शनिवार, 6 जुलाई 2013

Mumbai- Babulnath Temple मुम्बई का बाबुलनाथ मन्दिर

EAST COAST TO WEST COAST-29                                                                   SANDEEP PANWAR
बोम्बे के कई प्रसिद्ध मन्दिर देखने के उपराँत, यहाँ का मशहूर मन्दिर बाबुलनाथ देखने की बारी भी आ गयी थी। महालक्ष्मी मन्दिर से यहाँ पहुँचने के हमने एक टैक्सी से  इनके बीच का फ़ासला तय किया। मन्दिर सड़क से काफ़ी हटकर व अन्दर जाकर है जबकि टैक्सी ने हमें सड़क पर ही उतार दिया था। सड़क किनारे पर ही बाबुलनाथ मन्दिर चौक के नाम से एक बोर्ड़ भी लगा हुआ है। मैंने सोचा कि मन्दिर यही-कही सामने ही है लेकिन जब आसपास कही भी मन्दिर दिखायी नहीं दिया तो मैंने विशाल से कहा, क्यों महाराज बाबुलनाथ को बाबुल ने कहाँ छुपाया हुआ है? विशाल बोला थोड़ा सब्र रखो, सामने वाली गली में ऊपर चढ़ने पर मन्दिर आ जायेगा।



हम सामने वाली गली में चलने लगे, इस गली में जाते ही पुराने समय की लगभग सौ वर्ष पुरानी इमारते दिखायी देने लगी। ऐसी ही पुरानी जर्जर इमारते देखते हुए हम आगे बढ़ते जा रहे थे कि तभी एक ऐसे मकान पर नजरे जाकर ठहर गयी, जिसको एक पीपल के विशाल पेड़ की जड़ों ने ऐसा लपेता था जिसे देख एक बार तो साँसे थमती हुई दिखायी देने लगी। एक लम्बी साँस लेकर विशाल से कहा, अरे भाई जरा अपने कैमरे से इसका एक फ़ोटो तो ले लो जरा। विशाल ने उस भीमकाय पेड़ व उसकी जड़ों से लिपटे मकान का फ़ोटो लिया, तब कही जाकर हम अगे बढ़ चले। पीपल व बरगद के पेड़ विशाल रुप धारण कर लेते है लेकिन इन दोनों पेड़ों की सबसे खास बात यह है कि यह पेड़ किसी भी मकान की दीवार में उग आते है। जैसे-जैसे ये बड़े होते रहते है वैसे-वैसे उस मकान की दीवार को चीरते रहते है।

आगे बढ़ते ही जोरदार चढ़ाई से हमारा सामना होने लगा। विशाल के एक बार मुझे लगभग ड़राते हुए कहा कि संदीप भाई अभी एक पहाड़ पर चढ़ना होगा तब कही जाकर मन्दिर आयेगा। मुझे अच्छी तरह पता है कि विशाल जानता है कि पहाड़ पर चढ़ने में मैं पीछे रहने वाला नहीं हूँ। विशाल भी पहाड़ी की चढ़ाई में किसी से कम नहीं है। मैं पहाड़ चढ़ने के बारे में अपने आप को मानसिक रुप से तैयार कर चुका था कि अचानक विशाल बोला, संदीप भाई, चलो लिफ़्ट से ऊपर पहाड़ी पर चलते है। अच्छा महाराज तुम्हे भी पंगा लेने में मजा आ रहा था। क्या हुआ भीमाशंकर की चढ़ाई भूल गये क्या, जो इस चढ़ाई में मजे लिये जा रहे हो। चलने के मामले में विशाल किसी भी अनुभवी ट्रेकर से कम नहीं है। यदि किसी को शक हो विशाल के साथ कुछ घन्टे पैदल चलकर देख ले।

चल भाई लिफ़्ट में, लिफ़्ट किसी को लेकर ऊपर गयी थी जैसे ही लिफ़्ट नीचे आई तो हम दोनों उस लिफ़्ट में खड़े होकर ऊपर की मंजिल पर पहुँच गये। इस लिफ़्ट को मन्दिर वालों ने ही लगवाया हुआ है वैसे यह लिफ़्ट फ़्री में किसी को ऊपर नीचे नहीं लेकर जाती है। इसे प्रयोग करने के बदले कुछ शुल्क चुकाना होता है। विशाल ने हम दोनों के लिये शायद पाँच रुपये का शुल्क अदा किया था। शुल्क अदा करने के बदले लिफ़्ट मैन एक पर्ची भी देता है जो इस बात का प्रमाण होता है कि हमने शुल्क सही जगह अदा किया है। हमें लिफ़्ट मैन ने वह पर्ची नहीं दी। उस समय हम भी कुछ नहीं बोले, वापसी में यह लिफ़्ट जब नीचे जाते समय हमसे पर्ची माँगेंगा तो उसे उसकी लापरवाही/चालाकी का जवाब दिया जायेगा।

लिफ़्ट से बाहर निकल एक लम्बे प्लेटफ़ार्म पर पहुँच गये। यहाँ खड़े होकर नीचे झाँकने पर ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी गर्म हवा के गुब्बारे में उड़कर नीचे का नजारा लिया जा रहा हो।  कुछ देर वही खड़े होकर आसपास के नजारों का लुत्फ़ उठाते रहे। जब विशाल बोला संदीप भाई वापसी में भी यही से आना है बाकि नजारे बाद में देख लेना। तब कही हम मन्दिर की ओर बढ़ चले। कुछ कदम तय करते ही मन्दिर का प्रवेश द्धार आ गया, यहाँ से होकर हम आगे बढ़ते रहे। अभी तक हम दोनों (विशाल अपने कैमरे से मैं अपने मोबाइल से) फ़ोटो लिये चले जा रहे थे। मन्दिर में घुसते ही फ़ोटो पर पाबन्दी वाली बात याद आ गयी। पहले चारों ओर घूमकर यह सुनिश्चित कर लिया गया कि वहाँ ऐसा कोई बोर्ड़ नहीं लगा है जिस पर यह लिखा हो कि मन्दिर प्रांगण में फ़ोटो लेना मना है।

मन्दिर परिसर के ढेर सारे फ़ोटो लेने के बाद मुख्य मन्दिर के दर्शन की बारी थी। मुख्य मन्दिर के आगे पहुँचते ही फ़ोटो पर पाबन्दी वाला बोर्ड़ दिखायी दिया। हमने अपने कैमरे बन्द कर मुख्य मूर्ति के दर्शन किये। मुख्य मूर्ति के दर्शन के उपराँत मन्दिर के बाहरी भाग के फ़ोटो लेने लग गये। मन्दिर परिसर का रखरखाव बेहरतीन तरीके से किया गया है। यहाँ के खम्बों पर किये गये नक्काशी के कार्य को देखकर मन प्रसन्न हो गया। खम्बों पर बनी मूर्तियाँ देखकर शिल्पकार की मेहनत पर आश्चर्य होता है कि कितनी मेहनत से यह कार्य पूर्ण किया गया होगा। मन्दिर परिसर में काफ़ी समय बिताने के बाद हम वहाँ से वापिस चलने के लिये तैयार हो गये। यहाँ इस मन्दिर को देखकर विशाल ने कहा संदीप भाई बोम्बे के मुख्य मन्दिरों के दर्शन आप कर चुके हो, अब आपको यहाँ के पार्क दिखाता हूँ। आज का पूरा दिन तुम्हारे नाम है जो अच्छा लगे वो दिखाओ। (क्रमश:)
विशाखापटनम-श्रीशैल-नान्देड़-बोम्बे-माथेरान यात्रा के आंध्रप्रदेश इलाके की यात्रा के क्रमवार लिंक नीचे दिये गये है।
15. महाराष्ट्र के एक गाँव में शादी की तैयारियाँ।
16. महाराष्ट्र की ग्रामीण शादी का आँखों देखा वर्णन।
17. महाराष्ट्र के एक गाँव के खेत-खलिहान की यात्रा।
18. महाराष्ट्र के गाँव में संतरे के बाग की यात्रा।
19. नान्देड़ का श्रीसचखन्ड़ गुरुद्धारा
20. नान्देड़ से बोम्बे/नेरल तक की रेल यात्रा।
21. नेरल से माथेरान तक छोटी रेल (जिसे टॉय ट्रेन भी कहते है) की यात्रा।
22. माथेरान का खन्ड़ाला व एलेक्जेन्ड़र पॉइन्ट।
23. माथेरान की खतरनाक वन ट्री हिल पहाड़ी पर चढ़ने का रोमांच।
24. माथेरान का पिसरनाथ मन्दिर व सेरलेक झील।
25. माथेरान का इको पॉइन्ट व वापसी यात्रा।
26. माथेरान से बोम्बे वाया वसई रोड़ मुम्बई लोकल की भीड़भरी यात्रा।
विशाखापटनम-श्रीशैल-नान्देड़-बोम्बे-माथेरान यात्रा के बोम्बे शहर की यात्रा के क्रमवार लिंक नीचे दिये गये है।
27. सिद्धी विनायक मन्दिर व हाजी अली की कब्र/दरगाह
28. महालक्ष्मी मन्दिर व धकलेश्वर मन्दिर, पाताली हनुमान।
29. मुम्बई का बाबुलनाथ मन्दिर
30. मुम्बई का सुन्दरतम हैंगिग गार्ड़न जिसे फ़िरोजशाह पार्क भी कहते है।
31. कमला नेहरु पार्क व बोम्बे की बस सेवा बेस्ट की सवारी
32. गिरगाँव चौपाटी, मरीन ड्राइव व नरीमन पॉइन्ट बीच
33. बोम्बे का महल जैसा रेलवे का छत्रपति शिवाजी टर्मिनल
34. बोम्बे का गेटवे ऑफ़ इन्डिया व ताज होटल।
35. मुम्बई लोकल ट्रेन की पूरी जानकारी सहित यात्रा।
36. बोम्बे से दिल्ली तक की यात्रा का वर्णन























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