बुधवार, 18 सितंबर 2013

Red fort दिल्ली का लाल किला /लाल कोट

TOURIST PLACE IN NEW DELHI-01                                                   SANDEEP PANWAR 
दिल्ली का लाल किला तो मैंने बहुत बार देखा हुआ है सपरिवार देखने का कार्यक्रम पहले भी एक बाद बन चुका था लेकिन उस दिन दशहरा होने के कारण लाल किले में जाने वालों की इतनी ज्यादा भीड़ थी कि टिकट की लाईन ही 200 मीटर लम्बी मिली। उस दिन लाल किला छोड़ दिया गया। अभी अगस्त में चिरमिरी छत्तीसगढ़ के रहने वाले अपने प्रशंसक कम दोस्त अमित शुक्ला जी दिल्ली भ्रमण पर आये हुए थे। उनसे अमरकंटक में पहले ही वायदा कर दिया गया था आप जब भी दिल्ली अपनी बड़ी बहिन के यहाँ आओगे तो एक दिन हम दोनों सपरिवार दिल्ली के किसी स्थल पर घूमने चलेंगे। इसी तय शुदा क्रम में जब अमित जी दिल्ली आये तो मैं अपने परिवार को बस में लेकर अमित की बड़ी बहिन के यहाँ पहुँच गया। 





यह दिन मैंने दिल्ली की बस में घूमने का कार्यक्रम इसलिये बनाया था ताकि बाइक पर दिल्ली की गर्मी या बरसात में तंग ना होना पड़े। दिल्ली में मेरा जन्म भले ही ना हुआ हो लेकिन बचपन से लेकर अब तक की जिन्दगी दिल्ली में ही बीत रही है। वो अलग बात है कि बीच में मौसम बदलने हेतू कुछ दिनों का प्रवास बाहर भी करना पड़ता है। हमारे घर से केवल आधा किमी दूरी पर ही दिल्ली मैट्रो का स्टेशन निर्मानाधीन है आगामी वर्ष में यहाँ मैट्रों आरम्भ हो जायेगी उसके बाद हमारे घर से आनन्द विहार, निजामुददीन, धौला कुआँ, पंजाबी बाग, आजादपुर , मुकुन्दपुर वाली लाईन आरम्भ हो जायेगी फ़िर दिल्ली की बसों के भरोसे नहीं रहना पडेगा। चलिये दोस्त के साथ लाल किला देखने चलते है।

अमित हमारे पहुँचने तक तैयार नहीं हुआ था घर पहुंच कर सबसे पहले यह तय हुआ कि कहाँ जाया जाये। फ़ैसला हुआ कि लाल किला। आधा घन्टे में ही हम सभी लाल किले के लिये घर से निकल लिये। मैंने दिल्ली की वातानुकूलित बसों में एक दिन पास बनवा लिया था जिन पाठकों को यह जानकारी ना हो तो उन्हे बता देता हूँ कि दिल्ली की आम बस हरी रंग वाली होती है इनमें एक दिन की जी भर कर यात्रा करने के लिये 40 रुपये का पास बनता है। जबकि मात्र 10 रु ज्यादा यानि 50 रुपये देने से पूरा दिन वातानुकूलित बस जिसका रंग लाल होता है में जी भर कर घूम सकते है। जहाँ अमित की बडी बहिन निवास करती है वहाँ दिल्ली मैट्रों भी उपलब्ध है अत: वहाँ से लाल किला के नजदीक मैट्रो स्टेशन चाँदनी चौक तक जल्दी जाने के लिये हमने दिल्ली मैट्रों से ही यात्रा की।

 चाँदनी चौक स्टॆस्शन पर उतर कर पैदल ही लाल किले की ओर चलने लगे। वही खाने की एक दुकान पर मैंगो की बोतले देख बच्चों ने इच्छा जाहिर की तो अमित शुक्ला जी ने तीनों बच्चों को एक-एक बोतल दिलवा दी (दो मेरे व एक शुक्ला जी का) धीरे-धीरे टहलते हुए लाल किला पहुँचे तो देखा कि आज टिकट खिड़की एकदम खाली पड़ी हुई है। मैंने चार टिकट ले लिये यहाँ 15 साल से कम उम्र के बच्चों का टिकट नहीं लगाया जाता है। फ़ोटो लेते हुए हम आगे चलते रहे। लाल किले में मुख्य प्रवेश करने वाले दरवाजे को लाहौरी गेट कहा जाता है। वर्तमान में लाल किले में दो दरवाजे खुले है एक यह दूसरा दिल्ली गेट जिससे लाल किले में सामान लाने ले जाने वाले व कार्यरत कर्मी अपने वाहन लेकर आते-जाते है। 

लाल किले में प्रवेश करते ही लाल किले के बारे में विवरण देने वाले कई बोर्ड़ लगे हुए है जिनके फ़ोटो मैंने यहाँ दिये हुए है। बाहर सड़क से लाल किला आते समय वह स्थान दिखायी देता है जहाँ पर खड़े होकर भारत के प्रधानमन्त्री भाषण देते आये है। लाल किले में अन्दर जाते ही भाषण वाले स्थान पर चढ़ने वाली सीढियाँ सीधे हाथ दिखायी देती है। अब तो यहाँ तीन मंजिला लिफ़्ट भी बन चुकी है। जिसका लाभ नेता व अफ़सर लोग उठाते है। आम आदमी यहाँ लगे रस्से से आगे नहीं जा सकता है।

लाल किले में आगे बढ़ते ही विशाल गलियारा नुमा बाजार आता है राजाओं के समय में भी यहाँ बाजार लगता था अब भी लगता है लेकिन तब जीवन की जरुरी चीजे बिकती थी आज फ़ैसल की वस्तुएँ बिकती है। अपने छोरे पवित्र ने यहाँ एक खिलौना साईकिल देखकर जिद कर दी कि इसे दिला दो। क्यों घर पर जो तेरी साईकिल है उससे मन भर गया है क्या? ऊ, ऊ, ऊ, ठीक है ले लेना, लेकिन वापसी में अभी नहीं। वापसी में पक्का लोगे ना। हाँ, अब आगे चल। आजकल के बच्चों को साईकिल का कितना शौक होता है एक हमारा समय था कि घन्टे के हिसाब से किराये पर साईकिल लेकर चलाते थे। अब बच्चों के पास घर में ही साईकिल होती है। साईकिल चलाने का मुझे भी बहुत शौक है लेकिन साईकिल पर लम्बी दूरियाँ तय करने के लिये समय भी लम्बा लगता है। समय बढ़ने से खर्चा भी बढ़ना लाजमी है इसलिये आगामी कुछ वर्षों तक अपना विचार साईकिल से लम्बी यात्रा करने का नहीं है।

लाल किले के गलियारे को पार कर जब एक खुले चौक में पहुँचते है तो यहाँ लगे एक बोर्ड़ को देखकर ध्यान आया कि लाल किले में एक संग्रहालय सेना आवास की तरफ़ भी बनाया गया है। यहाँ तक देखने के लिये मात्र 5 रुपये की टिकट लगती है जो पहले ही हमने ले ली थी। इस संग्रहालय को देखकर बाहर निकले तो पीने के पानी की मशीन दिखायी दी, अपनी पानी की बोतल खाली होने को थी उसे फ़िर से भर लिया गया। इसके बाद फ़िर उसी खुले गोल चौक पर पहुँचे जहाँ सामने दिखायी दे रहे बड़े से दरवाजे में घुसते ही टिकट दिखाना पड़ता है। यहाँ टिकट दिखाने के बाद आगे जाने से पहले इसी दरवाजे के ठीक ऊपर बनी मंजिल पर जाने के लिये पक्की सीढ़ियाँ चढ़नी होती है। 

इस संग्रहालय में थोड़े बहुत हथियार संग्रहित है यहां जितने भी हथियार है दूसरे विश्व युद्ध के समय के है। एक अंग्रेज अफ़सर की वर्दी है जिस पर लिखा हुआ है कि यह न्यूजीलैन्ड़ की सैनिक वर्दी है। तीर कमान, पिस्टल, मशीन गन, आजकल की AK 47 का ही पुराना रुप है। कटार, कृपाण, तलवार, आदि शस्त्र वहाँ रखे हुए है।  यहाँ पर लड़ाई में नदियों नालों पर बनने वाले फ़टाफ़ट पुल का माड़ल, व तार यंत्र आदि भी रखे हुए है। इन्हे देखने के बाद हम आगे बढ़े। यहाँ से आगे बढ़ते हुए, एक विशाल व हरे पार्क को पार करते हुए आगे बढ़ते गये। यहाँ राजाओं के समय भी दरवार लगा करता होगा। इस जगह से ना जाने कितने फ़ैसले ऐसे आये होंगे जिसने इतिहास बदल दिया। राजा का सिंहासन व दरबार देखकर आगे की ओर चल दिये।  

जैसे-जैसे आगे बढ़ते जा रहे थे। लाल किले के एक नये पहलू से सबका सामना हो रहा था। वैसे मैंने तो लगभग 55-60 बार लाल किला भ्रमण अन्दर से किया हुआ है। लेकिन दोस्त व परिवार ने पहली बार लाल किला देखा था। आगे हमने लाल किले में क्या-क्या देखा बाकि की कहानी चित्रों की जुबानी। जो आनन्द फ़ोटो देखने में आयेगा उसका रस फ़ोटो में ही टपकेगा, विवरण सिर्फ़ यात्रा का दिया जा सकता है किसी इमारत या जगह का विवरण तो वहाँ के फ़ोटो ही दे सकते है।

लाल किले में राजाओं के निजी महलों को देखने के लिये गये तो वहाँ पर निर्माण कार्य होने के अधिकतर बन्द ही मिले। बाहर से देखकर संतोष करना पड़ा। यहाँ लाल किले के अन्दर एक मस्जिद बनी हुई है। इससे आगे बढ़ने पर बड़े-बड़े मैदान पार करते हुए आखिरी छोर तक जा पहुँचे। यहाँ चाय हाऊस वाले स्थान से वापिस लौट चले। धीरे-धीरे अंग्रेजों के काल में बने हुए सैनिक आवास स्थल देखते हुए लाल किले से बाहर आ गये। किले से बाहर आते समय पवित्र जाट को फ़िर से खिलौना साईकिल दिख गयी या कहे कि भूला ही नहीं था तो ज्यादा सही है। पवित्र को एक साईकिल लेकर दी गयी। वो अलग बात रही कि लोटस टेम्पल से घर लौटते हुए वह बस में ही रह गयी थी। बाहर आने के बाद कुछ देर विश्राम किया उसके उपराँत अमित अपने परिवार के साथ अपनी दीदी के घर लौट गये जबकि हमारा परिवार लोटस/बहाई मन्दिर, कमल का मन्दिर देखने के लिये कालाजी जाने वाली बस में सवार हो गया। 

नीचे दिल्ली में की गयी सभी यात्राओं के लिंक लगाये गये है।
01-
05- महरौली के पास छतरपुर मन्दिर
06- भारत की सबसे ऊँची मीनार कुतुब मीनार /विष्णु स्तम्भ
07- अक्षरधाम मन्दिर
08- पुराना किला
09- दिल्ली का चिडियाघर
10-









































7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (18-09-2013) प्रेम बुद्धि बल पाय, मूर्ख रविकर है माता -चर्चा मंच 1372 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    हिन्दी पखवाड़े की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. sandeep ji ram- ram.kabhi school se bunk mar kar lal qila jathe tha.woh bhi bus me staff chala kar.I like ur post.

    उत्तर देंहटाएं
  3. भारत के अभिमान का प्रतीक..सुन्दर चित्र..

    उत्तर देंहटाएं
  4. आज की विशेष बुलेटिन "रहीम" का आँगन, राम की "तुलसी" और ब्लॉग बुलेटिन में आपकी इस पोस्ट को भी शामिल किया गया है। सादर .... आभार।।

    उत्तर देंहटाएं
  5. भाई जी मै सचिन त्यागी जी से सहमत हूँ मैने भी गोकुल पुरी बिल्डिँग वाले स्कूल से भाग कर (साथ मे यार दोस्त भी होते थे पूरा गैँग साथ होता था) ब्लू लाईन बस मे स्टाफ चला कर लाल किला व अन्य जगह पर दिल्ली भ्रमण होता था वो दिन अभी भी याद आते है तो लगता है कल परसो की बात है

    उत्तर देंहटाएं

इस ब्लॉग के आने वाले सभी या किसी खास लेख में आप कुछ बाते जुडवाना चाहते है तो अवश्य बताये,

शालीन शब्दों में लिखी आपकी बात पर अमल किया जायेगा।

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...