शनिवार, 24 अगस्त 2013

Chaunsath 64 yogini temple चौसट योगिनी मन्दिर

UJJAIN-JABALPUR-AMARKANTAK-PURI-CHILKA-15                              SANDEEP PANWAR
भेड़ाघाट के रेस्ट हाऊस की ओर चलते हुए सडक पर 64 योगिनी नामक मन्दिर का बोर्ड दिखायी देता है। सड़क से देखने पर पहली नजर में मन्दिर तो मन्दिर मन्दिर का कोई अंश भी दिखायी नहीं देता। मन्दिर ऊपर कही पहाड़ी पर बना होगा। जहाँ तक पहुँचाने के लिये पत्थर की बनी हुई पक्की सीढियाँ दिखायी दे रही थी। मैंने उन सीढियों से ऊपर पहाड़ी पर चढ़ना शुरु कर दिया। जैसे-जैसे ऊपर की ओर जाता जा रहा था शरीर कहने लगता कि रुक जा जरा साँस तो ले ले, ऐसी क्या जल्दी है जो दे दना-दना भागे जा रहा है। साँस फ़ूलने की समस्या तो चढ़ाई पर आती ही है अब चढ़ाई चाहे श्रीखन्ड़ की हो या मणिमहेश की या 64 योगिनी मन्दिर की ही क्यों ना रही हो। मुझे साँस सामान्य करने के लिये बीच में एक बार रुकना पड़ा।


जिस दिन मैं यहाँ गया था उस दिन दर्शनार्थियों का बहुत ज्यादा आवागमन दिखायी नहीं दिया था। हो सकता है कि पहले दिन महाशिवरात्रि पर सबका जोर खत्म हो लिया हो। इन नामुराद अधिकांश हिन्दुओं में यही तो समस्या है कि ये रोज-रोज अपने परमात्मा को याद नहीं करते है। लेकिन इन पर जरा सी आफ़त आ जाये तो फ़िर देखो इन्हे कैसे अपने भगवानों को कोसने बैठेंगे। लालची लोग भगवानों के पीछे नहाधोकर कुछ ज्यादा ही लगे होते है। मेरी अपनी नजर में तो जो जितना बड़ा पापी होता है उस पाप को छिपाने के लिये उतना बड़ा धार्मिक क्रिया कर्म करने की चेष्टा करने में लगा रहा है। अरे भाई अपनी तरह फ़क्कखड़-घुमक्कड बन जाओ, हर तरह की मोह माया से अपने आप को दूर कर लो। लेकिन संसारिक दुनिया में रहते हुए इस प्रकार का जीवन जीना हर किसी के बसकी बात नहीं है।

आखिरकार परमात्मा तो परमात्मा होता है वह भले ही हमें दिखायी ना देता हो, भले ही हम लोग उसकी प्रतीक रुपी मूर्ति आदि बनवाकर उसे पूजते हो लेकिन अगर दिन में एक बार सच्चे मन से उसे याद कर लिया जाये तो क्या बुराई है। यह मत समझना कि मैं आर्य समाजी हूँ इसलिये ऐसा कह रहा हूँ। मेरे सामने कोई किसी प्रकार की पूजा प्रणाली अपनाता है उससे मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है लेकिन यदि उसकी उस प्रणाली में घन्टों लगने लगे तो अपनी खोपड़ी घूम जाती है। यह मन्दिर शिव और पार्वती को समर्पित है शिव का दूसरा अर्थ श्मसान भी होता है। जिस प्रकार लोग अपने किसी रिश्ते-नातीदार के परलोक गमन करते ही उसे आग के हवाले करने की जल्दी में लग जाते है उसी प्रकार की जल्दी हर कार्य में करने तो दुनिया के कष्ट ही समाप्त हो जाये। किसी के मृत्यु कार्यक्रम में शामिल होने पर लोगों के मन में (मै भी अपवाद नहीं हूँ) ऐसे-ऐसे उल्टे-सीधे भाव आते है कि पूछो मत।

चलिये भाषण बाजी बहुत हो ली फ़िर से अपने लेख की पूँ पकड़ लेनी चाहिए कि बाद में पता लगे कि अरे यह क्या हुआ? उन सीढियों से ऊपर चढ़ने के बाद जैसे ही ऊपर पहुँचा तो वहाँ बनी विशाल गोलाकार आकृति की चारदीवारी देखकर थोड़ा सा आश्चर्य हुआ था कि अरे यह मन्दिर गोलाई में क्यों है? मन्दिर के बाहर बैठने के लिये पत्थर के स्थान बने हुए थे। कुछ मिनट मैं वही बैठा रहा। वहाँ से आसपास के फ़ोटो लेने के बाद मन्दिर के अन्दर जाने के तैयार हुआ। अभी मन्दिर के अन्दर प्रवेश नहीं हुआ था कि मुख्य प्रवेश मार्ग के बाहर एक चबूतरे के नीचे सुरंग जैसा निर्माण कार्य दिखायी दिया। लेकिन उसमें अंधेरा होने के कारण ज्यादा दूर तक नहीं दिखायी दिया।

मन्दिर में प्रवेश करने का मुख्य द्धार बहुत ज्यादा ऊँचा नहीं बना था इसलिये उसमें से झुक कर अन्दर जाना पड़ा। अन्दर जाते ही सम्पूर्ण मन्दिर दिखायी दे गया। गोलाई वाली चारदीवारी से मन्दिर के शीर्ष व झन्ड़े ही दिख रहे थे। सबसे पहले मुख्य मन्दिर के दर्शन किये गये। उसके बाद वहाँ गोलाई वाली चारदीवारी में बनाई हुई मूर्तियाँ देखी गयी। मुख्य मन्दिर में तो सिर्फ़ एक ही मूर्ति है। जो भगवान शंकर व पार्वती को समर्पित है। इस मन्दिर का निर्माण सन 1024 के आसपास का बताया जाता है। अगर देखा जाये तो जल्द ही यह मन्दिर अपने निर्माण के एक हजार साल पूरे करने जा रहा है।

मन्दिर में लगी हुई 64 मूर्तियों को देखने की बारी आयी तो उन मूर्तियों की दुर्दशा देखकर बड़ा बुरा लगा। कलाकारों ने महीनों की मेहनत से इन्हे तैयार किया गया होगा। टूटी-फ़ूटी कटी हुई मूर्तियों के बारे में पता लगा कि यहाँ शाँत धर्म के किसी धर्मनिरपेक्ष हमलावर ने हमला बोला था उनके कथित रुप से शाँत धर्म में यह बताया गया है कि मूर्ति/बुत पूजा तो दूर की बात है इन्हे घर में नहीं रखना चाहिए। यहाँ की सभी 64 की 64 योगिनी की मूर्तियाँ तोड़ी गयी है एक भी मूर्ति ऐसी नहीं मिली जो बिना तोड़-फ़ोड़ के बची हो। सुसरा ऐसा काहे का धर्म जो जीव-निर्जीव दोनों तरह के लोगों पर अत्याचार करता आ रहा हो और शाँत धर्म कहलाता हो। यह कथित धर्म इतना ज्यादा शाँत है कि दुनिया के हर धर्म से इसका झगड़ा निरन्तर चलता आ रहा है।

मन्दिर में जो 64 मूर्तियाँ है। कुछ जगह बताया गया है कि ये सभी मूर्तियाँ तंत्र-मन्त्र की शक्तियों पर कार्य करने वाले लोगों की बनवायी हुई है यहाँ भारत में इस प्रकार के कुल तीन मन्दिर पाये गये है एक यह दूसरा उड़ीसा में तीसरा खजुराहो में मिला है। मैंने अच्छी तरह मन्दिर देखा। इसके बाद मन्दिर के बाहर आया वहाँ से बाहर आकर मन्दिर की गोलाई वाली चारदीवारी का एक चक्कर लगा आया। अब मेरे लिये वहाँ कुछ नहीं बचा था इसलिये मैंने वहाँ से वापिस चलने का फ़ैसला किया। उन्ही सीढियों से चढ़ते हुए मैं नीचे सड़क पर आ गया जिनसे होते हुए ऊपर पहुँचा था। अबकी बार ऊपर पहाड़ी से दिख रहा गाँव देखने की इच्छा हो गयी थी। इसलिये मैं पहाड़ी से दिख रहे गाँव को देखने चल दिया। (भेड़ाघाट यात्रा अभी जारी है।)



















4 टिप्‍पणियां:

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

आक्रांताओं ने प्रतिमाओं को बहुत हानि पहुंचाई है। बढिया यात्रा विवरण।

SACHIN TYAGI ने कहा…

मनदिर व पृतीमाओ की एसी दुरदशा देखकर याद आता हे की शांत समुदाय के लोगो ने हमारे लोगो व देश को कितनी यातनाए दी थी व दे रहे है चलो छोडो ये बाते।
सनदीप जी बढिया याञा वणॅन व चिञ।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

हमें अपने इतिहास को हमेशा याद रखना चाहिये और दुर्दशा को भी. आज भी पता चला कि कई शांत जगहों पर शांत लोगों में विस्फोट हुये और सैकड़ों-हजारों लोग हताहत हुये हैं रासायनिक हथियारों से भी.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सुन्दर दृश्य, टूटी प्रतिमायें देख इतिहास पर ग्लानि होने लगती है।

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