मंगलवार, 3 सितंबर 2013

Starting point of Narmada River नर्मदा उदगम स्थल 39 शक्तिपीठ चण्डिका पीठ

UJJAIN-JABALPUR-AMARKANTAK-PURI-CHILKA-20                              SANDEEP PANWAR
नर्मदा उदगम स्थल मन्दिर में प्रवेश करने से पहले जूते-चप्पल बाहर ही उतारने होते है। मन्दिर की चारदीवारी के बाहर ही एक बन्दा दाल-चावल माँगने के लिये बैठा हुआ था। मैंने अपनी चप्पले उसके पास ही छोड़ कर आगे बढ़ चला। वैसे तो अपने पास चप्पल रखने के लिये बैग भी था लेकिन वहाँ भीड़ भाड़ ज्यादा ना होने के कारण मैंने चप्पल खुले में ही छोड़नी ठीक समझी। मन्दिर के अन्दर प्रवेश करते ही सबसे पहले मेरी नजर नर्मदा कुन्ड़ पर गयी। मैंने मन ही मन नर्मदा को स्मरण किया। यह वही नर्मदा थी जिसे मैंने अब तक ओमकारेश्वर में व भेड़ाघाट में विकराल रुप में देख चुका हूँ लेकिन यहाँ तो नर्मदा एकदम शांत एक कुन्ड़ में सिमटी हुई मिली।


मैंने नर्मदा उदगम स्थल पर बने मन्दिर के एक कोने से आरम्भ करते हुए वापिस उसी स्थल तक परिक्रमा करनी शुरु कर दी। वैसे तो स्थानीय लोग नर्मदा की हजार किमी से भी ज्यादा (1310 किमी) लम्बी दूरी की परिक्रमा कर ड़ालते है लेकिन उस परिक्रमा करने के लिये ढेर सारा समय भी होना चाहिए क्योंकि पता लगा है कि उस लम्बी परिक्रमा करने के लिये कम से कम तीन से चार महीने का समय लगना अवश्य माना जाता है।

आने वाले कुछ 22 वर्षों तक इतना लम्बा समय अपने पास नहीं है अगर भविष्य़ में कभी इतना लम्बा समय मिल गया तो हो सकता है कि इस लम्बी परिक्रमा पर अपुन का विचार भी बन जाये लेकिन वो सब भविष्य के गर्त में है अगर जिन्दे रहे तो तब की तब देखेंगे अभी तो नर्मदा मन्दिर की परिक्रमा करके की काम चला लेते है। सुना है गणेश जी (अपने शंकर-पार्वती के छोटे बेटे) ने अपने माँ-बाप का चक्कर लगाकर ही सात लोक की परिक्रमा का लाभ ले लिया था। ठीक उसी तर्ज पर अपुन भी छोटी सी परिक्रमा करके लाभ ले लेते है।

नर्मदा उदगम स्थल पर साफ़-साफ़ व मोटे अक्षरों में जगह-जगह लिखा हुआ था स्नान करना सख्त मना है। हो सकता है कि कुछ समय पहले लोग बाग यहाँ स्नान करते होंगे उन्हे रोकने के लिये यह कदम उठाना पड़ा होगा। आगे चलते हुए हरे रंग की छत वाला एक विशाल हवन कुन्ड़ वाला स्थल दिखायी दिया था। उस दिन तो हवन कुन्ड़ एकदम खाली पड़ा हुआ था किसी खास अवसर पर ही यहाँ हवन यज्ञ आदि होता होगा। मैंने सिर्फ़ भोले-नाथ पार्वती का विवाह स्थल त्रियुगी नारायण गौमुख से केदारनाथ पद यात्रा में ही ऐसा एकमात्र देखा है जहाँ पर उस हवन कुन्ड़ में बराबर आग जलायी जाती रहती है। लोग तो कहते है कि वह आग शिव पार्वती के विवाह के समय से ही जली हुई है लेकिन मुझे उस हजारों लाखों साल पहले से जलती हुई आग की कहानी पर पूरा यकीन नहीं होता है। हो सकता है कि कुछ सालों से यह आग जलायी गयी हो।

हवन कुन्ड़ वाली जगह से आगे बढ़ने पर नारियल फ़ोड़ने वाला स्थल दिखायी दिया। इस नारियल फ़ोड़ स्थल पर नारियल फ़ोड़ने के लिये एक हथौड़ा भी रखा हुआ था। यहाँ नारियल फ़ोड़कर बदले में शुल्क माँगने वाला कोई बन्दा दिखायी नहीं दिया था। मुझे याद है कि श्री शैलमल्लिका अर्जुन आंध्रप्रदेश में बने हुए 12 ज्योतिर्लिंग में से एक में नारियल फ़ोड़ने के बदले शुल्क माँगने वाला बन्दा बैठाया गया है। जिसको चिढाते हुए कई भक्त उसके सामने ही नारियल को जोर से पटक कर फ़ोड़ते है। इस बात की खुशी हुई कि वह लूट यहाँ नहीं थी। यहाँ से आगे चलने पर एक अन्य मन्दिर में लगी हुई लम्बी लाईन दिखायी दी।

इस लम्बी लाईन को देखकर मेरे मन में खटका हुआ कि नर्मदा उदगम वाला मन्दिर यह लम्बी लाइन वाला है या वह जहाँ पानी के अन्दर बना हुआ मन्दिर है उस पर लिखा भी था। चलो होगा कोई सा उससे मुझे क्या? पहले इस मन्दिर की परिक्रमा कर लू क्या पता इसके आगे-पीछे कही कुछ इसके बारे में भी लिखा हो? मन्दिर के पीछे जाने पर मन्दिर के गर्भ गृह से बाहर आते हुए लोग दिखायी दिये। मैं उससे आगे चलता गया। मन्दिर की चौथी दिशा में जाने पर मन्दिर की दीवार पर लिखा हुआ देख अपुन की समझ में सब कुछ आ गया था।

मन्दिर की दीवार पर लिखा हुआ था कि सती और शिव वाली कहानी के फ़लस्वरुप हुए सती के 52 टुकडों के कारण बने शक्तिपीठ में 39 स्थान इस मन्दिर का भी आता है। यहाँ लिखे अनुसार पता लगा कि यहाँ माता सती का दक्षिण नितम्ब गिरा था जिस कारण यहाँ पर भी शक्तिपीठ बनाया गया है। इस मन्दिर को चण्डिका पीठ कहा जाता है। मन्दिर में लगी भयंकर भीड़ के कारण मैंने बाहर से ही जाट देवता स्टाईल में राम-राम किया और आगे की यात्रा पर निकल लिया। आगे चलते हुए मैं एक बार फ़िर उसी कुन्ड़ पर आ पहुँचा जहाँ लिखा हुआ था नर्मदा कुन्ड़।

वैसे नर्मदा का असली उदगम तो इस मन्दिर से भी आगे बताया जाता है। कहते है कि यहाँ से आगे सवित्री कुन्ड़ है उससे भी आगे जाने पर नर्मदा का असली उदगम स्थल आता है। यहाँ मन्दिर में लोगों को रोकने हेतू यह भी लिखा हुआ था कि कुन्ड़ में पैर ना ड़ाले सिर्फ़ आचमन करे। हमारे देश के लोग इतने महान है कि जिस पानी के कुन्ड़ को बेहद पवित्र मानेंगे उसी कुन्ड़ को आखिर में गन्दा करते हुए अपनी शान समझ अपने घर चले जाते है। यहाँ नर्मदा कुन्ड़ वाले छोटे से मन्दिर में जाने के लिये पानी में घुसना पड़ रहा था। मैंने अपनी पैन्ट ऊपर घुटने तक चढ़ा ली। अन्दर जाकर देखा तो वहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ पानी ही पानी था। उसके ठीक बाहर एक शिवलिंग बना हुआ था जहाँ लोगों ने मीठा प्रसाद ड़ालकर ढेर सारी मक्खी आमंत्रण देकर बुलायी हुई थी।

नर्मदा उदगम स्थल वाले मन्दिर को अच्छी तरह देखने के बाद मैंने बाहर का मार्ग पकड़ा। मन्दिर से बाहर आने के बाद सबसे पहले अपनी चप्पल वाले स्थल पर पहुँचा। चप्पल किसी ने उठायी नहीं थी। वही एक बुढढ़ा व उसकी बुढढ़ी इस आस में जमे हुए थे कि कोई आने वाला कुछ चावल व दाल उनके कटोरे में ड़ाल जायेगा। यहाँ मैं काफ़ी देर तक बैठकर यह देखता रहा था कि आखिर दाल-चावल दान करने वाले लोग कितना-कितना दाल-चावल दान करते है।

जितनी देर मैं वहाँ बैठा रहा था उतनी देर में सिर्फ़ दो-तीन लोग ही वहाँ से निकले थे जिन्होंने उनके कटोरे में चावल ड़ाले थे। दान करने वाले ने हर कटोरे में एक-एक मुट्ठी चावल जरुर ड़ाले होंगे। उसके पास काफ़ी सारे दो-तीन किलो चावल रहें होंगे। वह लाईन में बैठे माँगने वालों की प्लेट कटोरी में चावल ड़ालकर आगे बढ़ता जाता था। यह सब देखने के बाद आगे बढ़ने की अपुन की बारी थी।

मन्दिर के ठीक सामने स्नान घाट बने हुए है जहाँ पर नर्मदा नदी बहती हुई आगे बढ़ती जाती है। मैं भी स्नान करने के मूड़ में था लेकिन सोचा स्नान करने से पहले दाढ़ी बनवाकर चिकना हो लिया जाये। इसलिये पहले एक नाई की दुकान देखी गयी। नाई सुबह का समय होने के कारण खाली ही बैठा हुआ था। मैंने दाढ़ी बनवाने के बाद नाई से पैसे पूछे तो उसने दाम बता कर मेरी आँखे खोल दी। जब उसने मात्र साधारण दाढ़ी बनाने के लिये 40 रुपये देने को कहा तो मैंने कहा देख महाराज साधारण दाढ़ी बनाने का शुल्क मात्र 15-20 रुपये है। मैं बीस से ज्यादा नहीं देने वाला। यह मत समझना कि मैं दिल्ली बोम्बे से आया हूँ मैं उज्जैन से आया हूँ। वह बोला मेले का समय है महँगाई बहुत ज्यादा हो जाती है ठीक है मेला कल समाप्त हो गया है उसके दाम कल समाप्त हो गये है। अगर तुमने दाढ़ी बनाने से पहले दाम बता दिये होते तो मैं बाबा जी ही बना रहता लेकिन दाढ़ी नहीं बनवाता। खैर थोड़ा सा प्रवचन देने से उसने चुपचाप बीस रुपये लेकर रख लिये। (अमरकंटक यात्रा अभी जारी है।)
जबलपुर यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे दिये गये है।


अमरकंटक यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे दिये गये है।

18-अमरकंटक की एक निराली सुबह
19-अमरकंटक का हजारों वर्ष प्राचीन मन्दिर समूह
20-अमरकंटक नर्मदा नदी का उदगम स्थल
21-अमरकंटक के मेले व स्नान घाट की सम्पूर्ण झलक
22- अमरकंटक के कपिल मुनि जल प्रपात के दर्शन व स्नान के बाद एक प्रशंसक से मुलाकात
23- अमरकंटक (पेन्ड्रारोड़) से भुवनेशवर ट्रेन यात्रा में चोर ने मेरा बैग खंगाल ड़ाला।



















7 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

नर्मदा मैया की जय, इतना बड़ा बड़ा और इतना अधिक लिख देते हैं दीवारों पर कि यह मन्दिर से अधिक क़ानून की पुस्तक लगने लगती है।

SACHIN TYAGI ने कहा…

सन्दीप भाई राम-राम।नर्मदा नदी इतनी विशाल नदी है ओर आजकल इसमे बाढं भी आ रही है जिसके कारण कई मन्दिर भी बह गये है समाचार पञ मे पढा था पिछले हफ्ते।लेकिन इसका उदगम स्थल एक छोटा सा कुण्ड ही है।सन्दीप जी ये नदी आगे जा कर इतना विशाल रूप धारण कैसे कर लेती हे?ये पुरे वर्ष पानी से कैसे भरपुर रहती है?क्या यह एक वर्षा नदी है?

रविकर ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवारीय चर्चा मंच पर ।।

रविकर ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

Ajay Kumar ने कहा…

Bhai ji, aapki post aaaj kal thodi late padhi jaa rahi hai... Tuesday wali Wednesday ko

Vandana ने कहा…

sandipji namaste.bahut dinobad aapaka lekh padha.maine bhi paidal narmadaparikrama ki.pach mahine lage.aap thodi thodi har sal karke puri karsakate ho.22years rukaneki jarurat nahi.

Vandana ने कहा…

sandipji namaste.bahut dinobad aapaka lekh padhaneko mila.aap harsal pandhara-bis din chalte parikrama puri kar sakate hai,bavis sal rukaneki jarurat nahi.narmadamaiyyaki krupase meri do parikrama purna ho gayi.dashahareke bad punha janevali hai.

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