शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

Srinagar- ShankaraCharya Temple श्रीनगर- शंकराचार्य मन्दिर (तख्त ए सुलेमान)

श्रीनगर सपरिवार यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे दिये गये है।
01- दिल्ली से श्रीनगर तक की हवाई यात्रा का वर्णन।
02- श्रीनगर की ड़ल झील में हाऊस बोट में विश्राम किया गया।
03- श्रीनगर के पर्वत पर शंकराचार्य मन्दिर (तख्त ए सुलेमान) 
04- श्रीनगर का चश्माशाही जल धारा बगीचा
05- श्रीनगर का मुगल गार्ड़न-निशात बाग
06- श्रीनगर का मुगल गार्ड़न-शालीमार बाग
07- श्रीनगर हजरतबल दरगाह (पैगम्बर मोहम्मद का एक बाल सुरक्षित है।)
08- श्रीनगर की ड़ल झील में शिकारा राइड़ /सैर
09- अवन्तीपोरा स्थित अवन्ती स्वामी मन्दिर के अवशेष
10- मट्टन- मार्तण्ड़ सूर्य मन्दिर  व ग्रीन टनल
11- पहलगाम की सुन्दर घाटी
12- कश्मीर घाटी में बर्फ़ीली वादियों में चलने वाली ट्रेन की यात्रा, (11 किमी लम्बी सुरंग)
13- श्रीनगर से दिल्ली हवाई यात्रा के साथ यह यात्रा समाप्त

SRINGAR FAMILY TOUR- 03

हमने श्रीनगर में ठहरने के लिये ड़ल झील के एक सुन्दर से हाऊसबोट का चुनाव किया था। जिस हाऊसबोट में हम ठहरे थे, वहाँ से सामने वाले पहाड़ की चोटी पर बना शंकराचार्य मन्दिर व टीवी टावर साफ़ दिखायी दे रहा था। हमारा कार्यक्रम सामने वाली चोटी पर जाने का पहले से ही था। तो चलो आपको भी शंकराचार्य मन्दिर की यात्रा करा देता हूँ। सुबह उठते ही सबसे पहले नहाने की तैयारी करने लगे। श्रीनगर में रात को तापमान माइनस (-2) में था लेकिन बिस्तर में बिजली से गर्म होने वाले हीटर लगे होने से ठन्ड़ का पता ही नहीं लगा। 



बिस्तर से निकल कर जब नहाने लगा तो श्रीनगर की माइनस वाली ठन्ड़ का अहसास गर्म पानी में भी हो गया था। जब तक शरीर पर गर्म पानी गिरता रहता, तब तक तो ठन्ड़ का पता नहीं लगता था लेकिन जैसे ही गर्म पानी गिरना बन्द होता, ठन्ड़ का जोरदार असर दिखायी दे जाता था। हम चारों फ़टाफ़ट नहाकर गर्म-गर्म कम्बल में घुसते गये। गर्म कम्बल में घुसने से शरीर को काफ़ी राहत मिली। आज केवल श्रीनगर के बाग आदि ही घूमने थे इसलिये कमरे से जल्दी निकलने की आवश्यकता नहीं थी। हाऊस बोट के कर्मचारी मुददसर ने सुबह 9 बजे नाश्ता दे दिया। रात का भोजन तो हमें कमरे में मिल गया था लेकिन नाश्ता करने के लिये हमें कमरे से बाहर ड़ायनिंग टैबल पर आना पड़ा।

नाश्ता करने के दौरान ठन्ड़ की अधिकता होने से पवित्र के हाथ व पैर की अंगुलियाँ दर्द करने लगी। नाश्ता करते ही बच्चों को दुबारा गर्म कम्बल में बैठा दिया। नाश्ता करने के दौरान जूते ना पहने होने के कारण (नंगे पैर होने से) बच्चों को ठन्ड़ ने तंग कर दिया था। अब कम्बल में तापमान सामान्य होने के बाद बच्चों को जुराब व जूते पहना कर ही कमरे से बाहर लाया गया। अपने बच्चों की उम्र लड़के की उम्र आगामी अप्रैल में 6 वर्ष व लड़की आगामी अप्रैल में ही 8 वर्ष की हो जायेगी। हाऊस बोट से सड़क पर आने के लिये शिकारा का इन्तजार करने लगे।

थोड़ी देर में ही शिकारा आ गया। हम चारों शिकारे में बैठकर सड़क पर जा पहुँचे। जिस कार में हवाई अड़ड़े से यहाँ आये थे वही कार आज श्रीनगर में घूमाने वाली थी। मैंने गाड़ी चलते ही चालक से कहा, “आज सबसे पहले कहाँ जाओगे?” चालक बोला सबसे पहले शंकराचार्य मन्दिर चलते है। हमारी कार शंकराचार्य मन्दिर की ओर चल पड़ी। हम शिकारा स्टैन्ड़ 7 पर ठहरे थे। जबकि मन्दिर जाने वाला मार्ग नुनकुन पार्क से थोड़ा पहले नेहरु पार्क पुलिस स्टेशन से थोड़ा सा आगे से ऊपर पहाड़ की ओर सीधे हाथ अलग होता है।

मन्दिर वाले मार्ग पर कुछ दूर चलते ही सेना की चैक पोस्ट है जहाँ यात्रियों को गाड़ी से उतर कर 40-50 मीटर पैदल निकला पड़ता है। सेना के जवान गाड़ी की तलाशी लेने के बाद ही गाड़ी को आगे जाने देते है। गाड़ी की तलाशी होने के बाद हम पुन: सवार हो गये। ड़ल झील के किनारे से मन्दिर की दूरी 5 किमी है। पूरा मार्ग चढाई वाला है। जिस कारण गाड़ी लगातार चढाई पर रहती है। जाते समय सड़क के दोनों ओर पेड़ों पर शानदार बर्फ़बारी दिखायी दी। अपनी गाड़ी होने का लाभ यह हुआ कि जहाँ मन करता वहाँ गाड़ी रुकवा लेते, थोड़ी देर रुककर नजारे देखते और आगे बढ जाते।

जब हमारी गाड़ी आखिर में मन्दिर की सीढियों के सामने पहुँच गयी तो कार चालक बोला आपको यहाँ से सीढियों से चढते हुए मन्दिर जाना होगा। मैं अपना कैमरा लेकर जाने लगा तो वहाँ तैनात सेना के कर्मचारियों ने बताया कि यहाँ से आगे कैमरा, मोबाइल या अन्य इलैक्ट्रोनिक सामान लेकर जाना मना है। मैंने आसपास के फ़ोटो लेकर कैमरा व मोबाइल कार में रख दिया। जब कैमरा ले जाने से रोका था तो मन हुआ कि चलो यहाँ से वापिस चलते है। सड़क से काफ़ी बर्फ़ हटायी जा चुकी थी लेकिन जो बर्फ़ बची थी वह सड़क से चिपकने के कारण फ़िसलन पैदा कर रही थी।

हम पक्की सीढियों से होकर मन्दिर की ओर बढने लगे। मन्दिर एकदम चोटी पर स्थापित है वहाँ से श्रीनगर शहर का नजारा बहुत शानदार दिखाई देता होगा। बर्फ़ से जम चुकी सीढियाँ पैदल चलने वालों के लिये बहुत खतरनाक हो चुकी थी। हम बेहद सावधानी के साथ ऊपर चढते जा रहे थे। करीब आधी सीढियाँ चढने के बाद बाकि सीढियों पर बर्फ़ जमकर सख्त हो चुकी थी जिस कारण ऊपर से नीचे उतर रहे यात्री दीवार के सहारे उतरने में लगे हुए थे। मैं दो बार फ़िसलते-फ़िसलते बचा था। पवित्र महाराज एक बार लुढक चुका था जिस कारण मैं उसका हाथ पकड़ कर चढने लगा।

एक 20-22 बाइस साल की युवती जींस पहने कुछ स्टाइल दिखाती नीचे उतर रही थी। मैं सोच रहा था कि हमें ऊपर चढते समय इतनी दिक्कत हो रही है तो नीचे आने वालों को बहुत समस्या आ रही होगी। इतने में जींस वाली छोरी धमा-धम कर पिछवाड़े के बल उछलती हुई तीन-चार सीढियाँ उतर गयी। उसका उतरने का स्टाइल इतना अच्छा लगा कि मन किया कि चलो हम भी उसी तरह नीचे उतर कर जायेंगे। मुझे उसके उतरने के स्टाइल पर हँसी भी आई थी लेकिन मैं चुप रहा क्योंकि आगे ऐसा स्टाइल मेरे साथ भी हो सकता था। श्रीमति जी उस युवती के जाने के बाद बोली। आप जरा उस लड़की वाला स्टाइल करके दिखाओ। मैं समझ गया श्रीमति जी मुझे सावधान कर रही है कि सम्भल कर चलो। 

बर्फ़ की फ़िसलन वाली सीढियाँ पार कर राहत की साँस ली। ऊपर पहुँचते ही सबसे पहले नीचे शहर का नजारा देखा। सेना वालों ने कैमरा नहीं लाने दिया। नही तो आप भी यहाँ से दिखने वाले नजारे देख पाते। ऊपर से देखने पर ड़ल झील सफ़ेद बर्फ़ से गिरी हुई बहुत सुन्दर लग रही थी। मन्दिर में दर्शन करने से पहले जूते उतारने होते है। अपुन इतने बड़े भक्त नहीं है कि पुजारियों की सारी बाते मानने लगे। श्रीमति जी कुछ ज्यादा ही आस्थावान है। मुझसे एकदम विपरीत। मैंने बाहर से ही भगवान जी को जय राम जी की बोल दी। भगवान को जय राम जी लेनी होगी तो कही से भी स्वीकार कर लेंगे। नहीं लेनी होगी तो फ़िर चाहे भगवान के गले लटक जाओ, नहीं मानेंगे। जबकि श्रीमति जी मन्दिर के अन्दर जाकर माथे पर टीका लगवाकर ही मानी।

अब कुछ बाते इस मन्दिर की हो जाये। यह मन्दिर डलझील से 300 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। श्रीनगर शहर/डल झील को समुन्द्रतल से 1700 मीटर की ऊँचाई पर बताया जाता है। इस मन्दिर का निर्माण राजा गोपादात्य ने सन 371 में कराया था। डोगरा राजा गुलाब सिंह ने यहाँ तक पहुँचने के लिये सीढियाँ बनवायी थी। इस मन्दिर को कश्मीरी लोग तख्त-ए-सुलेमान भी कहते है। जगदगुरु शंकराचार्य जी अपनी भारत यात्रा के दौरान यहाँ आये थे उन्होंने यहाँ पर तपस्या/साधना भी की थी।
हमारे से कुछ पहले ही दिल्ली का एक अन्य परिवार भी यहाँ आया था। उनकी बोलचाल देखकर पता लाग गयो कि वे हरियाणा की सीमा से लगते गाँव के रहने वाले थे। कुछ देर चोटी से आसपास के नजारे देखने के बाद वापिस लौटने लगे तो सीढियों को देखकर सोचने लगे कि इन पर हम कम से कम कितनी बार स्टाइल में लुढेंगे? हम अभी सोच ही रहे थे कि वहाँ पर कार्यरत एक सरदार जी हमें बोले, आओ मेरे साथ आ जाओ। आपको सीढियों के बिना नीचे ले जाऊँगा। सरदार जी ने कहा था कि बिना सीढियों के लेकर जायेंगे।

इसका अर्थ यह था कि सरदार जी कच्ची पगड़न्ड़ी से होकर जायेंगे। बर्फ़ में कच्ची पगड़न्ड़ी भी खतरनाक हो सकती थी। लेकिन कच्ची पगड़न्ड़ी पक्की सीढियों से तो आसान ही रहेगी। सरदार जी आगे-आगे, हमारा परिवार उनके पीछे-पीछे। हमें कच्चे मार्ग से नीचे जाते देख एक अन्य परिवार भी हमारे पीछे आने लगा। कच्चा मार्ग बर्फ़ से जरुर भरा था। लेकिन उसपर फ़िसलने का खतरा एक बार भी नहीं हुआ। जब कच्चा मार्ग समाप्त होने को था तो कच्चे मार्ग के एक तरफ़ गहरी खाई देखकर थोड़ी सावधानी से पहाड़ की ओर झुककर बर्फ़ को पार किया था कि कही गलती से खाई में लुढक गये तो? वाशिंग पाउड़र के ऐड़ की तरह ढूंढते रह जाओगे?

यह कच्चा मार्ग बेहद आसानी से नीचे उतार लाया। कच्चा मार्ग अन्त में एक बार फ़िर उसी पक्की सीढियों में जा मिला। लेकिन अब खतरा नहीं था अब सिर्फ़ 100 के करीब, बिना बर्फ़ वाली सीढियाँ ही बची हुई थी। इन पर उतरने में कोई समस्या नहीं हुई। कार वाला हमारा इन्तजार कर रहा था। जब हम यहाँ आये थे तो मुश्किल से दो-तीन गाडियाँ थी लेकिन अब वहाँ 15-20 गाडियाँ आ चुकी थी। सड़क पर बर्फ़ जमी होने से उन गाडियों को मोड़ने में समस्या आ रही थी। हमारी कार भी वहाँ से मुश्किल से निकल पायी।

ऊपर आते समय एक मजेदार बात बतानी याद नहीं रही थी कि जगह सामने ऊपर से आती हुई तवेरा गाड़ी को साइड़ देने के चक्कर में हमारी कार बर्फ़ में स्लिप करने लगी। किसी तरह धक्के लगाकर कार को वहाँ से निकाला तो देखा कि तवेरा भी स्लिप कर रही है। अपनी गाड़ी निकालने के बाद, अब तवेरा को धक्के लगाना पड़ा। बर्फ़बारी में यही समस्या होती है कि गाडियाँ अटकते/फ़िसलते देर नहीं लगती। हमने यहाँ से वापसी में बहुत सारे फ़ोटो लिये थे जिसमें से कई आपको दिखाये गये है। अब नीचे ड़ल झील दिखायी दे रही है। हमारी अगली मंजिल श्रीनगर के बाग-बगीचे देखने की है।

अगले लेख में आपको श्रीनगर के बगीचे/बाग दिखाये जायेंगे। (यात्रा अभी जारी है।) 























13 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बर्फ, पहाड़, झील और शंकराचार्य, अद्भुत।

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

कती गजब कर दिया, राम राम

pradeep sharma ने कहा…

Band kamre me baithe hu bhi thand lagna lagi itni barf dekh ker.. Bahut hi khoobsoorat jageh hai kashmeer..

Pradeep Kumar ने कहा…

नीरज भाई, यात्रा व्रतांत बहुत ही बढ़िया है और फोटो ने तो लेख में चार-चाँद लगा दिए है ! बरफ में घूमने का भी अपना अलग ही मज़ा है ! घूमते रहिए, लिखते रहिए !

SANDEEP PANWAR ने कहा…

Pradeep Kumar भाई, जाड़े में बच कै रहियो?

Prasad Np ने कहा…

Bahut badiya....in najaron ke age switzerland bhee fail hai......

SACHIN TYAGI ने कहा…

सन्दीप जी राम राम,भाई सभी फोटो गजब ढा रहे है.

रोशन ने कहा…

प्रदीप कुमार जी! आप, जिसकी पोस्ट पढ़ रहे है उसका नाम संदीप पंवार है, आपने लगता है कि नीरज जी की पोस्ट पढ़कर संदीप जी की पोस्ट में टिप्पणी प्रकासित कर दी।

रोशन ने कहा…

संदीप पंवार जी! नमस्कार आपकी फैमली यात्रा संस्मरण पढ़कर कश्मीर जन्नत है वो भी आपके द्वारा खींची गयी तस्वीर में साफ झलक रही।

Vaanbhatt ने कहा…

जबरदस्त यात्रा...बर्फ़बारी के साथ...आनंद आ गया...

दर्शन कौर धनोय ने कहा…

बहुत ही मजेदार जर्नी लग रही है --आपके वहाँ जाने से हमको भी थोडा साहस बन रहा है वरना कश्मीर देखना अब ख्वाबो में ही सम्भव था --तुम दिल्ली वाले वहाँ कि ठंडी बर्दास्त कर गए हम मुम्बई वाले तो कर ही नहीं सकते -हम तो कश्मीर गर्मियों में ही जा पायेगे

संजय @ मो सम कौन... ने कहा…

अपनी फ़ेवरेट आईसक्रीम खाई या नहीं?

Manu Tyagi ने कहा…

बढिया रहा सब , इस बर्फ को देखकर मन मचल जाये अच्छे अच्छो का

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