सोमवार, 3 दिसंबर 2012

जैसलमेर- बाबा रामदेव/रामदेवरा Baba Ramadevra (Pokhran)


जैसलमेर से रामदेवरा बाबा (रामलीला मैदान व कालाधन देश में वापिस लाने वाले रामदेव बाबा नहीं) जाने के लिये पोखरण होते हुए, जाते समय पोखरण की दूरी कोई 105 किमी के आसपास रही होगी। वहाँ की सडक एकदम चकाचक थी जिस कारण हम मुश्किल से डेढ़ घन्टे में पोखरण पहुँच गये थे। पोखरण से रामदेवरा बाबा की समाधी मात्र दस किमी दूर रह जाती है। यहाँ तक तो पहले लेख में बता दिया गया था। अब आगे चलते है। इस लेख में आपको राजस्थान के भक्ति भगवान के मन्दिरों, मजार, समाधी आदि में सबसे ज्यादा मान्यता प्राप्त/मशहूर बाबा रामदेवरा के दर्शन कराये जा रहे है। अब आपको बिना यहाँ गये बाबा की समाधी के दर्शन हो रहे है तो रामदेवरा बाबा की जय तो बोलनी ही पड़ेगी। आप जय बोलो मैं आगे की यात्रा शुरु करता हूँ।



जैसे ही बस से उतरे तो सामने ही सडक पार उल्टी दिशा में कुछ निजी बस वाले तथा जीप वाले रामदेवरा की आवाज लगा रहे थे। जिस बस में हम यहाँ तक आये थे उसी बस में हमारे साथ बैठी सवारियों ने हमें बता दिया था कि जहाँ आपको यह बस उतारेगी, ठीक उसी जगह से सड़क पार करके दूसरी दिशा में आपको रामदेवरा जाने के लिये बस या जीप तैयार मिल जायेगी। यहाँ यह स्पष्ट कर देना सही रहेगा कि रामदेवरा जाने वाला मार्ग जैसलमेर से जाते समय पोखरण शहर के बस स्थानक से थोडा सा पहले ही उल्टे हाथ मुड़ जाता है। पोखरण का बस अड़ड़ा जोधपुर जाने वाले हाई वे पर स्थित है। अगर आप जोधपुर से आ रहे है तो पोखरण पार करते ही सीधे हाथ रामदेवरा वाला मार्ग दिखाई दे जायेगा। यहाँ पोखरण का अपना रेलवे स्टेशन भी है जो बस अड़डे से मुश्किल से आधा किमी दूर भी नहीं है। 


हम पहले एक बस में सवार हो गये लेकिन दो तीन मिनट में देखा कि वह तो बस भर कर जायेगा। इसलिये हम बस से उतर कर एक जीप में बैठ गये। जीप वाले भी कम बदमाश नहीं होते है यह भी दस सवारी की जीप में 17-18 सवारी भूस की तरह ठूसकर ले जाते है। यहाँ यही ठूसना शब्द ज्यादा ही ज्यादा सही प्रतीत हो रहा है। हम पीछे वाली एक सीट पर बैठ गये थे। साधारण रुप से उस सीट पर सिर्फ़ दो सवारी बैठनी चाहिए लेकिन जीप वाले ने तीन-तीन सवारी बैठायी थी जबकि हम दो ही बैठे थे तो जीप वाला बोला भाई साहब आपके साथ एक सवारी और बैठेगी। हमने कहा हम अपने साथ और सवारी नहीं बैठा सकते है। अगर तुम्हारे यहाँ तीन सवारी ही बैठाने का चलन है तो हम तीसरी सवारी का भाड़ा दे देंगे लेकिन बैठेंगे दो ही। तीसरी सवारी के भाड़े मिलने की बात सुनते ही जीप वाले की बोलती जीभ बन्द हो गयी थी।


आखिरकार कुछ देर बाद हमारी जीप जिसमें हम घुसे हुए थे हमें लेकर रामदेवरा बाबा की समाधी की ओर चल पड़ी। जीप वाले ने राजस्थान की खाली चकाचक सड़को पर  रामदेवरा जाने में 15-16 मिनट का समय ही लगाया होगा। जब रामदेवरा का बस अड़डा आ गया तो सभी सवारियाँ बस अड़डे पर उतर गयी, हमें कौनसा जीप का अचार ड़ालना था हम भी सबके साथ जीप से उतर गये। जीप से उतरने के बाद एक मानव/बन्दे/इन्सान/व्यक्ति/आदमी/मानस/ (जो सही लगे मान लेना।) से रामदेवरा बाबा के मन्दिर के बारे में पूछा तो उसने बताया कि आपको बस अड़डे के पीछे जो तालाब दिखाई दे रहा है यह बाबा मन्दिर का ही तालाब है। आप इस तालाब के साथ-साथ चले जाओ आप सीधे मन्दिर के मुख्य दरवाजे पर पहुँच जाओगे।


हम उस तालाब की ओर चल पड़े, जब हम तालाब किनारे पहुँचे तो देखा कि तालाब का अधिकतर पानी सूख चुका है। पानी के निशान बता रहे थे कि बरसात में यहाँ शानदार झील का नजारा दिखाई देता होगा। यह तालाब या झील जो जी में आये कह लो, इस तालाब की लम्बाई लगभग पौने किमी के आसपास तो होगी ही। हम झील/तालाब के साथ चलते रहे, थोडी देर मॆं ही हम रामदेवरा बाबा (एक रामदेवराहा बाबा भी है) एक रामदेव बाबा पतंजलि वाले लेकिन यहाँ उनका कोई जिक्र नहीं हो रहा है। जब हम रामदेव बाबा मन्दिर के मुख्य द्धार पर पहुँचे तो हमें काफ़ी आश्चर्य हुआ क्योंकि हम तो शार्टकट से आये थे जिस कारण वहाँ की चकाचौंध नहीं देख पाये थे लेकिन जैसे ही मुख्य द्धार पर आये तो देखा कि वहाँ तो पूरी सड़क पर ही मेले जैसा माहौल बना हुआ है वहाँ आकर ऐसा लगा कि जैसे हम पहाडों पर किसी देवी के मन्दिर में जा रहे हो। 



मन्दिर में प्रवेश करने से पहले जूते उतारने होते है इसलिये हमें यहाँ भी जूते उतारने पड़ गये थे। जूते उतार कर हमने ऐसे ही उस सड़क पर खुले में रख दिये थे। वहाँ हमारी तरह सैकड़ों की संख्या में जूते-चप्पल बिखरे पड़े हुए थे। मुख्य द्धार पर जाँच के नाम पर एक मशीन से होकर जाना होता था। वह मशीन भी ठीक थी या नहीं इसका भी पता नहीं लग पाया था। अन्दर प्रवेश करते ही लोगों की नियन्त्रित करने के लिये बनायी गयी लोहे की जालीदार पाईप वाली गली से होते हुए हम आगे बढते रहे। यहाँ साल में एक बार पूरे महीने के लिये एक मेला लगता है जिसमें राजस्थान के अलावा हरियाणा गुजरात तक से लोगों की भीड़ यहाँ आती है। मेले के दौरान यह बात ध्यान देने योग्य है कि मेले में लगभग सभी तीर्थ यात्री पैदल ही यहाँ तक आते है। अगर आप यहाँ बीकानेर से कभी यहाँ आओ या बीकानेर जाओ तो रामदेवरा से पहले आपको सड़क किनारे दुनिया भर के जूते-चप्पल बिखरे मिल जायेंगे। गली मॆं ज्यादा लम्बी लाईन नहीं थी।


जल्दी ही हम मन्दिर के नजदीक पहुँच गये तो वहाँ जाकर हमें लाईन मिली जिसमें हमें भी लगना पड़ा था। काफ़ी लोग वहाँ चढ़ाने के लिये ढ़ेर सारा सामान लेकर आये थे हो सकता है कि उनमें से किसी की कोई मन्नत आदि पूरी हुई होगी। अपुन दोनों ठहरे घुमक्कड़ प्रजाति के प्राणी हम भगवान से ना कुछ माँगते है ना कुछ देते है। क्योंकि जो हमारे पास है वो सब उसी का तो दिया हुआ है। किसी पुस्तक (गीता) में लिखा है हम क्या लेकर आये थे, और क्या लेकर जायेंगे। जो कुछ है उसी का है जो खा लिया या पहन लिया बस वही अपना है। इस दुनिया में मुठ्ठी बन्द करके आये थे आखिर में वो भी खुली रह जायेगी। लाईन जब आगे बढ़ी तो देखा कि मेरे सीधे हाथ एक चाँदी से बना हुआ घोडे पर  रामदेवरा बाबा का चित्र दीवार पर लगा हुआ था। उसका एक फ़ोटुवा मैंने थारे देखन वास्ते खेंच लिया था। जैसे ही हम अन्दर दाखिल हुए तो वहाँ एक बोर्ड देखा जिस पर लिखा था समाधी का चित्र लेना मना है। खैर बोर्ड की बात तो एक बार मैं जाने भी देता लेकिन मुझे समाधी का फ़ोटो लेने का भीड़ के कारण मौका नहीं मिल पाया। मेरे पीछे वाले जल्दी चलो- जल्दी चलो का नारा लगा रहे थे। 


यहाँ आकर मन्दिर में समाधी देखकर मुझे थोडा झटका सा लगा क्योंकि जिसे हम समाधी कहते है असलियत में वह किसी की कब्र होती है। जैसे साँई बाबा की कब्र/समाधी या उस जगह किसी की अंतिम क्रियाकर्म हेतू लाया गया होता है। यहाँ रामदेवरा बाबा की कब्र की कहानी के बारे में बाद में बताऊँगा। पहले चलते है डालीबाई के कंगन की ओर (मीरा बाई मत समझ लेना वो तो हमारे सबसे मनमौजी भगवान श्रीकृष्ण की सच्ची भक्त थी) रामदेव बाबा को ड़ाली बाई एक पेड़ के नीचे मिली थी। यह पेड़ मन्दिर से तीन किमी दूर हाईवे के पास बताया गया है। यहाँ भादवा बोले तो सावन के बाद आने वाले महीने में विशाल मेला लगता है। जिसमें यात्रा सफ़ेद कपडे पहनकर आते है।


अब कुछ बाते बाबा रामदेव के बारे में भी हो जाये।

बाबा रामदेव चौदहवी शताब्दी के महान सन्त माने गये है। जन्म से वह एक तँवर राजपूत थे, हिन्दू उन्हें कृष्ण का अवतार मानते है। मुस्लिम उन्हें रामशाह पीर कहते है। वहाँ एक बुजुर्ग ने हमें बताया था कि बाबा रामदेव ने जिस परिवार में जन्म लिया था वह वहाँ के राजा थे। राजा भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे जिस कारण भगवान ने राजा अजमल राजा के यहाँ पुत्र के रुप में जन्म लिया था। रामदेव बाबा बहुत चमत्कार करते रहते थे। जिस कारण एक बार मक्का से पाँच मुस्लिम सूफ़ी रामदेव की परीक्षा लेने आये थे। जब सभी फ़कीर रामदेव से तर्क में हार गये तो उन्हें रामदेव की बात माननी पडी थी। आगे की असली कहानी विकी पीडिया पर पढ लीजिये यह उसका लिंक है।


रामदेव बाबा के बारे में ज्यादा जानने के लिये यह लिंक जरुर देखे


पाँच मुस्लिम पीरों से मिलना व विजयी होना।

चमत्कार होने से लोग गांव गांव से रूणिचा आने लगे। यह बात मौलवियों और पीरों को नहीं भाई। जब उन्होंने देखा कि इस्लाम खतरे में पड़ गया और मुसलमान बने हिन्दू फिर से हिन्दू बन रहे हैं और सोचने लगे कि किस प्रकार रामदेव जी को नीचा दिखाया जाय और उनकी अपकीर्ति हो। उधर भगवान श्री रामदेव जी घर घर जाते और लोगों को उपदेश देते कि उँच-नीच, जात-पात कुछ नहीं है, हर जाति को बराबर अधिकार मिलना चाहिये। पीरों ने श्री रामदेव जी को नीचा दिखाने के कई प्रयास किये पर वे सफल नहीं हुए। अन्त में सब पीरों ने विचार किया कि अपने जो सबसे बड़े पीर जो मक्का में रहते हैं उनको बुलाओ वरना इस्लाम नष्ट हो जाएगा। तब सब पीर व मौल्वियों ने मिलकर मक्का मदीना में खबर दी कि हिन्दुओं में एक महान पीर पैदा हो गया है, मरे हुए प्राणी को जिन्दा करना, अन्धे को आँखे देना, अतिथियों की सेवा करना ही अपना धर्म समझता है, उसे रोका नहीं गया तो इस्लाम संकट में पड़ जाएगा। यह खबर जब मक्का पहुँची तो पाँचों पीर मक्का से रवाना होने की तैयारी करने लगे। कुछ दिनों में वे पीर रूणिचा की ओर पहुँचे। पांचों पीरों ने भगवान रामदेव जी से पूछा कि हे भाई रूणिचा यहां से कितनी दूर है, तब भगवान रामदेवजी ने कहा कि यह जो गांव सामने दिखाई दे रहा है वही रूणिचा है, क्या मैं आपके रूणिचा आने का कारण पूछ सकता हूँ ? तब उन पाँचों में एक पीर बोला हमें यहां रामदेव जी से मिलना है और उसकी पीराई देखनी है। जब प्रभु बोले हे पीरजी मैं ही रामदेव हूँ आपके समाने खड़ा हूँ कहिये मेरे योग्य क्या सेवा है। श्री रामदेव जी के वचन सुनकर कुछ देर पाँचों पीर प्रभु की ओर देखते रहे और मन ही मन हँसने लगे। रामदेवजी ने पाँचों पीरों का बहुत सेवा सत्कार किया। प्रभू पांचों पीरों को लेकर महल पधारे, वहां पर गद्दी, तकिया और जाजम बिछाई गई और पीरजी गद्दी तकियों पर विराजे मगर श्री रामदेव जी जाजम पर बैठ गए और बोले हे पीरजी आप हमारे मेहमान हैं, हमारे घर पधारे हैं आप हमारे यहां भोजन करके ही पधारना। इतना सुनकर पीरों ने कहा कि हे रामदेव भोजन करने वाले कटोरे हम मक्का में ही भूलकर आ गए हैं। हम उसी कटोरे में ही भोजन करते हैं दूसरा बर्तन वर्जित है। हमारे इस्लाम में लिखा हुआ है और पीर बोले हम अपना इस्लाम नहीं छोड़ सकते आपको भोजन कराना है तो वो ही कटोरा जो हम मक्का में भूलकर आये हैं मंगवा दीजिये तो हम भोजन कर सकते हैं वरना हम भोजन नहीं करेंगे। तब रामदेव जी ने कहा कि हे पीर जी राम और रहीम एक ही है, इसमें कोई भेद नहीं है, अगर ऐसा है तो मैं आपके कटोरे मंगा देता हूँ। ऐसा कहकर भगवान रामदेव जी ने अपना हाथ लम्बा किया और एक ही पल में पाँचों कटोरे पीरों के सामने रख दिये और कहा पीर जी अब आप इस कटोरे को पहचान लो और भोजन करो। जब पीरों ने पाँचों कटोरे मक्का वाले देखे तो पाँचों पीरों को अचम्भा हुआ और मन में सोचने लगे कि मक्का कितना दूर है। यह कटोरे हम मक्का में छोड़कर आये थे। यह कटोरे यहां कैसे आये तब पाँचों पीर श्री रामदेव जी के चरणों में गिर पड़े और क्षमा माँगने लगे और कहने लगे हम पीर हैं मगर आप महान् पीर हैं। आज से आपको दुनिया रामापीर के नाम से पूजेगी। इस तरह से पीरों ने भोजन किया और श्री रामदेवजी को पीरों के पीर की पदवी मिली और रामसापीर, रामापीर कहलाए। रामदेव बाबा ने इन पीरों से कहा कि ठीक है अब यहाँ आ ही गये हो तो यहाँ शांति का संदेश इस देश में फ़ैलाओ। वे पीर आये तो थे कुछ और करने लेकिन उन्हें रामदेव बाबा के कारण यही रहकर समाज सेवा करनी पड गयी। अब जाकर मेरी समझ में आया कि इन्हें पीर क्यों कहते है तथा इनकी समाधी/कब्र क्यों बनायी गयी है।


बाबा डोली बाई को बहिन कहते थे। बाबा की समाधी से आगे चलते ही डोली बाई का कंगन दिखाई देता है बताते है कि जो कोई इस कंगन से निकल जाता है उसे डोली बाई का आशीर्वाद मिल जाता है। हम इस कंगन को देख बाहर आ गये। हमें भूख लगी थी। शाम होने में अभी समय था। पहले एक ढ़ाबे पर जाकर भर पेट भोजन किया गया था। उसके बाद यह पता लगाया कि बीकानेर जाने वाली रेल कब आयेगी? जवाब मिला रात को साढ़े गयारह बजे। हम वहाँ सार घन्टे बर्बाद नहीं कर सकते थे अत: हमने वहाँ से बस पकड़ कर बीकानेर जाने का निश्चय किया।  

अगले लेख से आपको बीकानेर की मस्त सैर करायी जायेगी। जिसमें चूहों वाला दशनोक मन्दिर, बीकानेर का किला, रेत की रंगीन शाम।








9 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

रोचक यात्रा संस्मरण..

पी.एस .भाकुनी ने कहा…

shabd evm chitr ! dono prashanshniy, rochak prastuti..abhar....

पी.एस .भाकुनी ने कहा…

shabd evm chitr ! dono prashanshniy, rochak prastuti..abhar....

Virendra Kumar Sharma ने कहा…


आपका आई लेंस साक्षात मिलवा देता है ,हमने भी दर्शनाभिलाशी कतार में ला खड़ा करता है .ज़वाब नहीं आपके छायांकन और दरियादिली यायावरी का .

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल 4/12/12को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका स्वागत है

Arti ने कहा…

Aaj bahut dino ke baad aapke blog pe ayi. Sabse pehle Gangotri aur Gaumukh ki sari posts padhi :) Dil khush ho gaya tasveerien dekh kar aur lekh padh kar :) Mujhe meri 4 Dham Yatra yaad aa gayi :)
Ab Rajasthan ki posts bhi padhni chalu ki hai. Shubh Ratri :)

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

इन मनोरम यात्राओं का दुर्लभ चित्रमय वृत्तांत आँखों देखा हाल निरंतर सुनाने के साथ साथ आप अपनी टिपण्णी से भी नवाज़ रहें हैं आम औ ख़ास को .आपकी टिपण्णी हमारी शान है .शुक्रिया .

Virendra Kumar Sharma ने कहा…


जैसलमेर का सफर बढिया रहा यौन मार्ग में बड़ी फिसलन है यौन संचारी रोग उग्र हो रहें हैं हमारे फिरंगी पन के साथ .

Vishal Rathod ने कहा…

जय राम जी की . बाबा रामदेव के बारे में पढकर अच्छा लगा. मैंने एक बहुत बड़ा कमेन्ट लिखा था लेकिन जब पब्लिश करने गया तो कुछ गडबड हो गयी. लगता है भगवान की मर्जी नहीं थी के मैं वह लिखू.

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