना है। इसके ठीक पीछे एक विशाल खाली जगह है जिसके चारों ओर कमरे बने हुए है। हो सकता है मेले आदि के दिनों में यहाँ रुकने का प्रबन्ध हो जाता हो। या फ़िर पुजारी लोगों ने अपने लिये यह कमरे बनवाये हो। मन्दिर को देखते हुए मेरी नजर एक बोर्ड़ पर गयी। इसके सामने 5 पाण्ड़वों की मूर्ति तो नहीं है लेकिन उनके प्रतीक 5 पत्थर जरुर रखे हुए है।
इस बोर्ड़ पर लिखा है कि पाण्ड्वों को दुर्योधन के मामा शकुनि से जुए में हारने के कारण 12 वर्ष का वनवास हुआ था। जिसमें से अन्तिम 2 वर्ष अज्ञातवास में बिताने थे। अज्ञातवास में शर्त यह थी कि यदि इन 2 वर्ष में पाण्ड्वों के बारे में किसी को पता लग गया तो इनका वनवास फ़िर शुन्य से आरम्भ हो जायेगा। यहाँ मन्दिर वाली जगह पर पाण्डव एक दिन रुककर विराटनगर जाने के लिये आगे चल दिये। आगे चलकर पाण्डवों के सामने एक खडा पहाड आ गया। कहते है कि भीम ने युधिष्टर से आज्ञा लेकर इस पहाड में गदा का वार किया जिससे पहाड में सुराख हो गया।
गदा मारने से पर्वत से एक जलधारा भी निकल आयी। जो बरसात के दिनों में अपनी जवानी पर होती है। पर्वत में सुराख करने से भीम को अपने आप पर बहुत अभिमान हो गया। भीम का यह अभिमान चूर करने के लिये प्रभु ने एक लीला रची कि उन्होंने हनुमान जी को पाण्डवों के मार्ग में अवरोध बनाने के लिये भेज दिया। हनुमान जी ने अपनी पूँछ बढाकर इनके मार्ग में डाल दी ताकि पूँछ हटाये या लांगे बिना पाण्डव आगे नहीं जा पाये। भीम सबसे आगे चल रहा था। भीम ने हनुमान जी से कहा, हे वानर, अपनी पूँछ मार्ग से हटाओ। (भीम पवन पुत्र है और हनुमान भी पवन पुत्र है।) भीम अहंकार में होने के कारण अपने बडे भ्राता को पहचान नहीं पाया।
हनुमान जी बोले मैं बहुत बूढा हो गया हूँ मुझसे पूँछ सरकायी नहीं जा रही है। तुम्ही मेरी पूँछ हटाकर एक तरफ़ रख दो। भीम तो जोश से भरा हुआ था होश में होता तो वह हनुमान जी पहचान लेता। पहले तो भीम ने एक हाथ से पूंछ हटाने चाही लेकिन जब एक हाथ से बात ना बनी तो भीम को दोनों हाथ लगाने पड गये। आखिरकार भीम का सारा जोर लगने पर भी पूँछ ट्स से मस ना हुई। अन्त में हनुमान जी अपनी पूँछ भीम के ऊपर डाल दी जिससे भीम दब गया। अब तक सारे पाण्डव वहाँ आ चुके थे। युधिष्टर ने ताड लिया कि यह कोई साधारण वानर नहीं है। पाण्डवों के अनुरोध करने पर हनुमान जी ने अपने असली रुप के दर्शन कराये।
उस घटना के बाद पाण्डवों ने हनुमान जी का मन्दिर बनाकर पूजा की। हनुमान जी ने उनकी पूजा से खुश होकर आशिर्वाद दिया कि जाओ अज्ञातवास में तुम्हे कोई नहीं पकड पायेगा? भीम की गदा का कमाल, पहाड में इतना बडा सुराख भी देख लिया। मन्दिर में हनुमान जी की मूर्ति भी देख ली। चलो अब यहाँ से आगे चलने का समय हो रहा है। अगर हम यहां ज्यादा देर रुके तो कही हनुमान जी हमें यही पकड कर बैठा ना ले। इसलिये अब चलते है राजा भृतहरि की तपस्या स्थली के दर्शन कराने ले चलते है। यह राजा विक्रमादित्य के बडे भाई हुआ करते थे। मैंने उज्जैन में इन्ही राजा की एक तपस्या स्थली देखी थी।
मन्दिर से वापिस आते समय उस तिराहे पर पहुँचे जहाँ से सीधे हाथ मुडकर पाण्डु पोल की ओर आये थे। अबकी बार हमें सीधे जाना था। करीब २०-२५ किमी चलने के बाद सरिस्का से बाहर निकल गये। बाहर निकलने से पहले कार्ड वापिस लौटाना पडा। सामने हाईवे दिखायी दे रहा था। हाईवे के किनारे एक बोर्ड़ देखा, उस पर सरिस्का किले के बारे में लिखा था। अशोक भाई ने बताया था कि कर्ण-अर्जुन फ़िल्म की शूटिंग में अमरीश पुरी का घर इसी महल को बनाया गया था। महल के अन्दर सिर्फ़ मेहमानों को जाने दिया जाता है। मैंने गेट से ही इसका बाहरी फ़ोटो लिया और गाडी में आकर बैठ गया।
अगले लेख में आपको राजा भृतहरि तपस्या स्थली के दर्शन कराये जायेंगे। (यात्रा अभी जारी है।)
































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