मंगलवार, 16 जुलाई 2013

Kanyakumari Vivekanand Rock, Sunrise and Sunset कन्याकुमारी विविकानन्द रॉक सूर्यास्त व सूर्योदय

LTC-  SOUTH INDIA TOUR 03                                                                           SANDEEP PANWAR
कन्याकुमारी जाने वाली बस में बैठकर पाँच टिकट लिये। हमारी बस त्रिवेन्द्रम से कन्याकुमारी जाने वाले मुख्य हाईवे से होकर ही जा रही थी मार्ग के दोनों ओर हरियाली देखकर मन को बड़ा अच्छा लग रहा था। समुन्द्री किनारे वाले राज्यों में, शहरों में, नारियल के लम्बे पेड़ों की भरमार तो रहती ही है। कुल नब्बे किमी के मार्ग का आधा भाग आबादी से घिरा हुआ मिला। इस मार्ग में कई जगह तो सड़क इतनी तंग थी कि दो गाडियाँ मुश्किल से आ जा रही थी। लगभग दो घन्टे की यात्रा के बाद हमारी बस नगरकोईल पहुँच गयी। त्रिवेन्द्रम से नगरकोइल तक दिन में कई रेल सेवा है। लेकिन हमें यहाँ की बस सेवा के बारे में भी जानना था इसलिये हम बस से कन्याकुमारी आये थे।

विवेकानन्द रॉक

कन्याकुमारी के नजदीक नगरकोइल नाम कस्बा मुख्य रेलवे लाइन पर जुड़ा हुआ है यहाँ से कई जगह की रेल आरम्भ होती है। यह कन्याकुमारी से लगभग 10 किमी दूरी पर है। जैसे ही हमारी बस कन्याकुमारी की आबादी में दाखिल हुई तो मैंने बस से ही विविकानन्द आश्रम देखना शुरु कर दिया। मुझे बताया गया था कि कन्याकुमारी में ठहरने के लिये विवेकानन्द आश्रम से बेहतरीन स्थान मुश्किल से मिलेगा। आश्रम सड़क के उल्टे हाथ दिखायी दे गया। मैं अभी बस से नहीं उतरना चाहता था क्योंकि मैं जानना चाहता था कि बस अड़ड़ा अभी कितनी दूर है? आश्रम से बस अड़ड़ा लगभग 2 किमी दूरी पर जाकर मिला। बस अडड़े के पास भी बहुत सारे होटल आदि ठहरने के स्थल बने हुए है।

बस से उतरते ही एक बन्दा बोला नमस्कार क्या आप रात्रि विश्राम के लिये कमरा देखना चाहोगे। आप कौन? उस बन्दे ने बताया कि मैं बस अड़ड़े से बाहर से आने वाले लोगों को कमरे दिलाने का काम करता हूँ। तुम किस होटल में काम करते हो? जी मैं किसी होटल में काम नहीं करता हूँ, मैं तो लोगों को कई होटल दिखाता हूँ। दिन भर में 8-10 लोगों को कमरा दिला देता हूँ जिससे मुझे प्रति कमरे 50 रुपये कमीशन मिल जाता है। उसके दिखाये गये कई होटल में से एक होटल में हमने दो कमरे ले लिये। हमने वहाँ कई कमरे देखे थे जिनका किराया 200 से लेकर 1000/1500 तक बताया गया था। मैं महंगे कमरे में ठहरकर रुपये बर्बाद नहीं करना चाहता। मैं कमरा लेते समय दो बाते ध्यान से देखता हूँ पहली टायलेट साफ़ हो दूसरी बिस्तर की हालत ठीक हो जिससे हमें परेशानी ना हो।

कमरे में सामान रख कर हम बाहर घूमने के लिये चल दिये। अभी सूर्य छिपने में समय था इसलिये हम समय बिताने के लिये समुन्द्र किनारे उसी ओर चले गये जहाँ से सूर्यास्त होता देख सकते थे। स्थानीय लोगों से पता करते हुए समुन्द्र किनारे जा पहुँचे। कन्याकुमारी मन्दिर के आगे से होते हुए हम उस जगह जा पहुँचे जहाँ लिखा हुआ था त्रिवेणी संगम, तीन सागर इस जगह मिलते है पहला अपना देश के नाम वाला हिन्द महासागर, दूसरा बंगाल की खाड़ी वाला समुन्द्र, तीसरा अरब सागर तीन सागर मिलने से इस स्थान का महत्व बढ़ गया है। हम यहाँ तीन समुन्द्र के मिलन बिन्दु पर स्नान कर रहे लोगों को देखते हुए आगे बढ़ते गये।

आगे बढ़ते ही एक खुला सा स्थान दिखायी यहाँ पर खाने-पीने का सामान बेचने वाले काफ़ी संख्या में खड़े थे। सूर्य भी साफ़ दिखाई दे रहा था। हमने यही एक सही स्थान देखकर अपना डेरा जमा लिया। घरवाली साथ हो तो फ़िर खाने-पीने के बारे में माँग उत्पन्न होना मामूली सी बात है। उस माँग की पूति करना हमारा कानूनी फ़र्ज बन जाता है यहाँ सुनील पहले जाकर एक जगह से कच्चे आम ले आया। कन्याकुमारी में दिसम्बर माह में कच्चे आम देखकर मेरा सिर चकरा गया था कि दिसम्बर में कच्चा आम कैसे सम्भव है? बाद में कन्याकुमारी में पेड़ पर लगे आम देखकर समझ आ गया कि उत्तर भारत और दक्षिण भारत में 3000-4000 किमी की दूरी होने पर आम क्यों 6 महीने पहले नहीं अ सकते है। यहाँ की मौसम व जलवायु के कारण ही उत्तर भारत व यहाँ की फ़सल चक्र के समय में बहुत ज्यादा अन्तर है।

अभी सूर्य डूबने में कुछ मिनट बाकि लग रहे थे तब तक कन्याकुमारी की आइसक्रीम खायी गयी। आइसक्रीम खाते-खाते सूर्यास्त भी देखते रहे। जैसे-जैसे सूर्यास्त हो रहा था बादल भी सूर्य के आगे अड़ते जा रहे थे। बादलों में जैसे होड़ मची हो कि हम आज सूर्यास्त नहीं देखने देंगे। धीरे-धीरे सूर्य समुन्द्र में डुबने लगा। आखिरकार वह समय भी आया जब सूर्य दिखायी देना बन्द हो गया। सूर्य दिखना बन्द होते ही लोगों ने वहां से चलना शुरु कर दिया। हम भी देर किये बिना वहां से कन्याकुमारी मन्दिर के लिये चल दिये।

कन्याकुमारी मन्दिर पहुँचते ही जैसे ही अन्दर प्रवेश किया तो वहाँ मौजूद पहरेदार बोले पुरुष कमर से ऊपर के कपड़े उतार कर जायेगा। कैसे-कैसे रीति-रिवाज बनाये हुए है। माता का मन्दिर है पुरुष के कपड़े उतरवाकर दर्शन किये जा रहे है। मैंने कमीज व बनियान उतारकर मन्दिर में जाने से इन्कार कर दिया। भाड़ में जाये ऐसे नियम जो आदमी को बेशर्म होने पर मजबूर करे। सुनील ने अपनी कमीज व बनियान उतारा और कुछ मिनट में दर्शन कर बाहर आ गया। यहाँ दक्षिण भारत के मन्दिरों में दर्शन करने के लिये जाते समय 20-25 रुपये प्रति बन्दे के हिसाब से टिकट भी कटाना पड़ता है। इस मन्दिर में मेरे 20 रुपये व आधा बदन नंगे होकर पब्लिक में पर्दशन करने से बच गया।

मन्दिर देखकर बाजार देखते हुए वापिस अपने कमरे की ओर आ रहे थे। यहाँ कल सुबह विवेकानन्द रॉक देखने के लिये समुन्द्र में जाना था। विवेकानन्द रॉक जाने वाला मार्ग दिखायी दिया। लेकिन सुबह सूर्योदय के लिये उधर ही जाना पडेगा इसलिये अब वहाँ जाने के लिये इच्छा नहीं हुई। अपने कमरे के सामने ही अन्नापूर्णा भोजनालय के नाम से राजस्थानी बन्दे का होटल था हमने पाँच मारवाड़ी थाली लगवायी। खाना अच्छा बना था। खाना खाकर अपने कमरे पर आकर सो गये।

सुबह सूर्योदय से पहले ही उठना था इसलिये रात को दस बजे के आसपास ही सोने की तैयारी हो गयी थी। सुबह ठीक पाँच बजे का अलार्म लगाया गया था। अलार्म बजते ही सूर्योदय देखने के लिये निकल पड़े। हमारे कमरे से सूर्योदय देखने वाला बिन्दु तीन-चार मिनट की पैदल दूरी पर ही था। यहाँ सामने ही विवेकानन्द रॉक जाने वाली बड़ी नाव चलने वाला स्थान भी था। देखते ही देखते कुछ ही मिनटों मॆं वहाँ सैकडों लोगों की भीड़ जुट गयी। धीरे-धीरे सूर्य की लाली से पहले आसमान लाल हुआ उसके बाद लंका वाली दिशा से सूर्य महाराज आकाश में ऊपर उठने शुरु हुए। जैसे ही सूर्य ने आसमान में आकर आकर चारों ओर धूप बिखेरी तो लोगों ने वहाँ से चलना आरम्भ कर दिया।

हमने आज मदुरै जाने वाली बस से मदुरै जाना था वहाँ रात ठहरना का कार्यक्रम बनाया था। घन्टे भर समुन्द्र किनारे ठहलते रहे। उसके बाद विवेकानन्द रॉक जाने वाली फ़ेरी चालू होते ही विवेकानन्द रॉक के दर्शन जा पहुँचे। नाव से आने जाने का किराया एक बार में ही ले लिया जाता था। उस समय प्रति सवारी 20 रुपये का टिकट दर से किराया लिया गया था। विवेकानन्द रॉक पहुँचकर वहाँ लगी तमिल कवि की विशाल मूर्ति देखी। विविकानन्द भवन देखा, पार्वती मन्दिर देखा। यहाँ आकर सबसे ज्यादा रोमांच यहाँ चलने वाली तेज हवाओं ने हमारा खूब स्वागत किया। वहाँ चल रही तेज हवाओं को देखकर कन्याकुमारी के उल्टे हाथ बंगाल की खाड़ी में इन तेज हवाओं से बिजली बनाये जाने वाले विशाल पंखे देखे।

विवेकानन्द रॉक देखकर पुन: अपने कमरे पर आये। सुबह से कुछ खाया पिया भी नहीं था इसलिये मदुरै जाने से पहले एक बार फ़िर दोपहर का खाना खाने के लिये राजस्थानी बन्दे के अन्नापूर्णा भोजनालय में मारवाड़ी थाली का भोजन करने पहुँच गये। कल त्रिवेन्द्रम में हमें पूरे दिन ढंग का खाना भी नहीं मिल पाया था। दोपहर का खाना खाकर शाम तक के लिये फ़्री हो गये। 

बस अडड़े पहुँचकर मदुरै जाने वाली बस के बारे में पता लगाने की कोशिश भी नहीं कि थी क्योंकि एक जानकार कुछ दिन पहले कन्याकुमारी से रामेश्वरम के लिये निजी टूर वाले की बस से यात्रा करके आया था उसने हमें निजी बस से ही आगे की यात्रा करने की सलाह दी थी। हमने रात में सूर्यास्त देखकर लौटते समय ही एक निजी टूर वाले से मदुरै होकर रामेश्वरम जाने वाली उनकी बस के 5 टिकट बुक कर दिये थे, जो रात में इस यात्रा की हमारी सबसे भयंकर भूल साबित हुई। अगर हम क्न्याकुमारी/नगरकोइल से मदुरै/रामेश्वरम के लिये रेल में बैठ जाते तो कोई दिक्कत नहीं आनी थी। (क्रमश:)   

सूर्यास्त के समय


सूर्योदय की झलक


बिबेकानन्द हॉल में लगी उनकी मूर्ति






रात के समय
कन्याकुमारी से दिखायी देता, विवेकानन्द रॉक व तमिल कवि की विशाल मूर्ति





5 टिप्‍पणियां:

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

कोन भाग्यशाली कवि था जिसकी इतनी बड़ी मूर्ति लगी है? बढिया चल रही है यात्रा।

Mukesh Bhalse ने कहा…

Enjoyed the post thoroughly. This famous tamil poet is Thiruvalluvar. Waiting for next part.

We are planning to visit Rameshwaram, Madurai and Kanyakumari next year, your posts will be helpful for me in planning my trip.

Thanks.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

शिला स्मारक के विहंगम दृश्य..

माँ शेरोवाली दुर्गा का बेटा_रविन्द मानकर ने कहा…

ततीर्थं स्पृस्य राजेंद्र सर्वपापै:प्रमुच्यते
||
अर्थात कावेरी में स्नान करके मनुष्य
समुन्द्र तटवर्ती कन्या तीर्थ में स्नान करे |
इस कन्या तीर्थ का स्पर्श कर लेने मात्र ही
मनुष्य सभी पापो से मुक्त हो जाता है |
कन्याकुमारी एक अंतरीप है |कन्याकुमारी के
दक्षिण में हिन्दमहासागर ,पश्चिम में
अरबसागर ,तथा पूर्व में बंगाल की खड़ी से
घिरा हुआ है |
|पापविनाशं "काशी की गंगा के बाद
कन्याकुमारी का समुन्द्र ही सबसे ज्यादा
पवित्र है |"चैत्र पूर्णिमा को इस स्थान पर
एक साथ बंगाल की खड़ी में चंद्रोदय तथा
अरब सागर में सूर्यास्त दिखाई देता है |जो
अद्भुत है |
कन्या कुमारी के इस त्रिकोणीय संगम
क्षेत्र में कई तीर्थ है |बंगाल की खड़ी के
समुन्द्र में सावित्री, गायत्री ,सरस्वती
,तथा कन्याविनायक आदि तीर्थ है |कहाँ
जाता है सुचित्रं में शिव जी पर किया
जलाभिषेक भूमि के भीतर से आकर इसी
समुन्द्र में मिलता है |तट पर ही गणेशजी का
मन्दिर है जो "इन्द्रकांत" विनायक के नाम
से प्रसिद्द है |क्योकि इस विग्रह की
स्थापना देवराज "इन्द्र "ने की थी |
कन्याकुमारी माँ का भव्य रूप अत्यन्त ही
मनोहारी है |कई द्वारो के भीतर माता हाथो में
माला लिए स्थापित है |कहा जाता है माता का
श्रंगार विशेष अवसरों में हीरकरत्नों से
किया जाता है |मन्दिर के ही दक्षिण
अग्रहार के बीच में भद्रकाली के मन्दिर है जो
५१ पीठो में एक है |यहाँ माता "सती"का पृष्ठ
भाग गिरा था |मन्दिर में चारो और अनेक देव
विग्रह है ,उत्तर में पापविनाशनम
पुष्कर्निया है |इसे" मंडूकतीर्थ "भी कहते है
|कन्या कुमारी से १२ किलोमीटर की दुरी पर
ही "नागरकोइल "नागराज का मन्दिर है कहते
है मन्दिर के चारो और सर्प वास करते है |हर
रविवार ,एवं आइल्या (अश्लेशा )नक्षत्र के
दिन दूध लेकर लोगो की काफी भीड़ रहती है |
लोग कहते है यहाँ सर्प दंश से या विष से
कभी किसी की मृत्यु नही होती |नागरकोइल
से ही चार मील दूर "शुचीन्द्रम "जाहाँ परम
शिव स्थिर हो गए है |यह भगवान्
स्थानुमालका मन्दिर है |इस मंदिर का
प्रधान आकर्षण और विशेषता १८ फुट का
ऊँचा हनुमानजी की प्रतिमा है |कन्याकुमारी
की ये मेरी दूसरी बार यात्रा रही है |बचपन में
जब पहली बार कन्याकुमारी आई तो पहली
बार समुन्द्र देख कर मन काँप उठा था |मुझे
आज भी वो दिन याद है ,सब कुछ मेरे लिए
अद्भुत और आश्चर्य कर देने वाला हुआ
करता था |विवेकानन्द जी के बारे में किताबो
में काफी कुछ पढ़ा था
,अध्यात्म ,आत्मज्ञान ,शान्ति ये केवल
शब्द के जाल मात्र हुआ करते थे पर आज मै
इसकी सार्थकता को समझ सकती हूँ |

Bhagirath Ram ने कहा…

very good saheb ji

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