बुधवार, 31 जुलाई 2013

Sugalvas-Tindi- Udaipur सुगलवास-तिन्दी-उदयपुर (बाइक की क्या औकात, दलदल नाले में ट्रक भी अटक गया)

SACH PASS, PANGI VALLEY-08                                                                      SANDEEP PANWAR
तिन्दी से पहले सुगलवास नामक जगह आती है, यहाँ पर वन विभाग की निरीक्षण चौकी बनी हुई है। सुगलवास से तिन्दी के बीच सड़क चौड़ीकरण का निर्माण कार्य चल रहा है। यही एक बोर्ड़ भी लगा हुआ था जिस पर लिखा हुआ था कि इस मार्ग पर कहाँ से कहाँ तक सप्ताह में मार्ग किस-किस दिन बन्द रहता है? हिमाचल प्रदेश में यह इलाका बेहद ही दुर्गम माना गया है कुछ वर्षों पहले तक यहाँ आने के लिये केवल पैदल मार्ग हुआ करता था अब कही जाकर यहाँ इस घाटी में गाड़ी चलने लायक कच्चा मार्ग बन पाया है। आगामी 3-4 वर्षों में यही मार्ग पक्का बन जायेगा तब यहाँ आने का अलग ही सुख होगा। कभी-कभी तो सड़क इतनी बेकार आ जाती थी कि हम सीट पर बैठे-बैठे 8-10 ईंच तक उछल जाते थे। उछलने के बाद हमें ट्रक में लदी अपनी बाइक याद आती थी कि उदयपुर पहुँचने तक बाइक चलने लायक भी रहेगी या कबाडी को बेचकर बस में बैठकर घर जाना पड़ेगा। ट्रक चालक को बोला, अरे भाई जरा कुछ देर के लिये ट्रक कही रोक लेना, पीछे जाकर बाइक की हालत देखते है। 

इस पुल से पांगी घाटी आरम्भ होती है।

ट्रक चालक ने कहा था कि बस तिन्दी आने ही वाला है दोपहर का खाना वही खायेंगे। अगर पंचर वाली दुकान खुली मिली तो पंचर भी लगवाना पडेगा। तिन्दी से पहले ही सड़क पर चौड़ीकरण वाला वह इलाका आ गया था। जहाँ पर मजदूर सड़क किनारे पहाड़ में मशीनों से सुराख करने में लगे पड़े थे। इनकी बन्दूक जैसी मशीने काफ़ी लम्बी थी। इनकी मशीनों में बन्दूक जैसी लम्बी नली लगी हुई थी जिससे ये पहाड़ में लम्बा सुराख कर देते थे। लम्बा सुराख होने के बाद उस सुराख में पहाड़ तोडने के लिये ड़ायनामाईट की छड़ लगा रहे थे। हमने कई सौ मीटर का इलाका रुक-रुक कर पार किया था। हमारे ट्रक को नजदीक आते देख मजदूरों को अपना काम बीच में रोकना पड़ता था। एक जगह तो मजदूरों की मशीन हटने के इन्तजार में हमें काफ़ी देर रुकना पड़ा। इस तरह दिन भर में कम से कम 50-60 गाडियाँ तो इन मजदूरों को तंग करने आती ही होंगी।

काम करने वाले मजदूर आसपास ही झोपड़े बनाकर रहते थे। शक्ल से देखने पर ही अधिकतर मजदूर बिहार या झारखन्ड़ जैसे पिछ्ड़े राज्यों के लग रहे थे। ऐसे ही मजदूर हमने लेह वाली यात्रा में उपशी में भी बहुत सारे देखे थे। उपशी में हम जिस कमरे में लगातार तीन रात तक रुके थे। वह कमरा झारखन्ड/बिहार वाले एक मजदूर ने ही दिलवाया था। नदी किनारे वाले इस क्षेत्र में ठन्ड़ का ज्यादा असर नहीं दिख रहा था। किलाड़-सगलवास-तिन्दी-उदयपुर-टान्ड़ी बहुत ज्यादा ठन्ड़े इलाके नहीं है। सड़क की हालत बहुत ही बुरी थी घन्टा भर की यात्रा में मुश्किल से दो-चार मिनट ही ऐसे आते होंगे जहाँ हमारे ट्रक को 30 की गति से भागने का मौका मिलता था। सड़क की यह दुर्दशा देखकर मुझे अपनी बाइक की याद आ रही थी। मेरी बाइक भी नाराज हो रही होगी कि मैंने उसे ठीक होते हुए भी ट्रक में लाद दिया है। 

मैं अपनी बाइक को सही सलामत होते हुए भी ट्रक में लादे हुए थी इसका सिर्फ़ एक ही कारण था कि किलाड़ में हमें लोगों ने बताया था कि तिन्दी से आगे और उदयपुर से पहले दो बड़े-बड़े नाले आयेंगे वे नाले इतने भयंकर है कि उसमें तुम्हारी बाइक पत्ते की तरह बह जायेगी। उन नालों में तो कई बार बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ भी बहकर चन्द्रभागा नदी में गिर चुकी है। साच से नीचे आते समय जो नाले देखे थे उन्हे देखकर सोचा कि अगर यह लोग सही कर रहे है तो क्यों फ़ालतू में खतरा चाहे वो फ़्री में ही क्यों ना मिल रहा हो, सिर पर लिया जाये। इससे अच्छा तो यही है कि खराब वाली बाइक के साथ ही अपनी वाली बाइक भी ट्रक में लाद दी जाये। इस बेकार कबाड़े मार्ग पर बाइक भी 15-20 की गति से ज्यादा नहीं चलने वाली है इसमें तेल भी ज्यादा लगेगा और पानी में बहने का भी खतरा नहीं रहेगा।

मुझे यह नहीं पता था कि मेरी कंजूसी ही मुझे महंगी पड़ने जा रही थी। आखिरकार हम तिन्दी पहुँच गये। तिन्दी पहुँचकर हमने देखा कि हमारे साथ वाले ट्रक कही दिखायी नहीं दे रहे है। मैंने ट्रक चालक से कहा तो उसने बताया कि एक ट्रक आगे निकल गया है जबकि दूसरा ट्रक पीछे वाले ढ़ाबे पर बीच में खड़ा था वे शायद खाना खाने के लिये वहाँ रुके थे। चलो हम भी कुछ खा लेते है। यहाँ महेश ने कुछ दूर तक ट्रक चलाकर देखा था। महेश को ट्रक चलाते देख लगा कि यह पहली बार ट्रक नहीं चला रहा है। यहाँ तिन्दी में एक ढ़ाबे में रुककर शाकाहारी मोमो का स्वाद लिया गया। दाल चावल भी बने थे लेकिन उनका स्वाद ट्रक चालक को ही पता होगा कि कैसे बने थे?

यही पास में एक मुर्गी अपने चूजों के साथ दाने चुगने में लीन थी। मैंने सोचा चलो इसकी भी एक फ़ोटो ले ली जाये। सड़क किनारे एक कुत्ता हो सकता है कि कुतिया भी हो, इस पर मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। मुझे उसे लेकर दिल्ली तो आना नहीं था, अगर उसे दिल्ली लाना होता तो उसका लिंग परीक्षण जरुर चैक किया जाता। अभी तो लाहौल-स्पीति की सड़के हमारा परीक्षण करने पर तुली हुई थी। तिन्दी से पीछे मुड़कर देखा तो ऊपर पहाड़ का नजारा देखकर मेरे आश्चर्य का ठिकाना ही नहीं रहा। यहाँ से खीचा फ़ोटो देखकर, आप भी सोच में पड़ जाओगे कि इसके सामने कश्मीर की क्या औकात?

यहाँ ट्रक में बंधी अपनी बाईक की हालत देखी तो होश उड़ गये। दोनों बाइक की रस्सी ढ़ीली हो चुकी थी। बाइके सीधी बांधी गयी थी लेकिन अब बाइके तिरछी हो चुकी थी। दोनों बाइक के हैंडिल मुड़कर अंग्रेजी के U आकार में बदल चुके थे। ट्रक में घुसकर बाइक दुबारा बांधी गयी ताकि बाइक में और नुक्सान ना हो। दुबारा बाइक बांधते समय देखा कि मेरा अगले पहिये का मरगाड़ भी रस्सी के कसाव से टूट चुका है। बाइक तिरछी होने से पिछला इन्ड़ीकेटर भी टूट गया था। पल्सर की टंकी में एक बड़ा ड़ेन्ट पड़ चुका था। मेरी बाइक की टंकी लैग गार्ड़ बड़ा होने से सुरक्षित थी। अबकी बार बाइक और ज्यादा कसकर बांधी गयी थी।

तिन्दी से खाना खाकर व बाइक बांधकर आगे चल दिये, पंचर लगने का इन्तजाम यहाँ भी नहीं हो सका! अब शाम के पाँच बजने वाले हो रहे थे। ट्रक चालक बोला कि हमें तेजी से चलना होगा नहीं तो हम दलदल नाला पार नहीं कर पायेंगे। मैं दो दिन से दलदल नाले के नाम से अच्छी तरह जान चुका था कि इस मार्ग का यह सबसे खतरनाक नाला है। अभी यह नाला 5-6 किमी दूर रह गया था। यह दूरी उस कबाड़े मार्ग पर कब पार हुई मुझे याद नहीं है। जब अचानक एक मोड़ पार करते ही ऊपर से दूध जैसी दिखती नदी उल्टे हाथ सड़क पर बहती दिखायी तो ड्राईवर बोला वो देखो दलदल नाला आ गया है।

दलदल नाले का नाम सुनते ही मैंने कैमरा निकाल कर उसका फ़ोटो ले लिया। मैं ट्रक में खिड़की किनारे ही बैठा हुआ था लेकिन मेरा ध्यान इसके पानी पर था। जैसे ही ट्रक इसके अन्दर घुसा तो मैंने खिड़की से अपनी मुन्ड़ी बाहर निकाल कर देखा इसका पानी ट्रक के आधे पहिये तक आ गया था। धीरे-धीरे पूरा ट्रक इसमें घुस गया। यहाँ ट्रक चालक ने थोड़ी सी गलती कर दी कि ऐसी जगह पर हमेशा ऊपर की तरफ़ से घूमाकर गाडियों को निकालना चाहिए। जबकि ट्रक चालक ने ट्रक को उसके बीचो बीच से निकाला था। जैसे ही ट्रक के अगले पहिया पानी से बाहर निकलने वाले थे उनके सामने पत्थर की खड़ी टक्कर अड़ जाने से ट्रक आगे नहीं बढ़ पाया।

ट्रक के पिछले पहिया भी पानी में अन्दर ही थे ट्रक चालक ने जोर लगाया तो पिछले पहियाओं ने स्लिप करना शुरु कर दिया। यदि हमारे ट्रक में वजन रहा होता तो ट्रक के पिछले टायर के स्लिप होने की सम्भावना नहीं रहती। खाली ट्रक उसपर आगे टक्कर बनी हुई हो तो क्या करे। यहाँ पर ट्रक को पीछे हटाकर ऊपर से निकालने की सोची और ट्रक को पीछॆ हटाने लगे, लेकिन ट्रक पीछे भी नहीं हट पाया। कई बार कोशिश करने पर टायर स्लिप होने से ट्रक के टायर ने गड़ड़ा बना दिया। जिससे ट्रक निकलने की बची-खुची सम्भावना भी समाप्त हो गयी थी। मैंने सोचा कि अगर यही पानी एक फ़ुट और बढ़ जाये तो ट्रक को बहने से रोकना मुश्किल लगने लगेगा। हमारे आगे वाला ट्रक इस नाले को पार कर खड़ा हुआ मिला।

हमारा ट्रक पानी में फ़सँने के कारण पीछे आने वाले कई ट्रक लाईन में लगकर खड़े हो गये। एक बार मुझे लगा कि कही देर होने पर हमारा ट्रक पानी में ना बह जाये। मैं ट्रक से नीचे उतर आया, ट्रक से बाहर आने के लिये पानी में कूदना पड़ा। नाले का पानी ठन्ड़ा तो था लेकिन इतना ठन्ड़ा भी नहीं था कि परेशान करता। आगे वाला ट्रक हमारे इन्तजार में ही रुका हुआ था। जब हमारा ट्रक नहीं निकल पाया तो वह ट्रक हमारे ट्रक को खींचने के लिये वापिस आया। उसने ट्रक को बैक करके हमारे ट्रक के सामने लगाया गया।

ट्रक में उपलब्ध रस्सी को मिलाकर एक जगह जोड़ लिया और सामने वाले ट्रक के पिछवाड़े में बांधने के बाद जब दोनों ट्रकों ने जोर लगाया तो रस्सी टूट कर कई टुकड़ों में बँट गयी। अब हमारे पास दूसरी रस्सी भी नहीं थी। यहाँ पर पुल का निर्माण कार्य कर रहे मजदूर खड़े होकर हमारा तमाशा देख रहे थे। जब सड़क के दोनों ओर कई वाहन खड़े हो गये तो इन मजदूरों ने अपने पास से लोहे का एक मजबूर रस्सा हमें दिया। हमने अपने दोनों ट्रकों को उस रस्से से जोड़ दिया लेकिन अबकी बार जोर लगाने पर लोहे का रस्सा तो नहीं टूटा, इसकी जगह आगे खींचने वाला ट्रक भी स्लिप करने लग गया। ट्रक स्लिप करने का कारण उनमें वजन नहीं होना था।

आखिरकार हमारी हर तरकीब फ़ेल होने के बाद सड़क पर पुल बनाने वालों का अधिकारी हमारे पास आया और बोला कि क्या यह ट्रक आपका है? नहीं! क्यों इसके चालक को बोलो “ट्रक से उतर कर पहियों के नीचे से पत्थर हटाये।“ ट्रक चालक पानी में घुसकर पहिये के आगे-पीछे से पत्थर हटाने लग गया, मैंने भी उसकी मदद की। मैं इस नाले के पानी मे रस्सी लगाने व पत्थर हटाने के लिये 7-8 बार घुसा था लेकिन एक बार भी पानी मेरे घुटने से ऊपर नहीं जा पाया था। यहाँ गाड़ी फ़सने का मुख्य कारण पानी में पड़े गोल पत्थर थे जिन पर गाड़ी कम वजन होने से स्लिप कर रही रही थी। हमारा आधा घन्टा इस नाले में खराब हो चुका था। जब हमारी हर कोशिश नाकाम हो चुकी थी तो हम चिंता में पड़ गये कि अब क्या करे?

पुल बनाने वाले अपना बुलडोजर लेकर आये। पुल बनाने वाले जिस डोजर को लाये थे वह टैंक की तरह लोहे की चैन पर चलने वाला था। उसने नाले के पार आकर ट्रक के पिछवाड़े अपना डोजर लगा दिया। अबकी बार लोहे का रस्सा इस बुलडोजर में बाँध दिया गया था। बुलडोजर में रस्सा लगाने से पहले एक बार उसने धक्का लगाकर ट्रक को निकालने की कोशिश भी की थी लेकिन ट्रक धक्के से नहीं निकल पाया था। आखिरकार लोहे के रस्से बांधने के बाद डोजर ने ट्रक को खिलौने की तरह पीछे से हवा में उठा लिया। पीछे से ट्रक उठते ही आगे का हिस्सा अपने आप निकल आया। डोजर ने पूरा ट्रक नाले से बाहर निकाल कर रख दिया। अबकी बार ट्रक को नाले के ऊपरी किनारे से होकर निकाला तो ट्रक ने  आसानी से दलदल नाला पार कर लिया।

दलदल नाले को पार करने के बाद हमने डोजर वालों का धन्यवाद कहा यहाँ कार्य करने वाला अधिकारी गुड़गाँव का रहने वाला था। हमारे बारे यह जानकर कि हम दिल्ली से आये है तो वह बहुत खुश हुआ था। इन्होंने बताया था अगले 10-12 दिनों में यहाँ पुल तैयार हो जायेगा। अब उदयपुर पहुँचे से पहले एक बड़ा नाला और पार करना था। लेकिन शुक्र रहा कि उस पर काम चलाऊ पुल बना दिया गया था। यहाँ पर यह नाला बहुत लम्बे पट को लेकर चलता है ऊपर से ज्यादा पानी आने पर यह पुल के अलावा बहुत सारी जगह घेर लेता है। बताते है कि इस नाले में ज्यादा पानी आने पर कई-कई दिन तक वाहन दोनों ओर इन्तजार करते रह जाते है।

रात के आठ बजे के करीब हमने उदयपुर में प्रवेश किया। कई दिन बाद उदयपुर पहुँचने से कुछ पहले पक्की काली सड़क के दर्शन हुए। यहाँ पर तीनों ट्रक चालक हमारे वाले ट्रक चालक से बोले कि आज की दावत तुम दोगे, क्योंकि तुम बाइक लेकर जा रहे हो। बाइक ले जाने का किराया उनकी अलग से ऊपरी कमाई थी। हम यही सोच रहे थे एक-दो घन्टे में यह खाना खाकर आगे के लिये चलेंगे, जैसा कि दिन भर साथ रहने से ट्रक चालक ने कहा था कि रात में रोहतांग पार कर जायेंगे। लेकिन रात के 11 बजे के बाद ट्रक चालक बोलने लगे कि अब नीन्द आ रही है इसलिये सुबह 4 बजे ही आगे जायेंगे। अब रात रुकने/सोने के लिये ट्रक वालों के पास तो ट्रक में ही जगह होती है हम कहाँ जाये? शुक्र रहा कि जिस ढाबे पर ट्रक वालों ने खाना खाया था उसने अपने घर ले जाकर हमारे सोने का प्रबन्ध कर दिया था। इसके घर पर इस यात्रा का सबसे शानदार बिस्तर मिला।

सोने से पहले ही हमने रात के भोजन के रुप में एक दुकान से चाऊमीन बनवाकर खायी थी। इस दुकान पर भी एक मजेदार घटना हुई कि हम भर पेट चाऊमीन खाना चाहते थे। जब हमने चाऊमीन वाले से एक प्लेट चाऊमीन का दाम पूछा तो उसने कहा कि यहाँ आज तक किसी ने फ़ुल प्लेट चाऊमीन खाई ही नहीं है। अच्छा अब दिल्ली वाले भूक्खड़ यहां आ गये है इनका काम फ़ुल प्लेट से कम पर नहीं चलता है बल्कि डेढ़ प्लेट भी लेनी पड़ सकती है उसने चाऊमीन के दाम बताये कि हाफ़ प्लेट 40 की, व फ़ुल प्लेट 60 रुपये की होगी।

हमने चार प्लेट फ़ुल बनवायी थी। लेकिन अपने दो शेर कुछ ज्यादा ही भूखे थे जिससे उन्होंने हाफ़-हाफ़ प्लेट चाऊमीन बाद में और भी बनवायी थी। जब हम चाऊमीन की दुकान में आये थे तो यह घर जाने की तैयारी कर रहा था लेकिन हमारे लिये चाऊमीन बनाने में इसे घन्टा भर से ज्यादा लग गया था इसकी बीबी बच्चे को साथ लेकर दुकान पर आ गयी थी कि आज क्या हुआ जो अब तक दुकान पर रुके हुए है उसे क्या पता था कि आज दिल्ली वाले भूक्खड़ उसकी दुकान पर टूटे पड़े है। देवेन्द्र रावत हम चारों में सबसे बड़े भी थे लेकिन सबसे ज्यादा बैचेन भी वही लग रहे थे। ट्रक वालों का व्यवहार देखकर सोने से पहले उन्होंने कहा था कि कही ट्रक वाले हमारी बाइक लेकर भाग तो नहीं जायेंगे? (यह यात्रा अभी जारी है)


 इस साच पास की बाइक यात्रा के सभी ले्खों के लिंक क्रमवार नीचे दिये जा रहे है।



सड़क चौड़ीकरण कार्य प्रगति पर है।


नदी पार एक झरना

हाईवे का हाल

यह हमारा फ़ोटो खींच रहा था, हमने उसका खींच लिया है।


हरी-भरी एक घाटी की ओर जाती सड़क।


पहाड़ में महिलाएँ भी मजदूरी कार्य में लगी रहती है।





तेरे बच्चों का कबाब बनेगा या चिकन?

स्वर्ग का नजारा, इसके सामने कश्मीर की क्या औकात?

पहली प्लेट में शाकाहारी मोमो रखे हुए है।

यही फ़ँसा था हमारा ट्रक, इसका नाम है "दलदल नाला"

कहो मजा आया ना दलदल नाला देखकर

ट्रक निकालने के बाद का फ़ोटो

सड़क पर मिला रेवड़ का झुन्ड, गड़रिया कहाँ गया?

उदयपुर चाऊमीन की दुकान पर

मौजा ही मौजा।

9 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

रोचक और आनंद भरी यात्रा।

SACHIN TYAGI ने कहा…

अब दिल्ली वाले भूक्खड़ यहां आ गये है
इनका काम फ़ुल प्लेट से कम पर नहीं चलता है बल्कि डेढ़ प्लेट
भी लेनी पड़ सकती है उसने चाऊमीन के दाम बताये कि हाफ़ प्लेट
40 की, व फ़ुल प्लेट 60 रुपये की होगी।
sahi kahe bhai aap ne.uttam yatra varnan.

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

चित्र बहुत सुंदर हैं..... शुभ यात्रा

pradeep sharma ने कहा…

aaj ki post tho bahut jabardast rahi.. wo murgi wali photo k liye 10/10 number..

Salahuddin Ahmed ने कहा…

Sandeep Ji, Post aapki, aur apka ek bhi photo nahin, maza nahi aaya. Aapka Daldal Naala ka photos hote to behtar hota.

Ajay Kumar ने कहा…

Sandeep Bhai Ji iss yatra mein kafi adventurer hai...

डॉ टी एस दराल ने कहा…

मनमोहक तस्वीरें हैं .
मज़ा आ गया देखकर .
चित्रों में नाम न लिखा जाये या कोने में लिखें तो ज्यादा अच्छा लगेगा।

Anurag Sharma ने कहा…

वाकई, सुंदर भी और दुर्गम भी ...

नीरज कुमार ‘जाट’ ने कहा…

वाकई खतरनाक है दलदल नाला।

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