बुधवार, 24 जुलाई 2013

Bike trip-let's go to dangerious Saach pass आओ खतरनाक/दुर्गम साच पास चले

SACH PASS-PANGI VALLEY-01                                                                     SANDEEP PANWAR
अब से ठीक एक साल पहले july 2012 में मणिमहेश यात्रा दुबारा करने गया था, मणिमहेश यात्रा करना मेरा लक्ष्य नहीं था। उस यात्रा में सबसे बड़ी गड़बड़ यह हुई थी कि मैं पहाडों की यात्रा की अपना भरोसेमन्द साथी अपनी नीली परी साथ लेकर नहीं गया था। जिस कारण चम्बा से ही वापिस आना पड़ा था। कहते है ना जो होता है अच्छे के लिये ही होता है। यदि उस यात्रा में स्कारपियों वालों के चक्कर में हम वापिस नहीं आते तो कांगड़ा घाटी का हजारों वर्ष पुराना शिला वाला मशरुर मन्दिर कैसे देखते? इसके साथ हमने पठानकोट से चलकर जोगिन्द्रनगर तक चलने वाली ट्राय ट्रेन का भी आनन्द उठाया था। इसके बाद हिमाचल के पैराग्लाइडिंग स्थल बीड़ बिलिंग व करसोग घाटी के अन्य बहुत सारे स्थल सिर्फ़ वापसी के क्रम में ही देख ड़ाले थे, जिनका कोई इरादा भी नहीं था। यदि उस समय साच पास जाते तो वे सारे स्थल देखे बिना रह जाते। साच पास जाने का मुहूर्त तो इस साल का था तो उस साल साच जोत कैसे जा पाते? चलिये अब साच पास चलते है कौन-कौन साथ चलेगा?
एक बार फ़िर चतुर्भुज (चन्ड़ाल) चौकड़ी बाइक यात्रा पर निकली है। 


साच पास जाने की घोषणा मैंने महीने भर पहले ही फ़ेसबुक पर कर दी थी ताकि बाद में कोई यह ना कहे कि अरे संदीप भाई पहले बताया ही नहीं। चूंकि अब पहाडों की बाइक यात्रा पर मैं अकेला जाना ही बेहतर मानता हूँ। इससे आराम के साथ यात्रा भी आसान हो जाती है। यात्रा आरम्भ होने के तीन दिन पहले तक इस यात्रा पर जाने के लिये 5 बाइक तैयार हो चुकी थी। जैसा कि मैं पहले भी बता चुका हूँ कि जब तक यात्रा वाले दिन मेरे साथ कोई बाइक घर से चलती है तो मैं उसकी ही हाँ मानता हूँ। लेह वाली यात्रा के विशेष मलिक को जब पता लगा कि मैं लेह जैसी यादगार बाइक यात्रा करने बाइक पर अकेला जा रहा हूँ तो वह मेरे साथ चलने की जिद करने लगा। मैंने उसे बहुत समझाया कि मैं बाइक पर अकेला ही जाऊँगा, तुम्हे जाना है तो अपने लिये बाइक का प्रबन्ध कर लो। बन्दे को 27 साल की उम्र में भी बाइक चलानी नहीं आती है। बोला कि बाइक तो मैं किसी की माँग लू या नई ले लू लेकिन बाइक चलानी सिखनी होगी। अच्छा ठीक है ये चोचले रहन दे। मेरे साथ मेरी बाइक पर चल देना।

एक महीना पहले मनु त्यागी भी बाइक से इस यात्रा को करने के लिये तैयार थे, लेकिन अचानक उनका कार्यक्रम भी रददी की टोकरी में चला गया। महाराष्ट्र से संतोष तिड़के उसी बाइक को लेकर एक दिन पहले ही दिल्ली पहुँच चुके थे जिसे लेकर वे मेरे साथ सन 2010 में मनाली-लेह-कारगिल-श्रीनगर अम्बाला होकर आये थे। मेरे पास आज भी वही लेह वाली बाइक है जो मैंने सन 2005 में खरीदी थी। संतोष गुजरात व राजस्थान घूमते हुए दिल्ली पहुँचे थे। इनकी यात्रा में ही केदारनाथ त्रासदी वाली दुखद घटना घटित हो गयी थी। इस घटना को देखकर इनका मन पहाड़ पर जाने के लिये मान नहीं रहा था। संतोष का मन तो मैं किसी तरह मना देता लेकिन उनके साथ जो दूसरी बाइक आयी थी वह मात्र 100 cc वाली पैशन बाइक थी। साच पास 100 cc बाइक के बसकी बात नहीं है। इससे बढिया तो साईकिल रहती, जिसे पैड़ल से या पैदल तो चला लेते।

जब यह तय हो गया कि संतोष अब दिल्ली से ही वापिस लौट जायेगा तो। अब बची केवल तीन बाइक एक बाइक मेरी दूसरी लेह वाले महेश रावत की जो इस यात्रा में अपने साथी 50 वर्षीय देवेन्द्र रावत की पल्सर पर उनके साथ जाने वाले थे। तीसरी बाइक वाले का शाम को 7 बजे फ़ोन आया था कि क्या हम भी कल सुबह आपके साथ अपनी पल्सर बाइक पर चल सकते है? जाना है तो कल सुबह ठीक 04:30 मिनट पर लोनी मोड़ फ़्लाईओवर पर मिल जाना। लेकिन सुबह एक बार 04:15 मिनट तक कॉल जरुर कर देना। अगले दिन सुबह हम ठीक 04:25 पर घर से दो बाइक पर चार बन्दे तैयार हो साच की दुर्गम मानी जाने वाली यात्रा पर चल दिये। साच पास की यात्रा लेह वाली यात्रा से बहुत ज्यादा कठिन है। लेह वाली यात्रा तो इसके सामने आधी भी कठिन नहीं लगी थी। घर से निकलते ही सबसे पहले बाइक की टंकी पेट्रोल से फ़ुल करा दी।

लोनी मोड़ पर हमें तीसरे बाइक वाले की कोई निशानी भी दिखायी नहीं दी। मैं तभी समझ चुका था कि जब सुबह उसका फ़ोन ही नहीं आया तो अब यात्रा पर वह क्या खाक आयेगा? अबकी बार हम सबसे खतरनाक समझी जाने वाली यात्रा पर बहुत कम कपडों के साथ गये थे। मेरे बैग में सिर्फ़ एक जोड़ी कपड़े ही रखे हुए थे। दाड़ी बनाने का सामान, बाइक के पहिये के लिये दो ट्यूब, कैमरे का ट्रायपोड़। चप्पल जैसी बहुत जरुरी वस्तुएँ हमने अपने पास रखी हुई थी। लेह वाली यात्रा में भी हम बहुत ही कम सामान के साथ गये थे।

दिल्ली से अम्बाला तक सड़क की हालत बहुत ही शानदार है जिस कारण उस पर बाइक 70 की गति से भगाये चले गये। अम्बाला पहुँचने तक हम बीच में कही भी नहीं रुके। पहली बार ऐसा हो रहा था कि मैंने लगातार 200 किमी बिना रुके बाइक चलायी थी। इससे पहले 150 किमी तक के नान स्टाप चरण कई बार किये हुए है। बाइक मुझे दो कारणों से पसन्द है पहला समय की बचत जो आज के समय में सबसे कीमती है। दूसरा अपना मन जहाँ करे वहाँ रोक लो। वैसे मैं एक बार दिल्ली से शाकुम्बरी देवी तक साईकिल चलाकर जा चुका हूँ। जो मेरी अब तक की सबसे लम्बी साईकिल यात्रा है। एक दिन में 170 किमी साईकिल चलाकर हम 5 बन्दे शाकुम्बरी पहुँचे थे। अपनी फ़िटनेस बनाये रखने के लिये मैं प्रतिदिन 20-25 किमी साइकिल तो चला ही लेता हूँ। अब मेरे पास इतना ज्यादा फ़ालतू समय नहीं है कि जो काम बाइक पर 5 दिन में हो सकता हो उसके लिये साईकिल पर 15-20 दिन खराब करु। रिकार्ड़ व घमन्ड़ के चक्कर में मैं कभी यात्रा नही करता हूँ। यह तो अपना शौक जुनून है। 

अपने पडोस के बराबर वाले घर से एक व्यक्ति हर साल वैष्णों देवी साईकिल से ही आना-जाना करता है वे मात्र 7 दिन में वैष्णों देवी दर्शन सहित आना-जाना कर ड़ालते है। मैं उसी यात्रा को मात्र 2 दिन में बाइक पर कर चुका हूँ एक दिन पैदल मान ले तो तीसरा दिन हो जायेगा। अम्बाला पार करने के बाद खरड़ मोड़ से कुछ पहले एक जगह फ़्लाईओवर का कार्य चल रहा है यहाँ एक जगह रुककर हमने चाय-बिस्कुट खाया पिया था। चाय पीकर फ़िर आगे बढ़ चले। यहाँ से आगे लुधियाना तक भी मार्ग मस्त बना हुआ है। जिस दिन हम यात्रा पर थे इस दिन पंजाब में लोग सड़कों पर वाहन रोक कर शर्बत बाँट रहे थे। हमने कई बार रुक रुक कर शर्बत पिया था। शर्बत पीने के चक्कर में खाना भी नहीं खाया था। हमारे साथ 50 साल के देवेन्द्र रावत भी थे जब उन्होंने कहा कि दोपहर का खाना तो खा लो तब हमने जालंधर पहुँचकर खाने का इरादा बनाया था।

दोपहर का खाना खाने के लिये होटल तलाशते समय मैं बाइक को धीमे चला रहा था कि तभी हमारी दूसरी बाइक वाले साथी जालंधर से पठानकोट जाने वाले पर मुड़ने की बजाय फ़्लाईओवर से सीधे अमृतसर की ओर चलते चले गये। उनके मोबाइल पर फ़ोन कर उन्हे वापिस बुलाया। उनसे पूछा कि तुम कहाँ जा रहे हो? उन्होंने कहा कि पठानकोट, लेकिन यह सड़क तो अमृतसर जा रही है। लेकिन बोर्ड़ तो कही लगा ही नहीं था। महेश रावत लेह से वापसी में भी कई बार आगे पीछे हो गया था। उसे समझाया कि जब मैं बाइक धीमी करता हूँ या तुम बाइक धीमी करते हो तो ज्यादा दूर मत निकला करो। साथ-साथ रहने से ज्यादा लाभ है यदि मोबाइल नहीं होता तो लेह वाली यात्रा की तरह तुम कारगिल में रह जाते और हम द्रास पहुँच जाते। आज मोबाइल ना होता तो तुम अमृतसर पहुँचते और हम पठानकोट।

जालंधर में एक फ़्लाइओवर के नीचे से निकल कर सीधे हाथ पर पठानकोट के लिये एकदम सीधा 110 किमी से भी लम्बा मार्ग जाता है। जालंधर से पठानकोट मार्ग पर चलते समय खाना खाने के लिये ढ़ाबा या होटल तलाशते हुए धीमी गति से चल रहे थे। एक जगह एक ढ़ाबा दिखायी दिया जिस पर बैठने की ढ़ंग की जगह दिखायी ना दी तो आगे चल दिये। फ़्लाईओवर से करीब 3 किमी आगे जाने पर उल्टे हाथ एक बोर्ड़ को देखकर मैंने बाइक में जोर की ब्रेक लगायी। पल्सर वाले साथ ही चल रहे थे लेकिन मेरे अचानक लगाये गये ब्रेक से वे उलझन में पड़ गये। मैंने उन्हे हाथ के इशारे से वापिस बुलाया। उन्हे वह बोर्ड़ दिखाया। उस बोर्ड़ को देखते ही देवेन्द्र रावत व महेश रावत दोनों (उतराखन्ड़ी पहाड़ी) के चेहरे पर चमक आ गयी। वह बोर्ड़ दर्शा रहा था कि अन्दर फ़ैक्ट्री एरिया में 200 मी दूरी पर एक भोजनालय है।

हमने सोचा जब सड़क पर फ़ैक्ट्री एरिया में भोजनालय का बोर्ड़ लगाया गया है तो भोजनालय भी जरुर किसी फ़ैक्ट्री से ही सम्बंधित होगा। हमारी बाइक भोजनालय के ठीक सामने जा रुकी किसी से पता भी नहीं करना पड़ा। उल्टे हाथ पर ही बोर्ड़ था और उल्टे हाथ पर ही भोजनालय था। मैने सोचा कि पहले अन्दर जाकर यह देख आओ कि यहाँ भोजन मिलता भी है कि नहीं, क्योंकि बाहर तो कोई आदमी या वाहन कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। अपने पहाड़ी मानुष भोजनालय के अन्दर चले गये। कुछ देर में बाहर आये मैं बाइक पर बैठा हुआ उनका इन्तजार कर रहा था। जब उन्होंने कहा कि यहाँ तो बहुत शानदार प्रबन्ध है तो मैं भी बाइक से उतर कर उस भोजनालय में जा घुसा।

यहाँ दो तरह की थाली एक सादी व एक पनीर की सब्जी की, हमने पनीर वाली सब्जी की 70 रुपये वाली चार थाली भोजन बनाने के लिये कह दिया। जब खाना तैयार हुआ तब तक हम हाथ मुँह धोकर खाने के लिये तैयार होकर बैठ गये। कुछ ही देर में ताजा व गर्मा गर्म भोजन हमारी मेज पर उपस्थित था। पहाड़ी प्राणी को भोजन पर टूटता देख हम भी उनके जैसे हो गये। पनीर की सब्जी बेहद स्वादिष्ट बनी थी। भर पेट भोजन करने के बाद आधा घन्टा वही टाँग फ़ैला कर बैठे रहे। भोजनालय वालों ने बताया कि यह भोजनालय फ़ैक्ट्री वालों के लिये ही कार्य करता है। यहाँ से ज्यादातर भोजन बाहर भेजा जाता है। खाना खाने के बाद हम चम्बा के लिये चल दिये। (यात्रा अगले भाग में जारी है)

इस साच पास की बाइक यात्रा के सभी ले्खों के लिंक क्रमवार नीचे दिये जा रहे है।

11- हिमाचल के टरु गाँव की पद यात्रा में जौंक का आतंक व एक बिछुड़े परिवार को मिलवाना
12- रोहान्ड़ा सपरिवार अवकाश बिताने लायक सुन्दरतम स्थल
13- कमरुनाग मन्दिर व झील की ट्रैकिंग
14- रोहान्ड़ा-सुन्दरनगर-अम्बाला-दिल्ली तक यात्रा।

यह जूम लेने के बाद का फ़ोटो है।

यह फ़ोटो बिना जूम लिये लिया था।






9 टिप्‍पणियां:

  1. Hello Sandeep Ji

    Main pichle Ek saal se apka blog padh raha But comment pehli bar.

    VERY excitement trip please GO AHEAD

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  2. वाह, प्रकृति को पास से देखना है तो साइकिल या मोटरसाइकिल..

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  3. Sandeep ji ram-ram.aap ki bike yatra ka hume bahut intjaar rehta hai ki aap kab bike se yatra ke liya niklo kyoki bike yatra me romanch bane rehta hai.hum to kawal kawad ke time hi haridwar thak bike se jate hai isleya guru ji aap ko pranam..!

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  4. देखने मे तो खाना अच्छा लग रहा है भाई जी

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  5. आ हा पनीर की सब्जी भाई वाह, पनीर के साथ घुमककड़ी का अलग ही मज़ा हैं....

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  6. पीछे बिठाकर ले जाना था तो हम भी चल देते, चलो फ़िर सही :)

    साच-पास के बारे में उत्सुकता बढ़ा दी है भाई।

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