बुधवार, 5 जुलाई 2017

Qutub Minar कुतुबमीनार या विष्णु स्तम्भ


कुतुबमीनार उर्फ विष्णु स्तंभ, जी हाँ दोस्तों, आज आपको भारत के दिल कहे जाने वाली दिल्ली के एतिहासिक स्मारक कुतुबमीनार की सैर कराते है। कुछ वर्षों पहले तक दिल्ली को दिलवालों का शहर कहा जाता था लेकिन वर्तमान में यह भिखमंगों का शहर सा लगता है। ऐसा नहीं है कि सभी भिखमंगे है, अधिकतर मेहनतकश लोग है जो मेहनत की रोटी खाना पसन्द करते है। भिखमंगे वाली बात राजनीति की ओर मुड जायेगी। जो मैं नहीं चाहूँगा। वैसे तो मैं इससे पहले भी कई बार कुतुबमीनार देख चुका हूँ। पहले की तीन यात्राओं में से, दो में तो मैंने फोटो लिये ही नहीं थे। दो बार की यात्रा में यहाँ के फोटो लिये थे। जो पुराने फोटो अभी मेरे पास है। वो इक्के-दुक्के ही है। वो भी कागज वाले। आजकल तो डिजीटल कैमरे आ गये है। कुछ वर्ष पहले ऐसा न था। पहले हम रील वाले कैमरा उपयोग करते थे जिसमें 36 फोटो हुआ करते थे। उसमें से आधे फोटो किसी न किसी कारण खराब हो जाया करते थे। यह लेख वैसे भी लम्बा होने जा रहा है। 2,800 शब्दों व 30 से ज्यादा फोटो तो इसी लेख में हो गये है। ऊपर से मैं यह फोटो वाला किस्सा शुरु में ही घुसा बैठा। चलो फोटो वाले किस्से को यही दफन करते हुए, आगे कुत्ता बीमार! अरे कुतुब मीनार की ओर बढते है। इस यात्रा में मेरा पूरा परिवार साथ गया था। पूरा परिवार बोले तो मियाँ बीबी बच्चों समेत। इस यात्रा में बम्बई नगरी में रहने वाला अपना इकलौता दोस्त विशाल राठौर भी साथ आने वाला था।
World heritage monument site... Qutub Minar, Mehrauli कुतुब मीनार, महरौली


चूंकि मैं दिल्ली के उत्तरी पूर्वी कोने में बचपन से ही रहता हूँ। इसलिये मुझे दिल्ली का अधिकतर भू-भाग अच्छी तरह याद है। बोम्बे वासी विशाल को दिल्ली की सडकों के बारे में बहुत कम जानकारी है। इसे यूँ कह सकते है कि मुझे बम्बईयों की सडकों का जितना ज्ञान है उतना ही विशाल को दिल्ली की सडकों का पता है। विशाल बम्बई से सीधे दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर पहुँचेगा। मैं तय समय पर सपरिवार निजामुद्दीन पहुँच गया। विशाल ने अपना सभी सामान निजामुद्दीन स्टेशन के अन्दर, टिकट खिडकी के ठीक बराबर में बने क्लाक रुम में जमा करा दिया। जिन भाईयों को जानकारी नहीं हो उन्हे बता देता हूँ कि रेलवे के क्लाक रुम में सामान रखने के लिये आईडी व PNR संख्या आवश्यक होती है। सामान जमा करते ही, हम लोग स्टेशन के बाहर पूर्व दिशा में रिंग रोड की तरफ बनी दुकानों में छोले-भटूरे का स्वाद लेने पहुँच गये। दुकान वाले ने छोले के ऊपर मक्खन भरपूर मात्रा में डाला हुआ था। मक्खन का साथ होने से छोले-भटूरे का स्वाद कई गुणा बढ गया था।
सुबह की पेट पूजा से फ्री होकर रिंग रोड पर, महरौली जाने वाली बस में सवार होने पहुँच गये। काफी देर तक जब महरौली जाने वाली बस नहीं आयी तो बदरपुर जाने वाली बस में सवार हो गये। दिल्ली की बसों में 50 रु में दैनिक आधार पर एक यात्री का बस पास बनता है। 50 रु का पास बनवाये और दिन भर AC बसों में घूमने का लुत्फ उठाये। मैं गर्मियों में कई बार इस पास का लाभ उठाने से चूकता नहीं हूँ। वातानूकूलित बस में सवार होकर पहले तो बदरपुर पहुँचे। बदरपुर से महरौली के लिये बहुत बसे चलती है। बदरपुर से महरौली जाने वाली बस में सवार होकर महरौली जा पहुँचे।
बस ने हमें कुतुबमीनार के मुख्य प्रवेश द्धार के ठीक सामने उतार दिया। कुतुब मीनार सोमवार को बन्द रहती है। यहाँ एक बात याद दिलाता हूँ कि भारत के अधिकतर ऐतिहासिक स्थल सोमवार को ही बन्द रहते है। यह सभी वो स्थल है जो पुरातत्व विभाग के अधीन है। कुतुब मीनार भी विश्व धरोहर कहलाती है। दिल्ली का चिडियाघर शुक्रवार को बन्द रहता है। ताजमहल शुक्रवार को नमाज के लिये फ्री रहता है। ताजमहल में नमाज के समय आम दर्शकों को शायद नहीं जाने दिया जाता है। यहाँ कुतुबमीनार में प्रवेश करने के लिये टिकट लेकर लाईन में लग गये। अन्दर जाने के लिये बहुत लोग आये हुए थे। कुछ देर में हमारा नम्बर भी आ गया। कुतुबमीनार में अन्दर देखने के लिये दो घंटे का समय लगना तय था। काफी बडा परिसर है। जिसमें कुतुबमीनार के अलावा भी कई अन्य स्मारक है। चलो दोस्तों, आपको आगे बढने से पहले इस कुतुब मीनार के बारे में कुछ जानकारी दे दी जाये।
कुतुबमीनार उर्फ विष्णु स्तंभ के बारे में
कुतुबमीनार का असली नाम विष्णु स्तंभ था। जिसे विदेशी हमलावरों ने यहाँ हमलों के दौरान बहुत नुक्सान पहुँचाया है। दिल्ली के महरौली में स्थित यह मीनार 72.5 मीटर ऊँची बतायी जाती है। इसकी आधार पर गोलाई 14.3 मीटर है। चोटी तक पहुँचकर यह गोलाई मात्र 2.75 मीटर ही रह जाती है। इस मीनार के अन्दर 379 सीढियाँ बनी हुई है। इसका निर्माण मुस्लिम इतिहासकारों अनुसार लगभग 900 साल पहले हुआ है। पहले आम जनता को इसमें ऊपर तक चढने का मौका मिला करता था लेकिन एक हादसे के कारण उसी दिन से इसमें ऊपर तक जाना तो छोडो, अन्दर भी नहीं जाने दिया जाता है। भारत में अधिकतर भाग में खास कर उत्तर में, लगभग 1000 साल तक विदेशियों का शासन रहा था। इस एक हजार साल में 200 साल अंग्रेजों का तो 800 साल मुस्लिमों राजाओं का शासन रहा।
इतिहास बताता है, वैसे इतिहास हमेशा विजेता शासन ही लिखता आया है, हारने वालों का तो नामो निशान भी नहीं बचता है। विजय होने वाला भले ही कितना भी अत्याचारी रहा हो व अपने आप को सबसे अच्छा सिद्ध करने के लिये इतिहास को अपने अनुसार तोड-मरोड डालता है। इस तोड-मरोड से कोई भी शासक अछूता नहीं रहा होगा। सन 1193 में उत्तर भारत के पहले मुस्लिम शासक कुतुबद्दीन ऐबक रहा, उसका लिखा इतिहास कहता है कि उसने इस मीनार का निर्माण शुरु कराया था। उसके बाद इल्तुतमिश व फिरोजशाह तुगलक ने इसे अपने अंजाम तक पहुँचाया था। यहाँ कुछ इतिहासकार इनसे अलग राय रखते है। इनमें एक मतभेद उभर कर सामने आया है कि इलतुतमिश ने इसे बगदाद के एक फकीर कुतुबद्दीन ऐबक काकी की याद में बनवाया था।
भारतीय इतिहास कुछ और कहता है।
कुतुब मीनार उर्फ विष्णु स्तम्भ का निर्माण भारत के सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समय  के भवन निर्माण बराहमिहिर नामक खगोलशास्त्री ने करवाया था। मिहिर अवेली में उनका निवास स्थान था। यह मिहिर-अवेली बिगडते हुए आज का महरौली बन गया है। इस मीनार के सामने ही पास में खडा लौह स्तम्भ ध्रुव सन 380-414 के बीच स्थापित किया गया बताया जाता है। यदि लौह स्तंभ वाली बात सत्य है तो मुस्लिम हमलावरों वाली कहानी एकदम झूठी साबित हो जाती है। अब कुतुबमीनार की बनावट हिन्दू भवन निर्माण शैली को ध्यान रखते हुए एक विशेषज्ञ ने इसकी जाँच की थी। इसके बारे में चौकाने वाली बात सामने आती है।
विशेषज्ञ की जाँच में निकल कर आया कि इस मीनार के चारों और 27 परिपथ बनाये गये थे। विदेशी हमलावरों ने उन्हे तोड कर अपने हिसाब से अन्य निर्माण कार्य कराये थे। कुतुबद्दीन ने तोडफोड के बारे में लिखा भी है उसके अनुसार इस मीनार का निर्माण ढिल्लिका (दिल्ली का पुराना नाम) का एक पुराना किला तोड कर कराया गया था। एक इतिहासकार भटनागर जी के अनुसार यह मीनार एक स्तंभ है। जो प्राचीन हिन्दू वेधशाला के रुप में बनाया गया था। यदि आसमान से इसके ठीक ऊपर से देखा जाये तो यह 24 पंखुडियों वाले खिले हुए एक कमल के फूल की तरह दिखाई देता है। हिन्दू राशि चक्र व अन्य खगोलीय बिन्दुओं को समर्पित यह स्थल उस काल में अपने समय की बेहतरीन वैधशाला स्थल रहा होगा। चलो दोस्तों, इतिहास में कौन-सच्चा कौन-झूठा, यह साबित करना तो बहुत मुश्किल है। मुर्गी पहले आयी या अंडा, मामला ऐसी परिस्थिति में जाकर फँस जाता है। पक्ष-विपक्ष में तर्क-वितर्क भी खूब हो सकते है लेकिन सच्चाई तो इतिहास में दफन है। जो बाहर आनी मुश्किल है।
अब इतिहास को यही बाहर वाले दरवाजे पर छोडकर वापिस अपनी यात्रा पर लौट चलते है। कुतुबमीनार की ऊँचाई इतनी ज्यादा है कि यह कई किमी दूर से दिखाई देने लगती है। मैट्रों रेल तो इससे डेढ-दो किमी दूर से बनायी गयी है। मैट्रो के अन्दर से भी यह मीनार ऐसी लगती ह। जैसे सामने ही खडी हो। मीनार परिसर में अन्दर जाते ही पार्क में फैली हरियाली ने मन मोह लिया। मुझे हरियाली बहुत पसन्द है। मीनार क्या है? पत्थरों का एक ढेर ही तो है। पत्थरों से तो थोडी देर में मन भर जायेगा तो हम फिर कुदरती हरियाली देखने लौटना ही पडेगा। मीनार के नजदीक पहुँचने से पहले मैं इसके चारों और बने स्थलों में घूमकर ही इसके नजदीक जाता हूँ। इसके चारों ओर के फोटो लेता रहा। चारों कोनों में कुछ न कुछ फोटो लेने लायक मिल ही जाता है।
सेन्डरसन समय यंत्र (Sanderson’s Sundial)
यहाँ एक घडी जैसा समय बताने वाला यंत्र बनाया गया है। हम सबसे पहले उसी के पास जा पहुँचे। यह यंत्र पार्क के एक कोने में बनाया गया है। देखने में भी यह छोटा सा ही है जिस कारण अधिकतर आगंतुक इसे देखने से वंचित रह जाते है। इसका नाम सेन्डरसन समय यंत्र(Sanderson’s Sundial) है। घडी वाले यंत्र व स्मिथ कपोला (Smith Cupola) देखने के बाद मीनार की दक्षिण दिशा में चल दिये। यहाँ एक विशाल हाल को मस्जिद का रुप दिया गया है। आजकल सुना है कि मस्जिद में गैस बाहर करने पर फाँसी पर लटका देने का आदेश अदालत कर देती है। मस्जिद में अपना कोई काम नहीं था। अब हम मीनार की पश्चिम दिशा में बढ चलते है। यहाँ पार्क समाप्त हो जाते है। पार्क की जगह अब बचे हुए खण्डहरों ने ले ली है। अब आगे की यात्रा इन खन्डहरों के बीच की जायेगी।
यहाँ से मीनार को पृष्टभूमि में रखते हुए बेहतरीन फोटो लिये जाते है। यह दिशा फोटो लेने वालों के लिये स्वर्ग है। आसमान में पालम हवाई अडडे की दिशा में जाते हुए जहाज भी फोटोग्राफर को चुनौती देते प्रतीत होते है कि है हिम्मत तो बताओ कि जहाज मीनार के ऊपर से निकला या बराबर से या ऊपर से। जहाज वाला सीन भी बडा मजेदार होता है। कैमरा लिये बैठे लोग, हवाई जहाज के आते ही दे-दनादन फोटो लेने लगते है। उन पागलों में मैं भी एक था। मैंने भी ढेर सारी फोटो लिये थे। कभी हवाई जहाज आगे निकल जाता तो कभी पीछे रह जाता। मैं इस जुगाड में था एक एक फोटो ऐसा आ जाये जिसमें जहाज मीनार के ठीक ऊपर पकडा जाये, लेकिन मेरे साथ ऐसा न हो सका। अंगूर खट्टे निकले, नहीं तो मैं भी अपने आप को बडा फोटोग्राफर कहने लगता।
लौह स्तंभ
अब आगे बढते हुए लौह स्तंभ के पास आ गये। इस लौह स्तंभ पर संस्कृत व ब्रह्मीलिपी भाषा में खुदा सम्राट चन्द्रगुप्त का संदेश उत्कीर्ण किया हुआ है। सम्राट चन्द्रगुप्त का राजकाल 375-413 ईसवी के मध्य काल का रहा था। लौह स्तम्भ को गरुड स्तम्भ कहा जाता है इसके ठीक ऊपर गरुड जी की मूर्ति बनायी गयी थी जो मुस्लिम हमलावरों ने बुतपरस्ती के विरोध के कारण तोड दी। मूर्ति जिस स्थान पर टिकाई गयी थी वहाँ एक खाली गडडा दिखाई देता है। इस लौह स्तंभ का कुल वजन 6000 किलो के करीब है। इसकी ऊँचाई 24 फुट बतायी जाती है। गरुड स्तंभ लौहे का स्तंभ है। हिन्दूओं के ग्रंथों अनुसार गरुड को विष्णु भगवान का वाहन वताया गया है। जिसे आज हम कुतुब मीनार के नाम से जानते है यह विष्णु स्तंभ ही है। आज से लगभग 1700-1800 साल पहले यह लौह स्तंभ व विष्णु स्तंभ बनाये गये थे। इसी से अनुमान लग जाता है उस समय की भारतीय सभ्यता क भवन निर्माण कला कितनी सुदृढ रही होगी। मुस्लिमों के आज 56-57 देश है। इन सभी में से कितने देशों में भारत जैसी शानदार भवन निर्माण कला देखने को मिलती है।
आज से करीब 10 साल पहले जब मैं यहाँ आया था तो इस लौह स्तंभ को मैंने अपने दोनों हाथों से पकड कर (हाथों के पंजे मिलाये थे) आजमाया था कि यह मेरी पकड में आ सकता है या नहीं। इस पकडा-पकडी में दो बाते होती थी। पहली कि यदि हम इसको छाती लगाकर पकडते थे तो यह हमारी पकड में आसानी से आ जाता था। इसके विपरीत यदि हम इसे कमर लगाकर उलटे हाथ कर पकडने के कोशिश करते थे तो यह पकड से दूर हो जाता था। उन दिनों (10 साल पहले) यह प्रचलन जोर-शोर से होता था कि जो इसे उल्टे हाथों से पकड पायेगा वो बहुत किस्मत वाला होता है। लोग इसे पकडने के लिये लाइन लगाकर खडे हुआ करते थे। आज दस साल बाद वो लाइन नहीं मिल पायी। कारण, इस लौह स्तंभ के चारों और लोहे के ग्रिल की बाड लगाकर इसको छूने से वंचित कर दिया गया है।
बच्चों व विशाल को जब मैंने यह पकडने वाली बात बतायी तो उन्हे बडा आश्चर्य हुआ था। लौह स्तंभ लगभग 1700-1800 साल पुराना है। ऐसा ही लौह स्तंभ भारत के बिहार राज्य में भी है। कहते है कि ऐसे कुल तीन लौह स्तंभ हुआ करते थे। तीसरा कहाँ है मुझे नहीं मालूम। ये सभी लौह स्तंभ सम्राट चन्द्रगुप्त के शासनकाल में ही बनाये गये थे। इस लौह स्तंभ को हम भले ही लौह स्तंभ का नाम देते है लेकिन इसमें लौहे की बेहद उच्च गुणवत्त्ता वाली धातु से बनाया गया है। यह आश्चर्य वाली बात है। यदि इसे लौहे का माने तो हजारों साल तक खुले में रहने के बावजूद इसमें जंग नहीं लग सका है। जबकि लौहा एक सीजन भी खुले में रह जाये तब भी उसमें जंग लग जाता है।
मीनार के नजदीक पहुँचकर मैंने अपनी मुंडी ऊपर की तो मेरी टोपी सिर से नीचे गिर गयी। नजदीक से देखने पर यह इतना ऊँचा लगता है जैसे यह मीनार आसमान तक पहुँच गयी हो। मैंने अपनी टोपी ऊठायी और हाथ में ले ली। अभी दो-तीन बार ऊपर देखना पडेगा ना, फिर से बार-बार टोपी नीचे गिरेगी। मीनार देखने के बाद बाहर की ओर चले तो इसके थोडा दूरी पर एक अन्य मीनार का शुरु का अधूरा भाग दिखाई देता है। कहते है कि इससे भी बडी मीनार बनाने की कोशिश विदेशी हमलावरों में से अलाऊद्दीन खिलजी ने यहाँ की थी लेकिन खिलजी की मौत होने के बाद आगे इसका निर्माण कार्य जारी न रह सका। जब वे ऐसी दूसरी मीनार बनाने में असफल रहे तो खिलजी की अगली पीढियों के शासकों ने आज की कुतुब मीनार में छेडछाड कर अपनी निशानी बना दी ताकि भविष्य में कोई इसे देखेगा तो उसे यही लगेगा कि इसका निर्माण खिलजी या उसके वंशजों ने ही कराया होगा।
यह लेख समाप्त हो उससे पहले आपको कुछ काम की जानकारी दे देता हूँ। जैसे कि ....
कब जाना चाहिए?
यहाँ साल के 365 दिन में कभी भी आने का कार्यक्रम बनाया जा सकता है। बस ध्यान रहे कि सोमवार के दिन यह बन्द रहता है अत: सोमवार को यहाँ आने से बचना चाहिए। पुरात्व विभाग के अधीन आने वाले लगभग सभी ईमारत सोमवार को बन्द रहती है। यह मीनार दिल्ली में है तो ध्यान रहे कि दिल्ली में मई व जून में भयंकर वाली गर्मी पडती है। यदि आप ज्यादा गर्मी नहीं झेल सकते हो तो गर्मियों के दिनों में न ही आये। बरसात व सर्दी में यहाँ आने में कोई दिक्कत नहीं है यह जगह एक ऊँची जगह पर स्थित है पानी भरने की कोई समस्या नहीं आती है।
कैसे पहुँचा जा सकता है?
दिल्ली जैसे महानगर में होने के कारण यहाँ आने के लिये यातायात के साधनों की कोई कमी नहीं है। दिल्ली के हवाई अडडे व नई दिल्ली के साथ पुरानी दिल्ली और निजामुद्दीन रेलवे स्टेशनों से यहाँ के लिये बस सेवा भी उपलब्ध है जो हर आधे घंटे के अन्तराल पर मिलती रहती है।  यदि आप मैट्रों की सुविधा का लाभ लेना चाहते है तो मैट्रों भी कुतुब मीनार से मात्र डेढ किमी की दूरी से होकर निकलती है। मैट्रो स्टेशन के बाहर से ढेरों बैट्री रिक्शा यहाँ आने के लिये आपकी प्रतीक्षा करती मिल जायेगी। इसके अलावा ओला टैक्सी कैब व उबर टैक्सी कैब की सुविधा की दिल्ली में भरमार है। कैब बुक करके अपना सामन समेट नहीं पायेंगे तब तक आपके सामने हाजिर हो जायेगी।
मीनार देखकर निकास द्धार से बाहर निकले ही थे कि जोरदार बारिश शुरु हो गयी। तेज हवा तो बहुत देर से चल रही थी। ऐसा नहीं लग रहा था कि इतनी जोरदार बारिश आ जायेगी। हम भागकर एक दुकान की तिरपाल के नीचे खडे हो गये। आधा घंटा वही अटक कर रहना पड गया। आधे घंटे बाद बारिश हल्की हुई तो वहाँ से निकल कर एक बस में सवार हो महरौली बस अडडे पहुँचे। इस महरौली बस टर्मिनल के पीछे एक बावडी बतायी जाती है। जिसका नाम राजाओं की बावडी है। मैंने अभी तक वह वाबडी नहीं देखी है। अभी तक मैंने नीमराणा की बावडी व कनाट प्लेस वाली फिल्म पीके वाली बावडी ही देखी है। थोडी देर में हमें कश्मीरी गेट जाने वाली बस मिल गयी। इस बस में सवार होकर हम निजामुद्दीने के पास स्थित हुमायुँ का मकबरा देखने जा रहे है। आप हमारे साथ चल रहे हो या नहीं? चल रहे हो तो अगले लेख में आपको ताजमहल की तरह सुन्दर स्थल हुमायूँ का मकबरा दिखाया जा रहा है।








ये है 50X joom
























15 टिप्‍पणियां:

rakेश kumar ने कहा…

बहुत सही जानकारी दी आपने, मुझे तो आजतक ये सब पता ही नही था ...वैसे तो लेख देखते ही मेरा माथा ठनका कही इन्ही दिनों में तो आप कुतुबमीनार ना आगये हो,पर जब फ़ोटो पे डेट देखी तो खुश हो गया चलो अब झगड़ा नही करना पड़ेगा । ऐसे ही किसी ओर रोचक किस्से का इंतज़ार रहेगा

लोकेन्द्र सिंह परिहार ने कहा…

बहुत ही बढ़िया लेख इतिहास खंगाल के रख दिया कुतुबमीनार उर्फ़ विष्णु स्तम्भ के दर्शन बहुत ही बढ़िया हुए

Shyam Sunder ने कहा…

Bahut badiya post ,aisi bahut si jagah hai jo ki banai kisi aur ne ,naam kisi ne apna laga diya ki humne banayi hai ,tajmahal ko bhi tejomahal khete hai ,ye sab itihas me chupa hai ,khoj honi hi chahiye vo jaroori hai

प्रवीण गुप्ता - PRAVEEN GUPTA ने कहा…

सर जी राम राम, क़ुतुब मीनार के बारे में बहुत अच्छी जानकारी आपने दी, बरसात के मौसम में लिए हुए आपके फोटो शानदार हैं...बाकी दिल्ली तो हैं ही दिल के करीब, वन्देमातरम...

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

बहुत खूब

Vasant Patil ने कहा…

शानदार लेख 100% सही बात की जितने वाला इतिहास अपनी मर्जी से लिखता है,
भारत की ऐसी बोहतसी कलाकुर्तियोंको मुस्लिम शासकोंने आपने नाम दे दिए है,

Abhyanand Sinha ने कहा…

बहुत खूब, इतिहास बताता सुन्दर विवरण

Chandresh Samadhiya ने कहा…

बहुत ही अच्छी जानकारी दी , वर्तमान के साथ साथ एतिहासिक भी अगली पोस्ट का इन्तजार रहेगा

Chandresh Samadhiya ने कहा…

बहुत ही अच्छी जानकारी दी , वर्तमान के साथ साथ एतिहासिक भी अगली पोस्ट का इन्तजार रहेगा

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (06-07-2017) को "सिमटकर जी रही दुनिया" (चर्चा अंक-2657) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Sachin tyagi ने कहा…

मै भी कई बार कुतुबमिनार जा चुका हु लेकिन अभी कुछ वर्षो से उधर नही गया। आज आपने सैर तो कराई ही साथ मे और भी बहुत जानकारी दी इस लेख मे। धन्यवाद गुरू जी

संजय भास्‍कर ने कहा…

गया तो २ बार हूँ पर आज विस्तार से बहुत ही अच्छी जानकारी दी

Rohit Singh ने कहा…

बोत अच्छे ....पुरानी घूमाई नहीं चलेगी...दोबारा जाएं.....और लिखें...वैसे एक मीनार और है और वो है हस्तसाल में, उत्तम नगर के पास...उसकी रिपोर्ट अगले हफ्ते दिखाउंगा...वो कहते हैं कि पहली मीनार की कोशिश थी...वैसे वहां मीनार और पुरात्वविभाग के बोर्ड के अलावा कुछ नहीं है

Nitin Gupta ने कहा…

सर जी, बेहतरीन लेखनशैली के साथ सुंदर लेख |

Gaurav Chaudhary ने कहा…

जानकारी से लबालब पोस्ट और साथ ही सुन्दर फोटो

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