मंगलवार, 20 अगस्त 2013

Jabalpur to Bhedagath जबलपुर से भेड़ाघाट धुआँधार जलप्रपात तक

UJJAIN-JABALPUR-AMARKANTAK-PURI-CHILKA-12                              SANDEEP PANWAR
ट्रेन में रात सोते हुए कब बीती? पता ही नहीं लग पाया! सुबह जब आँख खुली और खिड़की से बाहर झाँक कर देखना चाहा कि कौन सा स्टेशन आने वाला है? घड़ी के हिसाब से तो अपना स्टेशन अभी नही आया था। लेकिन जैसे ही तेज गति से भागती ट्रेन से भेड़ाघाट नामक स्टेशन पीछे छूटता दिखायी दिया तो आँखे चौकन्नी हो गयी। मैंने साथ बैठी सवारियों से पूछा कि क्या भेड़ाघाट स्टेशन से धुआँधार झरने तक पहुँचने में आसानी है या यह भेड़ाघाट कोई और स्टॆशन का नाम है? मेरे पास बैठे एक महोदय ने बताया कि यही भेड़ाघाट का मुख्य स्टेशन है लेकिन यहाँ सिर्फ़ सवारी/लोकल रेल ही रुकती है लम्बी दूरी वाली रेलगाडियाँ यहाँ नहीं रुकती है। लेकिन अगर किसी को भेड़ाघाट जाना हो तो वो क्या करेगा? उसके लिये उसे मदन-महल नामक स्टेशन पर उतरना होगा। मदन महल क्यो? जबलपुर क्यों नहीं? मैंने उनसे सवाल किया। उन्होंने कहा कि जबलपुर से कई किमी पहले मुख्य स्टेशन मदन महल है जहाँ लम्बी दूरी की लगभग सभी रेल गाडियाँ रुकती है। यहाँ से भेड़ाघाट जाना नजदीक पड़ता है जबकि जबलपुर से भेड़ाघाट जाने वाला सड़क मार्ग भी मदन महल से होकर ही गुजरता है।



इतनी जानकारी मिलना मेरे लिये बहुत लाभदायक रहा, यह जानकारी मिलने से पहले मैं तो जबलपुर ही उतरने वाला था। मैंने अपना टिकट भी वही तक का लिया हुआ था। लेकिन भेड़ाघाट का स्टेशन देखकर मेरे मन में जो जिज्ञासाएँ उठी थी उसका समाधान हो चुका था। जैसे ही मदन महल स्टेशन आया तो अन्य सवारियों की तरह मैंने भी अपना सामान उठाया और ट्रेन से बाहर निकल आया। लोहपतगामिनी अल्पविराम स्थल पर एक कोने से दूसरे कोने तक टहल कर देखा गया। यह स्टेशन बहुत सुन्दर है खासकर इसका प्लेटफ़ार्म तो कुछ ज्यादा ही लुभावना लगा। प्लेटफ़ार्म के फ़ोटो लेने के बाद स्टेशन से बाहर जाने की बारी आ गयी थी।

लगभग सभी सवारियाँ जा चुकी थी इसलिये सबसे अन्त में मैं भी स्टेशन से बाहर चला आया। स्टेशन से बाहर खड़े कुछ तीन पहिया वालों से भेड़ाघाट जाने के बारे में पूछा तो उनका टका सा जवाब सुनकर मेरी बोलती बन्द हो गयी। मैंने दो ऑटो वालों से धुआँधार जाने के बारे में कहा लेकिन दोनों ने कहा कि हम शेयरिंग पर नहीं जाते है। आपको पूरा ऑटो करके ले जाना होगा। मैंने सामने खडे एक पुरुष से (पुरुष लिखा है तो पुरुष ही मानना, महिला मत पढ लेना) धुआँधार तक जाने के वाहन के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि आप 200 मीटर दूर सामने दिख रहे तिराहे तक पैदल चले जाईये। वहाँ से आपको हर कुछ मिनट में भेड़ाघाट-धुआँधार तक जाने के लिये शेयरिंग पर ऑटो मिलते रहेंगे।

मैंने सामने दिख रहे तिराहे तक पैदल चलना शुरु किया। मुश्किल से 3-4 मिनट उस तिराहे तक पहुँचने में लगे होंगे कि वह तिराहा आ गया। ट्रेन की दिशा के हिसाब से यह तो अंदाजा हो चला था कि मुझे वापिस वाली दिशा में ही जाना है इसलिये मैं सड़क पार कर ऑटो की प्रतीक्षा करने लगा। अभी मुझे खड़े हुए मुश्किल से 2-3 मिनट ही हुए होंगे कि दो ऑटो वहाँ आ गये। उन्होंने मेरे टोकने से पहले ही आवाज लगानी शुरु कर दी, भेड़ाघाट-धुआँधार।

धुआँधार का नाम सुनते ही मैंने एक ऑटो में पीछे की ओर बैठना चाहा ताकि सड़क के कुछ फ़ोटो ले सकूँ। मुझे सबसे पीछे वाली सीट पर बैठता देख, ऑटो वाला बोला अरे भाई आप आगे बीच वाली सीट पर आईये ना पीछे तो सामान लेकर बैठने वाले के लिये जगह बनायी हुई है। बीच वाली लाईन में कोने वाली सीट खाली पड़ी थी मैं उसी सीट पर जाकर बैठ गया। अभी उजाला हो चुका था लेकिन सूरज महाराज पूरी तरह, धरती से ऊपर नहीं आ पाये थे। जब ऑटो आगे बढ़ रहा था तो आकाश में सूर्य की लालिमा देखकर उसका फ़ोटो लेने को जी ललचाने लगा। लेकिन चलते ऑटो में फ़ोटो लेना बड़ा मुश्किल कार्य था। ऊपर से सूर्य महाराज मेरी सोची गयी दिशा से उल्टी दिशा में निकलने जा रहे थे। जब मैंने एक मोड़ पर देखा कि अरे सूर्य तो पीठ पीछे वाली दिशा से ऊपर आ रहे है तो मैंने उसका फ़ोटो ले लिया।

अपना ऑटो अभी पूरी तरह भरा नहीं था उसमें 3 सीट अभी तक खाली दिखायी दे रही थी। यह वाला ऑटो कुछ बड़ा था। आमतौर पर ऑटो में कानूनी तौर से केवल तीन सवारियाँ ही बैठ सकती है लेकिन इसमें बनायी गयी स्थिति अनुसार 8-9 सवारियाँ आसानी से बैठ सकती थी। सड़क किनारे खड़े एक बुजुर्ग को देखते ही ऑटो वाले ने ब्रेक लगायी और उसके पूछे बिना ही उसको कहा कहाँ जाओगे? नर्मदा स्नान करने का जवाब सुनते ही ऑटो वाला उन बुजुर्ग को बैठाने पर तुल गया लेकिन वे बुजुर्ग भी उस ऑटो वाले के बाप निकले।

ऑटो वाला उन्हे जबरदस्ती बैठाना चाहता तो था लेकिन उन्होंने किराया पूछा तो ऑटो वाला बोला यहाँ से 15 रुपये लगते है लेकिन मैं 5 रुपये ही दूँगा। कई मिनट की माथापच्ची के बाद भी वह बुजुर्ग 5 रुपये से ज्यादा देने को राजी नहीं हुए। ऑटो वाला उन्हे लिये बिना आगे बढ़ चला। कुछ दूर आगे जाने के बाद ऑटो वाले के मन में पता नहीं क्या विचार आया कि उसने अपना ऑटो वापिस घूमा दिया। मैंने सोचा कि लगता है यह कुछ भूल आया है लेकिन जब ऑटो वाला फ़िर से उन बुजुर्ग के पास आकर रुका और बोला कि 10 रुपये देना है तो बैठो, लेकिन वह बुजुर्ग भी लगता था कि घर से खाली थे उन्होंने कहा कि चाहे मुझे यहाँ रात हो जाये मैं 5 रुपये में ही जाऊँगा। अबकी बार भी ऑटो वाला उन्हे ले जाने को तैयार नहीं हुआ। ऑटो वाले के मन में कुछ ना कुछ हलचल रही थी जिससे वह वही कुछ मिनट तक खड़ा। आखिरकार उन्हे लिये बिना हमारा ऑटो आगे बढ़ गया।

मदन महल स्टेशन से भेड़ाघाट लगभग 18 किमी से ज्यादा दूरी पर है। यह सड़क भेड़ाघाट नामक जगह से उल्टे हाथ धुआँधार जाने के लिये मुड़ जाती है उस मोड़ से धुआँधार कुल 5 किमी दूर रह जाता है। मोड़ से आगे निकलते ही जंगल के नजारे दिखने आरम्भ हो जाते है। वैसे भेड़ाघाट का रेलवे स्टेशन प्रपात से लगभग 7 किमी दूरी पर है। आगे जाने पर एक बैरियर आता है जहाँ पर आगे जाने वाले वाहनों से टोल टैक्स जैसा कुछ कर वसूल किया जा रहा था। 

जिस ऑटो में हम लोग बैठे थे यह शायद वही का लोकल था उसने उन्हे कुछ कहा जिससे उसे बिना कर दिये आगे जाने दिया गया। आगे जाने के बाद सड़क किनारे लगे बोर्ड़ से दिखायी देने लगा कि भेड़ाघाट का धुआँधार झरना/जलप्रपात आने वाला है। यहाँ एक मोड़ पर ऑटो से कई लोग उतर गये। मैं चुपचाप बैठा रहा। थोड़ा और आगे जाने पर ऑटो वाले ने अपना ऑटो सड़क किनारे खड़ा कर दिया और बोला कि ऑटो इससे आगे नहीं जाता है। मैंने कहा कि धुआँधार कहाँ है? उसका जवाब था कि सामने थोड़ी दूरी पर ही है। उसको 25 रुपये किराये के देने के बाद मैंने आगे चलना शुरु किया।

मैं अभी कुछ आगे ही चला था कि मुझे सामने एक पुल दिखायी देने लगा। मैं अभी उस पुल तक पहुँचता उससे पहले ही उल्टे हाथ सड़क किनारे एक ऊँची सी जगह दिखायी दी। यहाँ पर एक पक्का वाच टावर बना देखा। मैंने इस टावर पर चढ़कर आसपास के दूर-दूर तक के इलाके पर एक नजर ड़ालने के इरादे से उस टावर पर जा चढ़ा। इस टावर तक पहुँचने के 50-60 मीटर की चढ़ाई चढ़नी होती है उसके बाद एक पक्के प्लेटफ़ार्म पर चढ़ना होता है वहाँ की ऊँचाई से आसपास की जगह का नजारा शानदार दिखायी देता है। कुछ मिनट तक वहाँ खड़े होकर धुआँधार की उड़ती धुएँ जैसी धुन्ध को देखता रहा।

टावर से नीचे आने के बाद सामने दिखायी दे रहे धुआँधार जलप्रपात को देखने चल दिया। यहाँ पर नर्मदा नदी अपने पूरे जोश में दिखायी देती है। यह वही नर्मदा नदी है जिसे ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के पास देखा जाता है। वाच टावर से नीचे उतरने के बाद सामने एक पक्का पुल आता है इस पुल को पैदल ही पार करता हुआ धुआँधार के नजदीक जा पहुँचा। अभी सुबह सवेरे 7 बजे का ही समय हुआ था इसलिये नर्मदा के तट पर नहाने वाली जगह पर इक्का-दुक्का इन्सान ही दिखायी देता था। दूर से उड़ती पानी की धुन्ध देखकर मन उतावला हो रहा था कि जल्दी से धुआँधार प्रपात के सामने पहुँच जाऊँ और देखूँ कि आखिर ऐसा क्या है जो एक नदी का पानी यहाँ धुएँ में बदलता दिख रहा है। जैसे ही मैं इस धुआँधार जल प्रपात के ठीक सामने पहुँचा तो वहाँ का नजारा देख मेरे आश्चर्य का ठिकाना ही नहीं रहा। (जबलपुर यात्रा अभी जारी है)












सामने जो धुन्ध सी दिख रही है यही धुआँधार है।





सामने जो धुन्ध सी दिख रही है यही धुआँधार है।


11 टिप्‍पणियां:

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

धुंवा दिखाई नहीं दे रही

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

चार पहिया वाहन से सौ रुपये टैक्स! कमाल है! और इस टैक्स का होता क्या होगा? क्या यह जनता की भलाई में लगता होगा या फिर ठेकेदारों-अफसरों-व्यापारियों के द्वारा वापस.

रविकर ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

Vidhan Chandra ने कहा…

भगवान आपको पैसा और सामर्थ्य दे और इसी तरह आप घूमते रहें और अच्छी जानकारी देते रहें.

SACHIN TYAGI ने कहा…

सनदीप भाई रेल की चैन खिचनी नही पडी आप को।झरनो के लिए कल की पोसट का इनतजार रहैगा

Sushant Singhal ने कहा…

मैं सन्‌ 81 में भेड़ाघाट और धुआंधार देखने गया था और आज भी अपने सिर की त्वचा को खुरच - खुरच कर याद करने का प्रयास करता रहता हूं कि इतनी ऊंचाई से गिर रही नर्मदा और उससे धुआं बन - बन कर उड़ रही जल की बूंदें मेरे चेहरे पर गिरती हुई कितनी मन भावन प्रतीत हो रही थीं। वहीं झोंपड़ियों में मूर्तिकार छोटी - छोटी मूर्तियां और अन्य दर्शनीय खिलौने (मछली, बतख आदि) बना रहे थे । पांच रुपये की एक मूर्ति और एक मछली (जो वास्तव में पेपरवेट था) मैं भी खरीद लाया था। ठीक वही मूर्ति देहरादून के एक शो रूम में 75 रुपये की देखी थी।

ये सारे के सारे दृश्य जाट देवता की निगाह और कलम से देखना बहुत अच्छा लगेगा, ऐसी उम्मीद है। अभी तक का वर्णन बहुत सुखकर है, आशा है अगली कड़ी के लिये अधिक प्रतीक्षा नहीं करवायेंगे !

Ajay Kumar ने कहा…

बुढा भी पूरा खडूस था 5 रुपये मे ही जायेगा ।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जल धुंध मन मोह लेती है।

दर्शन कौर धनोय ने कहा…

उत्सुक हूँ ..आज तक सिर्फ पढ़ा था ..आज देखना नसीब होगा ...यहाँ से भाई मेरा हाथियों का एक सेट (७) लाया था ...काफी दिनों तक साथ रहा ..

SANUK LAL YADAV ने कहा…

रोमांचक एवं मनोहारी दृश्य।

SANUK LAL YADAV ने कहा…

रोमांचक एवं मनोहारी दृश्य।

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...