रविवार, 4 अगस्त 2013

Rohanda- beautiful place रोहान्ड़ा- सपरिवार समय बिताने लायक सुन्दरतम स्थल

SACH PASS, PANGI VALLEY-12                                                                      SANDEEP PANWAR
हमने रोहान्ड़ा में वन विभाग के विश्राम भवन में अपने लिये एक कमरा बुक कर लिया। रेस्ट हाऊस वालों ने हमारी बाइक वहाँ अन्दर ही खड़ी करवा दी। मैंने मलिक को रेस्ट हाऊस के बाहर ही पल्सर वालों का इन्तजार करने को कहा कि कही लेह वाली यात्रा की तरह वे यहाँ से आगे ना निकल जाये। लेकिन जब 10 मिनट तक भी पल्सर वाले वापिस नहीं आये तो उन्हे फ़ोन लगाया गया उनका जवाब था कि बस अभी तक उनकी पकड़ में नहीं आ पायी है। बस व बाइक की गति पहाड़ पर चढ़ते समय लगभग एक समान होती है। ऐसा कई बार देखा है कि किसी पहाड़ी यात्रा में कम सवारी की बस या खाली ट्रक यदि हमारे साथ-साथ या आगे पीछे चल रहा हो तो वह बड़ी गाड़ी भी बाइक के साथ ही चलती रहती है। 

ROHANDA GUEST HOUSE AND OUR BIKE


रेस्ट हाऊस वालों ने हमें बताया कि आगे चौकी नामक जगह पर उनको बस मिल सकती है लेकिन बस उन्हे चौकी पर भी नहीं मिल सकी। हमने उन्हें दुबारा फ़ोन मिलाया तो अबकी बार उन्होने बताया कि रोहान्ड़ा से 10 किमी आगे जाने के बाद बस पकड़ में आ सकी। बस को रोककर हैल्मेट के बारे में कहा तो बस चालक ने मना कर दिया कि इसमें कोई हैल्मेट भी छूटा था। बस में बैठी उस लड़की का भगवान भला करे, जिसने रावत को इशारा कर दिया था कि कन्ड़कटर ने हैल्मेट को कहाँ छुपाया है? जब रावत बन्धु ने बस में छुपाये गये हैल्मेट को निकाल कर चालक को दिखाया तो उसने कहा “मुझे नहीं पता यहाँ किसने छुपाया?” कन्ड़क्टर भी हैल्मेट छुपाने वाली बात से अन्जान बन गया था। खैर हैल्मेट लेकर वे दोनों रोहान्ड़ा पहुँच गये।

जब तक वे दोनों रोहान्ड़ा के रेस्ट हाऊस पहुँचते, तब तक हमने सामने मिल रही एक दुकान से आइसक्रीम लेकर खायी। यहाँ ठन्ड़ी जगह पर आइसक्रीम देखकर मुझे आश्चर्य हुआ था। जब सड़क पर एक बन्दा आइसक्रीम खाता हुआ दिखायी दिया तो मुझे तो विश्वास ही नहीं हुआ था। मलिक बोला भाई साहब वह आइसक्रीम ही खा रहा है, फ़िर तुम खड़े-खड़े उसे क्यों देख रहे हो। जाओ! अपने लिये व मेरे लिये भी आइसक्रीम ले आओ। मलिक दो आइसक्रीम लेकर आया एक उसने दूसरी मैंने चट कर दी। हम आइसक्रीम चट करके रेस्ट हाऊस के बाहर ही पल्सर वालों की प्रतीक्षा में बैठे रहे। कुछ देर बाद वे दोनों भी ऊपर रेस्ट हाऊस में आ पहुँचे। रेस्ट हाऊस का एक कमरे का किराया मात्र 320 रुपये लिया गया था। हम चारों एक कमरे में ही एड़जस्ट हो गये थे।

रोहान्ड़ा का रेस्ट हाऊस बनने की दिनांक वहाँ लिखी हुई थी जहाँ तक मेरे ध्यान है यह सन 1982 में बनाया गया है। मैं सोच रहा था कि यह अंग्रेजों के समय का बना हुआ होगा। रेस्ट हाऊस के प्रागंण में कमरुनाग से लौटकर आने वाला एक समूह अपने भोजन करने की तैयारी में जुटा पड़ा था। इस समूह में महिलाएँ ज्यादा थी जिस कारण मैंने दूर से ही एक दो फ़ोटो लिया था। आजकल कानून वैसे ही महिलाओं के फ़ायदे के लिये बनाये जाते है लेकिन असली घाघ कानूनों के लपेटे में कहाँ आते है? जिला कोर्ट, हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, ऊपर से हर जगह अपील का चक्कर, तो बताओ इन्साफ़ कहाँ मिलेगा। इसलिये भारत में जी भर कर कानून की माँ-बहिन एक कर लो यदि आपके पास पैसा है तो आपका बाल भी बाँका नहीं हो सकता, यकीन नहीं आता तो नेताओ को देख लो। कितने नेता ऐसा है जिसने एक भी अपराध ना किया हो? मुझे तो एक भी नाम याद नहीं आ रहा है, वैसे कुछ मिलेंगे तो जरुर। आपको याद हो तो मुझे भी बता देना। कि यह है सच्चा नेता। असली कुत्ते वे नेता है जो झूठी व कथित धर्म निरपेक्षता की बात करते है लेकिन उसमें उनकी किसी एक खास धर्म की बात जग जाहिर रहती है।

मन्दिर वाली महिलाओ की दावत के कारण पूरा प्रागंण भरा भरा दिखायी दे रहा था। जब मैं फ़ोटो ले रहा था तो कई महिलाएँ मुझे ऐसे देख रही थी जैसे मैं उनका फ़ोटो उन्हे जाऊँगा। जब इन महिलाओं ने रेस्ट हाऊस खाली किया तो उनके साथ वालों ने वहाँ की साफ़-सफ़ाई भी कर दी थी। जिससे वहाँ पर ऐसा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था कि कुछ देर पहले यहाँ दावत हुई है। रेस्ट हाऊस के साथ सटा हुआ कमरुनाग का मन्दिर है बताया गया कि जब ऊपर बर्फ़ गिरने से मन्दिर तक पहुँचना बन्द हो जाता है तब कमरुनाग की पूजा यहाँ पर की जाती है। उस समय इस मन्दिर में काफ़ी चहल-पहल रहती होगी लेकिन अब तो यह मन्दिर एकदम सुनसान पड़ा हुआ है।

पड़ौस का मन्दिर देखने जा पहुँचे। यहाँ पर मलिक के पडौस वाले गाँव के एक वयक्ति ने कपड़े की दुकान की हुई है इनका नाम शमशेर है यह यहाँ रोहान्ड़ा में पिछले 35 साल से दुकान कर रहे है। उन्होंने बताया कि 35 साल पहले मैं मुज्जफ़रनगर से यहाँ कपड़े बेचने के लिये आया था। पहले मैं गाँव-गाँव जाकर कपड़े बेचा करता था लेकिन कुछ वर्षों से यहाँ दुकान लगाने लगा हूँ। मलिक के पडौस का बन्दा और उसकी दुकान देखने ना पहुँचे ऐसे कैसे हो सकता था हम चारों शमशेर जी की कपड़े की दुकान में जा पहुँचे। शमशेर जी ने बताया कि उन्होंने अपने सभी बच्चों की शिक्षा यहाँ रोहान्ड़ा के स्कूल में ही करायी है। हमारे लिये नमकीन व चाय मँगायी गयी, लेकिन जब उन्हे पता लगा कि मैं चाय नहीं पीता हूँ तो उन्होंने एक बोतल माजा की भी मँगवा ली।

चाय नमकीन व माजा पीने के बाद हम रोहान्ड़ा के आसपास टहलने के लिये चल दिये। पिछले साल विपिन के साथ बस में करसोग जाते समय मैने रोहान्ड़ा पार करते ही हनुमान जी की एक विशाल चित्रकारी एक बड़े पत्थर पर देखी थी। मैने दोस्तों को कहा चलो कुछ दिखाकर लाता हूँ। हम आधा किमी लम्बे रोहान्ड़ा को पार करते हुए एकदम आखिर में जा पहुँचे। आखिर में जाते ही एक पुलिया के पास हमें हनुमान जी की विशाल चित्रकारी वाली मूर्ति दिखायी दी। यहाँ पर काफ़ी देर तक बैठे रहे। आसपास का जंगल देखकर मन खुश हो गया। रोहान्ड़ा आकर मुझे बहुत अच्छा लगा। यहाँ तक पहुँचना भी ज्यादा कठिन नहीं है। अगर किसी को ज्यादा दिन की फ़ुर्सत नहीं हो तो रोहान्ड़ा बहुत ही अच्छी जगह है। रहने खाने की भी यहाँ कोई समस्या नहीं है।  

रोहान्ड़ा का हनुमान मन्दिर देखकर वापिस चल दिये। वापिस चलते समय रोहान्ड़ा में बने हुए मकान की छत देखता हुआ आ रहा था। पहाडों में बर्फ़बारी व ज्यादा बारिश होने के कारण तिरछी छते ही कामयाब हो पाती है। वापसी में रेस्ट हाऊस के करीब ही कई ढ़ाबे बने हुए दिखायी दिये। यहाँ एक ढ़ाबे पर जलेबी देखकर खाने का मन कर आया। इस पूरी यात्रा में जलेबी खाने को तो छोड़ों देखने को ही पहली बार मिली थी। इसलिये आधा किलों जलेबी तुलवा ली गयी। दोनों पहाडियों ने जलेबी में ज्यादा रुची नहीं दिखायी लेकिन जाट तो जाट है उन्हें जलेबी या मीठा खाने से कौन रोक सका है? दोनों जाट संदीप पवाँर व विशेष मलिक ने सारी जलेबियाँ चट कर ड़ाली। जलेबी ताजी नहीं थी नहीं तो रात को भोजन करने की जरुरत भी ना पड़ती।


जलेबी खाने के बाद उस ढ़ाबे नुमा भोजनालय में बैठकर टीवी पर समाचार सुनने लगे कि यह तो जाने कि एक सप्ताह में दुनिया में क्या-क्या हो गया है लेकिन जल्द ही साथी क्रिकेट मैच देखने लगे तो मैंने ढ़ाबे वालों को भोजन लगाने को कहा। भोजन के रुप में दाल चावल लिये गये। दाल चावल खाकर मैं कमरे पर आकर लेट गया। बाकि तीनों भी घन्टे भर बाद मैच देखकर कमरे पर आ गये। कल सुबह कमरुनाग की मात्र 6 किमी की लेकिन कठिन पद यात्रा/ट्रैकिंग करने जाना था। इसलिये रात में तय किया गया कि सुबह दिन निकलने से पहले ही यहाँ रोहान्ड़ा से निकल जाना है ताकि 10 बजे तक वापसी आ सके। वापसी आते ही दिल्ली के लिये प्रस्थान कर दिया जायेगा। अच्छा अब सोते है कल कमरुनाग के दर्शन करने के लिये जल्दी उठना होगा। (यात्रा अभी जारी है।)

इस साच पास की बाइक यात्रा के सभी ले्खों के लिंक क्रमवार नीचे दिये जा रहे है।

11- हिमाचल के टरु गाँव की पद यात्रा में जौंक का आतंक व एक बिछुड़े परिवार को मिलवाना
12- रोहान्ड़ा सपरिवार अवकाश बिताने लायक सुन्दरतम स्थल
13- कमरुनाग मन्दिर व झील की ट्रैकिंग
14- रोहान्ड़ा-सुन्दरनगर-अम्बाला-दिल्ली तक यात्रा।





















4 टिप्‍पणियां:

Manu Tyagi ने कहा…

वो शमशेर मुजफफरनगर में बुढाना के पास का ही रहने वाला है । मैने जब होटल वाले को बताया अपना पता तो उसने बताया कि आपके यहां का एक आदमी यहीं पर रहता है

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत सुन्दर दृश्य, स्थान तो वही अच्छा जहाँ स्वयं को भूल जायें।

Ajay Kumar ने कहा…

सँदीप भाई जी आईसक्रीम, माजा और जलेबी लठ गडगा यो तो...

Dinesh Thakur ने कहा…

Are jaatdevta ji Rohanda aaye or Hame yaad nahi kiyaa hamaara ghar bhi to najdik hi hai Rohanda se

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